14/01/2025
#11जनवरी
लोकनायक, जननायक, पूर्व विधायक कटेसर विधान सभा क्षेत्र (वर्तमान मे शिवपुर विधान सभा क्षेत्र वाराणसी) एवं सबसे महत्वपूर्ण स्वतंत्रता संग्राम सेनानी स्व० लोकनाथ सिंह को उनकी पुण्य स्मृति समारोह पर याद कर जनमानस के पटल पर पुनः स्थापित कर अविस्मरणीय बनाने का।
देवपितृकार्याभ्यां न प्रमदितव्यम् । मातृदेवो भव । पितृदेवो भव । आचार्यदेवो भव । अतिथिदेवो भव । यान्यनवद्यानि कर्माणि । तानि सेवितव्यानि । नो इतराणि । यान्यस्माकं सुचरितानि । तानि त्वयोपास्यानि ।।
(तैत्तिरीय उपनिषद्,)
अर्थ:- देवकार्य तथा पितृकार्य से प्रमाद नहीं किया जाना चाहिए । माता को देव तुल्य मानने वाला बनो । पिता को देव तुल्य मानने वाला बनो । आचार्य को देव तुल्य मानने वाला बनो । अतिथि को देव तुल्य मानने वाला बनो । अर्थात् इन सभी के प्रति देवता के समान श्रद्धा, सम्मान और सेवाभाव का आचरण करे । जो अनिन्द्य कर्म हैं उन्हीं का सेवन किया जाना चाहिए, अन्य का नहीं । हमारे जो-जो कर्म अच्छे आचरण के द्योतक हों केवल उन्हीं की उपासना की जानी चाहिए; उन्हीं को संपन्न किया जाना चाहिए । इन उद्देश्यों के साथ ही,
यह अवसर था सामाजिक समरसता, सदभाव एवं सामाजिक सौहार्द्य को बढ़ाने वाली सोच अपनाकर आगे बढ़ने एवं संकल्प लेने की जिम्मेवारी आज युवाओं के कंधे पर है, समझने का,
यह अवसर था शिक्षा के मंदिर लोकनाथ स्नातकोत्तर महाविद्यालय के आंगन में आने वाली पीढ़ियों को अपने घर, समाज एवं देश के प्रति उनकी जिम्मेवारी एवं कर्तव्यों से आत्मसात कराने का।
यह अवसर था क्षेत्र के समृद्ध विरासत का भावी पीढ़ी से मुलाकात, परिचय एवं संवाद का।
यह अवसर था पूर्व निर्धारित कार्यक्रम में विभिन्न समाजसेवी संगठन, राजनीतिक पार्टी के माननीय विधायक , सांसद , प्रतिनिधि, शिक्षक, अभिवावक, छात्र छात्रा एवं पत्रकार बंधुओं के महासंगम का।
साथ ही एक सुखद संयोग, #12 जनवरी 2025 को अपनी तरुणाई पर खड़े लोकनाथ स्नातकोत्तर महाविद्यालय के रजत जयंती समारोह का।
इस दोनो अवसर के साक्षी एवं सहभागी बने आप सभी देवतुल्य अतिथियों, पूर्व में कार्यरत रहे प्राध्यापकगण, आदरणीय अभिभावकों, सम्मानित पत्रकारों, पूर्व एवं वर्तमान छात्र - छात्राओं, एवं कार्यक्रम को सफल बनाने के अनवरत कई दिनों से लगे महाविद्यालय के प्राचार्य प्राध्यापकगण, कर्मचारीगण आप सभी का आभार एवं सबसे महत्वपूर्ण कड़ी महाविद्यालय के प्रबंधक श्री धनंजय सिंह जी चाचा जी, जिन्होंने पिता जी के अधूरे सपने एक महाविद्यालय की स्थापना करना, जिससे की गरीब एवं कमजोर वर्ग के लोगों को घर के पास स्नातक, परास्नातक आदि की सुविधा सुलभ हो सके, को साकार किया। यह बड़े भाइयों स्व० राणा प्रताप सिंह, श्री रमेश सिंह एवं डॉ हरिश्चंद्र सिंह के प्यार एवं स्नेह की मिशाल है तथा इस महाविद्यालय को आप सभी महानुभावों के आशीर्वाद से इस वर्ष रजत गौरव प्राप्त हुआ।
साथ ही महाविद्यालय के नींव खड़ी करने से लेकर आज तक सहयोगी की भूमिका में रहे सभी स्वजनों का हार्दिक आभार। लोकनाथ स्नातकोत्तर महाविद्यालय आपके प्यार एवं सहयोग के लिये नतमस्तक है। कृतज्ञ हैं।
मेरी कविता की चार पंक्तियां संघर्ष को समर्पित है -
अपनी जिंदगी यूं ही ना बेकार कर,
तेरे होने का कुछ अर्थ है, ये समझ,
ये ठान ले तू, कुछ ऐसा कर जाएगा,
तेरी नसीहत पीढ़ियों को जगाएगा।
(By : Aravind kumar Singh)