28/09/2017
"जिस देश का युवा वर्ग न ही अपने हितों की रक्षा कर पाने में सक्षम हो और न ही अपने सहोदरों की सुरक्षा सुनिश्चित करने का सामर्थ रखता हो, उस राष्ट्र के लिए उसका युवा होना ही उसका सबसे बड़ा दुर्भाग्य बन जाता है क्योंकि जो समाज अपने प्रयासों से ऐसे युवा वर्ग का निर्माण करे, एक राष्ट्र के रूप में उसका भविष्य ही उसके वर्त्तमान की सबसे बड़ी समस्या बन जाती है।
समस्या केवल वह सोच की संकीर्णंता ही है जिसने आज संभावनाओं को इतना सीमित कर दिया है।
हम कौन है, हमारा क्या है यह किसी के लिए जानना आवश्यक नहीं, बस, अपनी सीमित समझ से अपनी परिधि परिभाषित कर, सब अपना अपना भला करने में लगे पड़े हैं, तभी आज भारत की ऐसी दुर्दशा है;
आज के युवाओं को यह समझना होगा की उनके व्यक्तिगत प्राथमिकता सूचि में विषय के रूप में प्रयास के लिए जो भी कारन महत्वपूर्ण व् आवश्यक हैं, और जिसके लिए व् प्रयासरत भी हैं, सामाजिक व्यवस्था और राष्ट्रीय हितों की सुरक्षा सुनिश्चित किया बिना, यदि हम उन व्यक्तिगत लक्ष्यों को प्राप्त भी कर लेते हैं, तो भी वह निरर्थक सिद्ध होगा।
प्रयास के लिए समय सभी के लिए सीमित है पर हम क्या करते हैं और क्यों करते हैं निश्चित रूप से यह वो करक हैं जो किसी भी छोटे प्रयास को महत्वपूर्ण व् निर्णायक बना देते हैं।
सवाल केवल इतना है की जिस प्शाशन तंत्र और सामाजिक व्यवस्था से एक विश्वविद्यालय तक नहीं संभालता और जो विश्वविद्यालय परिषर में विद्यार्थियों की सुरक्षा सुनिश्चित नहीं कर सकते, ऐसे नेतृत्व के हाथों में देश का दाइत्व सौंप कर हम कितना निश्चिंत हो सकते हैं ?
व्यवस्था परिवर्तन आज समय की मांग है और समाज की आवश्यकता पर यह किसी चुनावी भाषण अथवा राजनेताओं के मिथ्यावाचन से संभव ही नहीं; इसके लिए समाज को एक जुट होकर राष्ट्रहित में खड़ा होना पड़ेगा और अर्थव्यवस्था के लाभ-हानि के गणित से अधिक सामाजिक जीवन में नैतिक मूल्यों के आधार पर सही- गलत को महत्वपूर्ण बनाना होगा।
परिवर्तन संभव है और आवश्यक भी , पर जिस तरीके से हम व्यवस्था परिवर्तन का प्रयास कर रहे हैं और जिस 'विकास' की समझ से भारत को विकसित बनाने निकले हैं, गलती उस प्रक्रिया और उस समझ की है।
यथार्थ की अनुभूति ही सत्य को प्रमाणित करता साक्ष्य होता है क्योंकि सत्य पर विश्वास तो आस्था है, व्यवहारिकता नहीं। ऐसे में जब देश का शीर्ष नेतृत्व ही अपने खोकले शब्दों से अपनी विश्वसनीयता खो दे तो देश के पास ऐसे नेतृत्व पर विश्वास करने का कारन ही नहीं बचता; ऐसे में, देश की वेदना कौन समझेगा और इसके निदान के लिए प्रयास कौन करेगा ? देश का युवा नहीं तो और कौन ?
समय जीवन के रूप में ही यथार्थ की संभावनाओं को जन्म देता है, और युवा वर्ग, उसी संभावनाओं को संभव बनाने वाली ऊर्जा का स्त्रोत; ऐसे में, जब किसी देश के युवा वर्ग की प्राथमिकता सूचि में राष्ट्र से अधिक महत्वपूर्ण व्यक्तिगत स्वार्थ, सफलता अथवा सिद्धि बन जाए तो उक्त राष्ट्र का युवा होना ही उसकी सबसे बड़ी समस्या बन जाती है।
आज समय ने भारत को उसी दोराहे पर ला खड़ा किया है जहाँ देश के युवा वर्ग को तय करना है उनके लिए महत्वपूर्ण क्या है, राष्ट्रहित या राजनीति, सही के पक्ष में खड़ा होना या अपने स्वार्थ के लिए गलत से समझौता करना और अंततः, जीवन की सफलता या जीवन की सार्थकता ;
समय नए गौरवशाली इतिहास लिखने का अधिकार हर वर्त्तमान को नहीं देता, और आज, जब भारत के युवा वर्ग को संयोग से यह अधिकार प्राप्त हुआ है, तो देखते हैं, वो क्या करते हैं ! यह महत्वपूर्ण इसलिए भी है क्योंकि भारत के युवा पीढ़ी का निर्णय ही भारत की नियति निश्चित करेगा।"