school of vedic science

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Researcher in vastu science
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09/08/2023

वास्तु शास्त्र कहता है यह १२ पौधे , घर मैं लाते हैं शुभ लाभ ।

वास्‍तु के हिसाब से कई पेड़-पौधे बेहद शुभ होते हैं और इनको घर में लगाने के क्‍या-क्‍या फायदे हो सकते हैं ये जान आप वाकई में हैरान रह जाएंगे।

समय के साथ कई बदलाव देखने को मिले हैं, इनमें एक घर का छोटा होना भी शामिल है। खास तौर से शहरों में, जहां आंगन का अस्तित्व तो लगभग खत्म ही हो गया है, जहां बड़ों की बैठकी लगती थी, बच्चे खेलते थे और साथ ही हरे-भरे पेड़-पौधे भी आंगन की शोभा बढ़ाते थे।

मगर इनका सिर्फ ये ही महत्व नहीं था, बल्कि इनसे घर की सुख-समृद्धि व संपन्नता भी जुड़ी होती थी। वास्तु के हिसाब से आइए आपको ऐसे पेड़-पौधों के बारे में बताते हैं, जो आपके घर के लिए बेहद लाभकारी हैं। अब भले ही घर में आंगन नहीं रहा, मगर शुक्र मनाइए बालकनी तो है।

तुलसी का पौधा

सबसे पहले शुरुआत तुलसी के पौधे से करते हैं, जो हर दूसरे भारतीय के घर में आपको मिल जाएगा। हिंदूू धर्म में इसे एक तरह से लक्ष्मी का दूसरा रूप माना गया है। सेहत के लिहाज से भी इसमें अद्भुत औषधीय गुण हैं। साथ ही तुलसी के पौधे के बारे में यह भी कहा जाता है कि यह घर में विपत्ति को आने से रोकता है और जिनको नहीं रोक पाता उसके संकेत देता है।

तुलसी का पौधा घर में उत्तर, उत्तर-पूर्व या पूर्व दिशा में लगाना चाहिए। यह घर से निगेटिव एनर्जी को दूर रखता है। वहीं यह अपने चारों ओर 50 मीटर तक का वातावरण भी शुद्ध रखता है। मगर गलती से भी तुलसी के पौधे को दक्षिण दिशा में नहीं लगाना चाहिए, क्योंकि फिर यह आपको फायदे की जगह काफी नुकसान पहुंचा सकता है।

बांस का पेड़

वास्तु में बांस के पेड़ को लेकर ऐसी मान्यताएं हैं कि इसे लगाने से आपकी तरक्की होती है और घर में सुख-समृद्धि आती है। वहीं घर की निगेटिव एनर्जी भी दूर होती है। बांस के पेड़ के बारे में कहा जाता है कि यह हर वातारण में तमाम मुश्किलों के बाद भी तेजी से बढ़ता है।

इसलिए इसे उन्नति, दीर्घ आयु और सुख-समृद्धि का प्रतीक माना जाता है। वहीं हिंदू धर्म के अनुसार भी बांस का घर में होना बेहद शुभ है। भगवान श्री कृष्ण हमेशा अपने पास बांस की बनी बांसुरी रखते थे। सभी शुभ अवसरों जैसे मुंडन, जनेउ व शादी आदि में बांस का जरूर उपयोग किया जाता है। इसे आप घर में कहीं भी लगा सकते हैं।

केले का पेड़

केला भी एक दिव्य गुणों से भरा पौधा है। यह एक फलदार पौधा होने के साथ ही घर में सुख और संपत्ति का संकेत भी देता है। हिंदु धर्म के अनुसार केले के पौधे में भगवान विष्णु का वास होता है और जिन घरों में होता है उन घरों की यह आर्थिक स्थिति कभी खराब नहीं होने देता है। ईशान कोण की दिशा में इसे लगाया जाना शुभ्ा बताया गया है।

हल्दी

तुलसी की तरह हल्दी भी वरदान प्राप्त पौधा है। यह गुणकारी और चमत्कारी है। यह ऐसी चीज है जिसका हर चीज में इस्तेमाल किया जाता है, जैसे कि पूजा, औषधी, आहार, सौन्दर्य प्रसाधन।

आंवले का पेड़

कहते हैं कि आंवले के पेड़ की पूजा करने से आपकी सारी मनोकामनाएं पूरी हो जाती हैं। इसकी हर रोज पूजा करने से सारे पापों का नाश भी होता है। इसे उत्तर या पूर्व दिशा में लगाना अत्यंत लाभकारी माना गया है।

श्वेतार्क का पौधा

इसे गणपति का पौधा मानते हैं और यह दूध वाला होता है। अब वैसे तो वास्तु के हिसाब से ऐसे पौधों का घर के भीतर होना अशुभ होता है, मगर श्वेतार्क इस मामले में अपवाद है। ऐसी भी मान्यता है कि जिसके घर के समीप यह पौधा फलता-फुलता है वहां हमेशा बरकत बनी रहती है।

अनार का पेड़

अनार भी एक गुणकारी पौधा है। वास्तु के अनुसार, यह ग्रह दोष को दूर करने और व्यक्ति को समृद्धि बनाने वाला है। घर में अनार का पेड़ होने से ग्रह दोषों से बचा जा सकता है।

परिजात का पौधा

परिजात के पौधे के बारे में शास्त्रों में कहा गया है कि यह समुद्रमंथन से निकला था। इसके फूूल को भगवान के चरणों में चढ़ाने से स्वर्ण दान का पुण्य मिलता है और इसके घर में होने से सारे देवी-देवताआें की कृपा बनी रहती है।

शमी का पेड़

शमी का पेड़ भी घर में होना शुभ माना गया है। ज्योतिष शास्त्र में इसका संबंध शनि से जोड़ा गया है और शनि की कृपा पाने के लिए शमी का पेड़ लगाकर इसकी पूजा-उपासना की जाती है। घर के मुख्य द्वार के बाईं ओर इस पौधे को लगाना शुभ बताया गया है। शमी के पेड़ के नीचे नियमित रूप से सरसों के तेल का दीपक जलाने से शनिक के प्रकोप से बचा जा सकता हैll
Acharya Shivprakash

09/08/2023

#हवन का क्या #वैज्ञानिक महत्व है?

हिन्दू सनातन धर्म में पूजा का सबसे अच्छा मार्ग हवन और यज्ञ है। इस विधि से भगवान को सदियों पहले से ही हमारे ऋषि मुनि रिझाते हुए आये है।यज्ञ को अग्निहोत्र कहते हैं।अग्नि ही यज्ञ का प्रधान देवता है। हवन में डाली गई सामग्री प्रसाद सीधे हमारे आराध्य देवी देवताओं तक पवित्र अग्नि के माध्यम से जाता है।वैज्ञानिक तथ्यानुसार जहाॅ हवन होता है, उस स्थान के आस-पास रोग उत्पन्न करने वाले कीटाणु शीघ्र नष्ट हो जाते है।

मनुष्य जीवन में यज्ञ और हवन का बहुत महत्व बताया गया है।यज्ञ हवन से देवी देवताओं की पूजा अर्चना ही नही बल्कि हवन यज्ञ से प्रदूषित वातावरण को भी शुद्ध किया जाता।यज्ञ हवन भी एक चिकित्सा पद्धति मानी गयी और हवन यज्ञ के माध्यम से विभिन्न बीमारियों का इलाज किया जाता है।

यज्ञोपैथी का पुराना वैदिक इतिहास है और जब चिकित्सा की अन्य पद्धतियां मौजूद नहीं थी तो.यज्ञ हवन आदि से ही वातावरण को बीमारी रहित बनाया जाता था।फ़्रांस के ट्रेले नामक वैज्ञानिक ने हवन पर रिसर्च की। जिसमें उन्हें पता चला की हवन मुख्यतः आम की लकड़ी को जलाकर की जाती है।

जब आम की लकड़ी जलती है तो फ़ॉर्मिक एल्डिहाइड नामक गैस उत्पन्न होती है जो खतरनाक बैक्टीरिया और जीवाणुओं को मारती है तथा वातावरण को शुद्ध करती है। इस रिसर्च के बाद ही वैज्ञानिकों को इस गैस और इसे बनाने का तरीका पता चला।

गुड़ को जलाने पर भी ये गैस उत्पन्न होती है।टौटीक नामक वैज्ञानिक ने हवन पर की गयी अपनी रिसर्च में ये पाया की यदि आधे घंटे हवन में बैठा जाये अथवा हवन के धुएं से शरीर का सम्पर्क हो तो टाइफाइड जैसे खतरनाक रोग फ़ैलाने वाले जीवाणु भी मर जाते हैं और शरीर शुद्ध हो जाता है।

हवन की महत्ता को देखते हुए राष्ट्रीय वनस्पति अनुसन्धान संस्थान लखनऊ के वैज्ञानिकों ने भी इस पर एक रिसर्च किया है कि क्या वाकई हवन से वातावरण शुद्ध होता है और जीवाणु नाश होते है अथवा नही होते हैं ? उन्होंने ग्रंथों में वर्णिंत हवन सामग्री जुटाई और जलाने पर पाया कि ये विषाणु नाश करती है।

फिर उन्होंने विभिन्न प्रकार के धुएं पर भी शोध किया और देखा कि सिर्फ आम की लकड़ी मात्र एक किलो जलाने से हवा में मौजूद विषाणु बहुत कम नहीं हो गये किन्तु उसमें जैसे ही उसके ऊपर आधा किलो हवन सामग्री डाल कर जलायी गयी तो एक घंटे के भीतर ही कक्ष में मौजूद बैक्टीरिया का स्तर ९४ % कम हो गया।

यही नहीं उन्होंने आगे भी कक्ष की हवा में मौजुद जीवाणुओ का परीक्षण किया और पाया कि कक्ष के दरवाज़े खोले जाने और सारा धुआं निकल जाने के २४ घंटे बाद भी जीवाणुओं का स्तर सामान्य से ९६ प्रतिशत कम था। बार-बार परीक्षण करने पर ज्ञात हुआ कि इस एक बार के धुएं का असर एक माह तक रहा और उस कक्ष की वायु में विषाणु स्तर 30 दिन बाद भी सामान्य से बहुत कम था।

यह रिपोर्ट एथ्नोफार्माकोलोजी के शोध पत्र में दिसंबर 2007 में प्रकाशित हो चुकी है। रिपोर्ट में लिखा गया कि हवन के द्वारा न सिर्फ मनुष्य बल्कि वनस्पतियों एवं फसलों को नुकसान पहुचाने वाले बैक्टीरिया का भी नाश होता है।जिससे फसलों में रासायनिक खाद का प्रयोग कम हो सकता है।
9-हवन करने से न सिर्फ भगवान ही खुश होते हैं बल्कि घर की शुद्धि भी हो जाती है।हवन यज्ञ का ही परिणाम है कि ओजोन परतों के छेद कम होने लगे हैं।भारत के अतिरिक्त चीन, जापान, जर्मनी और यूनानआदि देशों में अग्नि को पवित्र माना जाता है। इन देशों में विभिन्न प्रकार की धूप जलाने का चलन है।वस्तुत: अग्नि में जो वस्तु जलाई जाती है उसका स्वरूप सूक्ष्म से सूक्ष्मतर हो जाता है।आधुनिक परमाणु वैज्ञानिकों ने अब इस तथ्य को पूर्णत: आत्मसात कर लिया है कि स्थूल से सूक्ष्म कहीं अधिक शक्तिशाली है।

यज्ञ में चार प्रकार के हव्य पदार्थ डाले जाते हैं। सुगंधित-केसर, अगर, तगर, गुग्गल, कपूर, चंदन, इलायची, लौंग, जायफल, जावित्री आदि।पुष्टिकारक-घृत, दूध, फल, कंद, मखाने, अन्न, चावल जौ, गेहूं, उड़द आदि।मिष्ट-शक्कर, शहद, छुहारा, किशमिश, दाख आदि।रोगनाशक-गिलोय, ब्राह्मी, शंखपुष्पी, मुलहठी, सोंठ, तुलसी आदि औषधियां अर्थात जड़ी-बूटियां जो हवन सामग्री में डाली जाती हैं।

-प्राय: लोगों का विचार है कि यज्ञ में डाले गए घृत आदि पदार्थ व्यर्थ ही चले जाते हैं परंतु उनका यह विचार ठीक नहीं है। विज्ञान के सिद्धांत के अनुसार कोई भी पदार्थ कभी नष्ट नहीं होता अपितु उसका रूप बदलता है। यथा बर्फ का पिघल कर जल रूप में बदलना, जल का वाष्प रूप में बदल कर उड़ जाना। रूप बदलने का अर्थ नष्ट होना नहीं बल्कि अवस्था परिवर्तन है। बस यही सिद्धांत यज्ञ पर भी चरितार्थ होता है।

यज्ञ में डाले गए पदार्थ सूक्ष्म होकर आकाश में पहुंच जाते हैं। यज्ञ में पौष्टिक, सुगंधित और रोगनाशक औषधियों की हवन सामग्री से दी गई आहुतियों से पर्यावरण की शुद्धि होती है। सभी पदार्थ सूक्ष्म होकर पृथ्वी, आकाश, अंतरिक्ष में जाकर अपना प्रभाव दिखाते हैं। इससे मनुष्य, अन्य जीव-जंतु एवं वनस्पतियां सभी प्रभावित होते हैं।यज्ञ से शुद्ध हुई जलवायु से उत्पन्न औषधि, अन्न और वनस्पतियां आदि भी शुद्ध एवं निर्दोष होते हैं। वायु, जल आदि जो देव हैं वे यज्ञ से शुद्ध हो जाते हैं, आकाश मंडल निर्मल और प्रदूषणमुक्त हो जाता है। यही उन देवताओं का सत्कार और पूजा है।

अग्रि में समर्पित पदार्थ आकाश मंडल में पहुंच कर मेघ बनकर वर्षा में सहायक होते हैं। वर्षा से अन्न और अन्न से प्रजा की तुष्टि-पुष्टि होती है। इस प्रकार जो अग्निहोत्र करता है वह मानो प्रजा का पालन करता है। परमात्मा ने मनुष्य को बहुत कुछ दिया है परंतु क्या मनुष्य ने भी परमात्मा को यज्ञ के द्वारा कुछ दिया है? परमात्मा स्वयं वेद में कहता है :देहि में द दामि ते।।तुम मुझे दो, मैं तुम्हें देता हूं।अत: यज्ञ करते हुए बड़े प्रेम से वेदमंत्र बोल कर आहूति दो जिससे मन शुद्ध, पवित्र और निर्मल बन जाए , प्रदूषण समाप्त हो जाए और विश्व का कल्याण हो।

II शुभं भूयात् II
Aachrya shiv prakash

09/08/2023

शास्त्रों के अनुसार पूजा अर्चना में वर्जित काम

१) गणेश जी को तुलसी न चढ़ाएं
२) देवी पर दुर्वा न चढ़ाएं
३) शिव लिंग पर केतकी फूल न चढ़ाएं
४) विष्णु को तिलक में अक्षत न चढ़ाएं
५) दो शंख एक समान पूजा घर में न रखें
६) मंदिर में तीन गणेश मूर्ति न रखें
७) तुलसी पत्र चबाकर न खाएं
८) द्वार पर जूते चप्पल उल्टे न रखें
९) दर्शन करके बापस लौटते समय घंटा न बजाएं
१०) एक हाथ से आरती नहीं लेना चाहिए
११) ब्राह्मण को बिना आसन बिठाना नहीं चाहिए
१२) स्त्री द्वारा दंडवत प्रणाम वर्जित है
१३) बिना दक्षिणा ज्योतिषी से प्रश्न नहीं पूछना चाहिए
१४) घर में पूजा करने अंगूठे से बड़ा शिवलिंग न रखें
१५) तुलसी पेड़ में शिवलिंग किसी भी स्थान पर न हो
१६) गर्भवती महिला को शिवलिंग स्पर्श नहीं करना है
१७) स्त्री द्वारा मंदिर में नारियल नहीं फोडना है
१८) रजस्वला स्त्री का मंदिर प्रवेश वर्जित है
१९) परिवार में सूतक हो तो पूजा प्रतिमा स्पर्श न करें
२०) शिव जी की पूरी परिक्रमा नहीं किया जाता
२१) शिव लिंग से बहते जल को लांघना नहीं चाहिए
२२) एक हाथ से प्रणाम न करें
२३) दूसरे के दीपक में अपना दीपक जलाना नहीं चाहिए
२४.१)चरणामृत लेते समय दायें हाथ के नीचे एक नैपकीन रखें ताकि एक बूंद भी नीचे न गिरे
२४.२) चरणामृत पीकर हाथों को शिर या शिखा पर न पोछें बल्कि आंखों पर लगायें शिखा पर गायत्री का निवास होता है उसे अपवित्र न करें
२५) देवताओं को लोभान या लोभान की अगरबत्ती का धूप न करें
२६) स्त्री द्वारा हनुमानजी शनिदेव को स्पर्श वर्जित है
२७) कंवारी कन्याओं से पैर पडवाना पाप है
२८) मंदिर परिसर में स्वच्छता बनाए रखने में सहयोग दें
२९) मंदिर में भीड़ होने पर लाईन पर लगे हुए भगवन्नामोच्चारण करते रहें एवं अपने क्रम से ही अग्रसर होते रहें
३0) शराबी का भैरव के अलावा अन्य मंदिर प्रवेश वर्जित है
३१) मंदिर में प्रवेश के समय पहले दाहिना पैर और निकास के समय बाया पांव रखना चाहिए
३२)घंटी को इतनी जोर से न बजायें कि उससे कर्कश ध्वनि उत्पन्न हो
३४)हो सके तो मंदिर जाने के लिए एक जोड़ी वस्त्र अलग ही रखें
३५) मंदिर अगर ज्यादा दूर नहीं है तो बिना जूते चप्पल के ही पैदल जाना चाहिए
३६) मंदिर में भगवान के दर्शन खुले नेत्रों से करें और मंदिर से खड़े खड़े वापिस नहीं हों,दो मिनट बैठकर भगवान के रूप माधुर्य का दर्शन लाभ लें
३७) आरती लेने अथवा दीपक का स्पर्श करने के बाद हस्तप्रक्षालन अवश्य करें
इन सभी बताई गई बातें हमारे ऋषि मुनियों से परंपरागत रूप से प्राप्त हुई है।

🚩जय सनातन धर्म🙏🏻
आचार्य शिव प्रकाश शास्त्री

09/08/2023

मंत्रजप करने के कुछ सामान्य नियम.....

अशुचिर्वा शुचिर्वा गच्छंस्तिष्ठन स्वपन्नपि।
मन्त्रैकशरणो विद्वान् मनसैव सदाभ्यसेत् ।
न दोषो मानसे जाप्ये सर्वदेशेऽपि सर्वदा ।।

१. मन्त्र जप के समय निषिद्ध कार्य .....

आलस्य, जंभाई, निद्रा, छींक, थूकना, डरना,
अपवित्र अङ्ग का स्पर्श,क्रोध, मध्य में बातें करना,
जप में जल्दीबाजी करना, विलम्बपूर्वक जप,
गाकर जप, सिर हिलाना, लिखित मन्त्र पढ़ना,
मन्त्र का अर्थ न जानना, बीच-बीच में मन्त्र भूल जाना,

ll. इष्ट-देवता-मन्त्र एवं गुरु को पृथक्-पृथक् मानना निषिद्ध कार्य है ।l

२. मन्त्र-जप के समय आवश्यक नियम....

भूमिशयन, ब्रह्मचर्य, मौन,
गुरुसेवन, त्रिकालस्नान, पापकर्म परित्याग,
नित्य पूजा, नित्यदान, देवता की स्तुति एवं कीर्तन,
नैमित्तिक पूजा, इष्टदेव एवं गुरु में विश्वास, जपनिष्ठा।

३. मन्त्र-जप के समय त्याज्य.....

कर्मव्रात्य, नास्तिक, पतित आदि से संभाषण,
उच्छिष्ट मुख से वार्तालाप,असत्यभाषण, कुटिलभाषण, अनुष्ठान के समय-शपथ लेना, पहनने का वस्त्र ओढ़कर जप करना,
बिना आसन के जप करना, बिना माला ढके या सिर ढककर जप करना,
चलते या खाते समय जप करना, जूता पहनकर, पैर फैलाकर जप करना आदि निषिद्ध कार्य हैं ।

24/07/2023

#शिखा_बन्धन ( #चोटी) रखने का महत्त्व
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शिखा का महत्त्व विदेशी जान गए हिन्दू भूल गए।
हिन्दू धर्म का छोटे से छोटा सिध्दांत, छोटी-से-छोटी बात भी अपनी जगह पूर्ण और कल्याणकारी हैं। छोटी सी शिखा अर्थात् चोटी भी कल्याण, विकास का साधन बनकर अपनी पूर्णता व आवश्यकता को दर्शाती हैं। शिखा का त्याग करना मानो अपने कल्याणका त्याग करना हैं। जैसे घङी के छोटे पुर्जे कीजगह बडा पुर्जा काम नहीं कर सकता क्योंकि भले वह छोटा हैं परन्तु उसकी अपनी महत्ता है।

शिखा न रखने से हम जिस लाभ से वंचित रह जाते हैं, उसकी पूर्ति अन्य किसी साधन से नहीं हो सकती।

'हरिवंश पुराण' में एक कथा आती है हैहय व तालजंघ वंश के राजाओं ने शक, यवन, काम्बोज पारद आदि राजाओं को साथ लेकर राजा बाहू का राज्य छीन लिया। राजा बाहु अपनी पत्नी के साथ वन में चला गया। वहाँ राजा की मृत्यु हो गयी। महर्षिऔर्व ने उसकी गर्भवती पत्नी की रक्षा की और उसे अपने आश्रम में ले आये। वहाँ उसने एक पुत्र को जन्म दिया, जो आगे चलकर राजा सगर के नाम से प्रसिद्ध हुआ। राजासगर ने महर्षि और्व से शस्त्र और शास्त्र विद्या सीखीं। समय पाकर राजा सगरने हैहयों को मार डाला और फिर शक, यवन, काम्बोज, पारद, आदि राजाओं को भी मारने का निश्चय किया। ये शक, यवन आदि राजा महर्षि वसिष्ठ की शरण में चले गये। महर्षि वसिष्ठ ने उन्हें कुछ शर्तों पर उन्हें अभयदान दे दिया। और सगर को आज्ञा दी कि वे उनको न मारे। राजा सगर अपनी प्रतिज्ञा भी नहीं छोङ सकते थे और महर्षि वसिष्ठ जी की आज्ञा भी नहीं टाल सकते थे। अत: उन्होंने उन राजाओं का सिर शिखा सहित मुँडवाकर उनकों छोङ दिया।

प्राचीन काल में किसीकी शिखा काट देना मृत्युदण्ड के समान माना जाता था। बङे दुख की बात हैं कि आज हिन्दु लोग अपने हाथों से अपनी शिखा काट रहे है। यह गुलामी की पहचान हैं।

शिखा हिन्दुत्व की पहचान हैं। यह आपके धर्म और संस्कृतिकी रक्षक हैं। शिखा के विशेष महत्व के कारण ही हिन्दुओं ने यवन शासन के दौरान अपनी शिखा की रक्षा के लिए सिर कटवा दिये पर शिखा नहीं कटवायी।

डा॰ हाय्वमन कहते है ''मैने कई वर्ष भारत में रहकर भारतीय संस्कृति का अध्ययन किया हैं, यहाँ के निवासी बहुत काल से चोटी रखते हैं , जिसका वर्णन वेदों में भी मिलता हैं। दक्षिण भारत में तो आधे सिर पर 'गोखुर' के समान चोटी रखते हैं । उनकी बुध्दि की विलक्षणता देखकर मैं अत्यंत प्रभावित हुआ हुँ। अवश्य ही बौध्दिक विकास में चोटी बड़ी सहायता देती हैं। सिर पर चोटी रखना बढा लाभदायक हैं। मेरा तो हिन्दु धर्म में अगाध विश्वास हैं और मैं चोटी रखने का कायल हो गया हूँ ।

"प्रसिद्ध वैज्ञानिक डा॰ आई॰ ई क्लार्क एम॰ डी ने कहा हैं " मैंने जबसे इस विज्ञान की खोज की हैं तब से मुझे विश्वास हो गया हैं कि हिन्दुओं का हर एक नियम विज्ञान से परिपूर्ण हैं। चोटी रखना हिन्दू धर्म ही नहीं, सुषुम्ना के केद्रों की रक्षा के लिये ऋषि-मुनियों की खोज का विलक्षण चमत्कार हैं।

"इसी प्रकार पाश्चात्य विद्वान मि॰ अर्ल थामस लिखते हैं की "सुषुम्ना की रक्षा हिन्दु लोग चोटी रखकर करते हैं जबकि अन्य देशों में लोग सिर पर लम्बे बाल रखकर या हैट पहनकर करते हैं। इन सब में चोटी रखना सबसे लाभकारी हैं। किसी भी प्रकार से सुषुम्ना की रक्षा करना जरुरी हैं।

"वास्तव में मानव-शरीर को प्रकृति ने इतना सबल बनाया हैं की वह बड़े से बड़े आघात को भी सहन करके रह जाता हैं परन्तु शरीर में कुछ ऐसे भी स्थान हैं जिन पर आघात होने से मनुष्य की तत्काल मृत्यु हो सकती हैं। इन्हें मर्म-स्थान कहाजाता हैं।

शिखा के अधोभाग में भी मर्म-स्थान होता हैं, जिसके लिये सुश्रुताचार्य ने लिखा है मस्तकाभ्यन्तरोपरिष्टात् शिरासन्धि सन्निपातो।

रोमावर्तोऽधिपतिस्तत्रपि सद्यो मरणम्।
अर्थात् मस्तक के भीतर ऊपर जहाँ बालों का आवर्त(भँवर) होता हैं, वहाँ संपूर्ण नाङियों व संधियों का मेल हैं, उसे 'अधिपतिमर्म' कहा जाता हैं। यहाँ चोट लगने से तत्काल मृत्यु हो जाती हैं(सुश्रुत संहिता शारीरस्थानम् : ६.२८)

सुषुम्ना के मूल स्थान को 'मस्तुलिंग' कहते हैं। मस्तिष्क के साथ ज्ञानेन्द्रियों कान, नाक, जीभ, आँख आदि का संबंध हैं और कामेन्द्रियों - हाथ, पैर, गुदा, इन्द्रिय आदि का संबंध मस्तुलिंग से हैं मस्तिष्क व मस्तुलिंग जितने सामर्थ्यवान होते हैं उतनी ही ज्ञानेन्द्रियों और कामेन्द्रियों - की शक्ति बढती हैं। मस्तिष्क ठंडक चाहता हैं और मस्तुलिंग गर्मी मस्तिष्क को ठंडक पहुँचाने के लिये क्षौर कर्म करवाना और मस्तुलिंग को गर्मी पहुँचाने के लिये गोखुरके परिमाण के बाल रखना आवश्यक होता है।

बालकुचालक हैं, अत: चोटी के लम्बे बाल बाहर की अनावश्यक गर्मी या ठंडक से मस्तुलिंग की रक्षा करते हैं।

#शिखा_रखने_के_अन्य_लाभ
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१ शिखा रखने तथा इसके नियमों का यथावत् पालन करने से सद्‌बुद्धि , सद्‌विचारादि की प्राप्ति होती हैं।

२ आत्मशक्ति प्रबल बनती हैं।

३ मनुष्य धार्मिक , सात्विक व संयमी बना रहता हैं।

४ लौकिक - पारलौकिक कार्यों मे सफलता मिलती हैं।

५सभी देवी देवता मनुष्य की रक्षा करते हैं।

६ सुषुम्ना रक्षा से मनुष्य स्वस्थ, बलिष्ठ, तेजस्वी और दीर्घायु होता हैं।

७ नेत्र्ज्योति सुरक्षित रहती हैं।

इस प्रकार धार्मिक, सांस्कृतिक, वैज्ञानिक सभी दृष्टियों से शिखा की महत्ता स्पष्ट होती हैं। परंतु आज हिन्दू लोग पाश्चात्योंके चक्कर में पड़कर फैशनेबल दिखने की होड़ में शिखा नहीं रखते व अपने ही हाथों अपनी संस्कृति का त्याग कर डालते हैं।

लोग हँसी उड़ाये, पागल कहे तो सब सह लो पर धर्म का त्याग मत करो। मनुष्य मात्र का कल्याण चाहने वाली अपनी हिन्दू संस्कृति नष्ट हो रही हैं। हिन्दु स्वयं ही अपनी संस्कृति का नाश करेगा तो रक्षा कौन करेगा।

वेद में भी शिखा रखने का विधान कई स्थानों पर मिलता है,देखिये।

शिखिभ्यः स्वाहा (अथर्ववेद १९-२२-१५)

अर्थ👉 चोटी धारण करने वालों का कल्याण हो।

यशसेश्रियै शिखा।-(यजु० १९-९२)
अर्थ 👉 यश और लक्ष्मी की प्राप्ति के लिए सिर पर शिखा धारण करें।

याज्ञिकैंगौर्दांणि मार्जनि गोक्षुर्वच्च शिखा। (यजुर्वेदीय कठशाखा)

अर्थात्👉 सिर पर यज्ञाधिकार प्राप्त को गौ के खुर के बराबर(गाय के जन्में बछड़े के खुर के बराबर) स्थान में चोटी रखनी चाहिये।

केशानां शेष करणं शिखास्थापनं।
केश शेष करणम् इति मंगल हेतोः
👏👏(आचार्य शिव प्रकाश)

16/07/2023

#कर्पुर (कपूर) के उपाय -

कर्पूर या कपूर मोम की तरह उड़नशील दिव्य वानस्पतिक द्रव्य है। इसे अक्सर आरती के बाद या आरती करते वक्त जलाया जाता है जिससे वातावरण में सुगंध फैल जाती है और मन एवं मस्तिष्क को शांति मिलती है। कपूर को संस्कृत में कर्पूर, फारसी में काफूर और अंग्रेजी में कैंफर कहते हैं।

वास्तु एवं ज्योतिष शास्त्र में भी इसके महत्व और उपयोग के बारे में बताया गया है। कर्पूर के कई औषधि के रूप में भी कई फायदे हैं। इस लेख के माध्यम से हम जानेंगे कि कर्पूर या कपूर से आप कैसे अपनी परेशानी कम कर सकते हैं ,और कैसे आप अपने ग्रह और घर को भी बाधा मुक्त रख सकते हैं।

कर्पूर जलाने की परंपरा प्राचीन समय से चली आ रही है। शास्त्रों के अनुसार देवी-देवताओं के समक्ष कर्पूर जलाने से अक्षय पुण्य प्राप्त होता है। अत: प्रतिदिन सुबह और शाम घर में संध्यावंदन के समय कर्पूर (कपूर) जरूर जलाएं।

पितृदोष और कालसर्पदोष से मुक्ति हेतु -

कर्पूर जलाने से देवदोष व पितृदोष का शमन होता है। अक्सर लोग शिकायत करते हैं कि हमें शायद पितृदोष है या काल सर्पदोष है। दरअसल, यह राहु और केतु का प्रभाव मात्र है। इसको दूर करने के लिए घर के वास्तु को ठीक करें।
यदि ऐसा नहीं कर सकते हैं तो प्रतिदिन सुबह, शाम और रात्रि को तीन बार घी में भिगोया हुआ कर्पूर जलाएं। घर के शौचालय और बाथरूप में कर्पूर की 2-2 टिकियां रख दें। बस इतना उपाय ही काफी है।

आकस्मिक घटना या दुर्घटना से बचाव -

आकस्मिक घटना या दुर्घटना का कारण राहु, केतु और शनि होते हैं। इसके अलावा हमारी तंद्रा और
क्रोध भी दुर्घटना का कारण बनते हैं। इसके लिए रात्रि में हनुमान चालीसा का पाठ करने के बाद कर्पूर जलाएं।
प्रतिदिन सुबह और शाम जिस घर में कर्पूर जलता रहता है उस घर में किसी भी प्रकार की आकस्मिक घटना और दुर्घटना नहीं होती। रात्रि में सोने से पूर्व कर्पूर जलाकर सोना तो और भी लाभदायक है।

सकारात्मक उर्जा और शांति के लिए -

घर में यदि सकारात्मक उर्जा और शांति का निर्माण करना है तो प्रतिदिन सुबह और शाम कर्पूर को
घी में भिगोकर जलाएं और संपूर्ण घर में उसकी खुशबू फैलाएं। ऐसा करने से घर की नकारात्मक उर्जा नष्ट हो जाएगी। दु:स्वप्न नहीं आएंगे और घर में अमन शांति बनी रहेगी है।

वैज्ञानिक शोधों से यह भी ज्ञात हुआ है कि इसकी सुगंध से जीवाणु, विषाणु आदि बीमारी फैलाने वाले जीव नष्ट हो जाते हैं जिससे वातावरण शुद्ध हो जाता है तथा बीमारी होने का भय भी नहीं रहता।

वास्तु दोष मिटाने के लिए -

यदि घर के किसी स्थान पर वास्तु दोष निर्मित हो रहा है तो वहां कर्पूर की 2 टिकियां रख दें। जब वह टिकियां गलकर समाप्त हो जाए तब दूसरी दो टिकिया रख दें। इस तरह बदलते रहेंगे तो वास्तुदोष निर्मित नहीं होगा।

भाग्य उन्नति के लिए -

पानी में कर्पूर के तेल की कुछ बूंदों को डालकर नहाएं। यह आपको तरोताजा तो रखेगा ही आपके भाग्य को भी चमकाएगा। यदि इस में कुछ बूंदें चमेली के तेल की भी डाल लेंगे तो इससे राहु, केतु और शनि का दोष नहीं रहेगा, लेकिन ऐसे सिर्फ शनिवार को ही करें।

धन-धान्य बंधन हटाने के लिए -

रात्रि काल के समय रसोई समेटने के बाद चांदी की कटोरी में लौंग तथा कपूर जला दिया करें। यह कार्य नित्य प्रतिदिन करेंगे तो धन-धान्य से आपका घर भरा रहेगा। धन की कभी कमी न होगी।
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लेखक आचार्य शिव प्रकाश शास्त्री

16/07/2023

स्नान करते समय बोलने वालेके तेजको वरुण, हवन करते समय बोलने वाले की श्री को अग्निदेव तथा भोजन करते समय बोलने वाले की आयुको यमदेव हरण कर लेते हैं।
अतः उक्त तीनों कर्मोंमें मनुष्यको बोलना नहीं चाहिये। - वृद्ध मनु

16/07/2023

*पूजापाठ से जुड़ी हुईं महत्वपूर्ण बातें*

★ एक हाथ से प्रणाम नही करना चाहिए।

★ सोए हुए व्यक्ति का चरण स्पर्श नहीं करना चाहिए।

★ बड़ों को प्रणाम करते समय उनके दाहिने पैर पर दाहिने हाथ से और उनके बांये पैर को बांये हाथ से छूकर प्रणाम करें।

★ जप करते समय जीभ या होंठ को नहीं हिलाना चाहिए। इसे उपांशु जप कहते हैं। इसका फल सौगुणा फलदायक होता हैं।

★ जप करते समय दाहिने हाथ को कपड़े या गौमुखी से ढककर रखना चाहिए।

★ जप के बाद आसन के नीचे की भूमि को स्पर्श कर नेत्रों से लगाना चाहिए।

★ संक्रान्ति, द्वादशी, अमावस्या, पूर्णिमा, रविवार और सन्ध्या के समय तुलसी तोड़ना निषिद्ध हैं।

★ दीपक से दीपक को नही जलाना चाहिए।

★ यज्ञ, श्राद्ध आदि में काले तिल का प्रयोग करना चाहिए, सफेद तिल का नहीं।

★ शनिवार को पीपल पर जल चढ़ाना चाहिए। पीपल की सात परिक्रमा करनी चाहिए। परिक्रमा करना श्रेष्ठ है,

★ कूमड़ा-मतीरा-नारियल आदि को स्त्रियां नहीं तोड़े या चाकू आदि से नहीं काटें। यह उत्तम नही माना गया हैं।

★ भोजन प्रसाद को लाघंना नहीं चाहिए।

★ देव प्रतिमा देखकर अवश्य प्रणाम करें।

★ किसी को भी कोई वस्तु या दान-दक्षिणा दाहिने हाथ से देना चाहिए।

★ एकादशी, अमावस्या, कृृष्ण चतुर्दशी, पूर्णिमा व्रत तथा श्राद्ध के दिन क्षौर-कर्म (दाढ़ी) नहीं बनाना चाहिए ।

★ बिना यज्ञोपवित या शिखा बंधन के जो भी कार्य, कर्म किया जाता है, वह निष्फल हो जाता हैं।

★ शंकर जी को बिल्वपत्र, विष्णु जी को तुलसी, गणेश जी को दूर्वा, लक्ष्मी जी को कमल प्रिय हैं।

★ शंकर जी को शिवरात्रि के सिवाय कुमकुम नहीं चढ़ती।

★ शिवजी को कुंद, विष्णु जी को धतूरा, देवी जी को आक तथा मदार और सूर्य भगवानको तगर के फूल नहीं चढ़ावे।

★ अक्षत देवताओं को तीन बार तथा पितरों को एक बार धोकर चढ़ावे।

★ नये बिल्व पत्र नहीं मिले तो चढ़ाये हुए बिल्व पत्र धोकर फिर चढ़ाए जा सकते हैं।

★ विष्णु भगवान को चावल गणेश जी को तुलसी, दुर्गा जी और सूर्य नारायण को बिल्व पत्र नहीं चढ़ावें।

★ पत्र-पुष्प-फल का मुख नीचे करके नहीं चढ़ावें, जैसे उत्पन्न होते हों वैसे ही चढ़ावें।

★ किंतु बिल्वपत्र उलटा करके डंडी तोड़कर शंकर पर चढ़ावें।

★पान की डंडी का अग्रभाग तोड़कर चढ़ावें।

★ सड़ा हुआ पान या पुष्प नहीं चढ़ावे।

★ गणेश को तुलसी भाद्र शुक्ल चतुर्थी को चढ़ती हैं।

★ पांच रात्रि तक कमल का फूल बासी नहीं होता है।

★ दस रात्रि तक तुलसी पत्र बासी नहीं होते हैं।

★ सभी धार्मिक कार्यो में पत्नी को दाहिने भाग में बिठाकर धार्मिक क्रियाएं सम्पन्न करनी चाहिए।

★ पूजन करनेवाला ललाट पर तिलक लगाकर ही पूजा करें।

★ पूर्वाभिमुख बैठकर अपने बांयी ओर घंटा, धूप तथा दाहिनी ओर शंख, जलपात्र एवं पूजन सामग्री रखें।

★ घी का दीपक अपने बांयी ओर तथा देवता को दाहिने ओर रखें एवं चांवल पर दीपक रखकर प्रज्वलित करें।

★ गणेशजी को तुलसी का पत्र छोड़कर सब पत्र प्रिय हैं। भैरव की पूजा में तुलसी स्वीकार्य नहीं है।

★ कुंद का पुष्प शिव को माघ महीने को छोड़कर निषेध है।

★ बिना स्नान किये जो तुलसी पत्र जो तोड़ता है उसे देवता स्वीकार नहीं करते।

★ रविवार को दूर्वा नहीं तोड़नी चाहिए।

★ केतकी पुष्प शिव को नहीं चढ़ाना चाहिए।

★ केतकी पुष्प से कार्तिक माह में विष्णु की पूजा अवश्य करें।

★ देवताओं के सामने प्रज्जवलित दीप को बुझाना नहीं चाहिए।

★ शालिग्राम का आवाह्न तथा विसर्जन नहीं होता।

★ जो मूर्ति स्थापित हो उसमें आवाहन और विसर्जन नहीं होता।

★ तुलसीपत्र को मध्यान्ह के बाद ग्रहण न करें।

★ पूजा करते समय यदि गुरुदेव,ज्येष्ठ व्यक्ति या पूज्य व्यक्ति आ जाए तो उनको उठ कर प्रणाम कर उनकी आज्ञा से शेष कर्म को समाप्त करें।

★ मिट्टी की मूर्ति का आवाहन और विसर्जन होता है और अंत में शास्त्रीयविधि से गंगा प्रवाह भी किया जाता है।

★ कमल को पांच रात,बिल्वपत्र को दस रात और तुलसी को ग्यारह रात बाद शुद्ध करके पूजन के कार्य में लिया जा सकता है।

★ पंचामृत में यदि सब वस्तु प्राप्त न हो सके तो केवल दुग्ध से स्नान कराने मात्र से पंचामृतजन्य फल जाता है।

★ शालिग्राम पर अक्षत नहीं चढ़ता। लाल रंग मिश्रित चावल चढ़ाया जा सकता है।

★ हाथ में धारण किये पुष्प, तांबे के पात्र में चन्दन और चर्म पात्र में गंगाजल अपवित्र हो जाते हैं।

★ पिघला हुआ घी और पतला चन्दन नहीं चढ़ाना चाहिए।

★ प्रतिदिन की पूजा में सफलता के लिए दक्षिणा अवश्य चढ़ाएं।

★ आसन, शयन, दान, भोजन, वस्त्र संग्रह, विवाद और विवाह के समयों पर छींक शुभ मानी गई है।

★ जो मलिन वस्त्र पहनकर, मूषक आदि के काटे वस्त्र, केशादि बाल कर्तन युक्त और मुख दुर्गन्ध युक्त हो, जप आदि करता है उसे देवता नाश कर देते हैं।

★ मिट्टी, गोबर को निशा में और प्रदोषकाल में गोमूत्र को ग्रहण न करें।

★ मूर्ति स्नान में मूर्ति को अंगूठे से न रगड़ें।

★ पीपल को नित्य नमस्कार पूर्वाह्न के पश्चात् दोपहर में ही करना चाहिए। इसके बाद न करें।

★ जहां अपूज्यों की पूजा होती है और विद्वानों का अनादर होता है, उस स्थान पर दुर्भिक्ष, मरण और भय उत्पन्न होता है।

★ पौष मास की शुक्ल दशमी तिथि, चैत्र की शुक्ल पंचमी और श्रावण की पूर्णिमा तिथि को लक्ष्मी प्राप्ति के लिए लक्ष्मी का पूजन करें।

★ कृष्णपक्ष में, रिक्तिका तिथि में, श्रवणादी नक्षत्र में लक्ष्मी की पूजा न करें।

★ अपराह्नकाल में, रात्रि में, कृष्ण पक्ष में, द्वादशी तिथि में और अष्टमी को लक्ष्मी का पूजन प्रारम्भ न करें।

★ मंडप के नव भाग होते हैं, वे सब बराबर-बराबर के होते हैं अर्थात् मंडप सब तरफ से चतुरासन होता है, अर्थात् टेढ़ा नहीं होता। जिस कुंड की श्रृंगार द्वारा रचना नहीं होती वह यजमान का नाश करता है।

★ पूजा-पाठ करते समय हो जाए कुछ गलती तो अंत में जरूर बोलें ये एक मंत्र

आवाहनं न जानामि न जानामि विसर्जनम्।
पूजां चैव न जानामि क्षमस्व परमेश्वर॥
मंत्रहीनं क्रियाहीनं भक्तिहीनं जनार्दन।
यत्पूजितं मया देव! परिपूर्ण तदस्तु मे॥

आप सभी को निवेदन है अगर हो सके तो और लोगों को भी आप इन महत्वपूर्ण बातों से अवगत करा सकते है
आचार्य शिव प्रकाश शास्त्री
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16/07/2023

मंदिर की पैड़ी पर कुछ देर क्यों बैठा जाता है?

बड़े बुजुर्ग कहते हैं कि जब भी किसी मंदिर में दर्शन के लिए जाएं तो दर्शन करने के बाद बाहर आकर मंदिर की पेडी या ऑटले पर थोड़ी देर बैठते हैं । क्या आप जानते हैं इस परंपरा का क्या कारण है?

आजकल तो लोग मंदिर की पैड़ी पर बैठकर अपने घर की व्यापार की राजनीति की चर्चा करते हैं परंतु यह प्राचीन परंपरा एक विशेष उद्देश्य के लिए बनाई गई । वास्तव में मंदिर की पैड़ी पर बैठ कर के हमें एक श्लोक बोलना चाहिए। यह श्लोक आजकल के लोग भूल गए हैं।
आप इस लोक को सुनें और आने वाली पीढ़ी को भी इसे बताएं।

यह श्लोक इस प्रकार है -

अनायासेन मरणम् ,बिना देन्येन जीवनम्।
देहान्त तव सानिध्यम्, देहि मे परमेश्वरम् ।।

इस श्लोक का अर्थ है-
🔱 अनायासेन मरणम्...... अर्थात बिना तकलीफ के हमारी मृत्यु हो और हम कभी भी बीमार होकर बिस्तर पर पड़े पड़े ,कष्ट उठाकर मृत्यु को प्राप्त ना हो चलते फिरते ही हमारे प्राण निकल जाएं ।

🔱 बिना देन्येन जीवनम्......... अर्थात परवशता का जीवन ना हो मतलब हमें कभी किसी के सहारे ना पड़े रहना पड़े। जैसे कि लकवा हो जाने पर व्यक्ति दूसरे पर आश्रित हो जाता है वैसे परवश या बेबस ना हो । ठाकुर जी की कृपा से बिना भीख के ही जीवन बसर हो सके ।

🔱 देहांते तव सानिध्यम ........अर्थात जब भी मृत्यु हो तब भगवान के सम्मुख हो। जैसे भीष्म पितामह की मृत्यु के समय स्वयं ठाकुर जी उनके सम्मुख जाकर खड़े हो गए। उनके दर्शन करते हुए प्राण निकले ।

🔱 देहि में परमेशवरम्..... हे परमेश्वर ऐसा वरदान हमें देना ।

यह प्रार्थना करें गाड़ी ,लाडी ,लड़का ,लड़की, पति, पत्नी ,घर धन यह नहीं मांगना है यह तो भगवान आप की पात्रता के हिसाब से खुद आपको देते हैं । इसीलिए दर्शन करने के बाद बैठकर यह प्रार्थना अवश्य करनी चाहिए ।
यह प्रार्थना है, याचना नहीं है । याचना सांसारिक पदार्थों के लिए होती है जैसे कि घर, व्यापार, नौकरी ,पुत्र ,पुत्री ,सांसारिक सुख, धन या अन्य बातों के लिए जो मांग की जाती है वह याचना है वह भीख है।

हम प्रार्थना करते हैं प्रार्थना का विशेष अर्थ होता है अर्थात विशिष्ट, श्रेष्ठ । अर्थना अर्थात निवेदन। ठाकुर जी से प्रार्थना करें और प्रार्थना क्या करना है ,यह श्लोक बोलना है।

सब_से_जरूरी_बात

जब हम मंदिर में दर्शन करने जाते हैं तो खुली आंखों से भगवान को देखना चाहिए, निहारना चाहिए । उनके दर्शन करना चाहिए। कुछ लोग वहां आंखें बंद करके खड़े रहते हैं । आंखें बंद क्यों करना हम तो दर्शन करने आए हैं

भगवान के स्वरूप का, श्री चरणों का ,मुखारविंद का, श्रंगार का, संपूर्णानंद लें । आंखों में भर ले स्वरूप को । दर्शन करें और दर्शन के बाद जब बाहर आकर बैठे तब नेत्र बंद करके जो दर्शन किए हैं उस स्वरूप का ध्यान करें मंदिर में नेत्र नहीं बंद करना।

बाहर आने के बाद पैड़ी पर बैठकर जब ठाकुर जी का ध्यान करें तब नेत्र बंद करें और अगर ठाकुर जी का स्वरूप ध्यान में नहीं आए तो दोबारा मंदिर में जाएं और भगवान का दर्शन करें । नेत्रों को बंद करने के पश्चात उपरोक्त श्लोक का पाठ करें।

यहीं शास्त्र हैं यहीं बड़े बुजुर्गो का कहना हैं !
जय श्रीराम, जय श्री हनुमान, जय श्री गणेश 🙏

16/07/2023

शिवपुराण में भीष्म को महर्षि पुलस्त्य ने विभिन्न वृक्षों के बारे में बताया है और कहा कि वृक्ष पुत्रहीन व्यक्ति को पुत्र होने का वरदान देते है।

🌷पीपल का वृक्ष लगाने से एक हजार पुत्रों के बराबर फल मिलता है और धन की प्राप्ति होती है। साथ ही पीपल से रोग का नाश होता है।

🌷नीम के वृक्ष से दीर्घायु प्राप्त होती है।

🌷जामुन के वृक्ष से कन्या रत्न की प्राप्ति होती है।

🌷अनार के वृक्ष से सुंदर पत्नी की प्राप्ति होती है।

🌷पलाश ब्रह्मतेज प्रदान करता है।

🌷खैर का वृक्ष लगाने से आरोग्य की प्राप्ति होती है।

🌷नीम का वृक्ष लगाने से भगवान सूर्य प्रसन्न होते हैं।

🌷बेल के वृक्ष में भगवान शिव का वास होता है।

🌷गुलाव के पौधे में देवी पार्वती का निवास है।

🌷अशोक के वृक्ष में अप्सराओं और मोगरे की बेल में गंर्धव का निवास बताया गया है।

🌷बेंत का वृक्ष लुटेरों को भय देता है।

🌷चंदन के वृक्ष से पुण्य और कटहल के पेड़ से लक्ष्मी प्राप्त होती है।

🌷ताड़ का वृक्ष संतान का नाश करता है।

🌷मौलसिरी से कुल की वृद्धि होती है।

🌷केवड़े के पौधे से शत्रु का नाश होता है।

🌷इसके साथ ही जो लोग पौधे लगाकर उनकी देखभाल करते हैं उनको परलोक में सर्वश्रेष्ठ प्राप्त होता है।
#कंचन 🌷
Acharya Shivprakash shastri (vedic scientists)

16/07/2023

♦️ शनि व तेल का सम्बन्ध ♦️
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👉आप सभी जानते है शनि के दोष को दूर करने लिये तेल का दान किया जाता है। शनि पर तेल क्यो चढाया जाता है । इसके पीछे की कथा कहानी आप सभी जानते है।
👉मेरा धै इसके विज्ञान सम्मत कारण पर विचार करना है।
👉आप जानते है शनि का दुष्प्रभाव जब शरीर पर होता है तो वात जन्य कष्ट होते है। आयुर्वेद के अनुसार सरसो तेल की मालिस करने से वात शान्त होता है। जोड़ो के दर्द या मांसपेशियों में दर्द रहता है। ये भी गर्म या धूप में रखे तेल लगाने से कम होता है। धूप ( सूर्य) व गर्म ( मंगल ) अर्थात सूर्य व मंगल की ऊर्जा से शनि के दोष दूर होते है। इसलिये जोड़ो के दर्द, मांसपेशियों के दर्द दिन में कम व रात्रि को अधिक होते है। धूप सेकने से कम होते है।
👉शनि की धातु लोहा है। तेल स्नेहक होता है। जब लोहे पर तेल लगा होता है तो उसपर जंग नही लगता है। जंग लगे लोहे पर तेल का जंग उतर जाता है । वह साफ व दुष्प्रभाव से मुक्त हो जाता है। अग्निकारक( मंगल) तेल जैसे कॅरिसिन ऑयल से लोहे का जंग तुरंत साफ हो जाता है। साफ व शुद्ध लोहा ( अनुकूल शनि) मानव जीवन मे लाभप्रद भी होता है। तो जंग लगा लोहा ( प्रतिकूल शनि) कष्टकारक होता है। ऐसे लोहे से चोट लग जाये तो टिटनेस का खतरा होता है। जबकि ब्लड में लौह तत्व होता है। वह उस लोह तत्व को भी दूषित कर देता है।
👉आयुर्वेद या अन्य चिकित्सा पद्दति में दर्द नाशक जितने भी तेल आते है उनका रंग लाल होता है। लाल रंग मंगल व सूर्य की ऊर्जा को प्रतिनिधित्व करते है। यह रंग कोई ज्योतिषियों से पूछकर नही किये गया बस ग्रहों का कमाल है।
👉तेल का दान क्यो किया जाता है❓ शनि प्रतिनिधित्व तेल ( सरसो, तिल) के तेल को जब सर पर घुमाया जाता है तो वह व्यक्ति के शरीर के आभा मंडल में शनि की दूषित ऊर्जा को अवशोषित कर लेता है ।बार बार करने से वह ऊर्जा चक्र शनि की दूषित ऊर्जा से क्लीन हो जाता है। आभामंडल में ऊर्जा चक्र क्लॉक वाइज होता है। अतः घुमाना एंटी क्लॉक वाइज होना चाहिए तभी अधिक ऊर्जा अवशोषित होगी। यही दान की वैज्ञानिक कारण है। ज्योतिष अनुसार दान की वस्तु जबतक व्यक्ति के आभामंडल के सम्पर्क में नही आएगी उसका ज्योतिषीय दृष्टि से दान व्यर्थ है। आध्यात्मिक पक्ष उसका अलग हो सकता है।
👉शनि दोष से रोगी है तो धूप में रखे तेल की मालिस पूरे शरीर पर करे व फिर गर्म पानी से अच्छी तरह साबुन लगा कर नहा ले। ऐसा शनिवार को अवश्य करे। आपको बहुत जल्दी अच्छा अनुभव होगा।
👉दूसरा तरीका तेल का छाया पात्र दान है। अपनी छांया 3 मिनिट तक देखे तभी सही असर आएगा। या तेल को सर पर से एंटी क्लॉक वाइज धीरे धीरे 7 बार घुमाकर दान करे। यह दान फिर तुरंत होना चाहिए अधिक समय घर पर नही रखे।
नोट : यह मेरे मौलिक विचार है। आप सहमत असहमत हो सकते है।

🙇 #जयश्रीसीताराम🙇

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