14/03/2026
छपरा बिहार जहां से राजीव प्रताप रूडी सांसद हैं, इनके हीं क्षेत्र में 5 दलित पासवान जाति के लोगों ने राजपूत समाज की 10वीं में पढ़ने वाली नाबालिग बच्ची के साथ गैंगरेप करके उसे कुएँ में फेंक दिया, जहाँ वह 30 मिनट तक तड़पती रही, और आखिर में तड़पते हुए दुनिया छोड़ गई।
एक ठाकुर लड़की पीड़ित है और आरोपी दलित है, तो इस पर कोई विशेष हल्ला नहीं मचेगा, कहीं कोई आंदोलन नहीं होगा, मिडिया वाले विलाप नहीं करेंगे।
बिहार में 32 क्षत्रिय विधायक है, कितने विधायक अभी तक पीड़ित के घर गए? क्या किसी ने आवाज उठाई? क्या इन्हें सिर्फ वोट चाहिए??
26/11/2020
वो 500 से ज्यादा कुस्तीयां लड़ा एक भी नही हारा,53 की छाति,6.2 की हाईट ओर 127kg वजन था
नाम है
💪दारा सिंह जी💪 #रुस्तम_ए_हिंद_दारा_सिंह_रंधावा को उनकी जन्म जयंती पर शत-शत नमन 🙏🏼🙏🏼🇮🇳🇮🇳
(19 नवंबर 1928 - 12 जुलाई 2012)
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दारा सिंह रंधावा, #कुश्ती का वो खिलाड़ी, जिसने अखाड़े से लेकर #रेसलिंग के रिंग तक के अपने सफर में दुनिया भर के करोड़ों लोगों की खूब वाहवाही बटोरी। उन्होंने #फ़िल्मी दुनिया में भी अपना नाम कमाया और साथ ही साथ राजनीति में भी अपने पैर रखने से न चूके।
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दारा सिंह का जन्म 19 नवंबर 1928 में अमृतसर के धर्मुचक्क नामक गांव में एक #जाट_जमींदार परिवार में हुआ था। उनका परिवार मूल रूप से खेतिहर पृष्ठभूमि का ही था।
बहुत ही कम उम्र में सिंह को उनके परिवार ने स्कूल से निकलवाकर खेतों में काम करने के लिए लगा दिया। बचपन में ही उनकी शादी उनसे उम्र में बड़ी बचनो कौर से करवा दी गयी जिनको सिंह ने बाद में तलाक़ दिया और 1961 में #सुरजीत_कौर से शादी रचाई।
दारा सिंह 1947 में सिंगापुर गए जहां उन्होंने एक ड्रम निर्माण करने वाली मिल में छोटी मोटी नौकरी की। सिंगापुर में ही वे #हरनाम_सिंह से मिले जो उनके गुरु बने और 6 फुट 2 इंच लंबे दारा सिंह को रेसलिंग की दुनिया में ले भी आए।
1954 में सिंह ने #टाइगर_जोगिन्दर_सिंह को हरा कर रुस्तम-ए-हिंद का ख़िताब जीता। उन्होंने 1959 के राष्ट्रमंडल खेलों की चैंपियनशिप भी जीती।
इसके बाद दारा सिंह प्रोफेशनल रेसलिंग में आ गए। अपनी लगभग 500 लड़ाइयों में दारा सिंह ने कई चैंपियनशिप जीतीं। सिंह ने कई मशहूर अंतरराष्ट्रीय पहलवानों को पटखनी दी जिनमें ऑस्ट्रेलिया के विख्यात रेसलर #किंग_कांग और 1956 के वर्ल्ड चैंपियन अमरीकी रेसलर #लू_थेज का नाम भी शामिल है। 1983 में सिंह ने रेसलिंग से अपनी रिटायरमेंट घोषित कर दी।
2012 में दिल के दौरे से मरने के छह साल बाद 2018 में ही वर्ल्ड रेसलिंग एंटरटेनमेंट ने दारा सिंह को अपने हॉल ऑफ़ फेम में जगह दी।
#भारत_के_हीमैन
दारा सिंह का मज़बूत शरीर उनको भारत का ‘पहला एक्शन हीरो’ और देश का पहला ‘ही-मैन’ बनाने में बहुत काम आया। #दिलीप_कुमार और मधुबाला की स्टार कास्ट वाली फिल्म संगदिल में सपोर्टिंग रोल से एक्टिंग शुरू करने के बाद दारा सिंह खुद ही फिल्मों की एक श्रेणी बन गए. ऐसी फिल्मों की शुरुआत उन्होंने 1962 में किंग कांग से की जिसको वे कथित तौर पर जबरदस्ती की गयी फिल्म बुलाते थे।
अपने पेशे की शुरुआत के लगभग दो दशकों तक दारा सिंह एक्शन हीरो के रोल में ही लीड पर छाए रहे। रुस्तम-ए-बगदाद(1963), फौलाद(1963), हर्क्युलेस (1964), सिकंदर-ए-आज़म(1965) और रुस्तम-ए-हिन्द (1965) कुछ उदाहरण हैं।
हिंदी फिल्म इंडस्ट्री की कई सारी बी-ग्रेड फिल्मों में काम करने के बाद दारा सिंह ने 1970 में कुछ हटकर करने की चाहत में फिल्म नानक दुख्या सब संसार का निर्देशन किया और एक्टिंग भी की जो 1947 के बाद के #बंटवारे के बाद हुई त्रासदियों पर आधारित थी।
सिंह ने कई टीवी शो, जिसमें हद कर दी आपने और क्या होगा निम्मो का शामिल हैं, में भी काम किया. लेकिन उनको 1987-88 के रामानंद सागर के मशहूर शो रामायण में #हनुमान का किरदार निभाने के लिए सबसे ज़्यादा प्रसिद्धि हासिल हुई।
सिंह ने कई बॉलीवुड फिल्मों में स्पेशल किरदार भी निभाया। उनके सब-रोल में सबसे महत्त्वपूर्ण #राज_कपूर की मेरा नाम जोकर (1970) रही। इसके अलावा उन्होंने अजूबा(1991), दिल्लगी(1999) और कल हो न हो (2003) में भी स्पेशल किरदार निभाया। 2006 की ब्लॉकबस्टर जब वी मेट उनकी आखिरी बॉलीवुड मूवी थी जिसमें उन्होंने #करीना_कपूर के दादा होने का किरदार निभाया।
#राजनेता
हालांकि दारा सिंह ज़्यादातर तो एक रेसलर व अभिनेता ही थे लेकिन उन्होंने राजनीति में भी काम किया भले ही ज़्यादा नहीं। सिंह 1998 में #भाजपा में शामिल हुए। 2003 में वे खेल श्रेणी से राज्य सभा के पहले चुने गए #सांसद थे। 2009 तक वे राज्य सभा के सांसद रहे। अखिल भारतीय जाट समाज और बॉम्बे जाट समाज में उन्होंने बतौर अध्यक्ष काम भी किया।
#मृत्यु
लंबी बीमारी से जूझते हुए उन्होंने 12 जुलाई 2012 सुबह 7.30 बजे उन्होंने अपनी अंतिम सांसे लीं। रुस्तम-ए हिन्द दारा सिंह के स्वास्थ्य के लिए पूरा देश प्रार्थना कर रहा था लेकिन कोकिला बेन अस्पताल के डॉक्टरों के लाखों प्रयासों के बाद भी दारा सिंह अपनी मृत्यु को टाल नहीं पाए।
🙏🙏
14/11/2020
आज से लगभग 2100 साल पहले यानि 57 BC से लेकर 35 BC तक राज करने वाले ग्रीक राजा Azillses ने कमल पर माता गज लक्ष्मी की मूर्ति अंकित ये सिक्का जारी किया था।
लक्ष्मी जी तो वैसे भी किसी न किसी फ़ॉर्म में पूरी दुनिया में पूजी जाती हैं, क्यूँकि हमने दिलीप सिंह जूदेव से सुना है पैसा ख़ुदा नहीं लेकिन ख़ुदा से कम भी नहीं मतलब ख़ुदा का नाम भी पैसा ही है, बंगारू लक्ष्मण ने भी इज़्ज़त से बड़ा भगवान पैसे यानि लक्ष्मी को ही बताया था। ख़ैर ये सब बातें करेंगे तो विषय से भटक जाएँगे। विषय है लक्ष्मी कि पूजा वो भी माता लक्ष्मी की पूजा और मान्यता का सर्वव्यापी होना वो भी आज से हज़ारों साल पहले।
दीपावली दुनिया का एक मात्र त्योहार है जो कुम्हार से लेकर सुनार तक बाज़ार के हर व्यापारी को कुछ देकर जाता है, लाई बताशे फूल माला से लेकर इलेक्ट्रॉनिक और ऑटमोबाइल के व्यापारी सभी चाहे वो जिस भी धर्म के हों, उन्हें इतना बड़ा व्यापार दे जाता है जो साल भर के व्यापार से भी ज़्यादा होता है।
दुनिया में कहीं कोई ऐसा फ़ेस्टिवल नहीं है जो समाज के हर वर्ग का कल्याण करे, इसीलिए दीपावली इतने धूम धाम से मनाई जाती है। सरकारों के सौ Stimulus Measures से बड़ा है दीपावली का त्योहार....तो इस पर्वराज दीपावली की सभी मित्रों को हार्दिक शुभकामनाएँ...लक्ष्मी कृपा हम सब पर बनी रहे 💐
01/05/2020
Need to bring widespread reforms in Medical Sectors.
20/04/2020
CSIR – NCL has set up Mist Sanitizer System in its campus for quick Sanitization of personnel. The system includes Mist Generation System, Pumping assembly, Mist generation Nozzles, Piping Assembly, and Sanitizing Fluid Storage Tank. The person while walking through the system is subjected to the mist for 10-15 seconds. The mist is generated through 24 nozzles placed at two different heights for maximum exposure and across the 12 feet length of the tunnel to ensure full body coverage. Sodium hypochlorite solution of suitable concentration as suggested by WHO (0.5% in water; equivalent to 5000 ppm) is used to create the disinfection mist in the chamber.
This unit is under testing for next few days and will be placed near the entrance of main gate for internal use of CSIR - NCL as required. A team lead by Dr Mahesh Dharne and Dr Syed Dastger, microbiologists of CSIR-NCL are studying the antibacterial activities on surfaces before and after the exposure.
16/04/2020
क्या आप इन्हें पहचानते हैं ? इन्हें आज की जनरेशन छोड़िये, 80 और 90 के दशक वाली पीढ़ी भी नहीं पहचानती होगी.
इनका नाम भारत भूषण था. भारत भूषण 1950 के दशक के सबसे बड़े बॉलीवुड सुपरस्टार हुआ करते थे. 14 जून, 1920 को मेरठ में पैदा हुए भारत भूषण के पिता रायबहादुर मोतीलाल वकील थे। भारत भूषण के पिता चाहते थे कि उनका बेटा भी उन्हीं की तरह वकील बने। लेकिन ऐसा नहीं हुआ, क्योंकि भारत भूषण तो एक्टर बनना चाहते थे।
भारत भूषण ने अलीगढ़ से ग्रैजुएशन किया और इसके बाद मुंबई चले आए। मुंबई आते ही उनका स्ट्रगल शुरू हो गया। भारत भूषण जब मुंबई आए तो उनके पास मशहूर डायरेक्टर महबूब खान के लिए एक सिफारिशी खत था। महबूब खान उन दिनों 'अलीबाबा चालीस चोर' की शूटिंग में बिजी थे। भारत भूषण ने उन्हें वह चिट्ठी दिखाई लेकिन तब तक उनके लिए कोई रोल नहीं बचा था। वो बेहद निराश हो गए लेकिन किसी ने उन्हें बताया कि डायरेक्टर रामेश्वर शर्मा 'भक्त कबीर' फिल्म बना रहे हैं। इसके बाद रामेश्वर ने उन्हें फिल्म में काशी नरेश का रोल और 60 रुपए महीना की नौकरी दे दी। 1942 में रिलीज हुई फिल्म 'भक्त कबीर' उनका पहला रोल था।
'भक्त कबीर' फिल्म के बाद तो जैसे भारत भूषण की किस्मत ही खुल गई। इसके बाद उन्होंने भाईचारा, सावन, जन्माष्टमी, बैजू बावरा, मिर्जा गालिब जैसी कई फिल्में कीं। ये वो दौर था, जब किस्मत भारत भूषण पर मेहरबान थी। देखते ही देखते उन्होंने मुंबई में न सिर्फ कई बंगले खरीद लिए बल्कि महंगी-महंगी कारें भी खरीद लीं। इसी बीच भारत भूषण के बड़े भाई रमेश ने उन्हें प्रोड्यूसर बनने की सलाह दी। इस पर भारत ने बड़े भाई का कहना माना और कई फिल्में प्रोड्यूस कीं। इनमें से दो फिल्में 'बसंत बहार' और 'बरसात की रात' सुपरहिट हुईं और भारत भूषण मालामाल हो गए। उनके पास काफी पैसा आ गया।
इसके बाद भारत भूषण के भाई रमेश ने उन्हें और फिल्में बनाने के लिए उकसाया। साथ ही यह भी कहा कि एक फिल्म में मेरे बेटे को हीरो बना दीजिए। भारत भूषण ने भाई की बात मान ऐसा ही किया। लेकिन अफसोस, कि बाद में उन्होंने जितनी भी फिल्में बनाईं वो सब फ्लॉप होती गईं। ऐसे में भारत भूषण कर्ज में डूब गए और पाई-पाई को मोहताज हो गए।
भारत भूषण ने जितना कमाया था वो सब गवां दिया। उनके बंगले बिक गए, कारें बिक गईं फिर भी वो कहते रहे मुझे कोई तकलीफ नहीं। लेकिन जब एक दिन उन्हें अपनी लायब्रेरी की किताबें रद्दी के भाव बेचनी पड़ीं तो वो तड़प उठे। जिंदगी के आखिरी दिनों में भारत भूषण काफी परेशान हो गए थे। इज्जत, दौलत शोहरत सब तबाह हो चुका था।
भारत भूषण ने अपने आखिरी वक्त में कहा था- ''मौत तो सबको आती है, लेकिन जीना सबको नहीं आता....और मुझे तो बिल्कुल नहीं आया''
10 अक्टूबर, 1992 को 72 साल की उम्र में तंगहाली से जूझते-जूझते भारत भूषण दुनिया छोड़कर चले गए।
इनका ज़िक्र एक बार अमिताभ बच्चन ने 2008 में अपने ब्लॉग में किया था. उन्होंने लिखा था , 'एक बार काम के लिए जाते वक़्त सांता क्रूज़ बस स्टॉप पे मेरी नज़र गयी. वहां मैंने ५० के दशक के सुपरस्टार भारत भूषण को बस का इंतज़ार करते हुए देखा. वो भीड़ का हिस्सा थे, उन्हें कोई नहीं पहचान पाया पर मैंने पहचान लिया. मैंने सोचा की उनके पास जा के उनको कार में बैठा के उनके गंतव्य तक छोड़ देता हूँ, पर मेरी हिम्मत नहीं हुई, मुझे लगा की मैं उन्हें शर्मिंदा कर दूंगा. वह द्रष्य मेरे जीवन में एक अमिट छवि बन के रह गया. यह किसी के साथ भी हो सकता है, मेरे साथ भी. और यह सोच के मेरे रोंगटे खड़े हो गए'
कहा जाता है की अपने जीवन के अंतिम दिनों में भारत भूषण किसी मल्टीस्टोरी बिल्डिंग में चौकीदारी का काम करते थे. वही भारत भूषण जिनके पास मुंबई में अपने खुद के 5-6 बंगले हुआ करते थे.
गुरुदत्त की कल्ट क्लासिक 'प्यासा' का वह गीत सहस ही याद आ गया आज :
"वक़्त ने किया, क्या हसीं सितम,
तुम रहे ना तुम, हम रहे ना हम"