शाश्वत सनातन धर्म

शाश्वत सनातन धर्म

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Lord Shiva, is considered to be the most divine among all Hindu gods. “Maha Dev”, which means greatest God is another name given to him.

In the Hindu religion, Lord Shiva is also considered to be the father of the whole universe.

31/07/2023

केदारनाथ को क्यों कहते हैं ‘जागृत महादेव’ ?, दो मिनट की ये कहानी रौंगटे खड़े कर देगी "*
*एक बार एक शिव-भक्त अपने गांव से केदारनाथ धाम की यात्रा पर निकला। पहले यातायात की सुविधाएँ तो थी नहीं, वह पैदल ही निकल पड़ा। रास्ते में जो भी मिलता केदारनाथ का मार्ग पूछ लेता। मन में भगवान शिव का ध्यान करता रहता। चलते चलते उसको महीनो बीत गए।* *आखिरकार एक दिन वह केदार धाम पहुच ही गया। केदारनाथ में मंदिर के द्वार 6 महीने खुलते है और 6 महीने बंद रहते है। वह उस समय पर पहुचा जब मन्दिर के द्वार बंद हो रहे थे। पंडित जी को उसने बताया वह बहुत दूर से महीनो की यात्रा करके आया है। पंडित जी से प्रार्थना की - कृपा कर के दरवाजे खोलकर प्रभु के दर्शन करवा दीजिये । लेकिन वहां का तो नियम है एक बार बंद तो बंद। नियम तो नियम होता है। वह बहुत रोया। बार-बार भगवन शिव को याद किया कि प्रभु बस एक बार दर्शन करा दो। वह प्रार्थना कर रहा था सभी से, लेकिन किसी ने भी नही सुनी।*

पंडित जी बोले अब यहाँ 6 महीने बाद आना, 6 महीने बाद यहा के दरवाजे खुलेंगे। यहाँ 6 महीने बर्फ और ढंड पड़ती है। और सभी जन वहा से चले गये। वह वही पर रोता रहा। रोते-रोते रात होने लगी चारो तरफ अँधेरा हो गया। लेकिन उसे विस्वास था अपने शिव पर कि वो जरुर कृपा करेगे। उसे बहुत भुख और प्यास भी लग रही थी। उसने किसी की आने की आहट सुनी। देखा एक सन्यासी बाबा उसकी ओर आ रहा है। वह सन्यासी बाबा उस के पास आया और पास में बैठ गया। पूछा - बेटा कहाँ से आये हो ?* *उस ने सारा हाल सुना दिया और बोला मेरा आना यहाँ पर व्यर्थ हो गया बाबा जी। बाबा जी ने उसे समझाया और खाना भी दिया। और फिर बहुत देर तक बाबा उससे बाते करते रहे। बाबा जी को उस पर दया आ गयी। वह बोले, बेटा मुझे लगता है, सुबह मन्दिर जरुर खुलेगा। तुम दर्शन जरुर करोगे।*

बातों-बातों में इस भक्त को ना जाने कब नींद आ गयी। सूर्य के मद्धिम प्रकाश के साथ भक्त की आँख खुली। उसने इधर उधर बाबा को देखा, किन्तु वह कहीं नहीं थे । इससे पहले कि वह कुछ समझ पाता उसने देखा पंडित जी आ रहे है अपनी पूरी मंडली के साथ। उस ने पंडित को प्रणाम किया और बोला - कल आप ने तो कहा था मन्दिर 6 महीने बाद खुलेगा ? और इस बीच कोई नहीं आएगा यहाँ, लेकिन आप तो सुबह ही आ गये। पंडित जी ने उसे गौर से देखा, पहचानने की कोशिश की और पुछा - तुम वही हो जो मंदिर का द्वार बंद होने पर आये थे ? जो मुझे मिले थे। 6 महीने होते ही वापस आ गए ! उस आदमी ने आश्चर्य से कहा - नही, मैं कहीं नहीं गया। कल ही तो आप मिले थे, रात में मैं यहीं सो गया था। मैं कहीं नहीं गया। पंडित जी के आश्चर्य का ठिकाना नहीं था।*

उन्होंने कहा - लेकिन मैं तो 6 महीने पहले मंदिर बन्द करके गया था और आज 6 महीने बाद आया हूँ। तुम छः महीने तक यहाँ पर जिन्दा कैसे रह सकते हो ? पंडित जी और सारी मंडली हैरान थी। इतनी सर्दी में एक अकेला व्यक्ति कैसे छः महीने तक जिन्दा रह सकता है। तब उस भक्त ने उनको सन्यासी बाबा के मिलने और उसके साथ की गयी सारी बाते बता दी। कि एक सन्यासी आया था - लम्बा था, बढ़ी-बढ़ी जटाये, एक हाथ में त्रिशुल और एक हाथ में डमरू लिए, मृग-शाला पहने हुआ था। पंडित जी और सब लोग उसके चरणों में गिर गये। बोले, हमने तो जिंदगी लगा दी किन्तु प्रभु के दर्शन ना पा सके, सच्चे भक्त तो तुम हो। तुमने तो साक्षात भगवान शिव के दर्शन किये है। उन्होंने ही अपनी योग-माया से तुम्हारे 6 महीने को एक रात में परिवर्तित कर दिया। काल-खंड को छोटा कर दिया। यह सब तुम्हारे पवित्र मन, तुम्हारी श्रद्वा और विश्वास के कारण ही हुआ है। आपकी भक्ति को प्रणाम जय श्री महाकाल

जय श्री केदारनाथ
हर हर महादेव

31/07/2023

नमामीशमीशान निर्वाण रूपं, विभुं व्यापकं ब्रह्म वेदः स्वरूपम् ।
निजं निर्गुणं निर्विकल्पं निरीहं, चिदाकाश माकाशवासं भजेऽहम् ॥

निराकार, ओंकार के मूल, तुरीय वाणी, ज्ञान और इन्द्रियों से परे, कैलाशपति, विकराल, महाकाल के भी काल, कृपालु, गुणों के धाम, संसार से परे परमेशवर को मैं नमस्कार करता हूं।

11/06/2023

श्री महाविष्णु किन के ध्यान में लगे रहते हैं....???? भगवत गीता के संपुर्ण 18 अध्याय किन के शरीर है....????? By ❤️ Prakash Ji ❤️

आदरणीय प्यारे मित्रों तथा गुरुजन भगवान श्री महाविष्णु किनके ध्यान करते हैं.... तथा गीता के संपूर्ण 18 अध्याय किनके शरीर है.... इसको जानने के लिए हमें पद्मपुराण उत्तरखंड में जाना पड़ेगा । पद्म पुराण के उत्तर खंड में ईश्वर पार्वती संवाद के अंतर्गत लक्ष्मी महाविष्णु संवाद आता है....

वहां पर मां लक्ष्मी भगवान महाविष्णु को प्रश्न करते हैं......
श्रीरुवाच-:
शयालुरसि दुग्धाब्धौ भगवन्केन हेतुना।
उदासीन इवैश्वर्यं जगंति स्थापयन्निव ५।

श्रीलक्ष्मीने पूछा- भगवन् ! आप सम्पूर्ण जगत्का पालन करते हुए भी अपने ऐश्वर्यके प्रति उदासीनसे होकर जो इस क्षीरसागरमें नींद ले रहे हैं, इसका क्या कारण है ?

भगवती महालक्ष्मी के प्रश्न सुनकर उसका उत्तर देते हुए भगवान महाविष्णु कहते हैं......

श्रीभगवानुवाच।
नाहं सुमुखि निद्रालुर्निजं माहेश्वरं वपुः।
दृशा तत्वानुवर्त्तिन्या पश्याम्यंतर्निमग्नया ७।
कुशाग्रया धिया देवि यदंतर्योगिनो हृदि।
पश्यंति यच्च वेदानां सारं मीमांसते भृशम् ८।
तदेवमक्षरं ज्योतिरात्मरूपमनामयम्।
अखंडानंद संदोह निष्पादि द्वैतवर्जितम् ९।
यदाश्रया जगद्वृत्तिर्यन्मया चानुभूयते।
न येन रहितं किंचिज्जगत्तत्वं चराचरम् १०।
निर्मथ्य बहुधालोक्य वेदशास्त्रांबुधिं सुधीः।
द्वैपायनो यदासाद्य गीताशास्त्रं निसृष्टवान् ११।
यदास्थाय महानंदमानंदीकृतमानसः।
निद्रालुरिव देवेशि दुग्धाब्धौ प्रतिभामि वै १२।

श्रीभगवान् बोले- सुमुखि ! मैं नींद नहीं लेता हूँ, अपितु तत्त्वका अनुसरण करनेवाली अन्तर्दृष्टिके द्वारा अपने अंदर स्थित माहेश्वर शरीर का साक्षात्कार करता रहता हूँ। देवि ! यह वही स्वरुप है, जिसका योगी पुरुष कुशाग्र बुद्धिके द्वारा अपने अन्तःकरणमें दर्शन करते हैं तथा जिसे मीमांसक विद्वान् वेदोंका सार-तत्त्व निश्चित करते हैं। वह माहेश्वर ज्योती एक, अजर, प्रकाशस्वरूप, आत्मरूप, रोग-शोकसे रहित, अखण्ड आनन्दका पुञ्ज, निष्पन्द (निरीह) तथा द्वैतरहित है।इस संपूर्ण जगत्का जीवन उसी महेश्वर ज्योति के अधीन है। में उसी महेश्वर ज्योति का अनुभव करता हूँ। कुछ संसारका तत्त्व स्थावर जंगम नीतिसे रहित है... बुद्धिमान्, व्यासजी वेदशास्त्ररूपी समुद्रको मथकर बहुत प्रकार से देखकर जिस माहेश्वर तत्व को प्राप्तहोकर गीता रूपी शास्त्रको निकाले हैं...उस महानन्द में स्थित होकर आनन्दयुक्त भावसे दूध के समुद्र में सोते हुए के सदृश में
शोभित होताहूं ।हे देवी ...यही कारण है कि मैं तुम्हें नींद लेता-सा प्रतीत हो रहा हूँ।

जब माता लक्ष्मी को यह पता चला कि भगवान महाविष्णु भी किसी माहेश्वर स्वरूप का ध्यान में लगे रहते हैं... तो माता को बड़ा आश्चर्य हुआ.... तब माता श्री लक्ष्मी ने भगवान महाविष्णु से कहा.....

श्रीरुवाच।
भवानेव हृषीकेश ध्येयोऽसि यमिनां सदा।
तस्मात्त्वत्तः परं यत्तच्छ्रोतुं कौतूहलं हि मे १४।
चराचराणां लोकानां कर्त्ता हर्त्ता स्वयं प्रभुः।
यथास्थितस्ततोऽन्यत्वं यदि मां बोधयाच्युत १५।

श्रीलक्ष्मीने कहा-
हृषीकेश ! आप ही योगी पुरुषोंके ध्येय हैं। आपके अतिरिक्त भी कोई ध्यान करनेयोग्य तत्त्व है, यह जानकर मुझे बड़ा कौतूहल हो रहा है। इस चराचर जगत्‌की सृष्टि और संहार करनेवाले स्वयं आप ही हैं। आप सर्वसमर्थ हैं। इस प्रकारकी स्थितिमें होकर भी यदि आप उस परम तत्त्वसे भिन्न हैं, तो मुझे उसका बोध कराइये।

देवी श्री लक्ष्मी के बाद श्रवण करके भगवान श्री महाविष्णु कहते हैं.....
श्रीभगवानुवाच।
मायामयमिदं देवि वपुर्मे न तु तात्विकम्।
सृष्टिस्थित्योपसंहारक्रियाजालोपबृंहितम् १६।
अतोऽन्यदात्मनोरूपं द्वैताद्वैतविवर्जितम्।
भावाभावविनिर्मुक्तमाद्यंतरहितं प्रिये १७।
शुद्धसंवित्प्रभालाभं परानंदैकसुंदरम्।
रूपमैश्वरमात्मैक्यगम्यं गीतासु कीर्तितम् १८।

श्रीभगवान् बोले-हे प्रिये ! यह मेरा शरीर मायामय है.... मेरा यह शरीर तात्विक नहीं है..... तथा सृष्टि स्थिति संहार आदि क्रिया समुह से वृद्धि को प्राप्त हुआ है...और मेरा यह शरीर वास्तविक नहीं है,(यह कहने के पश्चात यहां पर श्री महाविष्णु जिस माहेश्वर तत्व का अपने अंतर्मन में ध्यान करते हैं जिस शिव तत्व का अपने अंतर्मन में ध्यान करते हैं उसका वर्णन करते हैं) है देवीआत्माका स्वरूप द्वैत और अद्वैतसे पृथक्, भाव और अभावसे मुक्त तथा आदि और अन्तसे रहित है। शुद्ध ज्ञानके प्रकाशसे उपलब्ध होनेवाला तथा परमानन्दस्वरूप होनेके कारण एकमात्र सुन्दर है। यही ईश्वरीय रूप है। "आत्माकाएकत्व" ही सबके द्वारा जाननेयोग्य है। गीताशास्त्र में इसीका प्रतिपादन हुआ है। अमिततेजस्वी भगवान् विष्णुके ये वचन सुनकर लक्ष्मीदेवीने शङ्का उपस्थित करते हुए कहा- 'भगवन् ! यदि आपका स्वरूप स्वयं परमानन्दमय और मन-वाणीकी पहुँचके बाहर है तो गीता कैसे उसका बोध कराती है ? मेरे इस सन्देहका आप निवारण कीजिये।'
ध्यान देने की बात यहां पर यह है कि यहां पर स्वयं महाविष्णु अपना महाविष्णु शरीर को मायामय शरीर बोल रहे हैं 👍 ।

अमिततेजस्वी भगवान् विष्णुके ये वचन सुनकर लक्ष्मीदेवीने शङ्का उपस्थित करते हुए कहा- 'भगवन् ! यदि आपका (माहेश्वर) स्वरूप स्वयं परमानन्दमय और मन-वाणीकी पहुँचके बाहर है तो गीता कैसे उसका बोध कराती है ? मेरे इस सन्देहका आप निवारण कीजिये।'

श्रीभगवान् बोले – सुन्दरि! सुनो, मैं गीतामें अपनी स्थितिका वर्णन करता हूँ। क्रमशः पाँच अध्यायोंको तुम पाँच मुख जानो, दस अध्यायोंको दस
भुजाएँ समझो तथा एक अध्यायको उदर और दो अध्यायोंको दोनों चरणकमल जानो। इस प्रकार यह अठारह अध्यायोंकी वाङ्मयी ईश्वरीय मूर्ति ही समझनी चाहिये। यह ज्ञानमात्रसे ही महान् पातकोंका नाश करनेवाली है। जो उत्तम बुद्धिवाला पुरुष गीताके एक या आधे अध्यायका अथवा एक, आधे या चौथाई श्लोकका भी प्रतिदिन अभ्यास करता है, वह सुशर्माके
समान मुक्त हो जाता है।

अहमात्मा परेशानि परापरविभेदतः।
द्विधा ततः परः साक्षी निर्गुणो निष्कलः शिवः २१।
अपरः पंचवक्त्रोऽहं द्विधा तस्यापि संस्थितिः।
शब्दार्थभेदतो वाच्यो यथात्माहं महेश्वरः २२।

हे परेशानि ! लक्ष्मीजी ! पर और अपरके भेद से मेरा दो स्वरूप है, प्रथम श्रेष्ठ, साक्षी, निर्गुण, निष्फल, शिव तथा दूसरा पंचवक्त्र महेश्वर स्वरुप , दोप्रकार की तिसकी भी संस्थिति है शब्द और अर्थ भेदसे कहने योग्य मुझे महेश्वर से अलग ना समझो अर्थात मेरा जो आत्मा है आत्मा महेश्वर है ।

अर्थात बाहर से महाविष्णु स्वरूप धारण करने वाले अंदर से और कोई नहीं साक्षात् महेश्वर ही हैं । और महाभारत अंतर्गत भगवत गीता में पूरा 18 अध्याय के जरिए भगवान कृष्ण अर्जुन को जिस परमात्मा के बारे में समझाएं हैं वह परमात्मा साक्षात महेश्वर हैं यह वचन मेरा नहीं है भगवान महाविष्णु का है मां लक्ष्मी के प्रति पद्म पुराण की गीता महात्मा की प्रथम अध्याय में 👍👍👍 ।

31/03/2023

हां हां मैं वही उमा हूं जो शिवजी के वाम भाग में बैठी हुई होती है.... एक साधारण महिला की तरह..... तुम इस ब्रह्मांड में महाकाली तारा छिन्नमस्ता भुवनेश्वरी बगलामुखी भैरवी आदि जितने भी महाविद्या देख रहे हो..... जितने भी उपविद्या देख रहे हो.... जितने भी अति विद्या देख रहे हो.... यह 64 योगिनीयां...... यह नव कोटि कात्यायनी..... यह सप्तमातृका अष्ट मातृका षोडश मातृका...... यह सब के सब मेरे शरीर से निकली हुई एक छोटी-छोटी शक्ति बिंदु मात्र हैं..... अगर चाहूं तो इसी क्षण इन सब को मैं अपने अंदर समाहित कर सकता हूं....... जब मेरे पुत्र गणेश का मस्तक कटा था तब मैंने एक दो पांच या सात तो छोड़ दो मेरी इस शरीर से सहस्र महाविद्याएं प्रकट कर दी थी...... यह जो प्रत्यंगिरा विपरीत प्रत्यंगिरा महा विपरीत प्रत्यंगिरा को लेकर तुम खुद को सबसे बड़ा साधन मानते हो तुम जानते हो वही प्रत्यंगिरा विपरीत प्रत्यंगिरा महा विपरीत प्रत्यंगिरा मेरा आंखों से वही हुई एक अश्रु बिंदु से उत्पन्न हुआ था । जितने भी महाविद्या हैं जितने भी उपविद्या हैं जितने भी अति विद्या है यह सब के सब मुझसे ही उत्पन्न होते हैं और मुझ में ही समाहित हो जाते हैं क्योंकि मैं स्वयं ब्रह्मविद्या हूं .... हां हां मैं वही उमा हूं जो शिवजी के बाम भाग में बैठी हुई होती है एक साधारण महिला की तरह..........

11/10/2022

किन महाग्रहों की प्रसन्नता के लिए किन देवता की आराधना करें.....
By ❤️ Prakash Ji ❤️

आजकल कुछ ज्योतिषाचार्य अपनी मनमानी से दो चार पुस्तक पढ़कर... अशास्त्रीय पद्धति से... ग्रह के इष्ट देवता का निर्णय कर देते हैं... जैसे कि सूर्य की कृपा प्राप्त करने के लिए भगवान विष्णु का आराधना कर दो... चंद्रमा की कृपा प्राप्ति करने के लिए भगवान शिव का आराधना कर दो.... मंगल की कृपा प्राप्त करने के लिए हनुमान जी का आराधना कर दो, गुरुवार के दिन साईं क्यों पूजा कर दो.. शुक्रवार के दिन संतोषी माता का पूजा कर दो आदि आदि.... पर मैं मेरे सभी मित्रों को तथा गुरुजनों को यह कह देना चाहता हूं कि ऐसे बातों में ना पड़े.... क्योंकि ज्योतिष आचार्य से खुद पूछ लीजिए वह आपको शास्त्रीय पद्धति का ज्ञान नहीं दे रहे हैं अपितु दो चार पुस्तक पढ़ कर वहां से उन्हें जो मिला वह आपको दे रहे हैं.... मैं यह नहीं कह रहा हूं कि आप उन देवताओं का आराधना नहीं कर सकते हैं.... मैं यह नहीं कह रहा हूं कि आप भगवान विष्णु का आराधना नहीं कर सकते हैं भगवान शिव का आराधना नहीं कर सकते हैं अथवा भगवान हनुमान का आराधना नहीं कर सकते हैं..... पर अगर आप भगवान सूर्य की कृपा प्राप्त करना चाहते हैं तो आपको किसका आराधना करना चाहिए.... जो शास्त्रीय हो । नव ग्रहों को प्रसन्न करने के लिए अगर हम कहासुनी बातों से देवताओं का आराधना करने लग जाएंगे तो हमें फल प्राप्ति तो अवश्य होगा पर पूर्ण मात्रा में कदापि नहीं होगा ❤️👍। मैं यहां पर आज आप लोगों को वास्तव में नव ग्रहों का ईस्ट कौन कौन देवता है किस ग्रह का इष्ट देव कौन है यहां पर देने जा रहा हूं 👍। जिस ग्रह को भी आप प्रसन्न करना चाहते हैं उनका इष्ट देवता हैं... आप उनका आराधना करें....

आप लोगों को भ्रम से सुरक्षित रखने हेतु मैं यहां पर प्रत्येक ग्रहों का जो वास्तविक इष्ट देवता हैं.... मैं उनका वर्णन कर रहा हूं.....आप उनका आराधना करें और कितना प्रचंडता के साथ लाभ प्राप्ति होगा आप यह खुद महसूस कर लीजिए....👍❤️ ।

ज्योतिष शास्त्र में सप्तवार का नाम इस प्रकार है....

👉आदित्यश्चन्द्रमा भौमो बुधश्चाथ बृहस्पतिः ।
शुक्रः शनैश्चरश्चैव वाराः सप्त प्रकीर्तिताः ||

प्रत्येक ग्रहों को एकदिवस समर्पित है 👍 । और उस दिन की जो भी ग्रह है उनके अधिश्वर ही उस दिवस की अधिश्वर हैं 👍 ।

सोम मंगल बुध गुरु आदि दिवस के क्रम भाव से ईष्ट हैं उनके बारे में वर्णना करते हुए कहा गया है कि........

👉शिवो दुर्गा गुहो विष्णुर्ब्रह्मेन्द्रः कालसंज्ञकः ।
सुर्यादिनां क्रमादेते स्वामिनः परिकीर्तिताः ||

अर्थात ज्योतिष शास्त्र के अनुसार भगवान सूर्य तथा रविवार के स्वामी भगवान शिव हैं । चंद्रमा तथा सोमवार की स्वामिनी भगवती दुर्गा हैं । मंगल तथा मंगलवार के स्वामी भगवान कार्तिकेय हैं । बुध तथा बुधवार के स्वामी भगवान विष्णु हैं । बृहस्पति तथा गुरुवार के स्वामी भगवान ब्रह्मा हैं । शुक्र तथा शुक्रवार के स्वामी भगवान इंद्र हैं । शनि तथा शनिवार के स्वामी भगवान काल देवता हैं ॥ प्रत्येक ग्रहों को प्रसन्न करने के लिए उनकी इष्ट देवता का आराधना अनिवार्य है ।

चलिए अब आते हैं...अधिदेवता और प्रत्यधि देवता तत्व के ऊपर👍 ।

अधि देवता और प्रत्यधि देवता मतलब... हो देवी देवता हैं... जिन का आवाहन के बिना, जिनका पूजन के बिना... जिनका अर्चन के बिना नवग्रहों में से कोई भी ग्रह आपका पूजन को स्वीकार नहीं करेंगे । जिस प्रकार आप अपने जीवन में किसी निर्दिष्ट देवता को जैसे कि हो जाएं भगवान विष्णु हो या फिर भगवान शिव हो या फिर मां दुर्गा हो या फिर अन्य किसी देवता को अपना सब कुछ मानते हैं... और इसी कारण उन्हें से आपको ऊर्जा प्राप्त होती है..... ठीक उसी प्रकार नवग्रहों का भी अपने अपने इष्ट देवता हैं... अपने अपने इष्ट देवता से उन्हें ऊर्जा प्राप्ति होती है । इसीलिए जब भी आप कहीं पर भी कोई भी छोटा या बड़ा अनुष्ठान हो रहा हो या फिर नवग्रहों का पूजन हो रहा हो.... ऐसी परिस्थिति में नव ग्रहों को उनके अधी देवता और प्रत्यधि देवता के सहित अनुष्ठान में आवाहन किया जाता है.... और उन ग्रहों के दाहिने भाग में अधि देवता को और बाएं भाग में प्रत्यधि देवता को स्थापित किया जाता है ❤️👍 ।

सूर्य महा ग्रह के अधीदेवता भगवान शिव हैं और प्रत्यधिदेवता अग्नि हैं । चंद्र महाग्रह के अधीदेवता भगवती उमा हैं और प्रत्यधिदेवता जल है । मंगल महाग्रह के अधीदेवता भगवान कार्तिकेय हैं और प्रत्यधिदेवता पृथ्वी है । बुध महाग्रह के अधीदेवता और प्रत्यधिदेवता दोनों ही भगवान विष्णु हैं । वृहस्पति महाग्रह के अधीदेवता भगवान ब्रह्मा और प्रत्यधिदेवता ईंद्र है । शुक्र महाग्रह के अधीदेवता भगवान इंद्र और प्रत्यधिदेवता इंद्राणी हैं । सनी महाग्रह के अधीदेवता भगवान धर्मराज हैं (कालधिष्ठातृ देवता यमराज के न्याय बंत स्वरूप)और प्रत्यधिदेवता प्रजापति हैं ।राहु महा ग्रह के अधीदेवता भगवान काल हैं और प्रत्यधिदेवता सर्प है । केतु महा ग्रह के अधीदेवता भगवान चित्रगुप्त हैं और प्रत्यधिदेवता ब्रह्मा हैं ।

आशा करता हूं कौन सी बार का इष्ट देवता कौन हैं कौन सी महा ग्रह के इष्ट देवता कौन हैं.... यह विषय आपको भली-भांति पता चल गया होगा 🥰 । आगे आप जिस भी महा ग्रह की आशीर्वाद प्राप्त करना चाहते हैं जिस भी महा ग्रह को प्रसन्न रखना चाहते हैं जिस भी महा ग्रह को शांत करना चाहते हैं... उनका जो इष्ट देवता मैं यहां पर बताया हूं आपको इनका आराधना करें । शीघ्राति शीघ्र आपको फल की प्राप्ति होगी और साथ ही साथ उस महा ग्रह आपके ऊपर अत्यंत प्रसन्न होंगे यह निश्चित है ।

21/07/2022

कितना बड़ा षड्यंत्र रहा होगा जब यह प्रसिद्ध किया गया कि “महाभारत घर में नहीं रखना चाहिए”, क्योंकि होगा ही नहीं तो कोई पढ़ेगा कैसे?
आभार - Prakash Ji

21/07/2022

महादेव के नाम संकीर्तन की अद्भुत महिमा
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*महादेव महादेव महादेवेति यो वदेत्।*
*एकेन मुक्तिमाप्नोति द्वाभ्यां शंभू ऋणी भवेत्।।*
❤️❤️❤️❤️❤️❤️❤️❤️❤️❤️❤️❤️❤️
जो पुरुष तीन बार महादेव, महादेव, महादेव इस तरह भगवान के नाम का उच्चारण करता है, भगवान उसे एक नाम से मुक्ति देकर शेष दो नामों से सदा के लिए उसके ऋणी हो जाते हैं।

*महादेव महादेव महादेवेति कीर्तयेत्।*
*उमायाः पतये चैव हिरण्यपतये सदा।।* ( #लिङ्गपुराण)

*महादेव महादेव महादेवेति कीर्तनात्॥*
*कोटयो ब्रह्महत्याना - मगम्यागमकोटयः।*

*महादेव महादेव महादेवेति कीर्तनात्।*
*सद्यः प्रलयमायांति महादेवेति कीर्तनात्॥*
( #स्कन्दपुराण)

*महादेव महादेव महादेवेति वादिनः।*
*पश्चाद्यामि महांस्त्रस्तो नाम श्रवण लोभतः॥* ( #ब्रह्मवैवर्तपुराण)

श्रीकृष्ण कहते हैं- महादेव! महादेव!! महादेव!!! इस प्रकार बोलने वाले पुरुष के पीछे-पीछे मैं नाम श्रवण के लोभ से फिरता रहता हूँ।

*महादेव महादेव महादेवेति कीर्तनात् ।*
*वत्सं गौरिव गौरीशो धावन्तमनुधावति ।।*

महादेव! महादेव!! महादेव!!! पुकारने से शिव उसके पिछे ऐसे दौड़ते है, जैसे बछड़े के पीछे गाय

।।महादेव।। महादेव ।।महादेव।।
🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏

आभार - पण्डित हरीश पुरी 'शास्त्री'

18/02/2022

*पिता का आशीर्वाद!*

कर्नाटक मै बेंगलुरु के एक व्यापारी की यह सत्य घटना है। जब मृत्यु का समय सन्निकट आया तो पिता ने अपने एकमात्र पुत्र धनपाल को बुलाकर कहा कि..

बेटा मेरे पास धनसंपत्ति नहीं है कि मैं तुम्हें विरासत में दूं। पर मैंने जीवनभर सच्चाई और प्रामाणिकता से काम किया है।

तो मैं तुम्हें आशीर्वाद देता हूं कि, तुम जीवन में बहुत सुखी रहोगे और धूल को भी हाथ लगाओगे तो वह सोना बन जायेगी।

बेटे ने सिर झुकाकर पिताजी के पैर छुए। पिता ने सिर पर हाथ रखकर आशीर्वाद दिया और संतोष से अपने प्राण त्याग कर दिए।

अब घर का खर्च बेटे धनपाल को संभालना था। उसने एक छोटी सी ठेला गाड़ी पर अपना व्यापार शुरू किया।

धीरे धीरे व्यापार बढ़ने लगा। एक छोटी सी दुकान ले ली। व्यापार और बढ़ा।

अब नगर के संपन्न लोगों में उसकी गिनती होने लगी। उसको विश्वास था कि यह सब मेरे पिता के आशीर्वाद का ही फल है।

क्योंकि, उन्होंने जीवन में दु:ख उठाया, पर कभी धैर्य नहीं छोड़ा, श्रद्धा नहीं छोड़ी, प्रामाणिकता नहीं छोड़ी इसलिए उनकी वाणी में बल था।

और उनके आशीर्वाद फलीभूत हुए। और मैं सुखी हुआ। उसके मुंह से बारबार यह बात निकलती थी।

एक दिन एक मित्र ने पूछा: तुम्हारे पिता में इतना बल था, तो वह स्वयं संपन्न क्यों नहीं हुए? सुखी क्यों नहीं हुए?

धर्मपाल ने कहा: मैं पिता की ताकत की बात नहीं कर रहा हूं। मैं उनके आशीर्वाद की ताकत की बात कर रहा हूं।

इस प्रकार वह बारबार अपने पिता के आशीर्वाद की बात करता, तो लोगों ने उसका नाम ही रख दिया बाप का आशीर्वाद!

धर्मपाल को इससे बुरा नहीं लगता, वह कहता कि मैं अपने पिता के आशीर्वाद के काबिल निकलूं, यही चाहता हूं।

ऐसा करते हुए कई साल बीत गए। वह विदेशों में व्यापार करने लगा। जहां भी व्यापार करता, उससे बहुत लाभ होता।

एक बार उसके मन में आया, कि मुझे लाभ ही लाभ होता है !! तो मैं एक बार नुकसान का अनुभव करूं।

तो उसने अपने एक मित्र से पूछा, कि ऐसा व्यापार बताओ कि जिसमें मुझे नुकसान हो।

मित्र को लगा कि इसको अपनी सफलता का और पैसों का घमंड आ गया है। इसका घमंड दूर करने के लिए इसको ऐसा धंधा बताऊं कि इसको नुकसान ही नुकसान हो।

तो उसने उसको बताया कि तुम भारत में लौंग खरीदो और जहाज में भरकर अफ्रीका के जंजीबार में जाकर बेचो। धर्मपाल को यह बात ठीक लगी।

जंजीबार तो लौंग का देश है। वहां से लौंग भारत में लाते हैं और यहां 10-12 गुना भाव पर बेचते हैं।

भारत में खरीद करके जंजीबार में बेचें, तो साफ नुकसान सामने दिख रहा है।

परंतु धर्मपाल ने तय किया कि मैं भारत में लौंग खरीद कर, जंजीबार खुद लेकर जाऊंगा। देखूं कि पिता के आशीर्वाद कितना साथ देते हैं।

नुकसान का अनुभव लेने के लिए उसने भारत में लौंग खरीदे और जहाज में भरकर खुद उनके साथ जंजीबार द्वीप पहुंचा।

जंजीबार में सुल्तान का राज्य था। धर्मपाल जहाज से उतरकर के और लंबे रेतीले रास्ते पर जा रहा था ! वहां के व्यापारियों से मिलने को।

उसे सामने से सुल्तान जैसा व्यक्ति पैदल सिपाहियों के साथ आता हुआ दिखाई दिया।

उसने किसी से पूछा कि, यह कौन है?

उन्होंने कहा: यह सुल्तान हैं।

सुल्तान ने उसको सामने देखकर उसका परिचय पूछा। उसने कहा: मैं भारत के गुजरात के खंभात का व्यापारी हूं। और यहां पर व्यापार करने आया हूं।

सुल्तान ने उसको व्यापारी समझ कर उसका आदर किया और उससे बात करने ल

धर्मपाल ने देखा कि सुल्तान के साथ सैकड़ों सिपाही हैं। परंतु उनके हाथ में तलवार, बंदूक आदि कुछ भी न होकर बड़ी-बड़ी छलनियां है।

उसको आश्चर्य हुआ। उसने विनम्रता पूर्वक सुल्तान से पूछा: आपके सैनिक इतनी छलनी लेकर के क्यों जा रहे हैं।

सुल्तान ने हंसकर कहा: बात यह है, कि आज सवेरे मैं समुद्र तट पर घूमने आया था। तब मेरी उंगली में से एक अंगूठी यहां कहीं निकल कर गिर गई।

अब रेत में अंगूठी कहां गिरी, पता नहीं। तो इसलिए मैं इन सैनिकों को साथ लेकर आया हूं। यह रेत छानकर मेरी अंगूठी उसमें से तलाश करेंगे।

धर्मपाल ने कहा: अंगूठी बहुत महंगी होगी।

सुल्तान ने कहा: नहीं! उससे बहुत अधिक कीमत वाली अनगिनत अंगूठी मेरे पास हैं। पर वह अंगूठी एक फकीर का आशीर्वाद है।

मैं मानता हूं कि मेरी सल्तनत इतनी मजबूत और सुखी उस फकीर के आशीर्वाद से है। इसलिए मेरे मन में उस अंगूठी का मूल्य सल्तनत से भी ज्यादा है।

इतना कह कर के सुल्तान ने फिर पूछा: बोलो सेठ, इस बार आप क्या माल ले कर आये हो।

धर्मपाल ने कहा कि: लौंग!

सुल्तान के आश्चर्य का ठिकाना नहीं रहा। यह तो लौंग का ही देश है सेठ। यहां लौंग बेचने आये हो? किसने आपको ऐसी सलाह दी।

जरूर वह कोई आपका दुश्मन होगा। यहां तो एक पैसे में मुट्ठी भर लोंग मिलते हैं। यहां लोंग को कौन खरीदेगा? और तुम क्या कमाओगे?

धर्मपाल ने कहा: मुझे यही देखना है, कि यहां भी मुनाफा होता है या नहीं।

मेरे पिता के आशीर्वाद से आज तक मैंने जो धंधा किया, उसमें मुनाफा ही मुनाफा हुआ। तो अब मैं देखना चाहता हूं कि उनके आशीर्वाद यहां भी फलते हैं या नहीं।

सुल्तान ने पूछा: पिता के आशीर्वाद? इसका क्या मतलब?

धर्मपाल ने कहा: मेरे पिता सारे जीवन ईमानदारी और प्रामाणिकता से काम करते रहे। परंतु धन नहीं कमा सकें।

उन्होंने मरते समय मुझे भगवान का नाम लेकर मेरे सिर पर हाथ रखकर आशीर्वाद दिए थे, कि तेरे हाथ में धूल भी सोना बन जाएगी।

ऐसा बोलते-बोलते धर्मपाल नीचे झुका और जमीन की रेत से एक मुट्ठी भरी और सम्राट सुल्तान के सामने मुट्ठी खोलकर उंगलियों के बीच में से रेत नीचे गिराई तो..

धर्मपाल और सुल्तान दोनों का आश्चर्य का पार नहीं रहा। उसके हाथ में एक हीरेजड़ित अंगूठी थी। यह वही सुल्तान की गुमी हुई अंगूठी थी।

अंगूठी देखकर सुल्तान बहुत प्रसन्न हो गया। बोला: वाह खुदा आप की करामात का पार नहीं। आप पिता के आशीर्वाद को सच्चा करते हो।

धर्मपाल ने कहा: फकीर के आशीर्वाद को भी वही परमात्मा सच्चा करता है।

सुल्तान और खुश हुआ। धर्मपाल को गले लगाया और कहा: मांग सेठ। आज तू जो मांगेगा मैं दूंगा।

धर्मपाल ने कहा: आप 100 वर्ष तक जीवित रहो और प्रजा का अच्छी तरह से पालन करो। प्रजा सुखी रहे। इसके अलावा मुझे कुछ नहीं चाहिए।

सुल्तान और अधिक प्रसन्न हो गया। उसने कहा: सेठ तुम्हारा सारा माल में आज खरीदता हूं और तुम्हारी मुंह मांगी कीमत दूंगा।

इस कहानी से शिक्षा मिलती है, कि पिता के आशीर्वाद हों, तो दुनिया की कोई ताकत कहीं भी तुम्हें पराजित नहीं होने देगी।

पिता और माता की सेवा का फल निश्चित रूप से मिलता है। आशीर्वाद जैसी और कोई संपत्ति नहीं।

बालक के मन को जानने वाली मां और भविष्य को संवारने वाले पिता यही दुनिया के दो महान ज्योतिषी है।

अपने बुजुर्गों का सम्मान करें! यही भगवान की सबसे बड़ी सेवा है।

07/02/2022

#पूजा_पाठ_के_सम्बन्ध_में_प्रयुक्त_होने_वाले
#कुछ_विशिष्ट_शब्दों_का_अर्थ
इस प्रकार समझना चाहिए ।

(1). पंचोपचार – गन्ध , पुष्प , धूप , दीप तथा नेवैद्य द्वारा पूजन करने को ‘पंचोपचार’ कहते हैं।

(2). पंचामृत – दूध ,दही , घृत, मधु { शहद } तथा मिश्री [ शक्कर ] इनके मिश्रण को ‘पंचामृत’ कहते हैं।

(3). पंचगव्य – गाय के दूध ,घृत , मूत्र तथा गोबर इन्हें सम्मिलित रूप में ‘पंचगव्य’ कहते हैं।

(4). षोडशोपचार – आवाहन् , आसन , पाध्य , अर्घ्य , आचमन , स्नान , वस्त्र , अलंकार , सुगंध , पुष्प , धूप , दीप , नैवैध्य , अक्षत , ताम्बुल तथा दक्षिणा इन सबके द्वारा पूजन करने की विधि को ‘षोडशोपचार’ कहते हैं।

(5). दशोपचार – पाध्य , अर्घ्य , आचमनीय , मधुपक्र , आचमन , गंध , पुष्प , धूप , दीप तथा नैवैध्य द्वारा पूजन करने की विधि को ‘दशोपचार’ कहते हैं।

(6). त्रिधातु –सोना , चांदी और लोहा कुछ आचार्य सोना ,चांदी , तांबा इनके मिश्रण को भी ‘त्रिधातु’ कहते हैं।

(7). पंचधातु – सोना , चांदी , लोहा , तांबा और जस्ता।

(8). अष्टधातु – सोना , चांदी, लोहा , तांबा , जस्ता , रांगा ,कांसा और पारा।

(9). नैवैध्य –खीर , मिष्ठान आदि मीठी वस्तुएं।

(10). नवग्रह –सूर्य , चन्द्र , मंगल , बुध , गुरु , शुक्र , शनि , राहु और केतु।

(11). नवरत्न – माणिक्य , मोती ,मूंगा , पन्ना , पुखराज , हीरा , नीलम , गोमेद , और वैदूर्य।

(12). अष्टगंध – अगर , तगर , गोरोचन , केसर , कस्तूरी ,,श्वेत चन्दन , लाल चन्दन और सिन्दूर { देवपूजन हेतु }
अगर , लाल चन्दन , हल्दी , कुमकुम , गोरोचन , जटामासी , शिलाजीत और कपूर [ देवी पूजन हेतु ]

(13). गंधत्रय – सिन्दूर , हल्दी , कुमकुम।

(14). पञ्चांग – किसी वनस्पति के पुष्प , पत्र , फल , छाल ,और जड़।

(15). दशांश – दसवां भाग। 1/10

(16). सम्पुट –मिट्टी के दो शकोरों को एक-दुसरे के मुंह से मिला कर बंद करना।

(17). भोजपत्र – एक वृक्ष की छाल
मन्त्र प्रयोग के लिए भोजपत्र का ऐसा टुकडा लेना चाहिए ,जो कटा-फटा न हो।

(18). मन्त्र धारण –किसी भी मन्त्र को स्त्री पुरुष दोनों ही कंठ में धारण कर सकते हैं ,परन्तु यदि भुजा में धारण करना चाहें तो पुरुष को अपनी दायीं भुजा में और स्त्री को बायीं भुजा में धारण
करना चाहिए।

(19). मुद्राएँ –हाथों की अँगुलियों को किसी विशेष स्तिथि में लेने कि क्रिया को ‘मुद्रा’ कहा जाता है। मुद्राएँ अनेक प्रकार की होती हैं।

(20). स्नान –यह दो प्रकार का होता है।बाह्य तथा आतंरिक,बाह्य स्नान जल से तथा आन्तरिक स्नान जप द्वारा होता है।

(21). तर्पण –नदी , सरोवर आदि के जल में घुटनों तक पानी में खड़े होकर , हाथ की अंजुली द्वारा जल गिराने की क्रिया को ‘तर्पण’ कहा जाता है। जहाँ नदी , सरोवर आदि न हो , वहां किसी पात्र में पानी भरकर भी ‘तर्पण’ की क्रिया संपन्न कर ली जाती है।

(22). आचमन – हाथ में जल लेकर उसे अपने मुंह में डालने की क्रिया को आचमन कहते हैं।

(23). करन्यास –अंगूठा , अंगुली , करतल तथा करपृष्ठ पर मन्त्र जपने को ‘करन्यास’ कहा जाता है।

(24). हृद्याविन्यास –ह्रदय आदि अंगों को स्पर्श करते हुए मंत्रोच्चारण को ‘हृदय्विन्यास’ कहते हैं।

(25). अंगन्यास – ह्रदय ,शिर , शिखा , कवच , नेत्र एवं करतल – इन 6 अंगों से मन्त्र का न्यास करने की क्रिया को ‘अंगन्यास’ कहते हैं।

(26). अर्घ्य – शंख , अंजलि आदि द्वारा जल छोड़ने को अर्घ्य देना कहा जाता है घड़ा या कलश में पानी भरकर रखने को अर्घ्य-स्थापन कहते हैं।अर्घ्य पात्र में दूध ,तिल , कुशा के टुकड़े , सरसों , जौ , पुष्प , चावल एवं कुमकुम इन सबको डाला जाता है।

(27). पंचायतन पूजा – इसमें पांच देवताओं – विष्णु , गणेश ,सूर्य , शक्ति तथा शिव का पूजन किया जाता है।

(28). काण्डानुसमय – एक देवता के पूजाकाण्ड को समाप्त कर ,अन्य देवता की पूजा करने को ‘काण्डानुसमय’ कहते हैं।

(29). उद्धर्तन – उबटन।

(30). अभिषेक – मन्त्रोच्चारण करते हुए शंख से सुगन्धित जल छोड़ने को ‘अभिषेक’ कहते हैं।

(31). उत्तरीय – वस्त्र।

(32). उपवीत – यज्ञोपवीत [ जनेऊ ]।

(33). समिधा – जिन लकड़ियों को अग्नि में प्रज्जवलित कर होम किया जाता है उन्हें समिधा कहते हैं।समिधा के लिए आक ,पलाश , खदिर , अपामार्ग , पीपल ,उदुम्बर ,शमी , कुषा तथा आम की लकड़ियों को ग्राह्य माना गया है।

(34). प्रणव –ॐ।

(35). मन्त्र ऋषि – जिस व्यक्ति ने सर्वप्रथम शिवजी के मुख से मन्त्र सुनकर उसे विधिवत सिद्ध किया था ,वह उस मंत्र का ऋषि कहलाता है। उस ऋषि को मन्त्र का आदि गुरु मानकर श्रद्धापूर्वक उसका मस्तक में न्यास किया जाता है।

(36). छन्द – मंत्र को सर्वतोभावेन आच्छादित करने की विधि को ‘छन्द’ कहते हैं। यह अक्षरों अथवा पदों से बनता है। मंत्र का उच्चारण चूँकि मुख से होता है अतः छन्द का मुख से न्यास किया जाता है।

(37). देवता – जीव मात्र के समस्त क्रिया- कलापों को प्रेरित , संचालित एवं नियंत्रित करने वाली प्राणशक्ति को देवता कहते हैं यह शक्ति मनुष्य के हृदय में स्थित होती है ,अतः देवता का न्यास हृदय में किया जाता है।

(38). बीज– मन्त्र शक्ति को उद्भावित करने वाले तत्व को बीज कहते हैं। इसका न्यास गुह्यांग में किया जाता है।

(39). शक्ति – जिसकी सहायता से
बीज मन्त्र बन जाता है वह तत्व ‘शक्ति’
कहलाता है। उसका न्यास पाद स्थान में करते है।

(40). विनियोग– मन्त्र को फल की दिशा का निर्देश देना विनियोग कहलाता है।

(41). उपांशु जप – जिह्वा एवं होठों को हिलाते हुए केवल स्वयं को सुनाई पड़ने योग्य मंत्रोच्चारण को ‘उपांशुजप’ कहते हैं।

(42). मानस जप – मन्त्र , मंत्रार्थ एवं देवता में मन लगाकर मन ही मन मन्त्र
का उच्चारण करने को ‘मानसजप’ कहते हैं।

(43). अग्नि की जिह्वाएँ – अग्नि की 7 जिह्वाएँ मानी गयी हैं , उनके नाम हैं –
1. हिरण्या 2. गगना 3. रक्ता 4. कृष्णा
5. सुप्रभा 6.बहुरूपा एवं 7. अतिरिक्ता।

(44). 1. काली 2.कराली 3. मनोभवा 4. सुलोहिता 5. धूम्रवर्णा 6.स्फुलिंगिनी एवं 7. विश्वरूचि।

(45). प्रदक्षिणा –देवता को साष्टांग दंडवत करने के पश्चात इष्ट देव की परिक्रमा करने को ‘प्रदक्षिणा’ कहते हैं।

विष्णु , शिव , शक्ति , गणेश और सूर्य आदि देवताओं की क्रमशः 4, 1, 2 , 1, 3, अथवा 7 परिक्रमाऐं करनी चाहियें।

(46). साधना – साधना 5 प्रकार
की होती है –
1.अभाविनी 2. त्रासी 3. दोवोर्धी
4. सौतकी 5.आतुरी।

[1] अभाविनी – पूजा के साधन
तथा उपकरणों के अभाव से , मन से अथवा जल मात्र से जो पूजा साधना की जाती है , उसे‘अभाविनी’ कहा जाता है।
[2] त्रासी –जो त्रस्त व्यक्ति तत्काल अथवा उपलब्ध उपचारों से अथवा मान्सोपचारों से पूजन करता है , उसे ‘त्रासी’कहते हैं। यह साधना समस्त सिद्धियाँ देती है।
[3] दोवोर्धी – बालक , वृद्ध , स्त्री ,
मूर्ख अथवा ज्ञानी व्यक्ति द्वारा बिना जानकारी के की जाने वाली पूजा‘दोर्वोधी’ कहलाती है।

[4] सौतकी -- सूतक में व्यक्ति मानसिक संध्या करा कामना होने पर मानसिक पूजन तथा निष्काम होने पर सब कार्य करें। ऐसी साधना को ‘सौतकी’ कहा जाता है।

[5] आतुरी --रोगी व्यक्ति स्नान एवं पूजन न करें
देवमूर्ति अथवा सूर्यमंडल की ओर देखकर, एक बार मूल मन्त्र का जप कर उस पर पुष्प चढ़ाएं फिर रोग की समाप्ति पर स्नान करके गुरु तथा ब्राह्मणों की पूजा करके, पूजा विच्छेद का दोष मुझे न लगे – ऐसी प्रार्थना करके विधि पूर्वक इष्ट देव का पूजनकरे तो इस पूजा को ‘आतुरी’ कहा जाएगा।

(47). अपने श्रम का महत्व –पूजा की वस्तुएं स्वयं लाकर तन्मय भाव से पूजन करने से पूर्ण फल प्राप्त होता है।अन्य व्यक्ति द्वारा दिए गये साधनों से पूजा करने पर आधा फल मिलता है।

(48). वर्जित पुष्पादि –
[1] पीले रंग की कट सरैया , नाग चंपा तथा दोनों प्रकार की वृहती के फूल पूजा में नही चढाये जाते।
[2] सूखे ,बासी , मलिन , दूषित तथा उग्र गंध वाले पुष्प देवता पर नही चढाये जाते।
[3] विष्णु पर अक्षत , आक तथा धतूरा नही चढाये जाते।
[4] शिव पर केतकी , बन्धुक { दुपहरिया } , कुंद , मौलश्री , कोरैया , जयपर्ण , मालती और
जूही के पुष्प नही चढाये जाते।
[5]दुर्गा पर दूब , आक , हरसिंगार , बेल तथा तगर नही चढाये जाते।
[6] सूर्य तथा गणेश पर तुलसी नही चढाई जाती।
[7] चंपा तथा कमल की कलियों के अतिरिक्त अन्य पुष्पों की कलियाँ नही चढाई जाती।

(49). ग्राह्यपुष्प –
~विष्णु पर श्वेत तथा पीले पुष्प , तुलसी
~ सूर्य , गणेश पर लाल रंग के पुष्प ,
~लक्ष्मी पर कमल,
~शिव के ऊपर आक , धतूरा , बिल्वपत्र तथा कनेर के पुष्प विशेष रूप से चढाये जाते हैं।
~अमलतास के पुष्प तथा तुलसी को निर्माल्य नही माना जाता।

(50). ग्राह्य पत्र- – तुलसी , मौलश्री ,
चंपा , कमलिनी , बेल ,श्वेत कमल , अशोक ,
मैनफल , कुषा , दूर्वा , नागवल्ली , अपामार्ग ,
विष्णुक्रान्ता , अगस्त्य तथा आंवला इनके पत्ते देव पूजन में ग्राह्य हैं।

(51). ग्राह्य फल – जामुन , अनार , नींबू , इमली , बिजौरा , केला , आंवला , बेर , आम तथा कटहल ये फल देवपूजन में ग्राह्य हैं।

(52). धूप – अगर एवं गुग्गुल की धूप विशेष
रूप से ग्राह्य है ,यों चन्दन-चूरा , बालछड़ आदि का प्रयोग भी धूप के रूप में किया जाता है।

(53). दीपक की बत्तियां – यदि दीपक में अनेक
बत्तियां हों तो उनकी संख्या विषम रखनी चाहिए ।
दायीं ओर के दीपक में सफ़ेद रंग की बत्ती तथा
बायीं ओर के दीपक में लाल रंग की बत्ती डालनी चाहिए।
सनातन धर्म की जय
अगर आप घर पर सपरिवार साथ हैं तो अपने बेटे एवं बेटी को अपने पोते एवं पोती को यह सब सिखाएं क्योंकि उन्हें हिंदू धर्म के विषय में ज्ञान होगा।

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