कवि ravi Chandra

कवि ravi Chandra I am also a principal in government school

नदी नाले और पहाड़,सरहद नही बना करते है,कटे शीश की रक्त लकिरें. देश की भाग्य लिखा करते है...स्वरचित
06/06/2026

नदी नाले और पहाड़,
सरहद नही बना करते है,
कटे शीश की रक्त लकिरें.
देश की भाग्य लिखा करते है...
स्वरचित

चिता कि लौ जब तक जलती है..सूरज कभी ना अस्त होता.....युवाओं को शौक कफन हो तो...वो राष्ट्र नही परस्त होता..........स्वरचित...
06/06/2026

चिता कि लौ जब तक जलती है..
सूरज कभी ना अस्त होता.....
युवाओं को शौक कफन हो तो...
वो राष्ट्र नही परस्त होता..........
स्वरचित...

वो गंगा है वो यमुना हैवो जीवन कीधरायें है...वो धरती है,वो आसमां है,ये दुनिया किजो मांयें है,.......कई भाई मिले,कई बहन मि...
10/05/2026

वो गंगा है
वो यमुना है
वो जीवन की
धरायें है...

वो धरती है,
वो आसमां है,
ये दुनिया कि
जो मांयें है,.......
कई भाई मिले,
कई बहन मिले,
पिता का कई,
स्वरुप मिला,
कोई जाती हो,
कोई मजहब हो,
माता का एक
ही रुप मिला...
कोई मंदिर हो,
कोई मस्जिद हो,
सबकी एक दुआयें है..
वो धरती है,
वो आसमां है,
यें दुनियां की
जो मांयें है............
जिनकी गोद है,
स्वप्निल सी,
आखों मे किसकी
चिंता है...
दुध रक्त बन
बहता है..
सांसो से कौन
जिंदा है...
कोई धुप हो,
कोई वारिश हो,
सर पे उसी के सायें है....
वो धरती है,
वो आसमां है,
यें दुनियां की
जो मांये है........
वो हंसती है ,
तो फुल खिले,
खुशियों का
स्वर्णिम धुप खिले,
वो काया है,
वो माया है,
जहां बचपन का
रुप खिलें...
वो चंदा है,
वो तितली है
वो वसंती हवायें है....
वो धरती है..
वो आसमां है
यें दुनियां की
जो मांये है.........
स्वरचित

वो यमघटकी,वो कौरवी है,वो शकटव्युह,वो भैरवी है,वो लोचनभृंग,नही तरणी सी,मेरी गृहणी हैवट यक्षणी सी...........क्या शतकर्णी,क...
09/05/2026

वो यमघटकी,
वो कौरवी है,
वो शकटव्युह,
वो भैरवी है,
वो लोचनभृंग,
नही तरणी सी,
मेरी गृहणी है
वट यक्षणी सी...........
क्या शतकर्णी,
क्या चक्षुश्रवा,
हां कंटप अमोघ
सम भुरिश्रवा,
ना पारगम्य वो,
वैतरणी सी...
मेरी गृहणी है
वट यक्षणी सी........
वो चक्रव्युह,
दिव्यांगणाओं की,
वो कुम्भीपाक ,
यातनाओं की,
वह अजेय दंभ
राजनृपणी सी....
मेरी गृहणी है...
वट यक्षणी सी..........
स्वरचित

वो समंदर है और प्यासा है,फ़कत नाम की पानी है....जो फुक फुक कर पैर रखता है,बेकार उसकी जवानी है.............उजालों ने अब प...
11/04/2026

वो समंदर है और प्यासा है,
फ़कत नाम की पानी है....
जो फुक फुक कर पैर रखता है,
बेकार उसकी जवानी है.............
उजालों ने अब पाली है,
अंधेरों को पहरेदारी में,
खानदान नस्ल नही देखी
जाती अब दुनियादारी में,
अछुता प्रेम रुठ गया..
मोहब्बत अब जिस्मानी है...
बेकार उसकी जवानी है..........
स्वरचित

तेरी यादें मे खोए रहना ...किसी जन्नत से कम नही...कुछ कहूं तू मान जाये..किसी मन्नत से कम नही............भुल गया हूं रास्त...
09/04/2026

तेरी यादें मे खोए रहना ...
किसी जन्नत से कम नही...
कुछ कहूं तू मान जाये..
किसी मन्नत से कम नही............
भुल गया हूं रास्ता,
अपने घर का शहर का,
जाकर भी क्या करना,
जीवन -ए-बसर का,
तेरे दर पे बैठा रहूं,
किसी इज्जत से कम नही................
तेरी आंगन ही हरिद्वार,
वणारसी,प्रयाग है,
तेरे चरणो से उड़ता धूल,
वसंत है फाग है,
तु मेरी है कह दे
वेद तन्नत से कम नही...
कुछ कहूं तू मान जाय...
किसी मन्नत से कम नही..........
जब बोझ लगू स्वप्न सा,
महबर सा उपटन सा,
उतार देना हे प्रिय,
जीर्ण क्षीण जीवन सा,
मुस्कान तेरी प्राण मेरी
किसी किमत से कम नही...........स्वरचित

खुशियों कि मेला भटकी,बेजार सुनी सी राहों में,हंसने वाले चेहरे गुमसुम,जा डुबे दर्द और आहों में,रातें चादर तान सो गई,कौन ह...
02/04/2026

खुशियों कि मेला भटकी,
बेजार सुनी सी राहों में,
हंसने वाले चेहरे गुमसुम,
जा डुबे दर्द और आहों में,
रातें चादर तान सो गई,
कौन है अब जगने वाला,
चांद को तकने वाला...2........
प्रेम तपस्या पूरी हुई,
या करूणा सागर मे डुब गई,
बैठे बैठे संग मेरे,
कंधों पे जाने कब ऊंघ गई,
जी भर देख लू उसे सोतें हुये,
मेरे सांसों से गलने वाला....
मेरे साथ साथ चलने वाला............
कभी पा जाओं जो खुद को तो,
मेरा घर पत्ता बतला देना,
वही गलियां वही आंगन,
वही तस्वीर दिखला देना,
सब बदलें ,नही बदला
तेरे खिस्सें चर्चे चलने वाला...
तुझसे मुझसे जलने वाला..............
स्वरचित

क्या उच्चैश्रवा,क्या खडग वीर ,क्या मड़ी मसान,क्या जिंदा पीर,मालुम्ब ,जिन्न,अब कामनी सी,मेरी गृहणी है वट यक्षणी सी..........
24/03/2026

क्या उच्चैश्रवा,
क्या खडग वीर ,
क्या मड़ी मसान,
क्या जिंदा पीर,
मालुम्ब ,जिन्न,
अब कामनी सी,
मेरी गृहणी है
वट यक्षणी सी..........
बालखण्डी का,
तंत्र भी फिका,
अघोर शाबर का
मंत्र भी फिका,
छत्तीस भुत,
बतीस खबीस,
नौ नर सिंह,
नही दामनी सी,
मेरी गृहणी है
वट यक्षणी सी..........पुरब बांधा,
पश्चिम बांधा,
उत्तर बांधा ,
दक्षिण बांधा,
अकाश का जड़,
पत्ताल से बांधा,
वो बंधी नही,
एकघ्नि सी,
मेरी गृहणी है,
वट यक्षणी सी............
श्मशान की लौ
भी शांत हुई,
वो भैरवी ना
अक्रांत हुई,
रक्त पिपासू,
काली कपाली,
है विकट बड़ी
जमद्ध्नी सी....
मेरी गृहणी है
वट यक्षणी सी........
चौसठ योगनी,
परि साध लिया,
सोलह सींडू,
यंत्र बांध लिया,
हाकनी डाकनी,
नौ नर सिंह,
वो कच्चा कलवा
है ठगनी सी....
मेरी गृहणी है
वट यक्षणी सी............
दिग्गज दिक्पाल,
भैरु क्षेत्रपाल,
वो रक्त दंतिका,
वंदिश रुद्रयाल,
डामर तंत्र का,
मुंजा विकराल,
वो छद्म पद्म,
चित लंकनी सी..
मेरी गृहणी है
वट यक्षणी सी.........स्वरचित

अतीत से वर्तमान तक का गौरव कविता में लिखनें का प्रयास....विधा...कविताशीर्षक...हां मै बिहार हूं.......हर्यक का मैं विजय प...
22/03/2026

अतीत से वर्तमान तक का गौरव
कविता में लिखनें का प्रयास....
विधा...कविता
शीर्षक...हां मै बिहार हूं.......

हर्यक का मैं विजय पताका,
बलशाली जरासंध हूं।
कर्ण का दानी कवच लिए,
मौर्यों का शौर्य अनंत हूं।

गंगा की अविरल धारा में,
सभ्यता रुकी कालखंड है।
सिकंदर का मुकुट गिरा जहां,
सूर्य सा चंद्रगुप्त प्रचंड है।

आर्यभट्ट का खगोल, भूगोल,
चाणक्य का राजमंत्र हूं।
लिच्छिवियों का वैशाली मै,
वसुधा का प्रथम गणतंत्र हूं।

गौतम की तपोभूमि मै,
महावीर, बुद्ध का ज्ञान हूं।
अहिल्या का मुझे राम कहो,
मैं जानकी का मान हूं।

प्रेम यज्ञ की हवन कुंड में,
जलती आम्रपाली, चित्रा हूं।
चीन, जापान, तिब्बत, सिलोन,
का भिक्षु महेंद्र, संघमित्रा हूं।

मैं विद्यापति का मधुर गान,
दशमेश पिता का आंगन हूं।
मैं खिलजी का दंश झेलता,
नालंदा गुरुकुल का प्रांगण हूं।

ह्वेनसांग, फाह्यान का पथ मैं,
दधीचि का अस्थि बाण हूं।
गज, ग्राह हूं हरिहर क्षेत्र का,
लोक आस्था का प्राण हूं।

मैं बापू का चंपारण,
खुदीराम बोस का फांसी हूं।
कुंवर सिंह का विप्लव में,
जयप्रकाश नारायण का क्रांति हूं।

मैं गया का पितृपक्ष मेला,
पूर्वजों का करता उद्धार हूं।
मैं रेणु, दिनकर का लेखन,
श्रमिकों का कुशल नवाचार हूं।

हां मैं बिहार हूं,
हां मैं बिहार हूं।

रचनाकर्ता
रविचंद्र प्रकाश दास
प्रधानाध्यापक
उच्च माध्यमिक विद्यालय धवरी बनियापुर (सारण)

फुरसत में हूं,फुरसत भी नही,इतवार की तरह.......किमत रोज लगती है मेरी ,बजार की तरह..............वो मिली बड़ी अदब,बड़ी तमीज...
18/03/2026

फुरसत में हूं,फुरसत भी नही,
इतवार की तरह.......
किमत रोज लगती है मेरी ,
बजार की तरह..............
वो मिली बड़ी अदब,बड़ी तमीज से,
चेहरा पोछ गई मेरे कमीज से...
अब मै दागदार हूं,गुनाहगार की तरह...............
ऐसा नही की मै भी साजिश मे नही...
उसके हर गुनाह से वाकिफ भी नही....
किरदार ही मेरी है अंधकार की तरह....................
स्वरचित.....

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