27/05/2024
॥ श्रीहरिः ॥
॥ ॐ श्रीपरमात्मने नमः ॥
श्रीमद्भगवद्गीता अथ द्वादशोऽध्यायः
बारहवाँ अध्याय (भक्तियोग)
सब भूतों में द्वेषभाव से रहित और मैत्री आदि गुणों से युक्त प्रिय भक्त के लक्षण (श्लोक-१३-१४)
अद्वेष्टा सर्वभूतानां मैत्रः करुण एव च ।
निर्ममो निरहङ्कारः समदुःखसुखः क्षमी ॥
सन्तुष्टः सततं योगी यतात्मा दृढनिश्चयः ।
मय्यर्पितमनोबुद्धिर्-यो मद्भक्तः स मे प्रियः ॥
अद्वेष्टा, सर्वभूतानाम्, मैत्रः, करुणः, एव, च,
निर्ममः, निरहङ्कारः, समदुःखसुखः, क्षमी ॥ १३॥
सन्तुष्टः, सततम्, योगी, यतात्मा, दृढनिश्चयः,
मयि, अर्पितमनोबुद्धिः, यः, मद्भक्तः, सः, मे, प्रियः ॥ १४ ॥
इस प्रकार शान्तिको प्राप्त हुआ -
सर्वभूतानाम् = सब भूतों में, अद्वेष्टा = द्वेष-भाव से रहित, मैत्रः = स्वार्थरहित सबका प्रेमी, च = और, करुणः = हेतुरहित दयालु है, एव = तथा, निर्ममः = ममता से रहित, निरहङ्कारः = अहंकार से रहित, समदुःखसुखः = सुख-दुःखों की प्राप्ति में सम (और), क्षमी = क्षमावान् है अर्थात् अपराध करने वाले को भी अभय देनेवाला है (तथा जो), यः = जो पुरुष, योगी =योगी, सततम् = निरन्तर, सन्तुष्टः = संतुष्ट है, यतात्मा = मन-इन्द्रियों सहित शरीर को वश में किये हुए है (और), दृढनिश्चयः निश्चयवाला है, सः = वह, मयि = मुझमें दृढ़ मुझमें, अर्पितमनोबुद्धिः = अर्पण किये हुए मन-बुद्धिवाला, मद्भक्तः = मेरा भक्त, मे = मुझको, प्रियः = प्रिय है।
सब प्राणियोंमें द्वेषभावसे रहित और मित्रभाववाला तथा दयालु भी और ममतारहित, अहंकाररहित, सुख-दुःखकी प्राप्तिमें सम, क्षमाशील, निरन्तर सन्तुष्ट, योगी, शरीरको वशमें किये हुए, दृढ़ निश्चयवाला मुझमें अर्पित मन- बुद्धिवाला जो मेरा भक्त है, वह मुझे प्रिय है।
व्याख्या - गीता में मित्रता और करुणा न कर्मयोगी के लक्षणों में आयी है, न ज्ञानयोगी के लक्षणों में, प्रत्युत केवल भक्त के लक्षणों में आयी है। कर्मयोगी और ज्ञानयोगी में समता तो होती है, पर मित्रता और करुणा नहीं होती। परन्तु भक्त में आरम्भ से ही मित्रता और करुणा होती है।
भक्त की दृष्टि में एक भगवान् के सिवाय अन्य कुछ है ही नहीं, फिर कौन वैर करे, किससे करे और क्यों करे ? 'निज प्रभुमय देखहिं जगत केहि सन करहिं बिरोध' (मानस, उत्तर० ११२ ख)। यद्यपि ज्ञानयोगी का भी किसी से किंचिन्मात्र भी वैर नहीं होता, तथापि उसमें स्वाभाविक उदासीनता, तटस्थता रहती है। ज्ञानमार्ग में वैराग्य की मुख्यता रहती है और वैराग्य रूखा होता है इसलिये ज्ञानयोगी के भीतर कठोरता न होनेपर भी वैराग्य, उदासीनता के कारण बाहर से कठोरता प्रतीत होती है।
प्रत्येक साधक के लिये निर्मम और निरहंकार होना बहुत आवश्यक है। इसलिये गीता में भगवान् ने कर्मयोग (२।७१ ), ज्ञानयोग (१८।५३) और भक्तियोग (१२। १३) - तीनों ही योगमार्गों में निर्मम और निरहंकार होने की बात कही है। कारण कि वास्तव में हमारा स्वरूप निर्मम निरहंकार है।
भगवान् में ज्ञान की भूख तो नहीं है, पर प्रेम की भूख अवश्य है। कारण कि प्रेम प्रतिक्षण वर्धमान है, ज्ञान नहीं। इसलिये भगवान् कहते हैं कि मुझमें अर्पित मन- बुद्धिवाला भक्त मुझे प्रिय है।
श्रद्धेय स्वामी रामसुखदास जी
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