Suraj shrivastav

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मद्य (Alcohal) के गुण

मद्य (Alcohal) के गुण- सभी प्रकार के युक्ति पूर्वक सेवन किये गये मद्य के गुण हैं- दीपन (जठराग्नि को तीव्र करने वाला Appetisers), रुचिकारक (भोजन में रुचि उत्पन्न करने वाला), तीक्ष्ण, उष्ण, तुष्टि१ (मन को सन्तुष्ट Satisfied) करने वाला, पुष्टि१ (शरीर का पोषण) करने वाला, स्वादु (मधुर), तिक्त (Bitter or Pungent), कटु, अम्ल पाक, अम्ल रस, सर (विरेचक), कषाय (Astringent), स्वर- आरोग्य-प्रतिभा और वर्ण को बढ़ाने वाले, लघु, जिनकी निद्रा नष्ट हो गयी हो अर्थात् निद्रा न आती हो (Insomnia) या निद्रा बहुत आती हो उनके लिये लाभकारक (इन दोनों स्थितियों में सुधार लाने वाला), पित्तास्त्र (पित्त-रक्त) को दूषित करने वाला, कृश और स्थूल दोनों के लिये लाभकारक, रूक्ष और सूक्ष्म स्रोतसों में प्रवेश कर उसका शोधन करने वाला तथा वातकफनाशक हैं। बिना युक्ति (अतिमात्रा) के सेवन किया गया मद्य विष के समान मारक होता है।

विमर्श- मद्यपान से अम्लता के लक्षण के रूप में दन्तहर्ष, मुखस्त्राव आदि लक्षण उत्पन्न होते हैं। च.चि. २४/११६ में कहा गया है कि- "सर्वेषां मद्यमम्लानामुपर्युपरि तिष्ठति।" मद्य में लवण रस के अतिरिक्त सभी पांचों रस होते हैं, जिसमें अम्ल रस की प्रधानता होती है। सुश्रुत सू. ४५ में कहा गया है कि- जब तक मद्य सेवन युक्तियुक्त अर्थात् उचित है गुणकारक होता है और इसके बाद का सेवन किया गया मद्य विष के समान मारक होता है।

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