13/09/2024
रेणु को पढ़ते हुए - 1
रेणु को आंचलिकता के चौखटे में रखकर नहीं पढ़ा जा सकता। उन्हें पढ़ने के लिए एक विश्व दृष्टि चाहिए। विश्व दृष्टि का एक आधार 'मिट्टी और मनुष्य से मुहब्बत' भी है। रूसो, मैक्सिम गोर्की और चेखव आज विश्व के महान कथाकार हैं तो अपनी मिट्टी और मनुष्य से मुहब्बत के कारण, ठीक उसी प्रकार प्रेमचंद, रेणु और श्रीलाल शुक्ल बड़े कथाकार हैं या यूं कहूं कि वैश्विक कथाकार हैं तो मिट्टी और मुहब्बत के कारण। रेणु का पात्र मिट्टी को पहचानता है। यही वजह है कि जब प्रशांत कहता है कि "मैंने तो फैसला कर लिया है, रिसर्च असफल होने की घोषणा कर दूंगा।" तब ममता जवाब देती है -"कोई रिसर्च कभी असफल नहीं होता है डॉक्टर! तुमने कम-से-कम मिट्टी को तो पहचाना।... मिट्टी और मनुष्य से मुहब्बत। छोटी बात नहीं।"
प्रकृति ने स्त्री में इतनी ताकत दी है कि जब पुरुष बौद्धिकता से युक्त भावुक विचार से ग्रसित होकर जीवन में हारने लगता है, तब वह उन्हें थाम लेती है और पुनः साहस से भर देती है। इसलिए प्रसाद ने कहा था -"तुमुल कोलाहल कलह में मैं हृदय की बात रे मन।"
रेणु की चिंता का आधार वैश्विक है। एक तरफ 20 वीं शताब्दी में साम्राज्य लोभी शासकों की संगीन साये में वैज्ञानिकों के दल विध्वंसक बम की रचना कर रहे हैं, तो रेणु मिट्टी और मनुष्य से मुहब्बत की भाषा सीखा रहे हैं। हिंसा से जर्जर प्रकृति रो रही है, तो दूसरी तरफ निलोत्पल विधाता की सृष्टि में मानव के रूप में अपराजेय योद्धा बनकर आया है। मानव को पराजित करना असंभव है, प्रचंड शक्तिशाली बम भी उन्हें पराजित नहीं कर सकता। हिंसा से का प्रतिरोधी अस्त्र अहिंसा ही हो सकता है। यही वजह है कि रेणु बंजर भूमि पर प्यार की खेती करना चाहता है।
जिस धरती ने रेणु को जन्म दिया उस धरती को रेणु ने साहित्य और प्रेम का स्वर्ग बना दिया। यह यह धरती आज भी व्यंग्य करती हुई कहती है - "ओ शहर वालों क्या तुम्हारे जमीं पर प्रेम की ऐसी खेती होती है? आओ भारत माता की गोद में जहां बंजर भूमि पर भी रजनीगंधा जैसा सुगंधित प्रेम का फूल खिलता है और आभाव में भी जिंदगी मुस्कुराती है, गाती है और मनुष्य होने की अमर संदेश सुनाती है।" इसलिए रेणु को 'धरती का धनी' कथाकार कहा जाता है। मैं तो रेणु को' कोसी की हाहाकार और आत्म शक्ति से भरा वसुंधरा का राजकुमार' कहता हूं। कोसी की हाहाकार इसलिए जब कोसी अपना उग्र रूप धारण करती है, तब उस अंचल की ओर पूरे भारत की दृष्टि को दृष्टिपात करने के लिए मजबूर कर देती है और आत्मशक्ति से भरा वसुंधरा का राजकुमार इसलिए कि वह उस हाहाकार को समेटकर, आंसू और पीड़ा को समन्वित कर उम्मीद और संघर्ष से जीत हासिल करने की ओर अग्रसर कर देता है। सच रेणु नहीं होता तो 70 साल से उस अंचल की चर्चा नहीं होती।
तेजस्वी (शोध छात्र, डीयू)