14/09/2021
14 सितम्बर 2021
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हिन्दी दिवस की बधाइयाँ!
सदैव शुभ हो, मंगल हो सर्वदा !
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भाषा से संरक्षित होती है संस्कृति, संस्कृति से पोषित होता राष्ट्र! अपनी भाषा की प्रतिष्ठा हो तो मिले अपनी संस्कृति को संरक्षण! भाषा की उपेक्षा से व्यक्ति होता विच्छिन्नमूल !
जन के स्वाभिमान और आत्म-बल का एक प्रबल आधार है, अपनी संस्कृति से उसका लगाव!
पूर्वजों की विरासत को सहेजना, सामुदायिक ज्ञान का संचयन, पारम्परिक विवेक का भण्डारण अपनी भाषा में ही संभव! बोलियाँ और भाषाएँ मरती हैं। इनकी मौत से एक संस्कृति की मौत हो जाती है। भाषा की निधि संस्कृति को सम्पन्न करती है।
राष्ट्रवाद की दृढता केलिए भाषा की विशिष्ट भूमिका होती है। इससे "बिलगाव" अपनी जड़ों से जुड़ाव कमजोर करता है।
यह सच जेम्स मिल जानता था, मेकाले भी जानता था। तभी, उन्होंने दीर्घ काल तक भारत की सच्ची गुलामी की साजिश रची। वे जानते थे अंग्रेजी पढ़ाई करने पर यह देश "भूरे अंग्रेज " पैदा करने लगेगा। तभी, भविष्य के भारत पर इण्डिया की हुकूमत का सरंजाम कर दिया गया। योजना थी, भाषा के माध्यम से, समुदाय को अपनी संस्कृति से दूर, विमुख और परहेजी बना देना।
ऐसी ही साजिश कोल्हान में रची गयी । विलकिनसन के प्रस्ताव को मान कर चाइबासा में प्राथमिक विद्यालय खोले गये। एबीसीडी सीख जाएँगे तो अंग्रेजों के काम आएँगे। अपनी जमीन और जमात को छोड़ पाएँगे । विलकिनसन जानता था, अपनी संस्कृति से अटूट सम्बंध रखनेवाले "हो", कल खुद अपनी पहचान से अलग हो जाएँगे - बस इन्हें अंगरेजी सिखा देनी होगी । उसने सही सोचा था। उसकी "फरेब" में कोल्हान आ गया। इसी फरेब में हिन्दुस्तान आ गया।
भाषा संस्कृति से रिश्ता जोड़ती है तभी, चालाक हुकूमत सोच-समझ कर भाषा-नीति बनाती है।
गाँधी ने सोचा था आजादी के बाद अंग्रेजी के खिलाफ बनेगा देश का आम माहौल । गांधी गलत सोचते थे। वे अपने नुमाइंदे को सही पहचान नहीं सके। मेकाले सही सोचता था।
शिक्षण से बनता है मनोभाव; मनोभावों से व्यक्ति की इच्छाएं ठोस होती हैं और एक खास मानसिकता तैयार होती है। अंग्रेजी साम्राज्यवाद का शिकार हुए इस देश की अलग ही करुण गाथा है।
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आज की तारीख सिर में सवालों की झड़ी लगी है :-
-है दुनिया में और भी कोई देश जहाँ शिशु अपनी भाषा को छोड़ ,पहले सीखता है, एबीसीडी!
- है कोई देश जहाँ अपनी भाषा में बात करना अपमानजनक और अंग्रेजी में बोलना-लिखना शान और रुआब की बात हो !
- हमसे मेरा अग्रज-अनुज क्यों बतियाने लगता है हमसे अंग्रेजी में!
- हमारे सेमिनार, कौनफरेन्स, गोष्ठियों में अंग्रेजी के रुआब की क्यों पडती है जरूरत !
- बताइए आला अदालतें हिन्दी में क्यों नहीं सुनती !
- दवा के पुर्जे, जांच रिपोर्ट आदि क्यों हैं, अंग्रेजी में !
- हमारी सड़कों पर हिदायतें अंग्रेजी में क्यों!
- बताइए,इण्डिया और भारत के बीच की दूरी किसके हित में है! मेकाले का जहर जाएगा या नहीं, देश के बदन से !
- हिन्दी के सम्बंध में संविधान सभा ने जो मूल प्रस्ताव लिए वे क्यों लागू नहीं हुए !
- अभिजन की भाषा और आमजन की भाषा अलग-अलग , यह किसकी आजादी का सबूत है !
- किस वजह से हमारे आचार-व्यवहार में , पारिवारिक अनुष्ठानों में, सालाना उत्सवों में "विदेशी" हावी हो गया! हमारे सम्बोधन तक बदल गये !
- भाषा से लगाव जब छूटने लगा क्या तभी बदल गये हमारे नाच-गान, खान-पान, रीति-रिवाज, हाव-भाव, कपड़े-लत्ते, बोल-चाल, रहन-सहन, गति-मति, पूजा-पाठ तक !
- क्या भाषा की उपेक्षा ने परम्परा और रिवाजों पर मारक आघात किया तभी, दुष्प्रभावित हो गयी हमारी संस्कृति !
आज का हाल बुरा है। परायी भाषा का साम्राज्यवाद संस्कृति को लील रहा है।
अचरज है कि,जिस भाषा में लड़ा गया स्वतंत्रता संग्राम वह दोयम दर्जे की बनी रही । जिस भाषा के सहारे आजादी के बाद के सारे "प्रतिरोध" हुए वह उपेक्षित रही। बहुत बुरा हुआ । अपनी संस्कृति केलिए विख्यात राष्ट्र आज "नकलची" बना है।
सवाल 'भारतीयता' के बचने का है। भाषा मरती है तो एक संस्कृति मर जाती है !
अंग्रेज गये, अंग्रेज़ियत राज करती रही शासन में, शिक्षा में, चिकित्सा में, विधान में, राजनीति में, बौद्धिकता में, जीवन शैली में, मानसिकता में !
तभी, आजादी अधूरी रह गयी ।
आज के दिन विचारिए, समग्रता से।
हिन्दी का मसला राष्ट्रीय जीवन से जुड़ा है !
75 वर्षो में अनिर्णय के रोग ने खासा नुकसान किया है। यह सर्वथा चिंताजनक है।
हम चिंतित हैं! हमें निश्चय करने का बल मिले ! सोचिए कब आधिपत्य हटेगा इंडिया का !
शुभमस्तु!