07/08/2024
दिल्ली और यूपीएससी
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साल 2011 कांग्रेस का शासन था। यूपीएससी के चेयरमैन थे डी पी अग्रवाल। इनके कार्यकाल में यूपीएससी की परीक्षा में CSAT इंट्रोड्यूस हुआ। एक आईआईटी स्कॉलर और IIITM, ग्वालियर के फाउंडर डायरेक्टर होने के तौर पे उन्हें शायद उनका कोई विश्वास रहा हो कि एक ऐसा पेपर इंट्रोड्यूस करो कि आईआईटी, आईआईएम वाला ब्रेन आईएएस बने। क्योंकि शायद इन्हें लगता हो कि एक मात्र यही ब्रेन टॉप क्लास होता है।
CSAT आते ही मानविकीय विषय ग्रेजुएट्स विशेषतः हिन्दी माध्यम का रिजल्ट अचानक पूर्व के 45% सिलेक्शन से 2011 में तत्काल 15% पर आ गिरता है। बाद के सालों में वह 1-2% रह जाता है। 2011 के बाद 2013 में मुख्य परीक्षा में भी ऐतिहासिक बदलाव होते हैं। एथिक्स का पेपर लाया जाता है।
इन बदलावों की मंशा यह थी कि शार्प और सेल्फ रिटेन ब्रेन खोजे जाएँगे। कोचिंग पर बच्चों की निर्भरता कम होगी और कोचिंग की संख्या में कमी आयेगी। कोचिंग माफिया का सफ़ाया होगा।
ये उपरोक्त बातें तो महज़ क्रोनोलॉजी हैं। असल बात तो यह है कि यह बदलाव किए जाने से पूर्व दिल्ली यूनिवर्सिटी, जेएनयू के साथ-साथ भारत की लगभग सभी राज्य यूनिवर्सिटी की यूपीएससी चयन में भागीदारी थी। जो इन बदलावों के साथ शून्य हो गई। नये पैटर्न ने ग्रामीण शिक्षा, हिन्दी/क्षेत्रीय भाषा, मानविकीय ग्रेड्यूट्स के लिए इस परीक्षा को इतना टफ कर दिया कि कोचिंग्स का बाज़ार और तेज़ी में नये कलेवर के साथ बढ़ा।
जब यूपीएससी से क्षेत्रीय तैयारियों के गढ़ नष्ट हुए तो दो तरह के धड़े निकले। एक वो लड़के जिनके सीमित संसाधन थे वह यूपीएससी के नाम पे राज्य सेवाओं और एसएससी, रेलवे, बैंक की तैयारी करने लगे पर वह वहीं मुखर्जी नगर, राजेंद्र नगर, नेहरू-गांधी विहार में ही रहे। इस पूरे दशक में मुखर्जी नगर एसएससी का नया गढ़ बना। इधर राज्य लोक सेवाओं में भी यूपीएससी का पैटर्न फॉलो किया गया तो राज्य वाले भी सब दिल्ली की और ही कूँच किए। दूसरा धड़ा वह था जिसके पास संसाधन था तो वह इस इस टफ परीक्षा के लिए भला दिल्ली क्यों न जाता? क्योंकि पैटर्न के बदलाव ने यह तो तय कर ही दिया था कि क्षेत्रीय स्थल पर कुछ नहीं हो सकेगा।
.तो इस तरह यह बच्चे यूपीएससी का एग्जाम देने तो जातें हैं वह वास्तव में वह इस परीक्षा की माँग के हिसाब से तैयारी नहीं कर पाते। पर वह दिल्ली में टिके रह कर अपने दूसरे विकल्पों पे काम जारी रखते हैं और बढ़ता रेंट, कठिन जीवन निर्वाह परिस्थिति, बढ़ती भीड़ इत्यादि का संघर्ष देखते हैं।
अब आतें हैं यूपीएससी पर। बहरहाल! जिस परीक्षा की बेसिक माँग का स्तर ‘द हिंदू’ जैसे अख़बार, लाइब्रेरी की घंटों पढ़ाई, पीआईबी का डेटा, ग्रुप डिस्कशन, टेस्ट सीरीज इत्यादि हो ऐसे में क्या यह संभव है कि बच्चा छोटे से गाँव छोड़िए, एक छोटे ज़िले से ऑनलाइन पढ़ाई करके एग्जाम क्रैक कर जाएगा?
इसलिए बदले पैटर्न के बाद आप एक सूत्री कार्यक्रम पायेंगे कि आईआईटी, आईआईएम, एम्स, बीटेक के लड़के धड़ल्ले से सेलेक्ट हो रहें हैं पर इलाहाबाद, आगरा, इंदौर, जयपुर, भोपाल, लखनऊ जैसी यूनिवर्सिटी अचानक ग़ायब हो गईं? कहीं न कहीं अचानक बहुत बड़ा गैप आ गया है। कोचिंग्स की आवश्यकता ख़त्म करने की बजायें बदले पैटर्न ने इसकी ज़रूरत और बढ़ा दी हैं। क्षेत्रीय यूनिवर्सिटी से पढ़ा गाँव का गरीब लड़का भी यूपीएससी की तैयारी का सोचता है तो दिल्ली ही उनका आख़िरी और एकमात्र विकल्प होती हैं। वह वज़ीराबाद के टीन के शेड में रह लेता है पर अपने राज्य के किसी एजुकेशन हब में यूपीएससी के लिये बेहतर पढ़ाई का एटमॉस्फेयर नहीं पाता।
यूपीएससी के बदले पैटर्न ने भारत के यूनिवर्सिटी सिस्टम की पढ़ाई के लूपहोल्स को खोल के रख दिया। यूपीएससी के नये पैटर्न ने पिछले एक दशक में यूनिवर्सिटी की पढ़ाई और यूपीएससी को अप्रोच करने के बीच का गैप इतना बढ़ा दिया कि जिसका सीधा फ़ायदा कोचिग्स को मिला। बच्चों विशेषतः हिन्दी माध्यम के गिरते कॉन्फ़िडेंस में कोचिग्स फ़्रीहैंड हो गईं कि “अब हम ही पालनहाल है, तुम ख़ुद से पढ़ के पास हो ही नहीं सकते।” रही सही कसर कुछ कुलगुरुओं ने रील्स और पीआर के माध्यम से ह्यूमन साइकोलॉजी से खेल कर पूरी कर दी।
अब जब दिल्ली में ये भीड़ सालों- साल से सर्वाइव कर रहीं है तो बढ़ते दबाव में एक न एक दिन तो विस्फोट होना था सो हुआ। बच्चों की जान गई तो ध्यान गया कि कैसे रहते हैं? क्या खाते हैं? कहाँ पढ़ने जाते हैं? इत्यादि। भीड़ कहीं भी होगी उसे मैनेज करना मुश्किल होगा ही।
समस्या की जड़ कोचिंग नहीं, कोचिंग की इतनी ज़रूरत क्यों है? ..यह है। और यह भी कि रील्स और वीडियोज के माध्यम से इस परीक्षा को ज़रूरत से ज़्यादा ग्लोरिफ़ाई किया गया है। जिस मंशा से नये पैटर्न को लागू किया गया वह सफल होने की बजाए समस्या को भयावह कर गया है।
वर्तमान सरकार और यूपीएससी को पुनः पुराने पैटर्न की ओर या नये विकल्प की तलाश करना चाहिए। जहां सिलेक्शन न सिर्फ़ यूनिवर्सिटी और क्षेत्र आधारित डाइवरसिफ़ाई हो सके बल्कि हर तबके को लेवल प्लेइंग फ़ील्ड मिल सके। एग्जाम की माँग ऐसी हो कि उसकी तैयारी दिल्ली से इतर भी हो सके। इलाहाबाद जैसे क्षेत्रीय कुछ हब रिवाइव हो सके।
~ शालिनी