02/08/2026
# डिग्री बढ़ रही है, नौकरियाँ कहाँ हैं? भारत के युवाओं के सामने ‘जॉबलेस ग्रोथ’ का संकट
भारत आज दुनिया की सबसे युवा बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में से एक है। हमारे विश्वविद्यालयों से हर साल लाखों युवा डिग्री लेकर निकल रहे हैं। परिवार अपनी बचत का बड़ा हिस्सा बच्चों की शिक्षा पर खर्च कर रहे हैं। छोटे शहरों और गाँवों तक उच्च शिक्षा की आकांक्षा पहुँची है।
लेकिन इसी सफलता के पीछे एक बेचैन करने वाला सवाल खड़ा है—
**अगर भारत की अर्थव्यवस्था तेजी से बढ़ रही है, तो पढ़े-लिखे युवाओं को अच्छी नौकरियाँ क्यों नहीं मिल रही हैं?**
यही आज भारत की Gen Z के सामने सबसे बड़े आर्थिक विरोधाभासों में से एक है।
# # जितनी ऊँची शिक्षा, उतनी बड़ी बेरोज़गारी?
Periodic Labour Force Survey यानी **PLFS 2023–24** के आँकड़ों पर आधारित पीढ़ीगत विश्लेषण एक गंभीर तस्वीर पेश करता है।
Gen Z में बेरोज़गारी लगभग **11.9%** बताई गई है, जबकि Millennials में यह करीब **2%** है।
लेकिन सबसे चिंताजनक तस्वीर graduates के बीच दिखाई देती है।
युवा पुरुष graduates में बेरोज़गारी लगभग **29%**, जबकि युवा महिला graduates में करीब **36.9%** तक पहुँच जाती है।
यानी जिस शिक्षा को रोजगार की सीढ़ी माना गया था, उसी सीढ़ी के अंतिम पायदान पर बड़ी संख्या में युवा नौकरी का इंतजार कर रहे हैं।
इसे केवल बेरोज़गारी कहना पर्याप्त नहीं है।
यह भारत की **‘educated unemployment’ यानी शिक्षित बेरोज़गारी** की समस्या है।
# # नौकरी मिल भी जाए, तो कैसी नौकरी?
भारत की रोजगार समस्या का दूसरा पहलू और भी महत्वपूर्ण है।
सवाल केवल यह नहीं है कि **कितने लोगों को काम मिला?**
सवाल यह भी है कि—
**कैसा काम मिला?**
युवाओं का बड़ा हिस्सा ऐसे रोजगार में है जहाँ स्थायी contract, social security, pension, insurance या लंबे समय की job security उपलब्ध नहीं है।
PLFS आधारित विश्लेषण के अनुसार Gen Z workers के बड़े हिस्से को social-security benefits उपलब्ध नहीं हैं और केवल एक छोटा हिस्सा formal written contracts के तहत काम करता है।
इसलिए headline unemployment rate पूरी कहानी नहीं बताती।
एक युवा technically ‘employed’ हो सकता है, लेकिन वह अपनी qualification से बहुत नीचे का काम कर रहा हो सकता है।
वह gig worker हो सकता है।
Temporary contract पर हो सकता है।
Casual employment में हो सकता है।
या ऐसी नौकरी कर रहा हो सकता है जिसमें आय इतनी कम हो कि आर्थिक स्वतंत्रता संभव ही न हो।
यानी—
**नौकरी है, लेकिन सुरक्षा नहीं।
काम है, लेकिन पर्याप्त आय नहीं।
डिग्री है, लेकिन qualification के अनुरूप रोजगार नहीं।**
# # क्या भारत ‘Jobless Growth’ की ओर बढ़ रहा है?
यहीं से **Jobless Growth** की बहस शुरू होती है।
भारत तेज आर्थिक वृद्धि दर्ज कर सकता है। GDP 6–7 प्रतिशत या उससे अधिक की दर से बढ़ सकती है।
लेकिन GDP बढ़ना और उसी अनुपात में रोजगार पैदा होना एक ही बात नहीं है।
यदि उत्पादन और productivity तेजी से बढ़ें, लेकिन पर्याप्त संख्या में **स्थायी, उत्पादक और अच्छी आय वाले रोजगार** न बनें, तो आर्थिक वृद्धि का लाभ रोजगार बाजार तक सीमित रूप से पहुँचता है।
इसी चिंता को व्यापक रूप से **jobless growth** कहा जाता है।
भारत के विकास मॉडल की संरचना भी इस बहस को महत्वपूर्ण बनाती है।
चीन और कई पूर्वी एशियाई देशों ने industrialisation के दौरान करोड़ों लोगों को agriculture से निकालकर **labour-intensive manufacturing** में लगाया।
Factories ने relatively कम-skilled workers को भी बड़े पैमाने पर absorb किया।
भारत की कहानी अलग रही।
भारत ने IT, finance, digital services और skill-intensive services में शानदार सफलता हासिल की।
लेकिन समस्या यह है कि ये sectors बहुत अधिक economic value तो पैदा कर सकते हैं, पर भारत जैसे विशाल देश के करोड़ों workers को उसी पैमाने पर रोजगार देना कठिन है।
यानी—
**GDP में contribution बड़ा हो सकता है, लेकिन employment absorption उतना बड़ा होना जरूरी नहीं।**
# # भारत का ‘Missing Middle’
भारत की अर्थव्यवस्था की एक संरचनात्मक समस्या यह भी है कि बड़ी workforce अभी भी agriculture में लगी हुई है, जबकि national output में agriculture का हिस्सा उससे काफी कम है।
इसका अर्थ है कि बड़ी संख्या में workers relatively low-productivity activities में फँसे हुए हैं।
आदर्श structural transformation यह होना चाहिए था—
**Agriculture → Manufacturing → Modern Services**
लेकिन भारत में यह परिवर्तन अधूरा रहा।
हमने agriculture से सीधे services की ओर छलांग तो लगाई, लेकिन labour-intensive manufacturing वह विशाल employment engine नहीं बन पाया जिसकी भारत जैसे देश को आवश्यकता थी।
यही भारत के रोजगार मॉडल का **‘missing middle’** है।
# # कंपनियाँ कहती हैं—Skills नहीं हैं; युवा कहते हैं—Jobs नहीं हैं
इस संकट का एक और विरोधाभास है।
एक तरफ employers शिकायत करते हैं कि उन्हें industry-ready skilled workers नहीं मिल रहे।
दूसरी तरफ लाखों graduates कहते हैं कि उन्हें नौकरी नहीं मिल रही।
दोनों बातें एक साथ सही हो सकती हैं।
क्योंकि समस्या केवल education की quantity नहीं है।
समस्या है—
**Education और employability के बीच mismatch।**
हमारे colleges लाखों degrees पैदा कर रहे हैं, लेकिन क्या वे उतनी ही तेजी से market-relevant skills पैदा कर रहे हैं?
आज AI, automation और digitalisation entry-level jobs की प्रकृति बदल रहे हैं।
ऐसे में केवल degree होना पर्याप्त नहीं रह गया है।
युवाओं को communication, analytical ability, digital skills, technical competence और rapidly changing technologies के साथ adapt करने की क्षमता भी चाहिए।
लेकिन इसका पूरा बोझ युवाओं पर डालना भी गलत होगा।
अगर करोड़ों लोग बेहतर skills हासिल कर लें, तब भी अर्थव्यवस्था को उनके लिए **पर्याप्त productive jobs पैदा करनी ही होंगी।**
# # महिलाओं के लिए संकट और गहरा
इस पूरी कहानी में युवा महिलाओं की स्थिति विशेष चिंता का विषय है।
Urban Gen Z women में unemployment करीब **22.6%** बताई गई है।
इसके पीछे केवल jobs की कमी नहीं है।
Workplace safety, mobility, unpaid care work, सामाजिक अपेक्षाएँ, childcare और suitable employment opportunities की कमी भी महिलाओं की labour-market participation को प्रभावित करती हैं।
इसलिए महिलाओं की शिक्षा में भारत की उपलब्धियों को वास्तविक आर्थिक सशक्तीकरण में बदलने के लिए केवल colleges खोलना पर्याप्त नहीं होगा।
हमें ऐसी अर्थव्यवस्था भी बनानी होगी जहाँ educated women वास्तव में workforce में प्रवेश कर सकें और बने रह सकें।
# # Demographic Dividend अपने आप नहीं मिलता
भारत की युवा आबादी को लंबे समय से हमारी सबसे बड़ी ताकत बताया जाता रहा है।
लेकिन **demographic dividend कोई automatic dividend नहीं है।**
युवा आबादी तभी आर्थिक संपत्ति बनती है जब वह—
**शिक्षित हो,
कुशल हो,
स्वस्थ हो,
और उत्पादक रोजगार में हो।**
कल्पना कीजिए उस पीढ़ी की जो अपने माता-पिता से अधिक पढ़ी-लिखी है।
जिसके पास smartphone है।
जो दुनिया देख रही है।
जिसकी aspirations पहले से कहीं अधिक हैं।
लेकिन जिसके सामने स्थायी और सम्मानजनक रोजगार के अवसर सीमित हैं।
यह स्थिति केवल आर्थिक समस्या नहीं रहती।
लंबे समय में यह **सामाजिक निराशा, असमानता और संस्थाओं के प्रति असंतोष** को भी जन्म दे सकती है।
# # भारत को सिर्फ Growth नहीं, Job-Rich Growth चाहिए
इसलिए भारत की सफलता का पैमाना केवल यह नहीं होना चाहिए कि GDP कितनी तेजी से बढ़ी।
हमें यह भी पूछना होगा—
**उस growth ने कितनी नौकरियाँ पैदा कीं?**
कितनी नौकरियाँ formal थीं?
कितनी नौकरियों में social security थी?
कितने graduates को उनकी qualification के अनुरूप रोजगार मिला?
और कितनी महिलाओं को वास्तव में workforce में शामिल होने का अवसर मिला?
भारत ने करोड़ों युवाओं को स्कूल और कॉलेज तक पहुँचाने में बड़ी सफलता हासिल की है।
अब अगली और शायद कठिन परीक्षा है—
**क्या हम उन शिक्षित युवाओं के लिए पर्याप्त अच्छे रोजगार पैदा कर सकते हैं?**
क्योंकि किसी अर्थव्यवस्था की सफलता केवल इस बात से तय नहीं होती कि वह कितना उत्पादन करती है।
यह भी महत्वपूर्ण है कि उस समृद्धि में **कितने लोगों की हिस्सेदारी है।**
भारत को केवल तेज GDP growth नहीं चाहिए।
**भारत को रोजगार पैदा करने वाली—Job-Rich Growth चाहिए।**
और शायद आने वाले दशक में भारत की आर्थिक सफलता का सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यही होगा—
**क्या हमारी अर्थव्यवस्था उतनी तेजी से अच्छे रोजगार पैदा कर पाएगी, जितनी तेजी से हमारे युवाओं की आकांक्षाएँ बढ़ रही हैं?**
**स्रोत:** Periodic Labour Force Survey (PLFS) 2023–24, National Statistical Office (NSO), भारत सरकार; Gen Z संबंधी प्रतिशत PLFS आँकड़ों पर आधारित पीढ़ीगत विश्लेषण से।