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07/09/2023

G20 की मीटिंग चल रही है। मीडिया 24 घंटे रिपोर्टिंग किया जा रहा है ।कुछ लोगों को छोड़ दें तो अधिकतर भारतवासी उनके चमक दमक से प्रभावित हैं ,मानो भारत विश्व शक्ति के इर्द-गिर्द खड़ा हो रहा है लेकिन हम इसमें कर क्या रहे हैं ? हम यह दावा ठोक रहे हैं कि भारत भी लोकतंत्र की जननी है ! हम उसे यूरोपीय डेमोक्रेटिक सिस्टम को एकदम 100% परफेक्ट सिद्ध करने के लिए एड़ी चोटी एक लग रहे हैं। क्या इसे भी गुलामी हीन मानसिकता का परिणाम समझा जाए ? यह विमर्श का विषय हो सकता है ।इंडिया से नाम बदलकर भारत घोषित करने से क्या होगा ,जब तक भारतीयता या इसके तत्व को न अपनाया जाए ? कुछ लोग यह कह सकते है .हो तो रहा है ,धीरे धीरे होगा,पिछले 75 वर्षो के पाप भी धोने है.किंतु यह तर्क बस मन को भ्रमित करने वाला ही है..कुछ वर्ष पहले तक हम लोग स्वयं को समाजवादी कहते थे ,चीचा नेहरू से अब तक समाजवादी होने का ढोंग करने की परंपरा अभी गई नहीं ।यहां तक की कल के जनसंधी रहे भाजपाई भी खुद को गांधीवादी समाजवादी कहते रहे ।आज जब विश्व में समाजवाद की समाधि बन चुकी है तो यह भारत में ’सब का साथ सबका विकास’ के नाम से जोर मार रहा है ।वैसे जी20 के इस सम्मेलन में भारत कहीं नहीं दिख रहा है ,वह भारत, जो वेद पुराण उपनिषद रामायण या महाभारत में है ।वह भारत जो तमिल प्रदेश में है अथवा पूर्वोत्तर भारत में है, वह भारत भी इसमें नहीं है जो चंद्रगुप्त मौर्य के शौर्य ,अशोक की महानता, चाणक्य की बौद्धिकता, समुंद्रगुप्त की वीरता ,हर्षवर्धन की दानशीलता या शिवाजी के शौर्य वाले स्वराज में झलकता हो किंतु इस बात का संतोष है इसमें अकबर की महानता या गांधीवादी अहिंसा की नौटंकी नहीं दिखाई दे रही है। इससे कुछ मिली जुली संस्कृति वाले गैंग लोगों को आपत्ति भी हो सकती है। रवीश या आरफा की बातो का इंतजार रहेगा.एक लंबे समय से लोकतंत्र की आलोचना होती रही है, हेनरी एडम एमिल फागे,रॉबर्ट मिचेलस, बिल दुरंत जैसे विद्वानों की तार्किक आलोचना का विकल्प आज तक कोई विचारक नहीं दे पाया ।इन्होंने डेमोक्रेसी की इतनी तार्किक आलोचना की है जिसका तोड़ आज तक नहीं निकला।आज भारत में इस डेमोक्रेटिक शासन को पश्चिमी विचारक द्वारा धूर्तता, लंपट्टाता,मूर्खों का जातिवादी विकृति की बंदर बाट करने वाले शासन के शीर्षक से जब संबोधित किया जाता है तो आज के मौजूदा भारत के किसी विचारक के पास इसका कोई तार्किक उत्तर नहीं होता,वो चुपचाप इसको सुन लेते है. ज्यादा नहीं तो अखबारों के कार्टून या फिर टीवी पर चलने वाले चलते फिरते कार्टूनों से भारत के सिस्टम को बखूबी से समझा जा सकता है,जिनका विषय सिर्फ सत्ता प्राप्त करने के हथकंडे के इर्द गिर्द सिमटा है.आज की-20 के इस सम्मेलन में जब हम स्वयं को जन्मजात लोकतांत्रिक होने का ताल ठोक रहे हैं तब यूरोपीय अमेरिकी अखबार या मीडिया जगत हम पर हंस रहे हैं ।वह हंस इसलिए रहे हैं कि हमारा डेमोक्रेटिक सिस्टम काम कैसे करता है ? वह हंस रहे हैं ,हमारी न्यायपालिका/ पुलिस /शिक्षा/ स्वास्थ्य /पर्यावरण /प्रदूषण नियंत्रण जैसे डेमोक्रेटिक विभाग कम कैसे करते हैं ? भारत के इन सभी डेमोक्रेटिक सिस्टम का अनुभव कैसा है ? किसी भी आम भारतीय से पूछ ले तो उनकी वह सच्चाई बता सकता है ।भारत में लोकतंत्र कितना गहरा है यह किसी गांव के मुखिया के चुनाव के समय देखा जा सकता है। एक तरफ पश्चिम का लोकतंत्र है जिसने 75 वर्षो में प्रगति की सभी उपलब्धियां को प्राप्त की है दूसरी तरफ हम हैं ,जो सब ठीक है ,ठीक है ,का नारा लगाकर हवा बनकर सिर्फ 5 वर्ष तक इंतजार करते हैं ,चुनाव में जितने का। इसी डेमोक्रेटिक समाज की गुंडई और इज्जत से खेलने वाले जातिवाद , लंपट्टाता ,धूर्तता,कमीनापन ,भ्रष्ट घूसखोरी का दौरा प्रत्येक 5 वर्ष में आता है और जाता है ।सच तो ये है कि भारत के लोकतंत्र की यही पहचान विश्व में आज जानी जाती है ।यूरोप और अमेरिका के किसी भी विश्व प्रसिद्ध शिक्षण संस्थानों के शोध रिपोर्ट में देख ले तो यह बातें आपको प्रकाशित मिल जाएंगे ,लोग इनसे ही भारत की प्रगति का अंदाज लगाते है।प्रश्न यही उठता है की इन रिपोर्ट में गलत क्या है ? कुछ लोग बचाव में जरूर यह कहते हैं या कहेंगे कि भारत जैसे देश में इतनी विविधता है कि लोकतंत्र के अलावा कोई अन्य और विकल्प नहीं है ।फिर भी यह प्रश्न स्वयं से किया तो जा ही सकता है कि G 20 के इस बैठक में होने वाली चर्चा में डेमोक्रेटिक सिस्टम की जो वाह वाही हो रही है उसमे देश के एक आम नागरिक ,एक आम भारतीय कहां है ? वह अपनी जीवन की समस्या का क्या करें? उसके जीवन से जुड़ी हुई समस्याएं का समाधान आखिर हो तो कैसे हो? आज की वर्तमान राजनीतिक आरोप प्रत्यारोप और विविध गठजोड़ो वाले राजनीतिक चुनावी संस्कृति को देखें तो क्या उम्मीद बनती है ? मोदी युग के एक दशक हो चुके हैं ,अगला दशक कैसा होगा इस पर दुनिया भर में चर्चा चल रही है लेकिन इससे देश के आम नागरिकों का कितना भला होगा ? यह हमारे सोचने का विषय हो सकता है। शिक्षा ,स्वास्थ्य ,गरीबी ,बेरोजगारी जैसे मुद्दे कितने लोगो को उलझा रहे हैं ,इस डेमोक्रेटिक सिस्टम में वह छुपा नहीं है ।समस्या हमारे अंदर खुद है ,आखिर हम सिस्टम को क्यों दोष देते हैं ।संतोष यह कह कर कर सकते है की यूरोप भी तो इसी डेमोक्रेसी के छत्र छांव में मार रहा है ,देखिए फ्रांस और फिनलैंड के दंगे.हम तो फिर भी ठीक है.मूल बात यह है भारतीय नेतृत्व सिर्फ अपनी छवि चमकाने तक सीमित है,बस विश्व के चोटी के नेताओं में गिनती हो और होते रहे,करिश्माई नेतृत्व बनने की होड़ इस भारत को ले डूबेगी। वोकिज्म से प्रभावित सुप्रीम कोर्ट का जज भी लोकतांत्रिक होने का ढोंग करता है न की न्यायपालिका को सुधारने का. वास्तव में भारतीय नेतागण सिर्फ पश्चिमी विश्व से सर्टिफिकेट प्राप्त करने तक जायदा सक्रिय है.राष्ट्र की वास्तविक मुद्दों का समाधान शायद ही संभव हो.हिंदू मुस्लिम का गुणा गणित सिर्फ सत्ता में बने रहने का हथकंडा ही लग रहा है।वो तो धन्य हो सोशल मीडिया का जो कम से कम कुछ सोचने की जगह तो से रहा है बाकी राम जाने।तो अब देखना यही है की डेमोक्रेसी में कौन सा नया रूप आता है g20 के इस मीटिंग में,इंतजार कीजिए विश्व के शक्तिशाली नेताओं और देशों में भारत..जैसे किसी ढोंग का..और आनंदित हो उत्सव मनाए.वैसे सांप सपेरो के इस माने जाने वाले देश में यह उपलब्धि थोड़ी राहत दे सकती है.

31/12/2022

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