16/04/2020
क्या आप इन्हें पहचानते हैं ? इन्हें आज की जनरेशन छोड़िये, 80 और 90 के दशक वाली पीढ़ी भी नहीं पहचानती होगी.
इनका नाम भारत भूषण था. भारत भूषण 1950 के दशक के सबसे बड़े बॉलीवुड सुपरस्टार हुआ करते थे. 14 जून, 1920 को मेरठ में पैदा हुए भारत भूषण के पिता रायबहादुर मोतीलाल वकील थे। भारत भूषण के पिता चाहते थे कि उनका बेटा भी उन्हीं की तरह वकील बने। लेकिन ऐसा नहीं हुआ, क्योंकि भारत भूषण तो एक्टर बनना चाहते थे।
भारत भूषण ने अलीगढ़ से ग्रैजुएशन किया और इसके बाद मुंबई चले आए। मुंबई आते ही उनका स्ट्रगल शुरू हो गया। भारत भूषण जब मुंबई आए तो उनके पास मशहूर डायरेक्टर महबूब खान के लिए एक सिफारिशी खत था। महबूब खान उन दिनों 'अलीबाबा चालीस चोर' की शूटिंग में बिजी थे। भारत भूषण ने उन्हें वह चिट्ठी दिखाई लेकिन तब तक उनके लिए कोई रोल नहीं बचा था। वो बेहद निराश हो गए लेकिन किसी ने उन्हें बताया कि डायरेक्टर रामेश्वर शर्मा 'भक्त कबीर' फिल्म बना रहे हैं। इसके बाद रामेश्वर ने उन्हें फिल्म में काशी नरेश का रोल और 60 रुपए महीना की नौकरी दे दी। 1942 में रिलीज हुई फिल्म 'भक्त कबीर' उनका पहला रोल था।
'भक्त कबीर' फिल्म के बाद तो जैसे भारत भूषण की किस्मत ही खुल गई। इसके बाद उन्होंने भाईचारा, सावन, जन्माष्टमी, बैजू बावरा, मिर्जा गालिब जैसी कई फिल्में कीं। ये वो दौर था, जब किस्मत भारत भूषण पर मेहरबान थी। देखते ही देखते उन्होंने मुंबई में न सिर्फ कई बंगले खरीद लिए बल्कि महंगी-महंगी कारें भी खरीद लीं। इसी बीच भारत भूषण के बड़े भाई रमेश ने उन्हें प्रोड्यूसर बनने की सलाह दी। इस पर भारत ने बड़े भाई का कहना माना और कई फिल्में प्रोड्यूस कीं। इनमें से दो फिल्में 'बसंत बहार' और 'बरसात की रात' सुपरहिट हुईं और भारत भूषण मालामाल हो गए। उनके पास काफी पैसा आ गया।
इसके बाद भारत भूषण के भाई रमेश ने उन्हें और फिल्में बनाने के लिए उकसाया। साथ ही यह भी कहा कि एक फिल्म में मेरे बेटे को हीरो बना दीजिए। भारत भूषण ने भाई की बात मान ऐसा ही किया। लेकिन अफसोस, कि बाद में उन्होंने जितनी भी फिल्में बनाईं वो सब फ्लॉप होती गईं। ऐसे में भारत भूषण कर्ज में डूब गए और पाई-पाई को मोहताज हो गए।
भारत भूषण ने जितना कमाया था वो सब गवां दिया। उनके बंगले बिक गए, कारें बिक गईं फिर भी वो कहते रहे मुझे कोई तकलीफ नहीं। लेकिन जब एक दिन उन्हें अपनी लायब्रेरी की किताबें रद्दी के भाव बेचनी पड़ीं तो वो तड़प उठे। जिंदगी के आखिरी दिनों में भारत भूषण काफी परेशान हो गए थे। इज्जत, दौलत शोहरत सब तबाह हो चुका था।
भारत भूषण ने अपने आखिरी वक्त में कहा था- ''मौत तो सबको आती है, लेकिन जीना सबको नहीं आता....और मुझे तो बिल्कुल नहीं आया''
10 अक्टूबर, 1992 को 72 साल की उम्र में तंगहाली से जूझते-जूझते भारत भूषण दुनिया छोड़कर चले गए।
इनका ज़िक्र एक बार अमिताभ बच्चन ने 2008 में अपने ब्लॉग में किया था. उन्होंने लिखा था , 'एक बार काम के लिए जाते वक़्त सांता क्रूज़ बस स्टॉप पे मेरी नज़र गयी. वहां मैंने ५० के दशक के सुपरस्टार भारत भूषण को बस का इंतज़ार करते हुए देखा. वो भीड़ का हिस्सा थे, उन्हें कोई नहीं पहचान पाया पर मैंने पहचान लिया. मैंने सोचा की उनके पास जा के उनको कार में बैठा के उनके गंतव्य तक छोड़ देता हूँ, पर मेरी हिम्मत नहीं हुई, मुझे लगा की मैं उन्हें शर्मिंदा कर दूंगा. वह द्रष्य मेरे जीवन में एक अमिट छवि बन के रह गया. यह किसी के साथ भी हो सकता है, मेरे साथ भी. और यह सोच के मेरे रोंगटे खड़े हो गए'
कहा जाता है की अपने जीवन के अंतिम दिनों में भारत भूषण किसी मल्टीस्टोरी बिल्डिंग में चौकीदारी का काम करते थे. वही भारत भूषण जिनके पास मुंबई में अपने खुद के 5-6 बंगले हुआ करते थे.
गुरुदत्त की कल्ट क्लासिक 'प्यासा' का वह गीत सहस ही याद आ गया आज :
"वक़्त ने किया, क्या हसीं सितम,
तुम रहे ना तुम, हम रहे ना हम"