21/09/2026
कर्नाटक में स्थित पट्टदकल एक यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल है, जो 7वीं और 8वीं शताब्दी के हिंदू तथा जैन मंदिरों के लिए प्रसिद्ध है। प्रारंभिक चालुक्य वंश (543–753 ईस्वी) द्वारा विकसित यह स्थल कला और संस्कृति का प्रमुख केंद्र था। मलप्रभा नदी के तट पर स्थित इस पवित्र स्थान पर चालुक्य राजाओं का राज्याभिषेक होता था। यहाँ के कई प्रमुख मंदिर रानियों द्वारा अपने पतियों की सैन्य विजय के उपलक्ष्य में बनवाए गए थे, जिनमें रानी लोकमहादेवी द्वारा निर्मित भव्य विरुपाक्ष मंदिर प्रमुख है।
इस परिसर का सबसे बड़ा वास्तुशिल्प चमत्कार उत्तर भारतीय 'नागर' शैली और दक्षिण भारतीय 'द्रविड़' शैली का एक साथ अद्भुत संगम है। यहाँ दोनों शैलियों के मंदिर अगल-बगल खड़े हैं। इसके अलावा, गलगनाथ मंदिर जैसी कुछ संरचनाओं का अचानक अधूरा छूट जाना आज भी एक रहस्य है। इतिहासकारों का मानना है कि राजनीतिक उथल-पुथल, साम्राज्य के पतन या किसी शासक की अचानक मृत्यु के कारण इनका निर्माण बीच में ही रुक गया होगा।
मुख्य परिसर के दस प्रमुख मंदिरों में से नौ भगवान शिव को समर्पित हैं, जबकि एक अलग क्षेत्र में एक शांत जैन मंदिर स्थित है। पट्टदकल का भव्य विरुपाक्ष मंदिर इतना प्रभावशाली था कि यह बाद के साम्राज्यों के लिए एक आदर्श मॉडल बना। राष्ट्रकूटों द्वारा निर्मित एलोरा का प्रसिद्ध कैलाश मंदिर सीधे तौर पर इसी विरुपाक्ष मंदिर की वास्तुकला से प्रेरित होकर तराशा गया था।
यहाँ की मंदिर की दीवारों पर की गई पत्थर की बारीक नक्काशी भारतीय महाकाव्यों को जीवंत करती है। इन पर रामायण, महाभारत और भागवत पुराण की कथाएँ उकेरी गई हैं। दीवारों पर रावण द्वारा कैलाश पर्वत उठाने और बाल कृष्ण द्वारा माखन चुराने जैसे प्रसंगों को बहुत सुंदर एवं सजीव दृश्यों के रूप में दर्शाया गया है, जो उस काल की उत्कृष्ट मूर्तिकला का प्रमाण हैं।