Department Of Geography Govt Lohia PG College Churu Rajasthan

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Department Of Geography Govt Lohia PG College Churu Rajasthan पूर्णतया शिक्षा को समर्पित समूह���

23/11/2022
Eminent Geographer and Father of Huministic Trend in Geographical Studies *Prof. Yi Fu Tuan* Passes away at the Age of 9...
12/08/2022

Eminent Geographer and Father of Huministic Trend in Geographical Studies *Prof. Yi Fu Tuan* Passes away at the Age of 92.

He'll always inspire us through his immense Contributions in shaping the Field of Geography across the Globe in 20th and 21st Century...

May his Soul Rest in Peace🙏🏻

25/02/2022
24/02/2022
*Govt. Lohia PG College, Churu* *Gyandoot Programme (Geography)**Questions & Answer Session*Date: 13.6.2021 (Sunday)Time...
12/06/2021

*Govt. Lohia PG College, Churu*

*Gyandoot Programme (Geography)*

*Questions & Answer Session*
Date: 13.6.2021 (Sunday)
Time: 11 AM to 11.30 AM

*YouTube Link*
👇
https://youtu.be/pv7clyQTyYo

*Plate Tectonic Theory*
Date: 14.6.2021 (Monday)
Time: 11 AM to 11.30 AM
*YouTube Link*
👇
https://youtu.be/LtOX9JEYm1w

*Regional Disparities in Rajasthan*
Date: 15.6.2021 (Tuesday)
Time: 11 AM to 11.30 AM

*YouTube Link*
👇
https://youtu.be/dB_wjx7FZjc

*Indian Monsoon*
16.6.2021 (Wednesday)
Time: 11 AM to 11.30 AM

*YouTube Link*
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https://youtu.be/IMt-HjYer9I

*Please spread this message, so that maximum students can get benefitted*

Regards
*Dr. M.M. Sheikh*
*Coordinator*
*Gyandoot Programme (Geography)*
*Govt. Lohia PG College, Churu*

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09/06/2021

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अंटार्कटिका से निकला दुनिया का सबसे बड़ा हिमखंडबर्फ का एक भीमकाय टुकड़ा अंटार्कटिका से टूट कर समुद्र में जा गिरा है और दुन...
21/05/2021

अंटार्कटिका से निकला दुनिया का सबसे बड़ा हिमखंड

बर्फ का एक भीमकाय टुकड़ा अंटार्कटिका से टूट कर समुद्र में जा गिरा है और दुनिया का सबसे बड़ा हिमखंड बन गया है. इसकी सतह का आकार करीब 4,320 वर्ग किलोमीटर है, यानी स्पेन के द्वीप मयोर्का से भी बड़ा.
यूरोपीय अंतरिक्ष एजेंसी ने बताया है कि यह हिमखंड अंटार्कटिका की बर्फीली चट्टान 'रॉन' से टूट कर वेडेल समुद्र में जा गिरा है और वहीं तैर रहा है. इसे इस समय दुनिया में तैर रहे सभी हिमखंडों में सबसे बड़ा माना जा रहा है. वैज्ञानिकों ने इसका नाम ए-76 रखा है और इसे कॉपरनिकस सेंटिनल-1 मिशन द्वारा ली गई सैटेलाइट से हासिल चित्रों में देखा गया है. इस मिशन में दो सैटलाइट हैं जो धरती के ध्रुवों का चक्कर लगाते हैं. ए-76 की सतह का आकार 4,320 वर्ग किलोमीटर है.

यह 175 किलोमीटर लंबा और 25 किलोमीटर चौड़ा है. अगर हम इसके आकार की तुलना करें, तो सैलानियों में लोकप्रिय स्पेन का द्वीप मयोर्का 3,640 वर्ग किलोमीटर में फैला हुआ है, जो इसके क्षेत्रफल से कम है. ए-76 का सबसे पहले ब्रिटिश अंटार्कटिक सर्वेक्षण ने पता लगाया था और मेरीलैंड-स्थित अमेरिकी राष्ट्रीय बर्फ केंद्र ने इसकी पुष्टि की थी. इस हिमखंड के जन्म से पहले ए-23ए दुनिया का सबसे बड़ा हिमखंड था. इसका आकार लगभग 3,380 वर्ग किलोमीटर है और यह भी वेडेल समुद्र में तैर रहा है.

तियानवेन-1 : चीन का मंगल मिशन (Tianwen-1: China's Mars Mission)चीन ने मंगल ग्रह के लिये जो मिशन भेजा था, उसका रोवर हाल ह...
19/05/2021

तियानवेन-1 : चीन का मंगल मिशन (Tianwen-1: China's Mars Mission)

चीन ने मंगल ग्रह के लिये जो मिशन भेजा था, उसका रोवर हाल ही में सफलतापूर्वक मंगल ग्रह की सतह पर लैंड कर गया है।

चीन ने 23 जुलाई, 2020 को 'तियानवेन-1’ नामक मंगल ग्रह के लिये जो मिशन भेजा था। करीब सात महीने की अंतरिक्ष यात्रा के बाद 'तियानवेन-1’ मिशन ने मंगल ग्रह पर सफल लैंडिंग की है।
'तियानवेन-1’ मिशन में एक ऑर्बिटर, एक लैंडर और एक रोवर था। इस मिशन के तहत भेजे गए रोवर का नाम 'झुरोंग’ है।
चीन की अंतरिक्ष एजेंसी चाइना नेशनल स्पेस एडमिनिस्ट्रेशन (सीएनएसए) ने हाल ही में बताया है कि 'झुरोंग’ रोवर ने मंगल ग्रह पर यूटोपिया प्लैनिशिया नामक जगह पर सफल सॉफ्ट लैंडिंग की है।
इसके साथ ही चीन मंगल ग्रह पर रोवर उतारने वाला दुनिया का दूसरा देश बन गया है। चीन के पहले यह कार्य अमेरिका कर चुका है। गौरतलब है कि अमेरिकी अन्तरिक्ष नासा ने कुछ ही समय पहले मंगल ग्रह पर परसीवरेंस नामक रोवर की साफ्ट लैंडिंग कराई थी।
मंगल ग्रह पर लैंडिंग करने वाले 'झुरोंग’ रोवर का भार लगभग 240 किलोग्राम है तथा इसमें छह पहिए और चार सौर पैनल हैं।
इससे पहले भारत ने भी मंगल ग्रह पर अपना मिशन (मंगलयान) भेजा था। हालांकि भारत ने अपने मंगल मिशन में रोवर को नहीं भेजा था।
पूर्व में भेजे गए अन्य मंगल मिशन से संबंधित महत्वपूर्ण तथ्य
1971 में USSR मंगल पर लैंडिंग करने वाला पहला देश बना था हालाँकि इसका ‘मार्स 3’ लैंडर विफल हो गया था।
मंगल ग्रह की सतह पर पहुंचने वाला दूसरा देश अमेरिका है। 1976 के बाद से, इसने 8 सफल मार्स लैंडिंग की जिसमें नवीनतम वर्ष 2019 का ‘इनसाइट’ मार्स मिशन और वर्ष 2020 का मार्स रोवर परसिवरेंस (Mars Perseverance rover) है। मार्स रोवर परसिवरेंस ने हाल ही में मंगल ग्रह पर साफ्ट लैंडिंग की है।
यूरोपीय अंतरिक्ष एजेंसी भी मंगल की कक्षा में अपने अंतरिक्ष यान को रखने में सक्षम हो गई है।
भारत का मार्स ऑर्बिटर मिशन (MOM) या मंगलयान सितंबर 2014 में मंगल की कक्षा में पहुंच गया था, इसे नवंबर 2013 में भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन द्वारा आंध्र प्रदेश में सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र से लॉन्च किया गया था। भारत अमेरिका, रूस और यूरोपीय संघ के बाद मंगल ग्रह की कक्षा में पहुंचने वाला चौथा राष्ट्र है और उसने पहले प्रयास में ही ऐसा किया था।
संयुक्त अरब अमीरात ने भी ‘होप मंगल मिशन’ (Hope Mars Mission) को वर्ष 2020 में मंगल ग्रह के लिए लांच किया था।

महासागरीय धाराएँ एवं प्रभावमहासागरीय/सागरीय धाराएँ महासागरों में नदी प्रवाह के सामान होती हैं। एक निश्चित दिशा में बहुत ...
29/04/2021

महासागरीय धाराएँ एवं प्रभाव

महासागरीय/सागरीय धाराएँ महासागरों में नदी प्रवाह के सामान होती हैं। एक निश्चित दिशा में बहुत अधिक दूरी तक महासागरीय जल के एक राशि के प्रवाह को महासागरीय धारा कहते हैं।

धाराओं की उत्पत्ति के कारण:

महासागरीय धाराएँ महासागरों में कई कारणों से उत्पन्न होती हैं जिनमें से कुछ महासागरीय विशेषताओं के फलस्वरूप उत्पन्न होती हैं तथा कुछ पृथ्वी की घूर्णन गति एवं उसके गुरुत्वाकर्षण प्रभाव के कारण उत्पन्न होती हैं।

इन कारकों को मुख्य रूप से दो भागों में बाँटा जाता है-

a. महासागरीय धाराओं को उत्पन्न करने वाले कारक:

पृथ्वी के परिभ्रमण (घूर्णन) से संबंधित कारक-
पृथ्वी पश्चिम से पूर्व दिशा में गति करती है। इसी गति के कारण महासागरीय जल में पृथ्वी की गति के विपरीत बल (पूर्व से पश्चिम की ओर) उत्पन्न होती है जिससे विषुवत रेखीय धाराएँ उत्पन्न होती हैं।
कुछ जल पृथ्वी की गति की दिशा में अग्रसर हो जाता है, जिससे ‘प्रति विषुवत धारा’ उत्पन्न होती है।

उत्तरी गोलार्द्ध में धाराएँ विषुवत रेखा से ध्रुवों की ओर चलती हैं तथा दायीं ओर मुड़ जाती हैं वहीं दक्षिणी गोलार्द्ध में ध्रुवों से विषुवत रेखा की ओर चलती है तथा अपने बायीं ओर मुड़ जाती हैं।

महासागरों से संबंधित कारक-

तापमान में भिन्नता

तापमान में भिन्नता के कारण सागरीय जल के तल में अंतर के फलस्वरूप महासागरीय धाराओं की उत्पत्ति होती है।

विषुवत रेखा पर वर्षभर सूर्य की किरणें सीधी पड़ती हैं इससे महासागरीय जल का तापमान बढ़ जाता है तथा उसका घनत्व कम हो जाता है।
परिणामस्वरूप विषुवत जलधारा के रूप में जल में गति प्रारंभ हो जाती है।

लवणता में अंतर

सागरीय लवणता में भिन्नता पाई जाती है। अधिक लवणता वाला जल अधिक घनत्व वाला एवं भारी होता है।
भारी जल नीचे बैठता है जिसका स्थान भरने के लिये कम लवणता एवं घनत्व वाला जल आता है और एक धारा बन जाती है।

घनत्व में भिन्नता

तापमान, लवणता, दाब, तथा उच्च अक्षांशों में बर्फ के पिघलने से भी घनत्व में अंतर आता है। घनत्व में भिन्नता के फलस्वरूप धाराओं की उत्पत्ति होती है।

बाह्य महासागरीय कारक

महासागर के जल पर विविध दशाओं का प्रभाव होता है। जिसमें, वायुदाब, हवाएँ, वाष्पीकरण तथा वर्षण इत्यादि है।

वायुदाब तथा हवाएँ

महासागर के जल में जहाँ वायुदाब अधिक होता है, वहाँ पर सागरीय जल का तल नीचे होता है तथा जहाँ वायुदाब कम होता है, वहाँ पर सागरीय जल का तल ऊँचा होता है, जिसके कारण कम वायुदाब के क्षेत्र से जल अधिक वायुदाब की ओर गति करता है जिससे धाराएँ उत्पन्न होती हैं।

प्रचलित हवाओं के कारण भी महासागरीय जल में धाराएँ उत्पन्न होती हैं।
जब हवाएँ सागर से होकर चलती है तो रगड़/घर्षण से अपने साथ सागरीय जल को भी ले जाती हैं, जिससे धाराओं की उत्पत्ति होती है।

b. महासागरीय धाराओं की दिशा को प्रभावित करने वाले कारक:

तट की दिशा तथा आकार
तटीय आकृतियाँ
मौसमी परिवर्तन
पृथ्वी का परिभ्रमण: महासागरीय धाराओं के प्रकार
महासागरीय धाराओं के प्रकार:
तापमान के आधार पर महासागरीय धाराएँ दो प्रकार की होती है।

गर्म धारा:

जो जल धाराएँ निम्न अक्षांशों से उच्च अक्षांशों की ओर प्रवाहित होती हैं गर्म जलधाराएँ कहलाती हैं। इन जलधाराओं का तापमान मार्ग में आने वाले जल के तापमान से अधिक होता है। अतः ये तापमान जिन क्षेत्रों की ओर चलती हैं, वहाँ का तापमान बढ़ा देती है।

ठंडी जलधारा

जो धाराएँ उच्च अक्षांशों से निम्न अक्षांशों की ओर चलती हैं उन्हें ठंडी जलधाराएँ कहलाती हैं। इन जलधाराओं का तापमान मार्ग में आने वाले जल के तापमान से कम होता है। अतः ये तापमान जिन क्षेत्रों की ओर चलती हैं, वहाँ का तापमान कम कर देती हैं।

प्रशांत महासागर की धाराएँ:

उत्तरी एवं दक्षिणी विषुवतीय गर्म धारा: उत्तरी विषुवतीय धारा मध्य अमेरिका के पश्चिमी तट से आरंभ होकर पूर्व से पश्चिम की ओर प्रवाहित होकर फिलीपाइन्स द्वीप तक पहुँचती है। यह धारा हमेशा विषुवत रेखा के उत्तर में ही प्रवाहित होती है।

क्यूरोशियो की गर्म जलधारा: उत्तरी विषुवतीय धारा फिलीपाइन्स द्वीप समूह के बाद जापान तट के साथ उत्तर दिशा में बहती है।

कैलीफोर्निया की ठंडी जलधारा: उत्तरी प्रशांत धारा उत्तरी अमेरिका पश्चिमी तट से टकराकर उत्तर तथा दक्षिण की ओर दो भागों में बँट जाती है। दक्षिण की ओर बहने वाली धारा कैलीफोर्निया की धारा कहलाती है।

ओयोशिवों तथा क्यूराइल की ठंडी धारा: यह बेरिंग जल-डमरू-मध्य से होकर दक्षिण दिशा में प्रवाहित होती है। उसके द्वारा आर्कटिक सागर का ठंडा जल प्रशांत महासागर में लाया जाता है।

बॉन सम्मेलन (COP-23) का हासिल सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र-2संदर्भजलवायु परिवर्तन को नियंत्रित करने के वैश्विक समझौते को ला...
27/04/2021

बॉन सम्मेलन (COP-23) का हासिल

सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र-2
संदर्भ

जलवायु परिवर्तन को नियंत्रित करने के वैश्विक समझौते को लागू करने के उद्देश्य से हाल ही में जर्मनी के शहर बॉन में संयुक्त राष्ट्र फ्रेमवर्क कन्वेंशन (United Nations Framework Convention on Climate Change-UNFCCC) के दलों के 23वें सम्मेलन (23rd Conference of Parties-COP) का आयोजन किया गया है।COP-23 में जहाँ कुछ महत्त्वपूर्ण मुद्दों पर सहमति बनी वहीं वित्तपोषण और समीक्षा तंत्र से जुड़े अहम् बिन्दुओं पर कुछ चिंताएँ ज्यों की त्यों हैं।

COP-23 में इन मुद्दों पर हुई चर्चा (The questions raised in COP-23)

इस सम्मलेन में विवाद के मुख्य विषय वित्तीय सहायता, (financial support) शमन कार्रवाई, (mitigation action) विभेदीकरण, (differentiation) और नुकसान एवं क्षति (loss and damage) से संबंधित थे।बोन सम्मलेन में यह सवाल उठाया गया था कि उपलब्ध कार्बन स्पेस के बड़े हिस्से पर कब्ज़ा कर चुके विकसित देश क्या गरीब और विकासशील देशों को सहायता देंगे?अमीर देशों द्वारा ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन को कम करने के लिये अब तक क्या कार्रवाई की गई है और क्या कोयले का उपयोग सीमित नहीं किया जाना चाहिये?

क्या है कार्बन स्पेस (What is carbon space)?

जलवायु परिवर्तन पर अंतर-सरकारी पैनल (Intergovernmental Panel on Climate Change-IPCC) ने अपने 5वें आकलन रिपोर्ट में एक कार्बन-डाइऑक्साइड उत्सर्जन बजट (carbon dioxide emission budget) प्रकाशित किया था।यह बजट बताता है कि ग्लोबल वार्मिंग को औद्योगिक क्रांति से पहले के तापमान के मुकाबले अधिकतम 2 डिग्री सेल्सियस तक और इससे कम रखने के लिये CO2 के उत्सर्जन की सीमा क्या होनी चाहिये?बजट के अनुसार इस लक्ष्य की प्राप्ति हेतु औद्योगिक क्रांति के उतरार्द्ध के समय से लेकर वर्ष 2100 तक CO2 उत्सर्जन की सीमा 2900 गीगाटन होनी चाहिये।विदित हो कि 2011 तक विश्व में 1,900 गीगाटन कार्बन-डाइऑक्साइड उत्सर्जित हो चुकी है। इसका अर्थ यह है कि वर्ष 2011 और 2100 के बीच अब केवल 1,000 गीगाटन का ही उत्सर्जन संभव है।

दरअसल, CO2 उत्सर्जन की 2900 गीगाटन की यह सीमा ही कार्बन स्पेस है। इसे कार्बन बजट के नाम से भी जाना जाता है।

COP-23 में हुई प्रगति (progress made in COP-23)

यह कहना अतिशयोक्तिपूर्ण होगा इस सम्मेलन में चर्चा के सभी मुद्दों पर प्रगति हुई है, लेकिन जिन मुद्दों पर महत्त्वपूर्ण प्रगति हुई है वे हैं:

► चरणबद्ध तरीके से कोयले के उपयोग को सीमित करने (coal phase-out) पर सहमति बनी।
► हरित इमारतों (green-buildings) को स्थापित करने और इको- गतिशीलता (eco-mobility) में तेज़ी लाने का निर्णय लिया गया।
► मुद्दों के समाधान की दिशा में कार्य करने के दौरान लिंग संबंधी कारकों की पहचान करने का निर्णय हुआ।
► जलवायु वार्ताओं में स्थानीय लोगों की राय को अहमियत देने का निर्णय लिया गया।
► कृषि कार्यों के माध्यम से होने वाले ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन के मुद्दे पर विचार-विमर्श का निर्णय।
► सम्मलेन में एक महत्त्वपूर्ण प्रगति ‘टलानोआ वार्ता’ (Talanoa Dialogue) के रूप में हुई।

क्या है ‘टलानोआ वार्ता’ (What is Talanoa Dialogue)?

इस सम्मलेन में देशों द्वारा 'टलानोआ वार्ता' के लिये एक रोड मैप लाया गया है जो जलवायु परिवर्तन के संदर्भ में विभिन्न देशों द्वारा किये जा रहे प्रयासों एवं इस संबंध में प्रगति का आकलन करने के लिये एक वर्षीय प्रक्रिया है।
इसके तहत यह सहमति व्यक्त की गई है कि वर्ष 2018 और वर्ष 2019 में होने वाले अगले दो जलवायु सम्मेलनों में विशेष 'स्टॉक टेकिंग' सत्र (stock-taking session) होंगे।इस स्टॉक-टेकिंग सत्र में ‘प्री-2020 एक्शन्स’ (pre-2020 actions) यानी ग्रीनहाउस गैस-उत्सर्जन से संबंधित वर्तमान प्रतिबद्धताओं के संबंध में विभिन्न देशों द्वारा उठाए जा रहे कदमों की समीक्षा की जाएगी।उल्लेखनीय है कि 'टलानोआ', फिजी एवं प्रशांत क्षेत्र में प्रयोग होने वाला एक परंपरागत शब्द है जो एक समावेशी, सहभागी एवं पारदर्शी वार्ता की प्रक्रिया को निर्दिष्ट करता है|

क्या है ‘प्री-2020 एक्शन्स’?

दरअसल, पेरिस समझौते से यह तय होगा कि वर्ष 2020 के बाद क्या किया जाना चाहिये, लेकिन अभी यानी वर्ष 2017 के अंत से लेकर वर्ष 2020 तक क्या किया जाए? क्या इस समयावधि के अन्दर ग्लोबल वार्मिंग से बचाव के लिये कुछ भी नहीं किया जाएगा?वर्ष 2017 के अंत से लेकर वर्ष 2020 तक ग्लोबल वार्मिंग से बचाव के लिये किये जा रहे प्रयास क्योटो प्रोटोकॉल के दूसरे चरण के हिस्सा हैं। विदित हो कि क्योटो प्रोटोकॉल के प्रथम चरण (2005-2012) और दूसरे चरण (2013-2020) में तय किया गया है कि उत्सर्जन को कम करने की मुख्य ज़िम्मेदारी अमीर और विकसित देशों की है।

COP-23 में क्या कमियाँ रह गईं (shortfalls of COP-23)?

पेरिस समझौते की तहत तय की गई प्रतिबद्धताओं में अमेरिका की अहम् भूमिका है, लेकिन अमेरिका द्वारा पहले ही पेरिस समझौते से हटने की घोषण कर दी गई है।COP-23 में इस संबंध में कोई प्रगति नहीं हुई जबकि अमेरिका दुनिया का सबसे बड़ा ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जक देश है।कुछ वर्षों तक ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में स्थिरता दिखाई दी थी, लेकिन इसमें वर्ष 2017 में 2% की वृद्धि हुई। सम्मलेन में इसके कारणों की पहचान और इसे कम करने को लेकर समन्वय का अभाव दिखा है।चीन जो कि दूसरा सबसे बड़ा उत्सर्जक देश है कोयले के उपयोग को सीमित करने की बात तो करता है, लेकिन अन्य देशों में वह निवेश कर रहा है और वहाँ कोयले से प्राप्त बिजली का उपयोग हो रहा है।दरअसल, राष्ट्रीय स्तर पर निर्धारित योगदान (Nationally Determined Contribution-NDC) को पूरा करने हेतु विकासशील देशों को ‘मज़बूत वित्तीय एवं तकनीकी सहायता’ (cross-border funding and technology flows) की आवश्यकता होगी, लेकिन बॉन सम्मलेन इसकी पहचान करने में असफल रहा है।

क्या है राष्ट्रीय स्तर पर निर्धारित योगदान (what is Nationally Determined Contribution)?

पेरिस समझौते के अंतर्गत राष्ट्रीय स्तर पर निर्धारित योगदान (Nationally Determined Contribution) की संकल्पना को प्रस्तावित किया गया है।इसमें प्रत्येक राष्ट्र से यह अपेक्षा की गई है कि वह ऐच्छिक तौर पर अपने लिये उत्सर्जन के लक्ष्यों का निर्धारण करे। भारत ने राष्ट्रीय स्तर पर निर्धारित योगदान (Nationally Determined Contribution-NDC) के तहत वर्ष 2030 तक अपनी उत्सर्जन तीव्रता को 2005 के मुकाबले 33-35 फीसदी तक कम करने का लक्ष्य रखा है।भारत ने वृक्षारोपण और वन क्षेत्र में वृद्धि के माध्यम से 2030 तक 2.5 से 3 बिलियन टन CO2 के बराबर कार्बन सिंक बनाने का वादा किया है।भारत कर्क और मकर रेखा के बीच अवस्थित सभी देशों के एक वैश्विक सौर गठबंधन के मुखिया (anchor of a global solar alliance) के तौर पर कार्य करेगा।

निष्कर्ष

भले ही हम मानवों ने धरती की सतह पर लकीरें खींच कर अलग-अलग देश और राज्य बना लिये हों, लेकिन यदि वायु, जल और भूमि प्रदूषित हुई तो इनका विश्वव्यापी प्रभाव देखने को मिलेगा।वस्तुतः विकसित देश जो कि जलवायु परिवर्तन के लिये मुख्य रूप से ज़िम्मेदार हैं, उन्हें विकासशील देशों को जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिये वित्तीय और तकनीकी सहायता प्रदान करनी चाहिये।भारत एक विकासशील देश है और यह जलवायु परिवर्तन के प्रति संवेदनशील भी है। ऐसे में उसे जलवायु परिवर्तन के विरुद्ध जारी इस लड़ाई का नेतृत्व करना चाहिये।दरअसल, वार्ताकारों को अब उन नियमों को अंतिम रूप देने पर काम करना होगा जो वर्ष 2018 में पोलैंड में होने वाले दलों के अगले सम्मेलन (COP-24) के दौरान अपनाए जाएंगे।

प्रश्न: बॉन सम्मलेन (COP-23) में हुई प्रगति एवं विफलताओं के आलोक में पेरिस समझौते के भविष्य पर टिप्पणी करें।

संदर्भ: द हिंदू और इंडियन एक्सप्रेस

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