20/07/2021
सह अस्तित्व में एक नियम सहज काम करता है कि जिसके पास जो है वह उसे बांटता ही है । जैसे जिसके पास भ्रम है , गलती है , क्रोध है , भय है नासमझी है ,वह उसे ही बांटता है ।
इस पर एक शिविर में किसी ने प्रश्न किया कि अमुक ( जैसे अंबानी ) के पास इतना धन है , वह तो अपने धन को बांटता नहीं फिरता ।
प्रबोधक से उत्तर आया कि वह धन अमुक का जैसे , ( अंबानी) का है ही नहीं , अगर वह यह जानता कि धन उसका है तो सदुपयोग ( बांटता ) करता । वह तो अपने को उसका चौकीदार मानता है , उसकी सुरक्षा के उपक्रम करते रहता है ।अपनी मुख्य जिम्मेदारी उसको बढ़ाने की मानता है । किसी भी तरीके से उसे बढ़ाने में लगा हुआ है ।
प्राय
लोगों को शिकायत होती है कि मैं बेटे को , फलाने को समझाने की खूब कोशिश करता हूं वह समझता ही नहीं , समझना ही नहीं चाहता । ऐसा वह जानबूझकर करता है , मुझे दुखी करने के लिए करता है ।।।
यहां यह नियम काम क्यों नहीं करता ?
सरल उत्तर है कि वे अपने को समझदार मानते हैं , (हैं या नहीं ये जानना नहीं चाहते ) ।
और समझदारी ऐसी चीज है जिसको प्रसाद की तरह बांटा नहीं जा सकता है ।। समझदारी को केवल जीया जा सकता है ।
जीने में प्रमाणित कर दिया है तभी दूसरा अनुकरण , अनुसरण से समझता ( समझ सकता ) है । समझदार प्रमाणित मानव समझाने में सफल ही होता है ।
नहीं तो
वृद्धावस्था में लोग अधिक शिकायत करते पाए जाते हैं कि सारी जिंदगी समझाता रहा हूं कोई समझने को तैयार नहीं हैं । सब अपने मतलब की दुनिया है । बस आखिरी दिनों में जोड़ा हुआ पैसा ही अपना है ।
इससे भी अधिक
जीवन एक संघर्ष है ,
सुख दुख साथ हैं ,
संसार माया है
कुछ समझ नहीं आया है ।
ये ही अंतिम ज्ञान है ।