Braj Bhav Untold Braj Leela

Braj Bhav Untold Braj Leela

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प्रेम करोगे तो विरह झेलोगे ही ,

05/01/2023

▪[श्री राधारमणायो समर्पणम्]

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उन्मादिनी यशोदा-12] ▪

📬 कल हमने आस्वादन किया कि "मईया दिन के प्रथम पहर से ही छाक भेजना प्रारम्भ कर देती है। दाऊ और कन्हैया पता नही किधर गायेँ ले गए होंगे। सब दिशाओं में अलग अलग छाक जानी चाहिये। अब आगे......

🔅 मईया को एक बार छाक भेजकर सन्तोष नहीँ होता। वह तो एक छाक भेजकर फिर छीँके भरने लगती है--'कन्हैया-दाऊ तो वन मे उछलते-कूदते,खेलते है तो उन्हेँ भूख भी शीघ्र लग जाती है।'

▪मईया का तो कहना ठीक है-'कन्हैया छाक देखकर प्रसन्न हो जायेगा और झट से छीँके खोल लेगा

🔅कन्हैया को तो भूख का पता कहाँ लगता है वह तो सखाओँ को बंदरों को बाँटने-खिलाने के उत्साह मेँ तनिक कुछ अपने भी मुख मेँ डाल लेता है।

▪मईया के दाऊ-कन्हैया ही तो नहीँ हैँ। सब बालक तो मईया के अपने ही है।

🔅मईया कहती है-'नन्हा तोक,तेजस्वी,देवप्रस्थ भी बहुत छोटे हैँ उन्हेँ भी काफी देर तक भूखे नहीँ रहना चाहिये।

▪दिन के प्रथम प्रहर से तृतीय प्रहर के अन्त तक मईया को छाक भेजने की धुन रहती है और मानती भी तब है जब कोई कह देता है--अब तो बालक लौटने के लिए गायेँ घेरने लग गये होंगे।'

🔅मईया का तो पूरा दिन छाक सजाने-भेजने मेँ लग जाता है।

▪कोई नहीँ कहेगा कि वन मेँ दाऊ-कन्हैया नहीँ हैँ,छाक जायेगी तो बालक हैँ, कपि हैँ और कोई ना भी हो तो भी तो उसे लौटा लाकर मईया को दुखित करने का भूल तो कोई कर नहीँ सकता।

🔄क्रमश : https://www.facebook.com/profile.php?id=100087618515854&mibextid=ZbWKwL

✍️सूर श्याम प्रिया मञ्जरी (श्रीजी मंजरीदास)
@बृजभाव
▪[श्री राधारमणायो समर्पणम्]

01/01/2023

नव वर्ष (नवीन कलेंडर)की हार्दिक शुभकामनाएं 🙇🏻‍♂️🙇🏻‍♂️

मेरे गोविंद सदा अपने श्री चरणों की सेवा में रखे और अपना नाम भजन निरंतर चलता रहे इसी भाव से सभी वैष्णव जन ओर मानव जन को नव वर्ष सदा मंगल कारी हो ।
राधे राधे 🙏🙏
सदा भजो :- हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे ..
हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे ।। 🙇🏻‍♂️🙇🏻‍♂️

30/12/2022

देवकी के मृतवत्सा होने का कारण
> जय श्रीकृष्ण

30/12/2022

गीता तत्व 1 --

गीता क्या है ?

गीता तत्त्व-विज्ञानं एक राह हैं
गीता तत्त्व विज्ञानं -राह रोमांचित चौराहों से गुजरती है ,आइये देखते हैं कुछ झलकियाँ ।
राग से वैराग
काम से राम
आसक्ति से समभाव
साकार से निराकार
वासना से प्यार
मैं से तूं
अंहकार से प्रीति
अज्ञान-से ज्ञान
भोग से योग
भाव से सम भाव
सम भाव से भावातीत
विकार से निर्विकार .........
की यात्रा का नाम गीता तत्त्व विज्ञान है ।
धर्म क्षेत्र कुरुक्षेत्र में कौरव तथा पांडव के सेनाओं के मध्य अर्जुन के मोह को समाप्त करनें की दृष्टि से परम
श्री कृष्ण एवं अर्जुन के माध्यम से ज्ञान-योग तथा कर्म-योग का जो मार्ग निकलता है उसका नाम श्रीमदभगवद गीता है ।
गीता में 700 श्लोक हैं - 556 श्लोक परम श्री कृष्ण के हैं , 103 श्लोक अर्जुन के हैं , 40 श्लोक संजय के हैं और एक श्लोक ध्रितराष्ट्र का है ।
गीता में अर्जुन के 16 प्रश्न हैं जिनका उत्तर परम श्री कृष्ण देते हैं ।
एक बात आपको समझनी है ---गीता महाभारत नहीं है अतः गीता के सन्दर्भ में महाभारत का सहारा न लें ।
गीता शांख्य-योग की गणित है , इसमें कहानियाँ नहीं हैं लेकिन लोग इसको भी कहानियों में ढाल दिया है ।
गीता प्रत्येक हिन्दू परिवार में होता है लेकिन लोग इसको पढ़ते नहीं हैं , पूजते हैं ।
गीता की पूजा से क्या होगा , यह तो जीवन जीनें की नियमावली है ।
गीता जैसा है ठीक उसी तरह पढनें से कुछ नहीं मिल सकता, गीता पढ़नें की कला को समझना चाहिए ।
गीता जन्म से मृत्यु तक , भोग से वैराग तक , भोग-कर्म से योग-कर्म तक , भाव से भावातीत तक तथा
गुणों से गुनातीत तक का मार्ग है ।
क्या आप परम श्री कृष्ण के गीता से मिलना चाहेंगे ? यदि हाँ तो -----
इतनी सी बात अपनें अन्दर बैठानी पड़ेगी ---गीता से आप को मिलेगा तो कुछ नहीं पर छीन जाएगा वह सब जिसको आप पकड़ कर बैठें हैं ।
गीता योगी कौन है ?
१- गीता योगी गीता पढ़ता नही , गीता में बसता है ।
२- पढ़नें वाला और गीता में कुछ दूरी होती है - वहाँ दो होते हैं और बसाहुआ स्वयं गीतामय होता है , उसकी हर श्वाश से गीता अंदर जाता है और बाहर निकलता है ।
३- भोग की दौड़ जब माथे पर आये पसीनें को सुखनें नहीं देती तथा ऐसा लगनें लगता है की मै आगे नहीं पीछे जा रहा हूँ तब अन्तः करण में गीता की किरण फूटती है ।
४- जिसनें इस किरण को पहचान लिया , वह बन गया बैरागी , जानलेता है क्षेत्र - क्षेत्रज्ञ के रहस्य को और आ जाता है समत्व-योग में तथा जो नहीं देख पाता वह भोग में और अधिक गति से भागनें लगता है ।
५- गीता-योगी गीता के श्लोकों का भाषांतर नहीं करता वह भाषा रहित गीता भाव में बहता रहता है ।
६- गीता योगी के पास भाषा का अभाव होता है लेकिन जो जागनाचाहते हैं वे गीता-योगी के नजदीक होनें पर स्वयं जग जाते हैं ।
७- सिद्धि प्राप्त योगी radio active matters - राज धर्मी पदार्थों की तरह होते हैं जिनके तन से चेतन मय फोतोंस [photons] का विकिरण होता रहता है , जो लोग इस क्षेत्र में आते हैं उनको गीता सुनना नही पड़ता उनमें गीता की ऊर्जा स्वतः भर जाती है ।
८- गीता-योगी द्रष्टा - साक्षी होता है , वह अपनें भावातीत में डूबा रहता है ।
९- गीता से अंहकार एवं श्रद्घा दोनों मिलते हैं ,यह आप पर निर्भर है की आप क्या लेना चाहते हैं ।
१०- गीता का यदि आप भाषांतर करके लोगों से मान-सम्मान पाना चाहते हैं तो इस से आप में अंहकार सघन होगा और यदि आप गीता में डूबे रहते हैं तो आप में श्रद्धा की लहर दौडेगी जिसके साथ अब्याक्तातीत आनंद मिलेगा--आप क्या चाहते हैं गीता से ?
गीता तत्व के इस क्रम को जारी रखने के लिए भूलने पर याद दिला दीजियेगा । जिससे क्रम बना रहे
✍️सूर श्याम प्रिया मञ्जरी (श्रीजी मंजरीदास)
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27/12/2022

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जय गौर हरि] 🔆
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▪ [उन्मादिनी यशोदा-4] ▪

📬 कल हमनें आस्वादन किया कि "मईया ने कन्हैया के सुख के लिए महर को अच्छा तो कह दिया लेकिन वह स्वयं उन्मादिनी हो चुकी थी।" आज आगे.......

🔅ब्रह्ममुहुर्त के प्रारम्भ मेँ ही मईया उठ जाती है।पता नहीँ, इसे नीँद आती भी है या नहीँ।

▪उठते ही अपनी शैय्या टटोलती है और फिर स्वयं हँसती है-'मैँ भी कैसी पगली हूँ। अब कन्हैया कोई नन्हा शिशु है कि मेरे गोद मेँ सोयेगा।वह बड़ा हो गया।अब अपने बाबा यां दाऊ के साथ सोता होगा।

🔅तनिक खीझती है मन-ही-मन-'महर को कोई कैसे समझाये कि बालकों को इतनी सुबह उठा देना आवश्यक नहीँ है।

▪वे उठ गये होंगे या उठने ही वाले होंगे।उन्हेँ तो उठते ही यमुना-किनारे भागना है। बालकों को भी उठाकर साथ ले जाये बिना नहीँ मानते।मैया को इस समय अधिक ऊहापोह करने का अवकाश नहीँ है।

🔅उनका कन्हैया यमुना-स्नान करके सीधा भागता आयेगा। उसे गौ दुहन की जल्दी रहती है।गायेँ हैँ कि हुंकारती रहेँगी; किन्तु उसके पहुँचे बिना बछड़ो को थन से मुख ही नहीँ लगाने देँगी।

▪इस दौड़ा-दौड़ी मेँ सघन नवनीत(माक्खन की लोनी) निकला रहे तो उसके मुख मेँ तनिक सा दिया जा सकता है।
क्योँकि गौ दुहन के बाद तो गोप बालक आ जायेँगेँ।

🔅सखाओँ के आने पर पर कन्हैया को स्वयं के मुख मेँ कुछ डालना सूझता ही नहीँ और सब को खिलाने मेँ लगा रहेगा। वन मेँ जाने की जल्दी पड़ेगी सबको।

▪मईया दीपक जलाती है और दधि-मन्थन प्रारम्भ कर देती है।अपना हाथ-मुख धोना भी मईया को शीघ्रता मेँ करना पड़ता है।

🔅सेविकाएँ हैँ,गोपियाँ है; किन्तु कन्हैया को तो मईया के हाथ का ही मक्खन प्रिय लगता है।

▪मईया को ही स्वयं कहाँ सन्तोष है अपने कन्हैया के लिए दधि-मन्थन किये बिना।

🔄क्रमश:

✍️सूर श्याम प्रिया मञ्जरी (श्रीजी मंजरीदास)

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▪ [श्री राधारमणायो समर्पणम्]

24/12/2022

सुन्दर स्त्री बाद में शूर्पणखा निकली।
सोने का हिरन बाद में मारीच निकला।
भिक्षा माँगने वाला साधू बाद में रावण निकला।
लंका में तो निशाचार लगातार रूप ही बदलते दिखते थे।
हर जगह भ्रम, हर जगह अविश्वास, हर जगह शंका लेकिन बावजूद इसके जब लंका में अशोक वाटिका के नीचे सीता माँ को रामनाम की मुद्रिका मिलती है तो वो उस पर 'विश्वास' कर लेती हैं।

वो मानती हैं और स्वीकार करती हैं कि इसे प्रभु श्री राम ने ही भेजा है।
जीवन में कई लोग आपको ठगेंगे, कई आपको निराश करेंगे, कई बार आप भी सम्पूर्ण परिस्थितियों पर संदेह करेंगे लेकिन इस पूरे माहौल में जब आप रुक कर पुनः किसी व्यक्ति, प्रकृति या अपने ऊपर 'विश्वास' करेंगे तो रामायण के पात्र बन जाएंगे।

राम और माँ सीता केवल आपको 'विश्वास करना' ही तो सिखाते हैं। माँ कठोर हुईं लेकिन माँ से विश्वास नहीं छूटा, परिस्थितियाँ विषम हुई लेकिन उसके बेहतर होने का विश्वास नहीं छूटा, भाई-भाई का युद्ध देखा लेकिन अपने भाइयों से विश्वास नहीं छूटा, लक्ष्मण को मरणासन्न देखा लेकिन जीवन से विश्वास नहीं छूटा, सागर को विस्तृत देखा लेकिन अपने पुरुषार्थ से विश्वास नहीं छूटा, वानर और रीछ की सेना थी लेकिन विजय पर विश्वास नहीं छूटा और प्रेम को परीक्षा और वियोग में देखा लेकिन प्रेम से विश्वास नहीं छूटा।

भरत का विश्वास, विभीषण का विश्वास, शबरी का विश्वास, निषादराज का विश्वास, जामवंत का विश्वास, अहिल्या का विश्वास, कोशलपुर का विश्वास और इस 'विश्वास' पर हमारा-आपका अगाध विश्वास।
सच बात यही है कि जिस दिन आपने ये 'विश्वास' कर लिया कि ये विश्व आपके पुरुषार्थ से ही खूबसूरत बनेगा उसी दिन ही आप 'राम' बन जाएंगे और फिर लगभग सारी परिस्थितियाँ हनुमान बनकर आपको आगे बढ़ाने में लग जाएंगी।

यहाँ हर किसी की रामायण है, आपकी भी होगी। जिसमें आपके सामने सब है - रावण, शंका, भ्रम, असफलता, दुःख। बस आपको अपनी तरफ 'विश्वास' रखना है.. आपका राम तत्व खुद उभर कर आता जायेगा।
सादर नमन ।

सभी को अपने जीवन का संघर्ष स्वयं करना पड़ता है 🙏

13/12/2022

Jai jagran nath

10/12/2022

🌹 *जिस व्यक्ति में अपने जीवन को भगवत्सेवा में रत रखने के अतिरिक्त अन्य कोई रूचि नहीं होती, वही वास्तविक संन्यासी है |* ऐसा व्यक्ति भगवान् की परम इच्छा पर आश्रित रहते हुए अपने को उनका नित्य दास मानता है | अतः वह जो कुछ करता है, भगवान् के लाभ के लिए करता है | वह जो कुछ करता है, भगवान् की सेवा करने के लिए करता है | वह सकामकर्मों या वेदवर्णित कर्तव्यों पर ध्यान नहीं देता | सामान्य मनुष्यों के लिए वेदवर्णित कर्तव्यों को सम्पन्न करना अनिवार्य होता है | किन्तु शुद्धभक्त भगवान् की सेवा में पूर्णतया रत होकर भी कभी-कभी वेदों द्वारा अनुमोदित कर्तव्यों का विरोध करता प्रतीत होता है, जो वस्तुतः विरोध नहीं है |

अतः वैष्णव आचार्यों का कथन है कि *बुद्धिमान से बुद्धिमान व्यक्ति भी शुद्धभक्त की योजनाओं तथा कार्यों को नहीं समझ सकता |* ठीक शब्द है – ताँर वाक्य, क्रिया, मुद्रा विज्ञेह ना बुझय (चैतन्यचरितामृत, मध्य २३.३९) | इस प्रकार जो व्यक्ति भगवान् की सेवा में रत है, या जो निरन्तर योजना बनाता रहता है कि किस तरह भगवान् की सेवा की जाये, उसे ही वर्तमान में पूर्णतया मुक्त मानना चाहिए और भविष्य में उसका भगवद्धाम जाना ध्रुव है | जिस प्रकार कृष्ण आलोचना से परे हैं, उसी प्रकार वह भक्त भी सारी भौतिक आलोचना से परे हो जाता है |

(भ. गी. यथारुप 9.28 तात्पर्य)

हरे कृष्ण! सुप्रभातं!!🙏🙏

08/12/2022

*( "श्रीकृष्णचरितामृतम्"- भाग 4 )*

*!! श्रीकृष्णसखा मनसुख !!*
********************************************
यमुना के किनारे जो विशाल अनुष्ठान चल रहा था .......ऋषि शाण्डिल्य के सान्निध्य में ........"नन्दराय को पुत्र प्राप्ति हो" इसी कामना से ये आयोजित था ........पर वहाँ एक आश्चर्यजनित घटना घट गयी ......

सब चकित होकर पूर्वदिशा की ओर देखनें लगे थे ।

श्वेत केश, श्वेत वस्त्रों में ........वो अत्यन्त तेजस्विनी थीं.........हे तात विदुर जी ! उन माता को देखते ही स्वयं महर्षि शाण्डिल्य नें भी प्रणाम किया था .........नन्द राय उठ गए थे अपनें आसन से ........नन्दराय नें अत्यन्त विनम्र भाव से नमन किया ........और आसन भी दिया ।

यशोदा जी नें चरण छूए उन माता के .........माता नें यशोदा जी के सिर में हाथ रखा .......और आशीष दिया ।

हे तात विदुर जी ! उन माता के साथ एक बालक भी था ........जो उनके समान ही तेज़वन्त था.......गौर वर्ण ......मस्तक में ऊर्ध्वपुण्ड्र ......ये ऊर्ध्वपुण्ड्र लगाया नही था .........जन्म जात ही था ।

हमारा अहोभाग्य कि आप यहाँ पधारीं माते !

महर्षि शाण्डिल्य नें स्वागत किया ।

हे नन्दराय ! ये हैं महान तपश्विनी "माता पौर्णमासी" ........भगवान विश्वनाथ की पवित्र भूमि काशी में इनका जन्म हुआ है ........महान विद्वान ऋषि सान्दीपनि इनके छोटे भाई हैं........जो काशी छोड़कर महाकाल की छत्रछायाँ उज्जैन में वास कर रहे हैं ।

ऋषि शाण्डिल्य नें संक्षिप्त सा परिचय दिया माता पौर्णमासी का ।

सिर झुकाकर नन्दराय नें कहा ..........हम गोप कुमारों का ये सौभाग्य है कि आप का यहाँ पदार्पण हुआ ।

ये आपका बालक बहुत सुन्दर है.......यशोदाजी ने, माता पौर्णमासी के साथ आये बालक के बारे में कहा , ...ये आपका पुत्र है माते ? पूछा ।

हँसी पौर्णमासी ..........हे नन्दगेहनी ! ये मेरा बालक है .....पर मेरा जाया नही है...........फिर पौर्णमासी नें अपनी बात भी बता दी ......मेरे पिता नें, जब मैं अबोध थी तभी मेरा विवाह किसी विद्वान ऋषि के साथ तय कर दिया था ........वचन दे दिया उस ऋषि को ......पर कुछ ही समय बाद उन ऋषि का देहान्त हो गया .........पर जाते जाते उनकी पूर्व पत्नी से जो बालक था वो पालनें में ही मुझे मिला ......ये वही बालक है.............मैं इसे ले आई थी .....पौर्णमासी नें अपनी बात कहनी जारी रखी ......।

हे नन्दगेहनी ! इस बालक का नाम "मनसुख" है........मैने ही रखा है ......ये सबके मन को सुख पहुँचाता है.......हर समय मुस्कुराता रहता है..........वेद का कभी अध्ययन नही किया इसनें .......किन्तु सम्पूर्ण वेद इसे कण्ठस्थ हैं ............विद्याध्यन में इसका कभी मन नही लगा ......पर काशी के विद्वानों को ये जब देखो तब हरा देता था ......मैं चकित थी ।

एक दिन ये मुझ से कहनें लगा........"मेरा सखा आरहा है' ........."मेरे सखा के पास मुझे ले चलो"........मैने पहले तो इसकी बातों में विश्वास ही नही किया .......पर ये सपनें भी ऐसे ही देखनें लगा था ......ये बार बार सपनें में कहता.......'कन्हैया ! मैं आरहा हूँ'

"मैं आरहा हूँ.......मैं कुछ ही दिनों में तेरे पास पहुँच रहा हूँ '

हे बृजेश्वरी ! मैं ये सब देखकर चौंक जाती थीं ...........ये मुझे शुरू से ही कुछ विचित्र सा तो लगता था ..........क्यों की काशी में त्रिपुण्ड्र सब धारण करते हैं........पर ये "ऊर्ध्वपुण्ड्र" जन्म जात ही इसके मस्तक में विराजमान था .........रुद्राक्ष इसको कभी प्रिय नही रहा .......वैसे देखा जाए तो मैं विशुद्ध शैव हूँ.........मेरे पिता शैव थे ........इसके पिता भी शैव थे ..........मेरे भाई सान्दीपनि भी शुद्ध रूप से शैव ही हैं.............किन्तु ये ?......तुलसी की माला इसे प्रिय लगे ।

एक दिन भगवान विश्वनाथ नें मुझे ध्यानावस्था में कहा ..........

हे पौर्णमासी ! ये बालक जिसका नाम मनसुख है .......ये गोलोक से आया है......अनादिकाल से ये श्रीकृष्ण का ही सखा है..........इसे तुम साधारण मत समझो ...........गोकुल में श्री कृष्ण अवतार ले रहे हैं..........वहीं जाओ .........और इस बालक के साथ तुम भी वहीं रहो ।

ये आदेश मिला मुझे भगवान विश्वनाथ से ...........

बस उसी समय से मनसुख जिद्द पकड़नें लगा ...........कि मेरा सखा प्रकट होनें वाला है गोकुल में ........मुझे जानें दो .........मेरा सखा मुझे कह रहा है.........तू पहुँच गोकुल में ...........।

माँ ! चलो गोकुल !

ये माँ सबको कहता है ..........हँसी पौर्णमासी ये कहते हुए............हर नारी जात को ये माँ कहता है .........लड़की होनी चाहिये ........चाहे वो इससे छोटी भी क्यों न हो.........माँ ही कहेगा ये ।

पर मैं आपको "मैया" कहूँगा ..............बालक मनसुख चिपक गया था यशोदाजी के आँचल से ।

क्यों ? क्यों कहेगा तू इन्हें मैया ? पौर्णमासी नें छेड़ा ।

क्यों की मेरा सखा इन्हें मैया कहता है ना ! कहेगा ना ।

बस मैं ले आई हूँ इसे........पौर्णमासी नें कहा यशोदा जी से ।

आपके लिये अतिथि गृह में व्यवस्था कर देती हूँ....यशोदा जी बोलीं ।

ना ! मैं अतिथि बनकर नही आयी हूँ .............मैं तो अब अपनें पुत्र के साथ यहीं रहूँगी ..........जीवन पर्यन्त मैं बृजवास करनें आयी हूँ ।

हमारे अहोभाग्य .!

.साष्टांग लेट गए थे नन्दराय जी माता पौर्णमासी के चरणों में ।

एक झोपडी हमारे लिये बनवा दो .........मैं मात्र गौ दुग्ध पीयूँगी ........

पर मेरा ये पुत्र मनसुख !

"मैया भूख लगी है".........मनसुख नें तुरन्त कह दिया यशोदा जी से ।

इसको भूख बहुत लगती है..........इसलिये ।

नन्दराय आनन्दित हो उठे मनसुख को देखकर ...........ये हमारे साथ ही रहेगा ..............

"जब कन्हैया आएगा तब भी रहूंगा"

........मनसुख नें पहले से ही कह दिया ।

चलो ! नन्दराय जी ! अब तो पक्का हो गया ............कि आपकी सन्तान होगी ही..........और कोई दिव्य चेतना अवतरित होनें वाली है ।

ऋषि शाण्डिल्य नें प्रसन्न होकर कहा ।

दिव्य चेतना नही भैया शाण्डिल्य ! पूर्ण ब्रह्म ही अवतरित हो रहे हैं ।

पौर्णमासी नें नेत्रों को बन्दकर के गदगद् कण्ठ से ये बात कही ।

अब तो प्रकृति झूम उठी थी........गोकुल ही क्यों सम्पूर्ण बृजमण्डल आनन्द की धारा में बह रहा था ......अकारण सबको प्रसन्नता होनें लगी थी..........अकारण सब आनन्दित हो उठे थे ...........जब देखो तब मोर नृत्य करते थे ..........पक्षियों का कलरव कभी भी शुरू हो जाता था ।

हे विदुर जी ! योगियों के हृदय में जब ब्रह्म साक्षात्कार की स्थिति होती है...........तब जैसा योगी का हृदय हो जाता है ....वैसा ही आज बाहर प्रकृति का हो रहा है ..........दिव्य अद्भुत ।

मौन हो गए थे उद्धव ये कहते हुये ।

शेष चर्चा कल -

✍️श्रीजी मंजरीदास ( बृजभाव )
Follow on YouTube :- braj bhav बृजभाव

06/12/2022

*( "श्रीकृष्णचरितामृतम्"- भाग 3 )*

*!! आनन्द के अवतार की वेला !!*
******************************************

कौन जानता था कि नन्द जी युवा से प्रौढ़ और प्रौढ़ावस्था से वृद्धत्व की और बढ़ चले थे.......पर सन्तान सुख इनके जीवन में अभी तक नही आया........भगवान श्री नारायण से प्रार्थना करकरके बृजवासी भी अब थक चुके थे .......किन्तु इन नन्द दम्पति को कोई चिन्ता नही थी कि हमारे सन्तान नही हैं ।

हे तात विदुर जी ! निष्काम थे ये दोनों......नन्द जी और उनकी भार्या यशोदा जी.......दान पुण्य, अतिथि सेवा , गौ पालन, समस्त बृज को सुख देंने का प्रयास करते ही रहना.....पर अपनें लिये कुछ नही चाहिये।

"आपको भगवान सन्तान दे"

कोई वृद्ध बृजवासी हृदय से कह देता ।

तो नन्द जी हँसते ......और कहते .......भगवान जो करते हैं मंगल के लिये ही करते हैं........मुझे सन्तान नही दीं ये भी उनका कोई मंगल विधान ही होगा ।.......फिर हँसते हुए बृजेश्वरी कहतीं - भगवन् ! क्या बृज के गोप बालक हमारे बालक नही हैं ? मैं तो सबको अपना ही बालक मानती हूँ ।

ये मात्र कहना नही था यशोदा जी का ..........उनके हृदय से वात्सल्य निरन्तर झरता रहता था समस्त बालकों के लिये ।

पर बृजवासी दुःखी थे .......कि उनके मुखिया के कोई सन्तान नही है ।
मैं आपका कुलपुरोहित शाण्डिल्य हूँ ..........किन्तु ! मेरा श्रेष्ठ ज्योतिर्विद होना भी आपके किसी काम नही आरहा इस बात का हे ब्रजेश ! मुझे दुःख है .............

आज महर्षि शाण्डिल्य पधारे थे नन्दालय में ।

महर्षि के चरणों में अपना शीश रख दिया था नन्द जी नें ..........और यही कहा ........आप मेरे पुरोहित नही हैं .....आप मेरे पिता हैं ........आप मेरे सर्वस्व हैं महर्षि ! क्षमा करें ! मेरे नारायण भगवान नें मुझे जो दिया है मैं उस पर सन्तुष्ट हूँ.......पूर्ण सन्तुष्ट हूँ ।

क्या श्रेष्ठ, निष्काम हो जाना नही है ? महर्षि के मुखारविन्द की ओर देखकर ये प्रश्न किया था नन्द जी नें ।

आहा ! आनन्द से भर गए थे महर्षि शाण्डिल्य । कितनी ऊँची स्थिति को पा चुके हैं ये ब्रजपति ..........

आप मेरे कहनें से एक अनुष्ठान क्यों नही करते !

कैसा अनुष्ठान गुरुदेव ! नन्द जी नें पूछा ।

सन्तान गोपाल मन्त्र का अनुष्ठान ............

हँसे नन्दराय......."आप की जो आज्ञा हो ......दास को स्वीकार है" ।

विनम्रता की साक्षात् प्रतिमूर्ति हैं नन्द राय तो ।

तो मैं समस्त बृज के ब्राह्मणों को निमन्त्रण भेजूँ ?

जी ! मुस्कुराते हुये ब्रजपति नें महर्षि से कहा ।

गणना की महर्षी नें .................फिर आँखें बन्द करके कुछ बुदबुदानें लगे थे ...........कुछ देर में नेत्रों को खोल लिया था ........"पता नही मेरी ग्रह गणना किसी काम में नही आरही.......न मेरी भविष्य दृष्टि ही कुछ देख पा रही है .......ये क्या हो रहा है ........कुछ समझ नही आरहा ।

हे तात विदुर जी ! ग्रह गणना क्या बता पायेंगें इस अद्भुत जन्म के बारे में ...........न भविष्य दृष्टि ही ..........क्यों की ये तो "अजन्मा के जन्म" की अद्भुत घटना है ...........इसको कोई नही समझ पायेगा ।
OK
उद्धव नें विदुर जी को ये बात बताई ।

ब्राह्मणों का अनुष्ठान प्रारम्भ कर दिया गया था ................

बड़े बड़े ब्राह्मण आये थे ..............यमुना जी के पावन तट पर ये अनुष्ठान प्रारम्भ करवा दिया था महर्षि नें ............

मध्य में सजे धजे, स्वर्णाभूषण धारण कर यजमान की गद्दी में नन्द जी विराजमान होते .......और दाहिनें भाग में उनकी अर्धांगिनी यशोदा जी बैठतीं ।

बस.....नन्द यशोदा बैठते थे ........ब्राह्मणों के प्रति उनकी पूरी श्रद्धा थी ........पर संकल्प के समय वे "पुत्र प्रापत्यर्थम्" कभी नही बोलते .........वे अपनें समस्त अनुष्ठानादि कर्मों को भगवान नारायण के चरणों में समर्पित कर देते ।

किन्तु बृज के गोपों की यही कामना थी कि हमारे मुखिया के बालक होना चाहिये ........ये अनुष्ठान छ मास का था ।

अनुष्ठान से दम्पति अत्यन्त प्रसन्न.........यज्ञ हो रहा है........दान पुण्य किया जा रहा है ..... बड़े बड़े ब्रह्मर्षि पधारे हैं हमारे यज्ञ में ....नन्द दम्पति के आल्हाद का कोई ठिकाना नही ।

पर महर्षि का कहना ये था कि यजमान जब तक अपनी कामना का मन में संकल्प न करे तब तक कामना पूरी कैसे होगी ?

नन्द राय का कहना था.......जीवन में क्या कमी है ये बात क्या मेरे भगवान नारायण नही जानते ? वे तो अन्तर्यामी हैं भगवन् !

अब इसका उत्तर क्या देते महर्षि शाण्डिल्य ....और शाण्डिल्य स्वयं भी तो निष्काम भक्ति के आचार्य हैं............उन्होंने दुनिया को यही तो सिखाया है अपनें "शाण्डिल्य भक्ति सूत्र" में ।

अब जो करेंगें भगवान नारायण ही करेंगें ..............

तात विदुर जी ! छ मास के लिये समस्त बृज के गोपों नें भी अनुष्ठान शुरू कर दिया था ...........वे जप करते .......और उसका फल अपनें मुखिया नन्द जी को अर्पण कर देते .......पर साथ में ये भी कहते कि हमारे मुखिया जी को लाला हो ..........दान करते .....तो "मुखिया के लाला हो".........अतिथि सत्कार भी करते तो कहते ........अतिथि से कहते ........हमारे बृज के राजा नन्द जी के लाला हो ...हे अतिथि देवता ! ये आशीर्वाद दो ..........यमुना स्नान भी करते तो यही मांगते ।

गोपियाँ व्रत करनें लगी थीं ......"हमारी बृजेश्वरी के लाला हो".........

प्रार्थना हर गोकुल के घर से यही निकल रहा था ..........हमारे नन्द राय को पुत्र रत्न की प्राप्ति हो ।

सज धज करके प्रातः ही बैठ जाते नन्द जी यशोदा जी के साथ ......नित्य गौ दान करते ..........सुवर्ण दान करते ......भूमि दान करते ....विप्रों को भोजन कराते .............और उनके चरणों की धूल माथे से लगाते ......पर नही माँगा नन्द राय नें कि हमारे पुत्र हो ।

पर आस्तित्व में कुछ घटनाएँ घटनें लगी थीं.........जो अद्भुत थीं ।

शेष चर्चा कल -

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