15/10/2021
ी_वासना
वासना है तुम्हारी नजर ही में तो मैं क्या क्या ढकूं,
तू ही बता क्या करूं के चैन की जिंदगी जी सकूं।।
साडी पहनती हूं तो तुझे मेरी कमर दिखती है
चलती हूं तो मेरी लचक पर अंगुली उठती है।।
दुप्पटे को क्या शरीर पर नाप के लगाउ मै।
कैसे अपने शरीर की संरचना को तुमसे छुपाउ मैं ।।
पीठ दिख जाए तो वो भी काम निशानी है।
क्या क्या छुपाउ तुमसे
तुम्हारी तो मेरे हर अंग को देख के बहकती जवानी है।।
घाघरा चोली पहनू तो स्तनो पर तुम्हारी नजर टिकती है,
पीछे से मेरे नितंम्बो पर तेरी आंखे सटती है ।।
केश खोल के रखू तो वो भी बेहयाई है।
क्या करे तू भी तेरी निगाहों मे समायी काम परछाई है।।
हाथो को कगंन से ढक लूं चेहरे पर घुंघट का परदा रखलूं
किसी की जागिर हूं दिखाने के लिए अपनी मांग भरलूं।।
पर तुम्हे क्या परवाह मैं
किसकी बेटी किसकी पत्नी किसकी बहन हूं।
तुम्हारे लिए तो बस
तुम्हारी वासना को मिलने वाला चयन हूं।।
सिर से पांव के नख तक को छुपालूंगी
तो भी कुछ नहीं बदलेगा,
तेरी वासना का भूजंग तो नया बहाना
बनकर के हमें डस लेगा।।
सोच बदलो समाज बदलेगा
14/03/2020
*_मोदीजी की तरह खादी में_*
_कल हम गए एक *शादी* में !!!!!!!_
*_चारों तरफ डेटॉल और फिनायल_*
की खुशबू महक रही थी
सिर्फ करोना वाइरस की ही
चर्चा चहक रही थी
रिश्तेदार मिल रहे थे ...
आपस में हँसते हँसते
*_हाथ मिलाने की बजाय_*
कर रहे थे ..सिर्फ *_नमस्ते_*
सब दूर दूर खड़े थे
_शादी वाले *हॉल* में_
*_मास्क ही ..मास्क रखे थे_*
पहली पहली *_स्टॉल_* में
*_"इत्र" वाले को मिला हुआ था_*
सैनेटाइजर छिड़कने का...टास्क
*_महिलाएं पहने हुए थी_*
*_साड़ी से मैचिंग वाला...मास्क_*
_दूल्हा दुल्हन जमे *स्टेज* पर_
*_थोड़ा दूर दूर बैठकर_*
*_'वरमाला' भी पहनाई गई_*
_एक दूजे पर .. *फेंककर*_
_हमने भी *इवेंट* को देखा_
_स्क्रीन पे थोड़ा दूर से_
*_मेकअप दुल्हन का भी_*
_किया गया था *कपूर* से_
फेरों में भी उनके हाथ
_एक दूसरे को नहीं थमाए गए_
*_और तो छोड़ो उनके 'फेरे' भी_*
_सौ मीटर दूर से कराए गये_
_इधर हम थूकने गए_
*_अपने पान की 'पीक'_*
_उधर दूल्हे को आ गई_
_बड़ी जोर से *छींक*_
_एक *सन्नाटा* सा छा गया_
_उस पंडाल में चारों ओर_
*_दुल्हन को गुस्सा आ गया और_*
_चली गई नहाने *मंडप को छोड़*_
माफी लगा माँगने सबसे
तब दूल्हे का *_बाप_*
_रिश्तेदार एक दूजे की_
*_शकल रहे थे ताक_*
_छोड़कर खाना भूखे ही_
_*मेहमान* घर को भागने लगे_
_मेहमान तो छोड़ो *हलवाई* भी_
_बोरिया बिस्तर बाँधने लगे_
हम शादी में जाकर भी
यारों रह गए *भूखे सरीखे*..
जैसी हमपर बीती वैसी
_किसी पर भी ना बीते_
#डॉ_संजीव_आनंद