जब मैं मरूँगा
अपने साथ अपनी सारी प्रिय किताबों को ले जाऊँगा
अपनी क़ब्र को भर दूँगा
उन लोगों की तस्वीरों से जिनसे मैंने प्यार किया।
मेर नए घर में कोई जगह नहीं होगी
भविष्य के प्रति डर के लिए।
मैं लेटा रहूँगा। मैं सिगरेट सुलगाऊँगा
और रोऊँगा उन तमाम औरतों को याद कर
जिन्हें मैं गले लगाना चाहता था।
इन सारी प्रसन्नताओं के बीच भी
एक डर बचा रहता है :
कि एक रोज़, भोरे-भोर,
कोई कंधा झिंझोड़कर जगाएगा मुझे और बोलेगा --
'अबे उठ जा सबीर, काम पे चलना है।'
अनुवाद - गीत चतुर्वेदी
Dheerendra Kumar
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30/04/2024
स्त्री तो ख़ुद डूब जाने को तैयार रहती है, समदंर अगर उसकी पसंद का हो!
~ अमृता प्रीतम
25/02/2024
जिस दिन से चला हूँ मिरी मंज़िल पे नज़र है
आँखों ने कभी मील का पत्थर नहीं देखा
ये फूल मुझे कोई विरासत में मिले हैं
तुम ने मिरा काँटों भरा बिस्तर नहीं देखा
बशीर बद्र
वर्ष नव,
हर्ष नव,
जीवन उत्कर्ष नव।
नव उमंग,
नव तरंग,
जीवन का नव प्रसंग।
नवल चाह,
नवल राह,
जीवन का नव प्रवाह।
गीत नवल,
प्रीति नवल,
जीवन की रीति नवल,
जीवन की नीति नवल,
जीवन की जीत नवल!
हरिवंशराय बच्चन
21/11/2023
मैं था अपने खेत में, तुझको भी था काम।
मेरी तेरी भूल का राजा पड़ गया नाम ।।
निदा फ़ाज़ली
पुरुष में थोड़ी सी पशुता होती है, जिसे वह इरादा करके भी हटा नहीं सकता। वही पशुता उसे पुरुष बनाती है। विकास के क्रम में वह स्त्री से पीछे है। जिस दिन वह पूर्व विकास को पहुंचेगा वह भी स्त्री हो जाएगा। वात्सल्य, स्नेह, कोमलता, दया इन्हीं आधारों पर सृष्टि थमी हुई है और यह स्त्रियों के गुण हैं। अगर स्त्री इतना समझ ले तो फिर दोनों का जीवन सुख हो जाए । स्त्री पशु के साथ पशु हो जाती है, तभी दोनों सुखी होते हैं।
"प्रेमचन्द"
सलीका ही नही शायद उसे महसूस करने का ।
जो कहता है "खुदा" है तो नज़र आना ज़रूरी है ।।
मैं छिपाना जानता तो जग मुझे साधू समझता।
बन गया है शत्रु मेरा छल रहित व्यवहार मेरा।।
डॉ हरिवंश राय बच्चन
जो आपका तोड़ता है,
वही आपको बनता है
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