प्रवासी पंचायत - उत्तराँचल उत्थान परिषद्
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"उत्तराञ्चल उत्थान परिषद् " की स्थापना सन १९८८ में स्व० शोभन सिंह जीना जी की अध्यक्षता में अल्मोड़ा में हुयी थी। शुरू में पृथक राज्य कि प्राप्ति मुख्य उद्देश्य था किन्तु बाद में उत्तराञ्चल प्रदेश संघर्ष समिति के मंच से राज्य प्राप्ति का आन्दोलन लड़ा गया , और उत्तराञ्चल उत्थान परिषद् का कार्य समग्र ग्राम विकाश निश्चित किया गया। ९ नवंबर २००० को उत्तराखंड राज्य की प्राप्ति हुयी , किन्तु ग्राम विका
30/08/2020
उत्तराखंड ने फल उत्पादन में हिमांचल को पीछे छोड़ा ! - The Hill Express बीते 20 अगस्त को उत्तराखंड और हिमाचल की नौवीं तुलनात्मक रिपोर्ट सामने आई है जो कि मुख्य रूप से फल
प्रवासी संगठनों का उद्देश्य ग्राम केंद्रित गतिविधियों का सन्चालन हो तभीज परिणाम दिखेंगे। नाच -गान बहुत हुए अब अपने ग्राम का विकास ।
"चलो गांव की ओर "
यह नारा नही संकल्प बने।
उत्तरांचल उत्थान परिषद
10/11/2018
कवि / रचनाकार : - रकेश पुंडीर - मुम्बई
"एक पत्र प्रवासी मित्र के नाम "
हे मित्र !
कई वर्षों से
तुम गांव नहीं लौटे
मै इसे प्रवास समझूँ
या बनवास
पुकारता है हरदम
तुम्हे तुम्हारा आवास
बाट जोह रही है
तुम्हारी पुरखों की धरती
और बाप दादाओं की जागीर
जो खंडहर हो रही है
शनै शनै चिथड़ों में तव्दील
सुबक रही है ,करती है चीत्कार
कि हे गुदड़ी के लाल
तुझसे है मेरा एक सवाल
क्या यही दिन देखने के लिए
यहाँ की बेबस माताओं ने
अमृत जल ग्रहण कर
अपने लहू से सींचा था
और ऊँगली पकड़ कर
तुम्हे दुनियाँ में चलना सिखाया था
यह कैसा घाव दिया है
कि तुमने कर दिया है
उसे लहूलुहान -
अरे किया उसे लहूलुहान .…।
हे मित्र !
तुम्हारे चौक -तिबार और काकर में
जमी है कंडाली
और लगे हैं मकड़ी के जाले
जब किसी शुभवसर पर
गाँव में बजते हैं
ढोल नगाड़े
रोते और चीखते हैं
शायद वे अपनी बद नसीबी पर
और गुजर जाते है
असंख्या पखवाड़े
जब पहाड़ों में
आते हैं तीज -त्यौहार
लगते हैं फागुन के गीत
और चैत्वाली के मंडाण
विखोत -बग्वाल भी
आकर चली जाती है
पर तुम कभी नहीं आते
लेकिन तुम्हारे उजड़े आँगन में
गाँव के औजी उन अवसरों पर
अवश्य ढोल दमाऊ बजा कर
तुम्हारी सलामती के लिए
तुम्हारे कुलदेवता की बन्दना करते हैं
बच्चे तुम्हारी दरकती देहरी में
फूल संक्रात के दिन
प्योली के फूलों को
अर्पण कर आते हैं
उन फूलो की महक़ कुछ एक दिन
उस ढहते घर को महकाते हैं
इस तरह हम सभी तुम्हारे प्रति
अपना -अपना फर्ज निभाते हैं
मित्र क्या तुम भी कभी
अपना फर्ज निभाने
अपनी बाड़ी - सगोडी
डिंडाळी -तिबार
गोढ़ - गुढ़यार
कुड़ी - धुरपाली
खेत - खल्याँण की
सुध लेने कभी
अपने गांव वापस आवोगे
सदैव के लिये न सही
चंद रोज के लिए
क्या कभी वापस आवोगे …… ???
हे मित्र !
क्या तेरे शहर का छोर
है इतना न्यारा
की भूल गए तुम ऊँची श्रृंखलाएँ
और वहां गोद मे बसा
अपना गाव प्यारा -प्यारा
ऊँची अटिकलाओं में विराजते विराजते
बिसर गए हो
ओ जंगल और बण
जहाँ हम दूर निकल जाते थे
गौर (गाय-बछि ) चराते -चराते
मित्र ! गांव आने में नही
अब कठनाई
नहीं चढ़नी पड़ती
अब नाक सी चढ़ाई
तुम्हे उस महानगर में
अपने आवास लौटने में
जित बिलम्ब लगता है
उत देर में अब लोग बाग़
टाटा सूमो में गांव पहुँच जाते हैं
अब नहीं छिलेगी पीठ
लदे सामानो से
अब नही पड़ेंगे छाले
आ जाओ अरमानो से
मित्र ! अब तो आ जाओ अरमानो से .......
...... सर्वाधिकार संरक्षित।…
ग्रामोत्सव मात्र पूजा पाठ का उपक्रम नहीँ बल्कि ग्रामवासियों की अपने गांव के लिए विकास की प्रतिबद्धता है ।
उत्तरांचल उत्थान परिषद
उत्तराखंड का विकास ,
गोष्ठियों में उलझ गया ।
गांवों में दिखने के बजाय
महानगरों में समा गया।।
29/03/2018
https://m.facebook.com/story.php?story_fbid=570477693332562&id=554626184917713
Heritage Photography
Participant No. - 43
Anoop Bijalwan
MSW 2nd sem
Birla Campus Srinagar
Location: पलोगी(बमणगांव), क्विली टि. ग.
Caption: यह चित्र लोकपर्व नंदादेवी पाती पूजन का है जिसे नंदाअष्टमी के नाम से भी जाना जाता है, मुख्यरूप से यह त्यौहार चमोली जिले में मनाया जाता है। इस पर्व को प्रति प्रतिवर्ष भाद्रपद मास (अगस्त से सितंबर के मध्य) नंदाअष्टमी के दिन मनाया जाता है। इस पर्व को नंदा राजजात का लघु प्रतिरूप भी कहा जाता है इस दिन भगवान शिव की पत्नी नंदा पार्वती अपने मायके से ससुराल लौटती है और गाँववाशी देवी को अपनी बेटी के समान कलेवा बना कर तथा गाँव की साग सब्जी व अनाज काखड़ी, गोदड़ी, मुंगरी तथा धान, कोदा, झंगोरे के की बाल, भुने भट्ट(सोयाबीन), भुने गेहूं के देकर पूरी भावुकता के साथ देवी को अपने ससुराल विदा करते हैं। इस पर्व में अंकुरित गेहूँ का विशेष प्रसाद दिया जाता ।
यह पर्व हमारी अतुल्य सांस्कृतिक विरासत और प्रकृति के प्रति प्रेम का ध्योतक है पर सांस्कृतिक विघटन और पालयल के चलते ऐसे लोक पर्व भी हमारी संस्कृति से लुप्त होते जा रहे हैं।
प्रवासी पंचायतों का सुपरिणाम ।
ग्रामोत्थान ग्रामोत्थान ।।
उत्तरांचल उत्थान परिषद
24/01/2016
प्रवासी की याद में
रोती है धरती रोती है माता ,
तड़पते है नाते नजारा है सूना ।
दरकते हैं घर वानरों का कोहराम
विकास कहें या विनास जोे मार्ग हमने चुना ।।
साल में एक बार ग्रामोत्सव के अवसर पर अपने गांव आने का प्रवासी उत्तराखंडियों को न्योता ।
उत्तराखंडी विरासत धै लगैकि बुलाणी छ।।
बौन्ड-ओबरा कु आवास निवास , तिबारी माँ बैठीक बच्यांदा छा ,
मासांत संग्रांद गणि गणीक रूपणी कु दिन दिखोंदा छा ।
लवार्त,मण्डवार्त,डडवार ,बंदरवाल,घर- घर कु मिलाग मिलोंदा छा ,
चूड़ा ,बुखणा , घेंजा ,अरसा -पकोड़ा ,फुरसत मा बैठीक बणोदा छा ।
हिंसर ,काफल ,आड़ू ,किनगोड बांटी -बांटीक पुगोन्दा छा ,
भड्डू -चासण कु पकायो खाणु बैठीक सबु तैं जिमोंदा
छा ।
अब जब हमन घर छूडयालि भाइयों ! किलै टपकारा मारिक स्वचणा छा ।।(?)
चलो गांव की ओर मेरा गांव मेरा तीर्थ
उत्तरांचल उत्थान परिषद्
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