आर्द्रा नक्षत्र और उसमे जन्म लेने वाले जातको की व्याख्या!!
वैदिक ज्योतिष के अनुसार कुंडली से की जाने वाली गणनाओं के लिए महत्वपूर्ण माने जाने वाले सताइस नक्षत्रों में से आर्द्रा नक्षत्र को छठा नक्षत्र माना जाता है। आर्द्र का शाब्दिक अर्थ है नम तथा आर्द्रा का शाब्दिक अर्थ है नमी और इस नमी को विभिन्न वैदिक ज्योतिषी भिन्न भिन्न क्षेत्रों से जुड़े भिन्न अर्थों के साथ जोड़ते हैं। कहीं इस नमी को वर्षा के पश्चात सूर्य की तीव्र किरणों का कारण वातावरण में आने वाली नमी माना जाता है तो कहीं आंख में आने वाले आंसूओं को भी इस नमी के साथ जोड़ा जाता है। वैदिक ज्योतिष के अनुसार कहीं आंसू की एक बूंद तथा कहीं हीरे को आर्द्रा नक्षत्र का प्रतीक चिन्ह माना जाता है। कुछ वैदिक ज्योतिषी यह मानते हैं कि इस नक्षत्र का प्रतीक चिन्ह आंसू की बूंद ही होना चाहिए क्योंकि यह प्रतीक चिन्ह इस नक्षत्र के नाम का साथ मेल खाता है। वहीं पर कुछ अन्य वैदिक ज्योतिषी हीरे को ही आर्द्रा नक्षत्र का मुख्य प्रतीक चिन्ह मानते हैं। आर्द्रा नक्षत्र परिवर्तन तथा नवीकरण को दर्शाता है तथा कई बार यह परिवर्तन कुछ अनचाही घटनाओं के फलस्वरुप होता है। उदाहरण के लिए, खेती के लिए सबसे अधिक उपजाऊ भूमि का निर्माण ज्वालामुखी फटने का बाद उसके लावे के ठंडे हो जाने से बनने वाली भूमि से ही होता है जबकि ज्वालामुखी का फटना अपने आप में एक अनचाही घटना है तथा कई बार ज्वालामुखी फटने के कारण जान माल की बहुत हानि भी हो सकती है। इस प्रकार वैदिक ज्योतिष के अनुसार आर्द्रा उस परिवर्तन को दर्शाता है जिसके आने का कारण कोई अनचाही तथा भयावह घटना हो सकती है। वैदिक ज्योतिष के अनुसार भगवान शिव के रुद्र रुप को आर्द्रा नक्षत्र का अधिपति देवता माना जाता है। रुद्र भगवान शिव का उग्र तथा प्रलयंकारी रुप माना जाता है तथा यह माना जाता है कि जब जब भगवान शिव रुद्र रुप धारण करते हैं, किसी न किसी प्रकार की प्रलयंकारी घटना अथवा विनाशलीला अवश्य होती है। किन्तु कुछ वैदिक विद्वान इस बात की तरफ भी संकेत करते हैं कि भगवान शिव के रुद्र रुप के द्वारा आने वाली तबाही तथा विनाश अंत मे सदा जन हित में ही होते हैं। इस प्रकार सूक्षमता से विचार करने पर यह कहा जा सकता है कि जब जब सृष्टि में परिवर्तन अनिवार्य हो जाता है तथा यह परिवर्तन किसी ऐसी घटना के घटने से ही हो सकता है जिसे प्रलय अथवा विनाश के साथ जोड़ कर देखा जाता है, तब तब भगवान शिव अपने रुद्र रुप में प्रकट होकर उस प्रलयंकारी घटना के माध्यम से परिवर्तन को जन्म देते हैं। भगवान शिव के रुद्र रुप के ये गुण आर्द्रा नक्षत्र के माध्यम से प्रदर्शित होते हैं जिसके कारण इस नक्षत्र के प्रबल प्रभाव में आने वाले जातक स्वभाव से उग्र देखे जाते हैं तथा ऐसे जातक अपने जीवन में कई बार ऐसे कार्य कर देते हैं जिन्हें सभ्य समाज सामान्यतया उग्र अथवा भीषण मानता है किंतु आर्द्रा के जातक बिना किसी की चिंता किए अपने निश्चित किए हुए कार्यों को पूर्ण करने की कला में निपुण होते हैं। इसी प्रकार आर्द्रा नक्षत्र के प्रबल प्रभाव में आने वाले जातक भगवान शिव के रुद्र रूप के अन्य कई गुणों को भी प्रदर्शित करते हैं जिनमें वीरता, त्याग, भौतिक वस्तुओं के प्रति अधिक आकर्षित न होने का गुण, क्रोध तथा अपने आप में ही मग्न रहने का गुण भी शामिल है .. वैदिक ज्योतिष के अनुसार राहू को आर्द्रा नक्षत्र का अधिपति ग्रह माना जाता है। राहू को वैदिक ज्योतिष में माया के साथ जोड़ा जाता है जिसके कारण आर्द्रा नक्षत्र का भी माया के साथ संबंध स्थापित हो जाता है। राहू को अपनी जिज्ञासु प्रवृति, बुद्धिमता तथा किसी न किसी प्रकार से यात्रा करते रहने की प्यास के लिए भी जाना जाता है तथा राहू के चरित्र की ये विशेषताएं भी आर्द्रा नक्षत्र के माध्यम से प्रदर्शित होतीं हैं। आर्द्रा नक्षत्र के चारों चरण मिथुन राशि में स्थित होते हैं जिसके कारण इस नक्षत्र पर मिथुन राशि तथा इस राशि के स्वामी ग्रह बुध का प्रभाव भी रहता है। वैदिक ज्योतिष में बुध ग्रह को बुद्धिमता, विश्लेषण करने की क्षमता तथा भेद जान लेने की क्षमता के साथ भी जोड़ा जाता है तथा बुध ग्रह के चरित्र की यह विशेताएं आर्द्रा नक्षत्र के माध्यम से प्रदर्शित होतीं हैं। इस प्रकार भगवान शिव के रुद्र रुप, राहू की माया तथा बुद्ध की बुद्धिमता के प्रभाव में आने के कारण आर्द्रा नक्षत्र का स्वरूप सभी सताइस नक्षत्रों में से अलग ही हो जाता है तथा इस नक्षत्र के प्रभाव में आने वाले भिन्न भिन्न जातक विभिन्न प्रकार की विशेताओं का प्रदर्शन करते हैं। किसी कुंडली में राहू का प्रभाव प्रबल होने पर इस नक्षत्र के प्रभाव में आने जातक राहू की विशेषताओं को अधिक प्रदर्शित करते हैं जबकि किसी कुंडली में बुध का प्रभाव प्रबल होने पर इस नक्षत्र के प्रभाव में आने वाले जातक बुध की विशेषताओं को अधिक प्रदर्शित करते हैं .. आर्द्रा नक्षत्र के प्रबल प्रभाव में आने वाले जातक जिज्ञासु प्रवृति के होते हैं तथा इनमें विश्लेषण करने की क्षमता भी प्रबल होती है। आर्द्रा के जातक प्रत्येक मामले की जड़ तक जाने की चेष्टा करते हैं तथा इन्हें प्रत्येक मामले के छोटे से छोटे पक्ष के बारे में भी जानकारी रखने की आदत होती है। आर्द्रा के जातकों की मानसिक स्थिति बहुत तीव्रता के साथ बदल सकती है जिसके चलते ये जातक कई बार अप्रत्याशित हो जाते हैं। ऐसे जातक बहुत शीघ्रता के साथ ही उग्र हो जाते हैं तथा कई बार अपनी इस उग्रता के चलते ये जातक दूसरे व्यक्ति को हानि भी पहुंचा देते हैं। आर्द्रा के जातक सामान्य तौर पर वीर होते हैं तथा ये जातक किसी का सामना करने के लिए, वाद विवाद करने के लिए, तर्क वितर्क करने के लिए, लड़ाई झगड़ा करने के लिए तथा युद्ध करने के लिए भी तत्पर रहते हैं। आर्द्रा के जातक खोजी प्रवृति के होते हैं तथा साथ ही साथ ये जातक अच्छे निरीक्षक तथा समीक्षक भी होते हैं। आर्द्रा नक्षत्र के जातकों की आंखें आम तौर पर बड़ी होतीं हैं तथा ये जातक अपनी भेद जाने वाली दृष्टि से सामने आने वाले व्यक्ति को इस प्रकार देखते हैं जैसे एक ही दृष्टि में उसका पूरा निरीक्षण करके उसका सारा भेद जान लेंगे। आर्द्रा के जातक सामाजिक शिष्टाचार तथा औपचारिकताओं की ओर विशेष ध्यान नहीं देते तथा अपने काम में बिना किसी के बुरा मानने की चिंता किए लगे रहते हैं। इन जातकों को इस बात की तनिक भी चिंता नहीं होती कि इनके आस पास के लोग तथा समाज इनके किसी कार्य से इनके बारे में क्या राय बना सकता है। आर्द्रा नक्षत्र के जातक अपनी तार्किक प्रवृति के चलते कई प्रकार के विवादों में फंस जाते हैं तथा इनके कई शत्रु भी बन जाते हैं किन्तु आर्द्रा के अधिकतर जातक न तो अपने स्वभाव को बदलने की कोशिश करते हैं तथा न ही अपने शत्रुओं के साथ किसी प्रकार की संधि करने में विश्वास रखते हैं .. वैदिक ज्योतिष के अनुसार आर्द्रा को स्त्री नक्षत्र माना जाता है तथा आर्द्रा नक्षत्र का यह लिंग निर्धारण देखने में विचित्र लगता है क्योंकि आर्द्रा नक्षत्र के अधिपति देवता तथा अधिपति ग्रह दोनों ही पुरुष हैं तथा अपने स्वभाव से भी यह नक्षत्र पुरुषों के ही अधिकतर गुण प्रदर्शित करता है। कुछ वैदिक ज्योतिष इस लिंग निर्धारण का कारण आर्द्रा नक्षत्र का बुध ग्रह के साथ जुड़ना मानते हैं। वैदिक ज्योतिष में आर्द्रा को एक संतुलित नक्षत्र माना जाता है तथा इस नक्षत्र की कार्यशैली सी भी यह पता चलता है कि यह नक्षत्र किसी न किसी प्रकार से संतुलन बनाने की ही चेष्टा करता है। वैदिक ज्योतिष आर्द्रा नक्षत्र को शूद्र वर्ण प्रदान करता है जिसका कारण इस नक्षत्र का राहू के साथ जुड़े होना माना जाता है। वैदिक ज्योतिष के अनुसार आर्द्रा नक्षत्र को गुण से तामसिक माना जाता है जिसका कारण अधिकतर वैदिक ज्योतिषी इस नक्षत्र का रुद्र तथा राहू के साथ जुड़ा होना मानते हैं। वैदिक ज्योतिष आर्द्रा को गण से मानव मानता है तथा पंच तत्वों में से जल तत्व को इस नक्षत्र के साथ जोड़ा जाता है!!
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Astrological Counselling Mr. After years of hard work and determination, Mr.
Kanuj Bishnoi takes Vedic Astrology on a pure scientific level. Kanuj Bishnoi has formulated a " FIVE RULE THEORY " which has solved hundreds of MYTHS in Predictive astrology. This theory is strictly based on the first rule of Traditional Vedic Astrology " Desh-Kaal-Patra ". He applies this theory strictly on a pure scientific level in consultancy for clients as well as for teaching his students.
परिहार (उपाय) ज्योतिष का सबसे महत्त्वपूर्ण अंग है, क्योंकि बिना ज्योतिष के उपाय हो सकते हैं लेकिन बिना उपाय के ज्योतिष अधूरा है .. ज्योतिष की सार्थकता इसके उपायों से ही है, इसलिए ज्योतिषी के पास उसी जातक को आना चाहिए जो ये मानता है कि भविष्य बदला जा सकता है, क्योंकि ये विद्या उन्हीं पुरुषार्थियों के लिए है जो भाग्य से टक्कर लेना चाहते हैं .. ज्योतिष हमें सिखाता है कि भाग्य से टक्कर कब और कैसे लेनी चाहिए, यह दिव्य विज्ञान हमें बताता है कि किस तरह ग्रह-नक्षत्र किसी मानव, समुदाय, राष्ट्र या विश्व को प्रभावित करते हैं .. इसे वेदांग भी कहते हैं .. वेदांग छः हैं – शिक्षा, कल्प, व्याकरण, निरुक्त, छन्द और ज्योतिष .. इन अंगों में ज्योतिष को वेदों का नेत्र माना गया है .. ज्योतिष हमारे शरीर में नेत्रों के समान महत्त्वपूर्ण है बिना ज्योतिष (प्रकाश) के जीवन अंधकारमय रहता है, व्यक्ति हर काम अंधेरे-जीवन में टटोल-टटोल कर करता है .. कुछ लोगों की धारणा है कि ज्योतिष व्यक्ति को निष्क्रिय या भाग्यवादी बना देता है, ये बिलकुल ग़लत है .. जीवन से थके, हारे व निराश व्यक्ति को जीने की नई आशा और ऊर्जा “ज्योतिष“ ही देता है .. जब डॉक्टर किसी मरीज़ को ला-इलाज़ कह कर घर बैठने को कहता है तो ज्योतिषी उस मरीज़ को उठाकर मार्ग दिखाता है .. क्योंकि, डॉक्टर तो कल का मरता उसे आज ही मार देगा .. जीवन के किसी भी क्षेत्र से हारे व्यक्ति के लिए ज्योतिषी के पास इलाज है .. यदि वास्तव में कोई रास्ता नहीं तो ज्योतिषी, जातक को कम से कम शुभ समय अवधि तक सहन करने के लिए तो कहता ही है, अशुभ समय अवधि के लिए परिहार बता कर जातक को क्रियाशील भी बनाता है!!
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तृतीय, षष्ठम एवं एकादश भाव में स्थित अशुभ राहु भी सभी बुरे प्रभावों से रक्षा करता है और जातक को बल प्रदान करता है .. वहीँ जन्मांग में पंचम और नवम भाव स्थित शुभ राहु भी द्वितीयेश या सप्तमेश से संबंध बंनने पर मारक हो जाता है!!
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जन्मांग में योगकारक ग्रह के साथ युति या दृष्टि सम्बन्ध होने पर राहु योगकारक जैसा ही परिणाम देता है .. ज्योतिषविज्ञानं अनुसार भचक्र में हमारे सौरमंडल की गणना हेतु राहु/केतु केवल आभासी बिंदु है .. जिसमे राहु मानव की मनोस्थिति को अत्यधिक प्रभावित करता है और ये उसके जीवन में उत्थान या पतन का केंद्रबिंदु सिद्ध होता है!!
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विदेश में स्थायी निवास होने के लिए मुख्यतः दो-तीन स्थितियों का होना अनिवार्य है!
1) लग्न से चतुर्थ भाव/भावेश का पीड़ित होना
2) राहु की भूमिका .. विशेषकर इसका सम्बन्ध लग्न, चतुर्थ, सप्तम, नवम और द्वादश भावों/भावेशों से होना
3) यदि चतुर्थ भाव/भावेश पीड़ित हो अथवा चतुर्थेश दुःस्थित हो और इसमें राहु की किसी भी प्रकार की भूमिका हो तो जातक विदेश में स्थायी अथवा लंबे समय के लिए निवास करता है!!
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साढ़ेसाती के दौरान यदि चन्द्र स्थित भाव, उस से द्वितीय भाव और द्वादश भाव के सर्वाष्टक वर्ग में बत्तीस या बत्तीस से अधिक शुभ बिंदु हो अथवा अपने भिन्नाष्टक वर्ग में शनि इन तीनो राशियों में अधिकतम शुभ बिंदु प्राप्त करता है तो जातक तो साढ़ेसाती के अत्यंत शुभ परिणाम प्राप्त होंगे!!
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अष्टकवर्ग पद्धति द्वारा ग्रहों के गोचर का सूक्ष्म अध्ययन किया जा सकता है .. प्रत्येक राशि के तीस अंशों को तीन अंश और पैंतालीस मिनट के आठ बराबर भागों में बाटाँ गया है जिन्हे कक्षाएं कहते है, इन कक्षाओं के स्वामी क्रमशः शनि, गुरु, मंगल, सूर्य, शुक्र, बुध, चन्द्र और लग्न होते है .. कक्षाओं एवं उनके स्वामीयों का यह क्रम निश्चित होता है .. जब कोई ग्रह गोचर में उस कक्षा में आता है जहाँ कक्षा स्वामी ग्रह ने शुभ बिंदु दिया है तो उस समय वह ग्रह अच्छा फल देगा जबकि बिंदुहीन कक्षा में किसी भी ग्रह का गोचर अशुभ परिणाम देगा!!
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कल शनि का कुम्भ राशि में आगमन हो गया है, यह परिवर्तन सभी को उनके जन्म कुंडली स्थिति अनुसार ही शुभाशुभ होगा .. शनि के गोचर से सम्बंधित एक महत्वपूर्ण अनुभवसिद्ध सूत्र सांझा कर रहा हूँ .. "जन्मांग के जिस भाव में तीन या अधिक ग्रह होते है उस भाव पर शनि का गोचर अत्यधिक महत्वपूर्ण घटनाओं को देने वाला होता है" .. जन्मकुंडली की कुम्भ राशि में स्थित तीन या अधिक ग्रहों वाले जातक अगले ढाई वर्षों में घटने वाली विशेष घटनाओं के लिए तैयार हो जाएँ!!
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भाव विश्लेषण .. कुंडली विवेचन का एक विशेष पक्ष!
किसी भी भाव का विश्लेषण करते हुए निम्न तीन अव्यवो का विशेष ध्यान रखना चाहिए ..
1) भाव : यदि भाव, शुभ ग्रहोंbया भावेश से दृष्ट अथवा भावेश या शुभ ग्रहों द्वारा गृहीत हो या शुभकर्तरी योग में हो तो बली कहा जायेगा .. इसके विपरीत यदि भाव में अशुभ ग्रह हो या दृष्टि हो एवं भावेश से अदृष्ट हो तो भाव क्षीण या निर्बली कहा जायेगा!
2) भाव का स्वामी ग्रह/भावेश : जिस भाव में जो राशी स्थित हो उस राशी का स्वामी उस भाव का स्वामी अर्थात भावेश कहलाता है .. ग्रह जिस राशी में होता है उसका राशी स्वामी ग्रह का प्रबंधक या स्वामी कहलाता है, जैसे चन्द्र अगर मिथुन राशी का होकर 7वे भाव में है तो बुध सप्तमेश और चन्द्र स्वामी भी कहलायेगा .. कुंडली में ग्रह के साथ साथ इसके स्वामी का बली होना भी आवश्यक है अर्थात स्वामी ग्रह को 6, 8, 12 भावों में नहीं होना चाहिए .. इसी प्रकार भाव के साथ साथ भावेश का बली होना, भाव के कारकतत्वों में वृद्धि करता है!
3) कारक : जैसे प्रत्येक भाव के कारकतत्व निश्चित है इसी प्रकार प्रत्येक भाव के कारक ग्रह भी निश्चित है .. कुंडली में कारक की स्थिति की विवेचना किये बिना फल कथन किसी भी दृष्टिकोण से उचित नहीं होगा! उदाहरणतः यदि चतुर्थ भाव का विश्लेषण करना है तो चतुर्थ भाव एवं चतुर्थेश के साथ साथ इसके कारक का भी विश्लेषण अवश्य करना चाहिए .. यदि भाव एवं भावेश के साथ साथ कारक भी बली होगा तो भाव के कारकतत्वों में अधिक वृद्धि होगी .. चतुर्थ भाव भू-संपत्ति, माता, वाहन सुख आदि का कारक है .. भू संपत्ति के लिए मंगल, वाहन के लिए शुक्र एवं माता के लिए चन्द्र कारक होता है, यदि कारक ग्रह भी कुंडली में बली होंगे तो जातक को सारे कारकों का अत्यधिक सुख देंगे .. जो कारक ग्रह कुंडली में क्षीण या अशुभ ग्रहों से दृष्ट होकर निर्बली होगा वह अपने कारक तत्वों में कमी या विहीनता दे देगा!!
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सर्वाअष्टक वर्ग द्वारा जातक की आर्थिक स्थिति का विवेचन !!
सर्वाअष्टक वर्ग का उपयोग सम्बंधित भाव/भावेशो के बल के निर्धारण करने के लिए प्रभावशाली ढंग से किया जाता है .. मुख्यतः जन्मपत्रिका के लग्न को प्रथम भाव मानते हुए द्वितीय, पंचम, नवम, दशम और एकादश भाव/भावेशों के सम्बन्ध से बनने वाले योगो को धनयोगो को रूप से देखा जाता है, जबकि इंदु लग्न से धन-संपत्ति एवं समृद्धि का निर्णय जन्मपत्रिका में द्वितीय एवं एकादश भाव/भावेशों की स्थिति से होता है .. यदि सर्वाअष्टक वर्ग में इन भावों में प्राप्त बिन्दुओं को भी इसमें शामिल कर के देखा जाये तो धन समृद्धि और आर्थिक स्थिति के स्तर की करीब करीब सही स्थिति ज्ञात की जा सकती है!!
1) यदि लग्न, नवम, दशम और एकादश भावों में 30 अथवा अधिक बिंदु है तो जातक अवश्य धनवान होता है, यदि इसके विपरीत इन भावो में 25 से कम बिंदु हो तो जातक दरिद्र नहीं तो दरिद्रता के बहुत करीब होता है!
2) यदि लग्न एवं चतुर्थ भावों में 33 या अधिक बिंदु हो और इनके स्वामी भाव परिवर्तन करें तो जातक अचल संपत्ति के रूप में धनवान होता है!
3) लग्न (प्रथम) से द्वितीय, चतुर्थ, नवम, दशम और एकादश भावों के बिन्दुओं का योग अगर 164 या अधिक होता है तो जातक समृद्ध एवं धनवान होता है!!
4) सभी द्वादश भावों को निम्न चार भागों में बाटा गया है!!
क) बन्धु :: 1, 5, 9वा भाव
ख) सेवक :: 2, 6, 10वा भाव
ग) पोषक :: 3, 7, 11वा भाव
घ) घातक :: 4,8,12वा भाव
प्रत्येक समूह के भावों के बिन्दुओं का योग करें यदि पोषक समूह के बिन्दुओं की संख्यां, घातक समूह के बिन्दुओं की संख्या से अधिक होती है तो जातक धनवान होगा!
यदि सेवक समूह के बिन्दुओं की संख्यां, बन्धु समूह के बिन्दुओं से अधिक होती है तो जातक दूसरों के आधीन कार्य (नौकरी) करता है!
5) यदि लग्नेश चतुर्थेश से राशी परिवर्तन करता है अथवा लग्नेश का संबंध चतुर्थ भाव से होता है तो जातक राजा समान और अत्यधिक धनवान होता है!
6)vयदि सभी ग्रह (सातो) अपने अपने अष्टकवर्ग में 6 से 8 बिन्दुओं के साथ हो तो जातक की अपार धन-संपत्ति में और बढ़ोतरी करते है .. यदि ग्रह उच्च, स्वराशी अथवा मित्रराशी में भी हो तो परिणाम अत्यधिक शुभ फलकारी होते है!
7) यदि गुरु का राशीश शुभ स्थिति में केंद्र या त्रिकोण में ही और गुरु 4 से अधिक बिन्दुं के साथ हो तो यह जातक की धन-संपत्ति में वृद्धिकारक होता है!
8) यदि गुरु अपने अष्टकवर्ग में 4 से अधिक बिन्दुओं के साथ शुक्र से युति करे जिसके खुद अपने 4 से अधिक बिंदु हो तो जातक उच्चस्तरीय समृद्धि प्राप्त करता है!
9) यदि मेष या वृश्चिक राशी में स्थित शुक्र 5 से अधिक बिन्दुओं के साथ और शुभ ग्रहों से दृष्ट हो तो यह जातक को अत्यधिक धन-संपत्ति, समृद्धि और वाहन सुख देने वाला होता है!
यदि केंद्र अथवा त्रिकोण में हो तो परिणाम और अत्यंत अधिक सुख देने वाले होते है!
विशेष!! गोचर में ग्रह किस राशी और किस भाव में जाता है, उस राशी और भाव के बिन्दुओं का फर्क स्थिति पर अवश्य आता है!!
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इंदु लग्न द्वारा आर्थिक समृद्धि का शास्त्रोक्त आकलन
ज्योतिष शास्त्र में बार बार इंदु लग्न या धन लग्न शब्द का प्रयोग होता है .. पाराशरी में इसको "विशेष चन्द्र योग" कहा गया है, इंदु का अर्थ चन्द्रमा होता है और इस विशेष लग्न का प्रयोग जातक के ऐश्वर्या, धन संपत्ति के स्तर का आकलन करने में होता है .. इस लग्न का प्रयोग जीवन की सभी शुभ घटनाओ एवं धन सम्पति के संग्रह आदि के लिए भी उपयुक्त है, यूँ कह सकते है कि जन्म लग्न, चन्द्र लग्न और सूर्य लग्न के अतिरिक्त इंदु लग्न एक ऐसा लग्न है जो जातक के ऐश्वर्या एवं सम्पन्नता के साथ साथ जीवन के प्रत्येक क्षेत्र के विषय में चमत्कारी जानकारियां दे सकता है .. छाया ग्रह होने के कारण राहु/केतु को इंदु लग्न की गणना में शामिल नहीं किया जाता .. शेष सात ग्रहों को निन्मलिखित कला/इकाई दी गयी है!
ग्रहों के नाम!!
सूर्य ....चन्द्र .....मंगल .....बुध ....गुरु ........शुक्र ........शनि .
कला!! 30.......16........06.........08.....10...........12..........01..
1) सर्वप्रथम चंद्रमा से नवमेश और लग्न के से नवमेश की कलाओं का योग करें!
2) जन्मपत्रिका में सिर्फ बारह भाव होते है इसलिए यदि योग बारह से अधिक आये तो इसे इस प्रकार बारह से गुणक करे की शेष संख्या बारह से कम बचे लेकिन किसी भी स्थिति में यह 0 नहीं होती है यदि 0 शेष बचे तो 0 के स्थान पर बारह को ही लिया जाता है!
3) यदि योगफल 12 से कम आता है तो उपरोक्त प्रक्रिया करने की आवश्कयता नहीं है!
4) इस प्रकार प्राप्त संख्या के बराबर, चन्द्र द्वारा गृहीत भाव से आगे के भावों को गिने और तब जो भाव आता है वह इंदु लग्न कहलायेगा!
(चन्द्र से गिने जाने के कारण भी यह लग्न इंदु लग्न कहलाता है)
कुछ ज्योतिषियों द्वारा इंदु लग्न की गणना जैमिनी पद्धति एवं जैमिनी दृष्टियों द्वारा भी की जाती है .. इस पद्धति में ग्रहों की कलाएं तो वही रहती है लेकिन सम और विषम राशियों से नवम भाव की गणना की विधि अलग होती है .. यदि लग्न अथवा चन्द्र विषम राशी में हो तो गणना सीधी (आगे के भावो की ओर) और यदि सम राशी में हो तो गणना विपरीत दिशा (पीछे के भावों की ओर) में होती है .. ग्रहों की दृष्टियों की विवेचना भी पाराशरी के स्थान पर जैमिनी पद्धति से की जाती है .. इस पद्धति में जितने शुभ ग्रह इंदु लग्न को देखते है जातक का ऐश्वर्या और धन दौलत की स्थिति उतनी ही शुभ मानी जाती है .. इंदु लगन का अधिकतम शुभ ग्रहों से युक्त या दृष्ट होना एक अतिशुभ योग है इसमें जितने अधिक ग्रह शामिल होते है जातक को उतना अधिक समय इनकी शुभता को भोगने के लिए मिलता है .. यह योग कोटेश्वर योग के नाम से जाना जाता है .. इंदु लग्न में उच्च के क्रूर ग्रह (शनि,सूर्य एवं मंगल) होने से भी कोटेश्वर योग बनता है, यह धनदायक होता है लेकिन इसकी मात्रा अधिक नहीं होती, क्योंकि ये अंत (महादशा के अंत) में फलदायक होता है .. इंदु लग्न में चाहे एक भी शुभ ग्रह हो पर उस पर किसी अन्य ग्रह की दृष्टि (चाहे शुभ हो या अशुभ) पर्याप्त मात्रा में धनदायक होती है .. इंदु लग्न केवल अशुभ ग्रह/ग्रहों द्वारा गृहीत हो तब भी जातक को मध्य स्तर हेतु धनदायक अवश्य होते है .. वे सभी ग्रह जो इंदु लग्न में स्थित हो या दृष्टि देते हो अपनी दशा में धन-संपत्ति देते है .. जो ग्रह इंदु लग्न से केंद्र या त्रिकोण में स्थित होते है वह भी अपनी दशा/अन्तर्दशा में धन-संपत्ति देते है .. गोचर में जब भी गुरु इंदु लग्न से केंद्र में गोचर करता है, जातक को भू-संपत्ति और धन की खुशियाँ देता है .. जो ग्रह इंदु लग्न से षष्टम, अष्टम एवं द्वादश होते है वे अपनी दशा/अन्तर्दशा में धन-संपत्ति का नाश करते है .. इंदु लग्न में नीच के अशुभ ग्रह का होना या दृष्टि होना या इस लग्न का ग्रह विहीन होना अथवा किसी ग्रह द्वारा दृष्ट ना होना भी आर्थिक सम्पन्नता के लिए शुभ नहीं होता .. जन्मपत्रिका में आर्थिक सम्पन्नता के लिए इंदु लग्न से विवेचना करते हुए इस लग्न से द्वितीय एवं एकादश भावों और भावेशों की स्थिति भी महत्वपूर्ण होती है .. इंदु लग्न को प्रथम भाव लेने पर धन-समृद्धि और सम्पन्नता के लिए द्वितीय, पंचम, नवम, दशम एवं एकादश भाव/भावेशों का सम्बन्ध अत्यधिक धन योग बनाता है!!
विशेष!!
इंदु लग्न के सभी सम्बंधित भाव/भावेश के बल का आकलन करने के लिए सर्वाअष्टक वर्ग का उपयोग अत्यंत महत्वपूर्ण है!!
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गोचर में ग्रह जब अपनी गति बदलता है अर्थात जब सामान्य गति से वक्री होता है अथवा वक्री गति से सामान्य गति में आता है तो विशेष प्रभाव देता है .. ऐसी स्थिति में जातक को प्राप्त होने वाले शुभाशुभ प्रभाव ग्रह की जन्मकालीन स्थिति पर निर्भर करेंगे!!
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