11/03/2021
जिसने भी छुआ , वह स्वर्ण हुआ,
सब कहे मुझे मैं पारस हूं।
मेरा जन्म महाशमसान,
मगर मैं जिंदा शहर बनारस हूं।
मैं हूं वाराणसी, भारत की सांस्कृतिक राजधानी, कर्क रेखा से थोड़ा सा ऊपर, गंगा के समतल मैदान, उष्ण कटिबंधीय जलवायु, वरुणा और अस्सी के मातृत्व से संरक्षित हूं। पौराणिक भाषा में कहें तो यहां के महाराजाधिराज महादेव के त्रिशूल के अग्र तीक्ष्ण भाग पर स्थित, मोक्षदायिनी, पापनाशिनी गंगा से सिंचित, पुरातन हूं, सनातन हूं, फिर भी नूतन हूं।
जन्म दिया हैं मैंने कई पारसनाथ, कई रविदास, कई कबीर , कई बिस्मिल्ला, कई लाल बहादुर, कई रानी लक्ष्मीबाई को। कइयों को नीव दी हैं विश्वप्रसिद्धि की, चाहे वह बुद्ध हो, महामना हो या मोदी।
यज्ञ के दिव्य ऋचाएं, आहुंतियां , नैवेद्य, धूप, असंख्य जनों के ह्रदय से उत्पन्न होती आस्था और उसका प्रतिउत्तर, सभी इस सनातन संस्कृति के प्रतिबिंब हैं और मूल भी। एक और विश्वनाथ हैं, तो दूसरी और ज्ञानव्यापी मस्जिद, गंगा जमुना तहजीब का अद्भुत संगम!
काशी हिंदू विश्वविद्यालयादि संस्थानों में नवीन विज्ञान, कला, वाणिज्य तथा प्राच्य विज्ञान, कला, एवं वाणिज्य के समन्वय का उत्कर्ष, कचौड़ी गली के संकीर्ण मार्ग से निकलती मोक्षदायनी पथ, कबीर चौराहे से नित्य प्रतिदिन ईश्वर को साधती वाद्ययंत्रों से उठती असंख्य ध्वनियां, अस्सी घाट से सूर्योदय का दृश्य और रामचरितमानस की चौपाइयां, हरिश्चंद्र घाट से अंतिम सत्य का साक्षात्कार, दशाश्वमेध से गंगा आरती, मणिकर्णिका से मोक्ष का मार्ग, न जाने कितने असंख्य, अनगिनत, लौकिक, दार्शनिक, पारलौकिक प्रश्नों का उत्तर नित्य प्रतिदिन देती हूं।
रामनगर का किला, रामनगर की रामलीला, विश्वनाथ मंदिर, दुर्गा कुंड, संकट मोचन मंदिर, भारत माता मंदिर, सारनाथ, बनारसी साड़ी, बनारसी पान और उसके रस के उत्पन्न बनारसी भाषा, , सबकुछ अलौकिक हैं, अतुल्य हैं दिव्य हैं अद्भुत हैं। मुझे शब्दों में सहेजने का प्रयत्न, स्वयं एक मोक्ष का मार्ग हैं।
-- राधेय