दिल्ली और यूपीएससी
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साल 2011 कांग्रेस का शासन था। यूपीएससी के चेयरमैन थे डी पी अग्रवाल। इनके कार्यकाल में यूपीएससी की परीक्षा में CSAT इंट्रोड्यूस हुआ। एक आईआईटी स्कॉलर और IIITM, ग्वालियर के फाउंडर डायरेक्टर होने के तौर पे उन्हें शायद उनका कोई विश्वास रहा हो कि एक ऐसा पेपर इंट्रोड्यूस करो कि आईआईटी, आईआईएम वाला ब्रेन आईएएस बने। क्योंकि शायद इन्हें लगता हो कि एक मात्र यही ब्रेन टॉप क्लास होता है।
CSAT आते ही मानविकीय विषय ग्रेजुएट्स विशेषतः हिन्दी माध्यम का रिजल्ट अचानक पूर्व के 45% सिलेक्शन से 2011 में तत्काल 15% पर आ गिरता है। बाद के सालों में वह 1-2% रह जाता है। 2011 के बाद 2013 में मुख्य परीक्षा में भी ऐतिहासिक बदलाव होते हैं। एथिक्स का पेपर लाया जाता है।
इन बदलावों की मंशा यह थी कि शार्प और सेल्फ रिटेन ब्रेन खोजे जाएँगे। कोचिंग पर बच्चों की निर्भरता कम होगी और कोचिंग की संख्या में कमी आयेगी। कोचिंग माफिया का सफ़ाया होगा।
ये उपरोक्त बातें तो महज़ क्रोनोलॉजी हैं। असल बात तो यह है कि यह बदलाव किए जाने से पूर्व दिल्ली यूनिवर्सिटी, जेएनयू के साथ-साथ भारत की लगभग सभी राज्य यूनिवर्सिटी की यूपीएससी चयन में भागीदारी थी। जो इन बदलावों के साथ शून्य हो गई। नये पैटर्न ने ग्रामीण शिक्षा, हिन्दी/क्षेत्रीय भाषा, मानविकीय ग्रेड्यूट्स के लिए इस परीक्षा को इतना टफ कर दिया कि कोचिंग्स का बाज़ार और तेज़ी में नये कलेवर के साथ बढ़ा।
जब यूपीएससी से क्षेत्रीय तैयारियों के गढ़ नष्ट हुए तो दो तरह के धड़े निकले। एक वो लड़के जिनके सीमित संसाधन थे वह यूपीएससी के नाम पे राज्य सेवाओं और एसएससी, रेलवे, बैंक की तैयारी करने लगे पर वह वहीं मुखर्जी नगर, राजेंद्र नगर, नेहरू-गांधी विहार में ही रहे। इस पूरे दशक में मुखर्जी नगर एसएससी का नया गढ़ बना। इधर राज्य लोक सेवाओं में भी यूपीएससी का पैटर्न फॉलो किया गया तो राज्य वाले भी सब दिल्ली की और ही कूँच किए। दूसरा धड़ा वह था जिसके पास संसाधन था तो वह इस इस टफ परीक्षा के लिए भला दिल्ली क्यों न जाता? क्योंकि पैटर्न के बदलाव ने यह तो तय कर ही दिया था कि क्षेत्रीय स्थल पर कुछ नहीं हो सकेगा।
.तो इस तरह यह बच्चे यूपीएससी का एग्जाम देने तो जातें हैं वह वास्तव में वह इस परीक्षा की माँग के हिसाब से तैयारी नहीं कर पाते। पर वह दिल्ली में टिके रह कर अपने दूसरे विकल्पों पे काम जारी रखते हैं और बढ़ता रेंट, कठिन जीवन निर्वाह परिस्थिति, बढ़ती भीड़ इत्यादि का संघर्ष देखते हैं।
अब आतें हैं यूपीएससी पर। बहरहाल! जिस परीक्षा की बेसिक माँग का स्तर ‘द हिंदू’ जैसे अख़बार, लाइब्रेरी की घंटों पढ़ाई, पीआईबी का डेटा, ग्रुप डिस्कशन, टेस्ट सीरीज इत्यादि हो ऐसे में क्या यह संभव है कि बच्चा छोटे से गाँव छोड़िए, एक छोटे ज़िले से ऑनलाइन पढ़ाई करके एग्जाम क्रैक कर जाएगा?
इसलिए बदले पैटर्न के बाद आप एक सूत्री कार्यक्रम पायेंगे कि आईआईटी, आईआईएम, एम्स, बीटेक के लड़के धड़ल्ले से सेलेक्ट हो रहें हैं पर इलाहाबाद, आगरा, इंदौर, जयपुर, भोपाल, लखनऊ जैसी यूनिवर्सिटी अचानक ग़ायब हो गईं? कहीं न कहीं अचानक बहुत बड़ा गैप आ गया है। कोचिंग्स की आवश्यकता ख़त्म करने की बजायें बदले पैटर्न ने इसकी ज़रूरत और बढ़ा दी हैं। क्षेत्रीय यूनिवर्सिटी से पढ़ा गाँव का गरीब लड़का भी यूपीएससी की तैयारी का सोचता है तो दिल्ली ही उनका आख़िरी और एकमात्र विकल्प होती हैं। वह वज़ीराबाद के टीन के शेड में रह लेता है पर अपने राज्य के किसी एजुकेशन हब में यूपीएससी के लिये बेहतर पढ़ाई का एटमॉस्फेयर नहीं पाता।
यूपीएससी के बदले पैटर्न ने भारत के यूनिवर्सिटी सिस्टम की पढ़ाई के लूपहोल्स को खोल के रख दिया। यूपीएससी के नये पैटर्न ने पिछले एक दशक में यूनिवर्सिटी की पढ़ाई और यूपीएससी को अप्रोच करने के बीच का गैप इतना बढ़ा दिया कि जिसका सीधा फ़ायदा कोचिग्स को मिला। बच्चों विशेषतः हिन्दी माध्यम के गिरते कॉन्फ़िडेंस में कोचिग्स फ़्रीहैंड हो गईं कि “अब हम ही पालनहाल है, तुम ख़ुद से पढ़ के पास हो ही नहीं सकते।” रही सही कसर कुछ कुलगुरुओं ने रील्स और पीआर के माध्यम से ह्यूमन साइकोलॉजी से खेल कर पूरी कर दी।
अब जब दिल्ली में ये भीड़ सालों- साल से सर्वाइव कर रहीं है तो बढ़ते दबाव में एक न एक दिन तो विस्फोट होना था सो हुआ। बच्चों की जान गई तो ध्यान गया कि कैसे रहते हैं? क्या खाते हैं? कहाँ पढ़ने जाते हैं? इत्यादि। भीड़ कहीं भी होगी उसे मैनेज करना मुश्किल होगा ही।
समस्या की जड़ कोचिंग नहीं, कोचिंग की इतनी ज़रूरत क्यों है? ..यह है। और यह भी कि रील्स और वीडियोज के माध्यम से इस परीक्षा को ज़रूरत से ज़्यादा ग्लोरिफ़ाई किया गया है। जिस मंशा से नये पैटर्न को लागू किया गया वह सफल होने की बजाए समस्या को भयावह कर गया है।
वर्तमान सरकार और यूपीएससी को पुनः पुराने पैटर्न की ओर या नये विकल्प की तलाश करना चाहिए। जहां सिलेक्शन न सिर्फ़ यूनिवर्सिटी और क्षेत्र आधारित डाइवरसिफ़ाई हो सके बल्कि हर तबके को लेवल प्लेइंग फ़ील्ड मिल सके। एग्जाम की माँग ऐसी हो कि उसकी तैयारी दिल्ली से इतर भी हो सके। इलाहाबाद जैसे क्षेत्रीय कुछ हब रिवाइव हो सके।
~ शालिनी
UPSC Movement for Justice
This page speaks against the injustice being done to the students of Hindi medium, humanities subject and rural background in UPSC Civil Services Examination.
08/06/2022
आज बीबीसी में...
यूपीएससी में हिंदी माध्यम से सम्बंधित आँकड़े और समस्या बीबीसी से साझा करने का अवसर मिला।
हालाँकि हिंदी माध्यम की समस्याएँ इससे कहीं अधिक बिंदुओ में समाहित है। प्रतिशत में आँकड़े भयावह है। 2008 में 45% सलेक्ट होने वाला हिंदी माध्यम 2011 और 2013 में पैटर्न बदलने के बाद अब लगभग 2% में सिमट चुका है। यह मैं नहीं रिपोर्ट्स बताती है।
सभी बिंदुओ को एक ही रिपोर्ट में कवर करना संभव नहीं। अतः बीबीसी की इस रिपोर्ट को इस विषय की प्रस्तावना समझ कर पढ़ें।
UPSC की परीक्षा में हिंदी मीडियम के छात्र क्या पिछड़ रहे हैं? - BBC News हिंदी यूपीएससी की परीक्षा के टॉप-50 में हिंदी माध्यम से परीक्षा देने वाले दो छात्रों के आने के बाद भी क्यों उलझन में हैं हि....
यूपीएससी और हिंदी माध्यम का नैराश्य
2021 की यूपीएससी सिविल सेवा में चयनित अभ्यर्थियों को बधाई।
अब आते हैं हिंदी माध्यम पर। इस साल 18 वी रैंक लाकर हिंदी माध्यम ने झंडे गाड़ दिए हैं। पर आपको मालूम है कि रवि सिहाग को ये झंडे गाड़ने में एड़ी-चोटी का कितना ज़ोर लगाना पड़ा? साल 2018 में 337वीं रैंक और 2019 में 317वीं रैंक के बाद फ़ाइनली उन्हें एक बेहतर रैंक मिली। अब जाकर प्रॉपर आईएएस बन सकेंगे। हिंदी माध्यम से होना उनके लिए भी चुनौती था, वो भी तब जब वह अंग्रेज़ी का स्टडी मटीरीयल प्रयोग करते थे। मतलब अंग्रेज़ी में उपलब्ध सामग्री पढ़ना और मातृभाषा हिंदी में मेंस परीक्षा लिखना। साथ ही पिछले चयन में मिली नौकरी का एक्सपोज़र भी था।
इसके अलावा 22वी रैंक में एक और हिंदी माध्यम का उम्मीदवार क़ाबिज़ है। कुछ अपुष्ट जानकारी के अनुसार इसके बाद सब 501वी रैंक के बाद सिमटे हुए हैं। कुल मिलाकर 685 में 5-10 चयनित हो भी गए तो वाक़ई आप इसे 'उम्मीद की किरण' ही कह सकते हैं, 'उम्मीद' नहीं। ये जो 18वी रैंक का झंडा जहाँ गड़ा है उसके पीछे का रास्ता लम्बा और ख़ाली है।
परीक्षा का पैटर्न जब तक नहीं बदला था (2011से पूर्व) तब तक जो हिंदी माध्यम 48% पर था वह हिंदी माध्यम आज 2-3% रिज़ल्ट में ऐसा खुश है जैसे गड़ा हुआ धन मिल गया।
यह रिज़ल्ट भी सरकार को दिए ढेरों ज्ञापन, आंदोलन, मुख्यमंत्री, मंत्री, पत्राचार, अख़बार कवरेज, सोशल मीडिया और न जाने क्या-क्या करने के बाद भी ठीक से नहीं हासिल है। ..और अब अगर कुछ बेहतर हो भी जाए तो भी डी॰पी॰ अग्रवाल जैसे आधुनिक मैकाले का किया हुआ, जो गुजरे 10 साल में हमारी पीढ़ी ने भुगता है वह क्षम्य नहीं है। (पूर्व यूपीएससी चेयरमैन, जिन्होंने इस नए पैटर्न को लागू करने में भूमिका निभाई थी।)
अब कुछ लोग इस पर अपना ज्ञान दे सकते हैं कि भाषा चयन में बाधा नहीं है। यह मात्र हिंदी माध्यम का प्रलाप है।
.तो उनसे एक ही बात..
जाइए! टॉपर श्रुति शर्मा का इंटर्व्यू सुनिए। वह बतातीं हैं कि पिछले अटेम्प्ट में मेंस का फ़ॉर्म भरते समय गलती से उनका माध्यम 'हिंदी' क्लिक हो गया था। अतः उन्हें वह परीक्षा हिंदी माध्यम में देनी पड़ी और वह कुछ मार्क्स से सलेक्शन से चूक गईं, परफ़ॉर्म नहीं कर सकीं। (विडियो संलग्न है।) इससे बड़ा साक्ष्य हिंदी भाषाई हताशा का क्या होगा?
भई! अगर भाषा चयन और नॉलेज की अभिव्यक्ति में बाधा नहीं है तो टॉपर महोदया को पूर्व में ही हिंदी माध्यम से परीक्षा देने पर भी चयनित हो जाना चाहिए था।
.और बात हिंदी या अंग्रेज़ी में परीक्षा देने की नहीं है। परीक्षा की तैयारी, उसकी प्रोसेस, उपलब्ध अध्ययन सामग्री, मेंस के आन्सर जाँचने वालों का रवैया, यूपीएससी बोर्ड की उम्मीदवारों से एक्स्पेक्टेशन मायने रखती है। और यह एक्स्पेक्टेशन अंग्रेज़ी को पोषती है, यह कहूँ तो अतिशयोक्ति नहीं है। दौड़ शुरू करने की लाइन बराबरी की नहीं है। पूरे परीक्षा पैटर्न का झुकाव अंग्रेज़ी और टेकनिकल बैक्ग्राउंड की तरफ़ है। देशी, स्थानीय और हिंदी माध्यम के ग्रामीण बच्चे के लिए इसमें प्रीलिम्स के स्तर से ही एलिमिनेशन हैं, उसके लिए जगह ही नहीं है।
रिक्शे वाले, चाय वाले, सब्ज़ी वाले के बच्चों को IAS बनते देखने का बाज़ारवाद आपको सत्य नहीं देखने देता। exception are always there.. अतः सम्भव सब कुछ है। वह भी बनेगे अगर डिजर्व करते हैं पर इसे यूनिवर्सल मत मानिए।
फ़िलहाल हिंदी माध्यम के इत्ते से रिज़ल्ट से खुश होकर भाषाई हताशा का मखौल मत उड़ाइए। यह हिंदी माध्यम के मरणासन शरीर पर हंसने जैसा है कि देखो उसने अभी-अभी हाथ हिलाए।
हम हिंदी माध्यम वाले, एक लम्बे नैराश्य से गुजरे है, हम टूट गए, हम क़ाबिल थे पर हम दौड़ में बराबरी पर नहीं रखे गए। हम फिर भी चयनित हो गए पर हम हर रिज़ल्ट पर ग़ुस्से से भरे रहते हैं। हम सामान्य होने की कोशिश करते हैं पर उम्मीद की इक्का-दुक्का किरण हमारे नैराश्य को तोड़ने की बजाए और भड़का देती हैं। क्योंकि हमें उम्मीद की किरण नहीं सम्पूर्ण उम्मीद चाहिये।
शेष! रवि सिहाग के बहाने ही सही.. कुछ तो सुधरे और हिंदी माध्यम फिर से यूपीएससी के रिज़ल्ट में बराबरी कर सके।
~ शालिनी
14 -11-2021
15/11/2021
14 -11 -2021
Delhi
Candle march
14 -9-2021
(Delhi )
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17/10/2021
Aaj hamlog mukharjinagr (new delhi ) Me ek candle sabha ka ayojan kiya hai . Ek visham paristithi me kyk delhi me aaj barish ho rahi hai Or us time v halka Fulka barish ho rahi thi .
Mere dost,
Fir v hamlog is abhiyan ko rokne ka duhsahas nahi kiya kyk ye hindustan ke liye hai.
Doston ,
Aap sabhi se v humbly request hai
Aaplog v is samajik andolan me samil hoke is andolan ko safal banane me sahyog kare and is abhiyan ko Jan Jan tak pahuchaye or is pick ke sath tweet kare jisme ham sabhi ka demand ankit ho
Dhnyvad
Pradip mishra
8448807379
04/10/2021
Namaskar
My friends ,
Hamlog delhi me ek Jan andolan ki taiyar Kar rahe hain .
Jisme aap sabhi se sahyog ka ummid rakhe huwe Hai.
Dosto ,
Hamara demand -
civil service exam (UPSC )me Hindi Madhyam result Me Sudhar ho .
AND
Civil service exam me ek atirikt avsar (Jin students ka civil service me kayi attempts Kisi Na Kisi Karan se prabhavit Hua hai .
Dhanyavaad
Pradip mishra
8448807379
भारतीय संविधान के अनुच्छेद 351 में लिखा है कि-
"संघ का यह कर्तव्य होगा कि वह हिन्दी भाषा का प्रसार बढ़ाए, उसका विकास करे जिससे वह भारत की सामासिक संस्कृति के सभी तत्वों की अभिव्यक्ति का माध्यम बन सके और उसकी प्रकृति में हस्तक्षेप किए बिना हिन्दुस्तानी में और आठवीं अनुसूची में विनिर्दिष्ट भारत की अन्य भाषाओं में प्रयुक्त रूप, शैली और पदों को आत्मसात करते हुए और जहाँ आवश्यक या वांछनीय हो वहाँ उसके शब्द-भंडार के लिए मुख्यतः संस्कृत से और गौणतः अन्य भाषाओं से शब्द ग्रहण करते हुए उसकी समृद्धि सुनिश्चित करे।"
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बहुत क्षोभ, रोष और ग्लानि है यह कहने में कि ये कैसा प्रसार किया जा रहा है हिंदी सहित भारतीय भाषाओं का? .. जिसमे भारत की सबसे प्रतिष्ठित सेवा 'अखिल भारतीय प्रशासनिक सेवाओं' से हिंदी सहित भारतीय भाषियों को पृथक करने का खुला षड्यंत्र बुना गया है। दुर्दशा ऐसी की सिविल सेवा परीक्षा 2020 के परीक्षा परिणाम में कुल 746 पदों में से बमुश्किक 11 कैंडिडेट हिंदी भाषी निकल के आ रहे हैं और उनकी रैंक ऐसी कि शायद ही कोई प्रॉपर आईएएस या आईपीएस बन सके।
जब 2011 में यूपीएससी के तत्तकालीन अध्यक्ष डी पी अग्रवाल ( 'श्री' लगाने का मन नहीं है) ने जब सीसैट इंट्रोड्यूस किया था तो उनकी कयास थी कि यूपीएससी की तैयारी में कोचिंग की दुकानों को धक्का पहुंचेगा और रियल प्रतिभाओ को चांस मिलेगा। बहरहाल! ये बस एक कयास ही साबित हुआ व्यवहार में कोचिंग्स कुकुरमुत्ते की तरह उगी रहीं और सारी दुकानों में 'उत्तर भारत का सर्वश्रेष्ठ संस्थान' लिखा हुआ जगमगाता रहा। उलटे 2011 के बाद कोचिंग्स ने कॉर्पोरेट का दर्जा और पा लिया, जिसका सबसे बड़ा उदहारण 'अनएकेडमी' है। साथ ही इस पीरियड में सबने मुखर्जी नगर में भी कइयों को कोचिंग टायकून बनते देखा।
उधर जब पैटर्न बदल तो फायदा हुआ अंग्रेजी माध्यम के टेक्निकल बैकग्राउंड वालों का.. तमाम IITan, मेडिकल प्रोफेशनल, बिजिनेस स्कूल, व्यावसायिक शिक्षा वालों ने प्रीलिम्स पर एकाएक कब्जा कर लिया और सिलेक्शन में छा गए। पीछे रह गए खालिस गांव और कस्बों के स्कूल- कॉलेजों से पढ़े हिंदी माध्यम के उम्मीदवार। आखिर बदले पैटर्न का हर हाल में नुकसान उठाने वाले यूनिवर्सिटी सिस्टम के हयूमैनिटिज़ बैकग्राउंड के ये उम्मीदवार धड़ाम ने औंधे मुंह गिरे। (हयूमैनिटिज़ ऑप्शनल की बात नहीं है)
इसका सबूत है या डेटा कि ठीक 2011 से पहले जिस हिंदी माध्यम का सिलेक्शन लगभग 49% था वह अब 1% से नीचे जा चुका है। यह प्रश्न का उत्तर तो मिलना ही चाहिए कि पैटर्न बदलते ही हिंदी माध्यम सिलेक्शन से बाहर क्यो हो गया?
इसका संभावित उत्तर इतना ही है कि यह निश्चित ही परीक्षा पैटर्न की खामियां है जो अंग्रेजी और गैर -अंग्रेजी भाषियों को लेवल प्लेइंग फील्ड नहीं मुहैया करवा सकी। उस पर गोया ये कि 'राज्य सेवा आयोगों' ने भी इसी पैटर्न को फॉलो करना शुरू कर दिया है।
खैर! जब-जब संघ लोक सेवा आयोग का सिविल सेवा परीक्षा का रिजल्ट आता है तब तब संविधान का यह आर्टिकल 351 सिसक-सिसक के रोता होगा।
नोट:- अब कुछ करना है तो हिंदी माध्यम के लोगो को ही आगे आना चाहिए। वरना खूब पढिये किसने रोका है पढ़ने से.. पर आईएएस में सिलेक्शन की उम्मीद कम कीजिये। ईमानदारी से पढ़ेंगे तो कही न कही सेलेक्ट तो हो ही जायेंगे।
प्रिय साथियों ,
नमस्कार।
आप सभी का यह ग्रुप अभिनंदन करता है।
हम सभी को पता है कि हम इस ग्रुप में क्यों आए हैं। हम यहाँ इसलिए साथ है ताकि यूपीएससी में एक दशक से हिंदी माध्यम के साथ हो रहे भेदभाव को रोका जाए।
मेरे दोस्तों! आप सभी को पता है सिविल सर्विसेज में हिंदी माध्यम की रिजल्ट में दिन-ब-दिन गिरावट आ रही है जो 2011 से पहले 45% था आज 1% से भी नीचे चला गया है। इसका जिम्मेदार कौन है? क्या हिंदी माध्यम के स्टूडेंट्स ?
बहरहाल! हम सभी ने कई जांच- पड़ताल किए, जिसमें कई तथ्यों का खुलासा हुआ। हमने पाया कि हिंदी माध्यम स्टूडेंट्स में कोई कमी नहीं है, कमी है तो यूपीएससी की नीति में, यूपीएससी की इस परीक्षा प्रणाली में जो किसी एक खास बैकग्राउंड को फेवर कर रही है।
प्रश्नों के अंग्रेज़ी से हिंदी वर्जन में कई बार शाब्दिक और व्यावहारिक अर्थों में बहुत ज्यादा असंगतता होती है, जिससे हिंदी माध्यम के स्टूडेंट्स को काफी दिक्कतों का सामना करना पड़ता है। उस शब्द को समझने में काफी समय निकल जाता है, जिससे वह ज्यादा से ज्यादा प्रश्न को सॉल्व नहीं कर पाते हैं या आते हुए प्रश्न को भी हम अस्पष्ट/असंगत शब्द के कारण गलत कर बैठते हैं। अब आप ही बताओ इसमें हिंदी माध्यम स्टूडेंट की क्या गलती है? ऐसे कई उदाहरण पिछले एक दशक में हमारे सामने आते रहें हैं और बार बार ध्यान दिलाने के बावजूद यूपीएससी का रवैए में कोई बदलाव नहीं आया। यहाँ तक क़ि हाल में ही प्रश्न पत्र में ‘civil disobedience movement’ का हिंदी अनुवाद ‘सहयोग आंदोलन लिखा’ गया। और इस पर UPSC ने कोई खेद भी व्यक्त नहीं किया।
दूसरा उदाहरण; मेंस में हिंदी माध्यम की कॉपी इंग्लिश मीडियम के प्रोफेसर द्वारा चेक कर दी जाती हैं। ज़्यादातर अंग्रेज़ी माध्यम के प्रोफ़ेसर हिंदी की कॉपी भी अंग्रेज़ी माध्यम की कॉपी वाले माइंड सेट से चेक लेते हैं। हिंदी माध्यम के आंसर में इंग्लिश जैसे टेक्निकल और विशेष शब्दों को खोजते हैं। जबकि हिंदी माध्यम में वैसा कोई पारिभाषिक या विशेष शब्द बन नहीं पाता और न ही वैसा कोई वाक्य बन पाता है। अतः हिंदी को कॉपी उन्हें सदैव कमतर ही लगती हैं और फिर कम नंबर दे दिया जाता है। अब आप ही सोचो इसमें हिंदी माध्यम स्टूडेंट्स की क्या गलती? अतः यदि हिंदी माध्यम की कॉपी हिंदी माध्यम की प्रोफेसर टीचर्स के द्वारा चेक करवाया जाए तभी जाकर हिंदी माध्यम स्टूडेंट के साथ न्याय हो पाएगा।
मित्रों! ऐसे कई उदाहरण है जिसके कारण हिंदी माध्यम की रिजल्ट में दिन-ब-दिन गिरावट आ रही है। दोस्त, यदि अब भी हम चुप बैठे रहे तो एक दिन ऐसा आएगा जब हमें बोलने भी नहीं दिया जाएगा। एक दिन ऐसा आएगा जिसमें साफ-साफ यूपीएससी के बोर्ड पर लिखा रहेगा कि ग्रामीण पृष्ठभूमि के बच्चे को ‘यूपीएससी में नो एंट्री’। क्या आप उस दिन का इंतजार करोगे? ..या वह दिन न आए इसलिए अभी से अपनी आवाज को बुलंद करोगे।
साथियों! हम सभी को पता है अभी कोविड-19 हमारे देश में हावी है तो हम घर से बाहर नहीं निकल सकते। लेकिन हम लोग घर बैठे अपनी आवाज को सरकार के पास पहुंचा तो सकते हैं। मैं आप लोग से दिल से यह आशा रखता हूँ कि आप लोग मेरी बातों को समझेंगे और हिंदी माध्यम को न्याय दिलाने के लिए कुछ ना कुछ अपना योगदान देंगे ।
अभी हम लोग एक टि्वटर कैंपेनिंग माध्यम से अपनी बातों को सरकार व समाज के सामने रखेंगे। जिसमें आप सभी की सहायता की उम्मीद रखता हूं। यह काम किसी एक या दो स्टूडेंट का नहीं है। यह कर्तव्य हम सभी का है। हम सभी को मिलकर एक ही आवाज में हिंदी माध्यम के लिए आगे आना होगा और भारत सरकार व समाज को बताना होगा कि यूपीएससी में हिंदी माध्यम की दुर्दशा का जिम्मेदार कौन है? इसके सुधार के लिए कोई ठोस कदम उठाना चाहिए।
साथ ही साथ हम लोग यूपीएससी में कम्पेन्सटरी अटेम्प्ट की भी माँग कर रहे हैं। जिन विद्यार्थियों का सिविल सर्विसेज परीक्षा में आकस्मिक और विभेदपूर्ण चेंजेज के कारण अटेम्प्ट प्रभावित हुआ है उन्हें एक फ़ेयर चान्स मिलना ही चाहिए। सीसैट में अभी भी काफ़ी लूप होल बाक़ी है, जिसके कारण भी स्टूडेंट्स का अटेंप्ट प्रभावित हुआ है। ऐसे सभी स्टूडेंट्स को 2022 में अटेम्प्ट मिलना चाहिए।
अब हम आगे आएं और समाज को न्याय दिलाने के लिए अपनी कमर को कस लें। अपनी अंतरात्मा को मजबूत करें और अपनी आवाज को बुलंद करके समाज को न्याय दिलाने के लिए आगे आएँ।
जल्द ही आगे की रणनीति आप सभी के सामने शेयर की जाएगी
और यदि कोई स्टूडेंट दिल्ली में है और हमारे साथ ग्राउंड वर्क करना चाहते हैं तो प्लीज इस नंबर पर एक मैसेज या कॉल करें
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धन्यवाद!
30/03/2021
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02/11/2021