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दुनियां का हर बड़ा मुकाम
09/05/2026

दुनियां का हर बड़ा मुकाम

Thanks for being a top engager and making it on to my weekly engagement list! 🎉 Dinesh Bhati Bhati, Aabid Rathore, Raju ...
10/02/2026

Thanks for being a top engager and making it on to my weekly engagement list! 🎉 Dinesh Bhati Bhati, Aabid Rathore, Raju Kaswan

06/02/2026

मेरे ये विचार आपको कैसे लगे comment में जरूर बताए

क्यों सबसे ज़्यादा लड़ाई मन के अंदर होती है?क्योंकि मन बाहर नहीं,भीतर जीतना चाहता है।भक्ति वही है —जहाँ मन हार मान ले और...
22/01/2026

क्यों सबसे ज़्यादा लड़ाई मन के अंदर होती है?

क्योंकि मन बाहर नहीं,
भीतर जीतना चाहता है।

भक्ति वही है —
जहाँ मन हार मान ले और भगवान जीत जाएं।

यही जीत असली मुक्ति है।

अगर कभी मन टूटा है तो कमेंट में "जय श्री कृष्णा" लिखो

“क्या कभी सोचा है… इतना सब होने के बाद भी मन खाली क्यों रहता है?”लोग लाइफ़ में सब कुछ जोड़ते जा रहे हैंलेकिन शांति कहीं ...
21/01/2026

“क्या कभी सोचा है… इतना सब होने के बाद भी मन खाली क्यों रहता है?”

लोग लाइफ़ में सब कुछ जोड़ते जा रहे हैं
लेकिन शांति कहीं जोड़ नहीं पाते।

क्योंकि शांति चीज़ों से नहीं, याद से मिलती है।
और याद किसकी? — भगवान की।

जिस मन में नाम बस जाए…
उसको किसी चीज़ की कमी महसूस नहीं होती।

हम मंदिर जाते हैं, प्रसाद लेते हैं, प्रणाम करते हैं…
पर सबसे ज़रूरी चीज़ भूल जाते हैं — स्मरण।

अगर आप भी यह मानते हैं कि शांति नाम में है,
तो बस एक “ॐ” कमेंट में लिख दीजिए।

21/01/2026

बुद्धि भगवान को खोजती है,
भक्ति भगवान को पा लेती है।

20/01/2026

Q. हाल में “Solar Rooftop” को प्रोत्साहित करने की मुख्य वजह क्या है?
A. शहरी रोजगार घटाना
B. बिजली आयात बढ़ाना
C. घरेलू स्वच्छ ऊर्जा क्षमता बढ़ाना
D. डिज़ल की माँग बढ़ाना

Q.1. यदि कोई व्यक्ति डिजिटल भुगतान का उपयोग कर रहा है तो वह किस आर्थिक समस्या से बच सकता है?A. जानकारी विषमताB. समय लागत...
20/01/2026

Q.1. यदि कोई व्यक्ति डिजिटल भुगतान का उपयोग कर रहा है तो वह किस आर्थिक समस्या से बच सकता है?
A. जानकारी विषमता
B. समय लागत
C. आय असमानता
D. श्रम बाज़ार कठोरता

“यह कहानी एक ऐसी औरत की है, जिसकी किस्मत ने एक ही सुबह में उसे अमीर बना दिया… लेकिन उसी दिन उसने अपने पति का वो सच सुन ल...
05/01/2026

“यह कहानी एक ऐसी औरत की है, जिसकी किस्मत ने एक ही सुबह में उसे अमीर बना दिया… लेकिन उसी दिन उसने अपने पति का वो सच सुन लिया, जिसे सुनने के बाद कोई भी औरत टूट जाती। फर्क बस इतना था—वह टूटी नहीं… उसने चुपचाप फैसला किया।”
यह कहानी **काव्या मेहता** की थी।
उम्र करीब 36 साल।
शांत स्वभाव, मध्यमवर्गीय सोच और एक छोटी-सी दुनिया—पति **निखिल मेहता** और पाँच साल का बेटा **वेद**।

जिस दिन यह सब हुआ, उस दिन काव्या ने कभी नहीं सोचा था कि उसकी ज़िंदगी “पहले” और “बाद में” बँट जाएगी।

उस सुबह काव्या के हाथ काँप रहे थे।
कारण था—एक छोटा-सा काग़ज़।
लॉटरी टिकट।

**50 करोड़ रुपये।**

वह कई बार नंबर मिलाती रही, जैसे खुद को यक़ीन दिला रही हो कि यह सपना नहीं है। आँखें नम थीं, लेकिन चेहरे पर एक मासूम-सी मुस्कान थी। सबसे पहला ख़याल—निखिल।

उसने सोचा था,

> *“फोन नहीं करूंगी… सामने जाकर बताऊँगी… उसकी आँखों में खुशी देखूँगी।”*

वेद को साथ लिया और सीधे निखिल के ऑफिस निकल पड़ी। रास्ते भर वह भविष्य बुनती रही—
घर, सुरक्षा, बच्चे का भविष्य, और शायद… सम्मान।

लेकिन किस्मत ने उसके लिए कुछ और ही लिखा था।

---

निखिल का ऑफिस बारहवीं मंज़िल पर था।
रिसेप्शन खाली था—जो असामान्य था।
काव्या को अजीब लगा, लेकिन उसने ध्यान नहीं दिया।

जैसे ही वह केबिन के पास पहुँची, उसका कदम रुक गया।

अंदर से आवाज़ें आ रही थीं।

हँसी…
फुसफुसाहट…
और फिर… ऐसी आवाज़ें जिन्हें कोई पत्नी पहचान लेती है।

वेद ने उसका हाथ कसकर पकड़ लिया।
काव्या ने निखिल की आवाज़ पहचानी।
और साथ में—**रिया**, उसकी असिस्टेंट।

उस पल में काव्या का दिल नहीं टूटा…
**जम गया।**

उसने दरवाज़ा नहीं खोला।
चिल्लाई नहीं।
रोई नहीं।

बस चुपचाप वेद को गोद में उठाया…
और वापस मुड़ गई।

लिफ्ट नीचे उतर रही थी, और काव्या के अंदर कुछ ऊपर उठ रहा था—
**एक फैसला।**

---

उस दिन के बाद निखिल को कभी पता नहीं चला कि काव्या ने क्या जीता था।

काव्या ने लॉटरी अपने नाम पर क्लेम की।
नए अकाउंट।
नए काग़ज़।
नई पहचान।

कुछ महीनों तक वह वैसे ही रही—शांत, सामान्य, आज्ञाकारी।

निखिल को लगा,

> “शायद वह कुछ समझ ही नहीं पाई।”

लेकिन काव्या समझ चुकी थी—
**प्यार माँगा जा सकता है, सम्मान नहीं।**

---

एक दिन उसने निखिल से कहा,

> “मैं वेद को कुछ दिनों के लिए माँ के घर ले जाना चाहती हूँ।”

निखिल ने बिना सवाल किए हाँ कर दी।

वह “कुछ दिन”…
कभी खत्म नहीं हुए।

---

एक साल बाद—

निखिल के पास सब था,
लेकिन घर नहीं था।
बेटा नहीं था।
और जब उसने तलाक़ के काग़ज़ देखे,
तो वजह बस एक लाइन में लिखी थी:

उसी साल,
बेंगलुरु से दूर एक शहर में,
एक महिला ने बच्चों के लिए एक स्कूल खोला।

नाम था—
**“वेद फाउंडेशन।”**

काव्या अब भी अमीर थी,
लेकिन उससे ज़्यादा…
**आज़ाद थी।**
*“यह कहानी किसी बदले की नहीं थी… यह कहानी उस ख़ामोशी की थी, जिसने एक औरत को कमजोर नहीं, बल्कि अजेय बना दिया।”*

— मिट्टी, पसीना और किताबसुबह की धुंध अभी खेतों से उठी भी नहीं थी कि रवि हल थाम चुका था।मिट्टी गीली थी, हाथों में छाले थे...
02/01/2026

— मिट्टी, पसीना और किताब

सुबह की धुंध अभी खेतों से उठी भी नहीं थी कि रवि हल थाम चुका था।
मिट्टी गीली थी, हाथों में छाले थे, और पैरों में पुराने चप्पल। पिता दूर से आवाज़ देते—
“सीधी लकीर रख, खेत भी पढ़ाई माँगता है।”

दोपहर को वही हाथ कॉपी पकड़ते। स्कूल पाँच किलोमीटर दूर था।
क्लास में बैठते ही उसे खेतों की गंध आती—किताबों पर भी।
वह चुपचाप गणित के फ़ॉर्मूले लिखता, जैसे हर समीकरण उसे शहर तक एक कदम ले जाएगा।

एक दिन टीचर ने कॉपी देखी और कहा,
“इतनी तैयारी? तुम्हारे लिए खेती ही ठीक है।”

दोस्त शहर की कोचिंग, एसी क्लासरूम और टेस्ट सीरीज़ की बातें करते।
रवि की जेब में बस बस-भाड़ा था—वो भी कई बार उधार।

पहला बड़ा एग्ज़ाम आया। परिणाम—**फेल**।
पिता ने देर तक कुछ नहीं कहा। फिर बस इतना—
“अब खेत ही हमारा कॉलेज है।”

उस रात रवि छत की तरफ़ देखता रहा।
सवाल वही—*क्या सपना मेरी औक़ात से बड़ा है?*

अगली रात बिजली चली गई।
माँ दीया जलाकर बैठीं और रवि की फटी किताबें सिलने लगीं।
धागा खिंचता, पन्ने जुड़ते—जैसे उम्मीदें।

रवि ने देखा—माँ रोज़ दूध के पैसे से थोड़ी-सी बचत करती थीं।
“किसलिए?” उसने पूछा।
माँ मुस्कराईं—“तेरी फ़ीस के लिए।”

उस पल रवि समझ गया—
किसी ने उस पर भरोसा कर लिया है।
और भरोसा कर्ज़ होता है—उतारना पड़ता है।

रवि ने नियम बनाया:
दिन खेत, रात किताब।
लालटेन की रोशनी में फ़ॉर्मूले, मोबाइल की टॉर्च में रिविज़न।
गलतियाँ हुईं, नींद हारी, लेकिन रुकना मना था।

दूसरा प्रयास—थोड़ा बेहतर, फिर भी पर्याप्त नहीं।
लोग बोले—“कितनी बार कोशिश करेगा?”
रवि ने जवाब नहीं दिया—कॉपी खोली।

तीसरी बार परिणाम आया।
स्कूल के बोर्ड पर नाम चिपका था—
**Selected: IIT**

रवि दौड़ा—सीधे खेतों की ओर।
मिट्टी उठाई, माथे से लगाई।
पिता की आँखें भर आईं—उन्होंने कुछ नहीं कहा, बस हल रख दिया।

माँ ने दीया बुझाया—आज रोशनी कहीं और से आ रही थी।

# # # अंत — जहाँ सपने शहर नहीं माँगते

रवि शहर गया, हॉस्टल में रहा, मुश्किलें नई थीं।
लेकिन उसने सीखा—
**जिन सपनों की जड़ें खेतों में हों, वे हवा से नहीं गिरते।**

> *“कुछ सपनों को शहर नहीं… हौसला चाहिए।”*

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