07/06/2026
एक सूफी फकीर बूढ़ा हो गया है। उसके बेटे को बेटा हुआ है। वह उस छोटे से बेटे को लेकर फकीर के पास आया है। फकीर भी प्रसन्न है कि आज वह दादा बना। उसने बेटे को गोद में ले लिया है। उसे बड़े प्यार से खिला रहा है। और तभी उसे भीतर एक खयाल आता है कि मैं इस बेटे को इतना प्रेम दे रहा हूं,इतना आनंद-मग्न हूं, क्या मेरा यह प्रेम देना मेरी ईश्वर भक्ति के पक्ष में है या विपक्ष में? जैसे ही उसे यह खयाल आया उसने अपने नाती को धक्का देकर गोद से नीचे गिरा दिया।
उस बच्चे का बाप तो बहुत हैरान हुआ कि अभी आप इतने प्रेम से उसे थपथपा रहे थे, फिर क्या हुआ?
उसने कहा, मुझे याद आया कि मैं इस बच्चे को प्रेम करने में परमात्मा को भूल गया। इसे ले जाओ, इसे यहां से हटा लो। इसे कभी यहां मत लाना। मेरे लिए यह बच्चा तो शैतान जैसा है।
मैं जब यह कहानी पढ़ रहा था तो मैंने सोचा, जो भक्ति इतनी संकीर्ण हो जाए, उस भक्ति से क्या कोई मुक्त हो सकेगा? जो भक्ति इतनी ओछी हो जाए, इतनीर् ईष्यालु हो जाए, भगवान इतना छोटा पड़ जाए कि उसमें यह बेटा भी न समा सके, तो यह भगवान का आकाश न हुआ, यह किसी मस्जिद का आंगन हो गया, किसी मंदिर का आंगन हो गया।
भगवान का प्रेम तो इतना बड़ा होना चाहिए कि और सारे प्रेम उसमें समा जाएं, जैसे सागर में सारी नदियां समा जाती हैं। और सागर यह भी तो नहीं कहता कि ऐ नदियो, मत गिरो मुझमें! न मालूम कहां-कहां की गंदगियां लेकर तुम आती हो,न मालूम किन नगरों, न मालूम किन रास्तों की धूल-धंवास,कूड़ा-कर्कट लेकर तुम आती हो, मुझमें न समाओ! मुझे गंदा न कर देना!
नहीं, सागर सबको आत्मसात कर लेता है। सागर की क्षमता ऐसी है कि जो उसमें गिरेगा वह पवित्र हो जाएगा। सागर अपवित्र नहीं होता।
ऐसे ही, परमात्मा की अगर सच में ही प्रार्थना जगी हो, प्रेम जगा हो, तो उस प्रेम के कारण तुम्हारे और प्रेम खंडित नहीं होते, बल्कि पहली बार तुम्हारे और प्रेम भी पूर्ण होने लगते हैं। पहली बार तुम्हारे और प्रेम भी सच्चे होने लगते हैं। पहली बार तुम्हारे और प्रेम भी प्रामाणिक होने लगते हैं। फिर तुम पत्नी को इसलिए नहीं चाहते कि वह पत्नी है, तुम्हारी है; बल्कि इसलिए चाहते हो कि उसके भीतर भी परमात्मा प्रकट हुआ है। तुम बेटे को फिर इसलिए नहीं चाहते कि वह तुम्हारा है;फिर इसलिए चाहते हो कि उसके भीतर भी परमात्मा प्रकट हुआ है। फिर तो सब के भीतर परमात्मा प्रकट हुआ है--कौन अपना, कौन पराया! एक का ही वास है।
इसलिए मैं भक्ति से भी मूल्यवान प्रेम शब्द को मानता हूं,क्योंकि प्रेम निषेध नहीं करेगा। भक्ति में डर है। भक्तों ने अक्सर निषेध किया है। भक्त अक्सर डर गए हैं। और जो डर जाएं वे कोई भक्त हैं? जो भयभीत होकर अपने नाती को हटा दिया गोद से, यह आदमी कभी परमात्मा को पा सकेगा?हालांकि यह सोच रहा है कि यह पुण्य-कर्म कर रहा है। और सूफी इस कहानी को इस तरह लिखते हैं जैसे कि फकीर ने बहुत अच्छा किया! बड़ी प्रशंसा से लिखते हैं। और जब मैं सूफी किताबों में इस तरह की कहानियां देखता हूं तो एक बात पक्की हो जाती है कि जिसने भी यह किताब लिखी वह सूफी नहीं है, उसे प्रेम का कोई पता नहीं है; पंडित होगा, लेकिन उसे जीवन के रहस्यों का कोई बोध नहीं है।
सोहन, प्रेम तो पूर्ण है--इतना पूर्ण कि सारे अस्तित्व को समा ले अपने में और फिर भी शेष रह जाता है। अस्तित्व छोटा पड़ जाता है, प्रेम इतना पूर्ण है। और जो पूर्ण है वह घटता नहीं,बढ़ता ही जाता है। प्रेम के इस जगत में पूर्णिमा के बाद फिर चांद छोटा नहीं होता, चांद रोज बड़ा होता जाता है, चांद ही चांद रह जाता है। कंकड़-पत्थर भी चांद हो जाते हैं। सब तरफ चांदनी हो जाती है।
ओशो - उत्सव आमार जाति आनंद आमार गोत्र (प्रश्नोंत्तर)-प्रवचन-07
❤