तलाक से जुड़े एक अहम फैसले पर सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि पति-पत्नी का लंबे समय तक अलग रहना मानसिक क्रूरता माना जा सकता है। अदालत ने स्पष्ट किया कि हिंदू विवाह अधिनियम (धारा 13(1)(ia) के तहत यह तलाक का एक वैध आधार है। अदालत ने 15 वर्षों से अधिक समय से अलग रह रहे एक डॉक्टर दंपति के मामले में पति के पक्ष में दिए गए तलाक के फैसले को बरकरार रखा।
Vipin Poria Advocate
Advocate at Supreme Court of India -3rd Generation Lawyer- Religion Const. of India. Mob. 9312159058
तलाक के केस में तेलंगाना हाईकोर्ट ने हाल ही में फैसला सुनाया है कि विवाह वेबसाइट पर गलत जन्म तिथि देना और उसके आधार पर कुंडली मिलान करना धोखाधड़ी के समान है।अदालत ने माना कि यदि कोई व्यक्ति अपनी जन्म तिथि गलत बताता है और दूसरा पक्ष उस गलत तारीख के आधार पर विवाह के लिए सहमति देता है, तो इसे हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 की धारा 12(1)(c) के तहत धोखाधड़ी माना जाएगा।
इस आधार पर, अदालत ने पत्नी की अपील को स्वीकार किया, पारिवारिक अदालत के फैसले को रद्द कर दिया और विवाह को रद्द (Annul) कर दिया।
सर्विस केस में या अनुकंपा नियुक्ति केस में रिट किस हाईकोर्ट में? सुप्रीम कोर्ट। Baksish Ahmad VS. Union of India; Supreme Court on 09/06/2026.
रेप केस में बरी होने के बावजूद पितृत्व विवाद में आरोपी का DNA टेस्ट कराया जा सकता है, ये सख्त टिप्पणी की है सुप्रीम कोर्ट ने. अदालत ने एक अहम फैसला सुनाते हुए कहा कि पितृत्व विवाद के मामलों में अदालत DNA टेस्ट का आदेश दे सकती है, भले ही कथित पिता पहले किसी रेप केस में बरी हो चुका हो. बेंच ने ये भी स्पष्ट किया कि आपराधिक मामले में बरी होना यह साबित नहीं करता कि संबंधित व्यक्ति जैविक पिता नहीं हो सकता। Chaturbhuj Pradhan VS. Amar Pradhan on 29/05/2026.
Allahabad High Court के एक महत्वपूर्ण फैसले के अनुसार, यदि किसी सरकारी कर्मचारी ने नियुक्ति के समय हाईस्कूल या समकक्ष परीक्षा उत्तीर्ण नहीं की थी, तो सेवा पुस्तिका (Service Book) में दर्ज जन्मतिथि (Date of Birth) को ही अंतिम और सही माना जाएगा। न्यायमूर्ति सौरभ श्याम शमशेरी की एकल पीठ ने यूपी रिक्रूटमेंट टू सर्विसेज (डिटरमिनेशन ऑफ डेट ऑफ बर्थ) रूल्स, 1974 के नियम 2 का हवाला देते हुए यह व्यवस्था दी है।
सुप्रीम कोर्ट ने 11/06/2026 को एक अहम फैसले में स्पष्ट किया है कि खड़ी गाड़ी पर पेड़ या उसकी टहनी गिरने से लगी चोट 'मोटर दुर्घटना' नहीं है। इसलिए, इसके लिए मोटर दुर्घटना दावा न्यायाधिकरण (MACT) के तहत मुआवजे का दावा नहीं किया जा सकता, क्योंकि हादसे और वाहन के बीच कोई सीधा संबंध नहीं होता।
25 लाख का मानवीय मुआवजा: MACT क्लेम खारिज होने के बावजूद, सुप्रीम कोर्ट ने संविधान के अनुच्छेद 142 (Article 142) का उपयोग करते हुए मानवीय आधार पर पीड़ित को 25 लाख रुपये का मुआवजा प्रदान किया।
स्थानीय निकायों की जिम्मेदारी: कोर्ट ने माना कि शहर के पेड़ों के रखरखाव की जिम्मेदारी नगर निगम (Municipal Corporation) की होती है। The Commissioner, Bruhat Bangalore Mahanagara Palike VS. KK Umesh Kumar; Supreme Court on 11/06/2026.
आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट के अनुसार, किसी आपराधिक मामले (Criminal Case) या केवल FIR दर्ज होने मात्र से पासपोर्ट के नवीनीकरण (Renewal) या जारी करने पर रोक नहीं लगाई जा सकती। न्यायालय ने स्पष्ट किया है कि केवल जांच (Investigation) लंबित होने या FIR दर्ज होने से ‘पासपोर्ट अधिनियम, 1967’ की धारा 6(2)(f) के तहत प्रक्रिया लंबित नहीं मानी जाती।
संज्ञान (Cognizance) लेना ज़रूरी: कार्यवाही तभी लंबित मानी जाती है जब संबंधित आपराधिक अदालत अपराध का संज्ञान ले चुकी हो। यदि पुलिस ने अभी तक अदालत में आरोप पत्र (Charge Sheet) दाखिल नहीं किया है और अदालत ने संज्ञान नहीं लिया है, तो पासपोर्ट प्राधिकरण नवीनीकरण से इनकार नहीं कर सकता। Sattaru Ram Mohan Rao VS. Union of India; Andhra Pradesh High Court on 04/06/2026.
MACT को लेकर 11 जून 2026 को सुप्रीम कोर्ट ने एक ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए कहा है कि गृहिणियां (Homemakers) "राष्ट्र निर्माता" (Nation Builders) हैं और उनके काम को कम करके नहीं आंका जा सकता।
₹30,000 मासिक योगदान: कोर्ट ने निर्देश दिया है कि मोटर दुर्घटना दावों (Motor Accident Claims) में गृहिणियों के "घरेलू देखभाल की हानि" (Loss of Domestic Care) का मूल्य कम से कम ₹30,000 प्रति माह माना जाएगा।
राष्ट्र निर्माता का दर्जा: न्यायमूर्ति संजय करोल और न्यायमूर्ति एन.के. सिंह की पीठ ने टिप्पणी की कि गृहिणियां परिवार और राष्ट्र के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं, इसलिए उन्हें केवल 'आश्रित' (dependent) नहीं माना जा सकता।
नया पैमाना: पहले अदालतों में गृहिणियों की आय अक्सर अकुशल या कुशल मजदूरों के न्यूनतम वेतन के आधार पर तय की जाती थी। इस फैसले ने उस प्रथा को बदल दिया है और इसे एक अलग श्रेणी "घरेलू देखभाल की हानि" के रूप में मान्यता दी है। Shishupal@ Shish Ram VS. Surjeet SLP (C) 33915/25 on 11/06/2026.
राजस्थान हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि यदि पुलिस द्वारा न्यायालय में आरोप-पत्र (Chargesheet) दाखिल नहीं किया गया है, तो एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी मामले में आगे की जांच (Further Investigation) का आदेश देने के लिए पूरी तरह से अधिकृत है।
केरल हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि यदि पुलिस द्वारा वैधानिक जांच अवधि के अंतिम दिन शाम 5 बजे के बाद ई-फाइलिंग (e-filing) के जरिए अंतिम रिपोर्ट या चार्जशीट अपलोड की जाती है, तो उसे अगले दिन की फाइलिंग माना जाएगा ऐसी स्थिति में, निर्धारित समयसीमा समाप्त होने के कारण आरोपी को डिफ़ॉल्ट बेल (Default Bail) (या वैधानिक जमानत) का अधिकार मिल जाता है।
Aboobacker Siddique VS. State of Kerala; Bail Application No 1503/26; Kerala High Court on 01/06/2026.
Click here to claim your Sponsored Listing.
Location
Category
Website
Address
Supreme Court
Delhi
110001