bablie Bhardwaj

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20/07/2026
18/07/2026

11/07/2026

05/07/2026

Dham

03/07/2026

जीवन के तीन अमिट पन्ने
​मीरा आज अपनी नन्हीं बेटी को पालने में झुलाते हुए खिड़की के बाहर देख रही थी। हवा के ठंडे झोंकों के साथ उसका मन यादों के गलियारे में पीछे मुड़ गया। उसने अपनी दादी से कभी सुना था कि एक औरत अपने जीवन में चाहे सब कुछ भूल जाए, पर तीन मौकों पर उसके साथ किया गया व्यवहार वह कभी नहीं भूल सकती। आज माँ बनने के बाद मीरा को समझ आया कि वह बात कितनी गहरी और सच थी।
​1. शादी के बाद का व्यवहार: नए घर में पहला कदम
​वह दिन मीरा को आज भी याद है जब वह अपना मायका छोड़कर एक बिल्कुल अनजान घर में आई थी। दिल में अजीब सी घबराहट थी कि लोग कैसे होंगे, कोई गलती हो गई तो क्या होगा?
​शादी की अगली सुबह जब वह संकोच में डूबी रसोई में खड़ी थी, तब उसकी सास ने उसके सिर पर हाथ रखा और कहा, "बेटा, आज से यह तुम्हारा भी घर है। यहाँ गलती करने से डरना मत, हम सब साथ हैं।" उसी शाम उसके पति ने उसके हाथ में उसकी पसंदीदा कॉफी थमाते हुए कहा था, "तुम्हें इस घर में अपनी पहचान खोने की ज़रूरत नहीं है।"
​असर: शादी के शुरुआती दिनों में मिला वह सम्मान और अपनापन मीरा के दिल में हमेशा के लिए दर्ज हो गया। उसने महसूस किया कि वह सिर्फ एक बहू बनकर नहीं, बल्कि एक बेटी बनकर इस घर में आई है।
​2. डिलीवरी का समय: जब जिंदगी और मौत के बीच का फासला था
​वक्त बदला, और कुछ साल बाद मीरा अस्पताल के लेबर रूम में थी। वह दर्द ऐसा था जिसे शब्दों में बयां नहीं किया जा सकता था। डर, घबराहट और असहनीय पीड़ा से मीरा का बुरा हाल था।
​उस नाज़ुक और बेहद संवेदनशील वक्त में, जब डॉक्टर और नर्सों ने उसे डांटने के बजाय ममता से संभाला, और उसका पति लगातार उसका हाथ थामे रहा, तो मीरा को लगा कि वह इस जंग को जीत सकती है। आरव ने उसके माथे के पसीने को पोंछते हुए कहा था, "मीरा, तुम बहुत बहादुर हो, बस थोड़ा सा हौसला और..."
​असर: प्रसव (delivery) के उस अत्यंत कठिन समय में मिला वह मानसिक सहारा मीरा कभी नहीं भूल सकती। उस वक्त की गई एक-एक बात और हर एक व्यवहार उसके अंतर्मन में हमेशा के लिए छप गया।
​3. डिलीवरी के बाद का दौर: जब शरीर और मन दोनों कमजोर थे
​बच्चे के जन्म की खुशी तो बड़ी थी, लेकिन डिलीवरी के बाद का समय मीरा के लिए शारीरिक और मानसिक रूप से सबसे नाजुक दौर था। शरीर टूट चुका था, रातों की नींद गायब थी और हार्मोनल बदलावों के कारण वह बेवजह रो पड़ती थी।
​ऐसे समय में परिवार का व्यवहार उसके लिए संजीवनी जैसा था। सास ने बच्चे को गोद में लेकर मीरा से कहा, "तुम जाकर आराम करो मीरा, माँ बनने के साथ-साथ तुम्हारा शरीर ठीक होना भी ज़रूरी है।" पति ने रात को जागकर बच्चे के डायपर बदले ताकि मीरा अपनी नींद पूरी कर सके। किसी ने उस पर उंगली नहीं उठाई, बल्कि सबने उसे संभाला।
​असर: माँ बनने के बाद (Postpartum) मिले इस निस्वार्थ प्यार और तीमारदारी ने मीरा को डिप्रेशन से बचाया और उसे दोबारा पूरी ताकत से खड़े होने का हौसला दिया।
​मीरा ने मुस्कुराकर अपनी सोती हुई बेटी का माथा चूमा। उसे अहसास हुआ कि इन तीन पलों में मिले व्यवहार ने ही उसे इस घर से, इसके लोगों से आत्मा के स्तर पर जोड़ दिया था। यही वो तीन पल थे जिन्होंने मीरा को एक सहमी हुई लड़की से एक मजबूत और खुशहाल औरत बना दिया था।
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01/07/2026

यहाँ एक छोटी और दिल को छू लेने वाली कहानी है:
# # # आखिरी पन्ना
शहर की एक व्यस्त सड़क के कोने पर चाय की एक छोटी सी दुकान थी। वहाँ साठ साल के एक बुजुर्ग, जिन्हें सब 'दादा' कहते थे, चाय बनाते थे। दादा की चाय जितनी मीठी थी, उनका स्वभाव भी उतना ही नरम था। लेकिन उनकी एक अजीब आदत थी—जब भी कोई बच्चा उनकी दुकान के सामने से गुजरता, वो अपनी जेब से एक रंग-बिरंगी टॉफ़ी निकालकर मुस्कुराते हुए उसे दे देते।
उसी सड़क से रोज़ नौ साल का राहुल अपनी माँ के साथ गुज़रता था। राहुल के पैर में चोट के कारण वह ठीक से चल नहीं पाता था, इसलिए उसकी माँ उसे रोज़ व्हीलचेयर पर स्कूल ले जाती थी। राहुल को देखकर दादा की मुस्कान और गहरी हो जाती। वो रोज़ दौड़कर आते और राहुल को उसकी पसंदीदा आम वाली टॉफ़ी देते। राहुल के चेहरे पर आई वो मासूम मुस्कान दादा का पूरा दिन बना देती थी।
यह सिलसिला महीनों तक चला। दोनों के बीच कोई लंबी बात नहीं होती थी, बस एक टॉफ़ी और दो मुस्कान का रिश्ता था।
फिर एक दिन, अचानक दादा दुकान पर नहीं दिखे। उनकी जगह एक नया लड़का चाय बना रहा था। राहुल ने अपनी माँ से पूछा, लेकिन किसी को कुछ नहीं पता था। दो दिन बीते, चार दिन बीते, पूरा हफ़्ता गुज़र गया। राहुल उदास रहने लगा। उसे टॉफ़ी की चाहत नहीं थी, उसे दादा की उस निस्वार्थ मुस्कान की कमी खल रही थी।
दसवें दिन, जब राहुल स्कूल से लौट रहा था, तो उसने दुकान पर दादा को बैठे देखा। वे बहुत कमज़ोर लग रहे थे, जैसे किसी लंबी बीमारी से उठे हों। राहुल का चेहरा खिल उठा।
जैसे ही व्हीलचेयर पास पहुँची, दादा खड़े हुए। उनके हाथ काँप रहे थे। उन्होंने अपनी जेब में हाथ डाला, लेकिन इस बार जेब खाली थी। बीमारी के कारण वे टॉफ़ी लाना भूल गए थे। दादा की आँखों में एक अजीब सी लाचारी और शर्मिंदगी आ गई। उन्होंने अपनी नज़रें झुका लीं, मानो वे राहुल से आँखें नहीं मिला पा रहे थे।
राहुल ने दादा की खामोशी को समझ लिया। उसने मुस्कुराते हुए अपनी स्कूल बैग की ज़िप खोली। उसने अपनी छोटी सी हथेली आगे बढ़ाई—उसमें एक नहीं, बल्कि दस आम वाली टॉफ़ियाँ थीं।
राहुल ने बहुत प्यार से कहा, **"दादा, रोज़ आप मुझे अपनी जेब से खुशियाँ देते थे। आज मेरी जेब से थोड़ी सी खुशी आप रख लीजिए।"**
बुजुर्ग दादा की आँखों से आँसू छलक पड़े। उन्होंने राहुल को गले से लगा लिया। उस दिन बिना कुछ कहे भी, दो अलग-अलग पीढ़ियों के दिलों ने एक-दूसरे की बात पूरी तरह सुन ली थी।
> **सीख:** दिल को छूने के लिए बड़े-बड़े शब्दों या महंगे तोहफों की ज़रूरत नहीं होती। बस एक छोटा सा निस्वार्थ एहसास ही काफी होता है।
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