16/11/2023
असमाख्येय अपरिमित भगवन्! नारायण देवेश तुम्हारी
अद्भुत स्निग्धप्रेम महिमा को नहीं समझपायी मति हारी।
शय्यासन क्रीडा विहार में जो उपहास किया अति भारी
उसे क्षमा कर दो मेरे प्रभु जगन्निवास ! मैं शरण तुम्हारी ।।३५।।