19/06/2023
#भाग_२ #यात्रा_वृत्तांत #एवरेस्ट बेसकैंप
#किस्सागोई - जब पशुपतिनाथ ने गुम हुए डेबिट कार्ड को लौटाया 🥰🏔️👇
खैर एयरपोर्ट के ठीक पास होटल काठमांडू इन में चेक इन कर चुका था। लंबे सफर के बाद शावर लेने और अपने बैग्स व्यवस्थित करने के पश्चात हम पशुपतिनाथ मंदिर को निकले । होटल से लगभग देढ़ किलोमीटर की दूरी पर तांत्रिक विद्या का सबसे प्रमुख मंदिर पशुपतिनाथ, पशु अर्थात जीवन , पति का अर्थ स्वामी यानि जीवन के देवता के दरबार में हाजिरी देने हम चारों लोग पैदल ही पहुंच गए। मंदिर प्रांगण के अंदर लंबी लाइन ,धूप, तपिश और भक्तों की भीड़ थी हम भी उस लाइन में शामिल हो गए । यहां तक के किस्से में मैंने अपने समूह का परिचय नहीं दिया ,कोई न अभी तो सफ़र शुरू होने को है धीरे-धीरे सब सामने आएंगे। तो इस किस्सागोई का पहला पात्र विकास ओझा सर जो इस समूह में सबसे वरिष्ठ थे और उनके जीवन की इस तरह की यात्रा शायद पहली बार थी। विकास ओझा सर मेरे प्रिंसिपल रहें हैं, 2013 में जब एक आम मध्यमवर्गीय परिवार की महिला अपने बच्चे का दाखिला शहर के सबसे अच्छे निजी अंग्रेजी विद्यालय में कराने की दुस्साहस करती है तब मेरी मुलाकात इस विद्यालय के प्रिंसिपल श्री विकास ओझा सर से होता है। ऐसा व्यक्तित्व जो राह चलते लोगों के अंदर जादू फूंकता चलता है। कई वर्षों बाद इस विद्यालय को मैं शिक्षक के रूप में ज्वाइन कर बच्चों को कांउटर वायलेंस और फिजिकल फिटनेस सिखाना शुरू करता हूं ।आफिस चैंबर में विकास ओझा सर के साथ एक दिन एवरेस्ट बेसकैंप हिमालय की यात्रा के बारे में वार्तालाप कर रहा होता हूं। जैसे बुरे संगत में पड़ कर लोग बुराई सीख पड़ते हैं, ठीक वैसे ही अगर आप साहसिक, रोमांच, चुनौतियों से लबरेज और खुद को आजमाने , बदलाव लाने तथा क्रांतिकारी प्रवृत्ति लिए जीवन जीते हैं तो अपने आसपास के लोगों को भी बदल रहे होते हैं सर अपने जीवन के इस पड़ाव पर पर्वतारोहण जैसे संघर्षमय, कठोर अनुशासित यात्रा के प्रति मानसिक रूप से तैयार हो चुके थे । अब समय था तैयारी की , जोखिम भरे इस खेल में आप बिना तैयारी के उतर ही नहीं सकते । आपकी कम तैयारी और चूक जानलेवा हो सकती है । यात्रा शुरू करने में तब हमारे पास तीन माह का समय शेष था , मैं तुरंत सर के प्रशिक्षण हेतु एक्सरसाइज प्लान व रूटीन उनके वर्तमान शारीरिक स्ट्रैंथ व जरूरत के अनुरूप डिजाइन करता हूं और हम विद्यालय के छुट्टी पश्चात 3-4 घंटों के कड़े प्रशिक्षण में जुट जाया करते थे।
खैर पशुपतिनाथ मंदिर प्रांगण में हम अभी तक कतार में ही थे सर को आगे छांव में मंदिर के पास बैठने को कहा , जब कतार अंदर की तरफ बढ़ा तब सर भी आ गए तभी कुछ जन हमारे पास आकर प्रति व्यक्ति दो सौ रुपए में बिना कतार में शामिल हुए बाबा पशुपतिनाथ से भेंट कराने की बात करने लगे। देख रहे हैं न पशुपतिनाथ, अगर आप है तो देखिए, आपसे अप्वाइंटमेंट के लिए अब बिचौलियों की जरूरत पड़ेगी यह सर की आवाज थी । अब भी हमलोग कतार में थे, सर ने कहा कि मैं घूमकर आता हूं और जब तक हमारी कतार पशुपतिनाथ के ठीक सामने पहुंचती सर कतार के बाहर मंदिर के अन्य दरवाजों और कोण से कई बार दर्शन कर लिया। तब समझ में आया हम कतार में दर्शन करें या ऐसे घूमकर हमें दर्शन करने का बस उतना ही वक्त और दृश्य मिलेगा । मैं भी पहुंचता हूं बगल के कतार से निकल सामने की कतार में जहां भीड़ नहीं थी । मैं पशुपतिनाथ के सामने था , मुझे चार चेहरों वाला लिंग दिखा, और तब पता चलता है कि पूर्व दिशा की ओर वाले मुख को तत्पुरुष और पश्चिम की ओर वाले मुख को सद्ज्योत ,उत्तर दिशा की ओर स्थित मुख वामवेद तथा दक्षिण दिशा वाले मुख को अघोरा कहते हैं। ये चार चेहरे तंत्र-विद्या के चार बुनियादी सिद्धांत हैं।
पशुपतिनाथ दो शरीरों का सिर है। एक शरीर दक्षिणी दिशा में हिमालय के भारतीय हिस्से की ओर है, दूसरा हिस्सा पश्चिमी दिशा की ओर है, जहां पूरे नेपाल को ही एक शरीर का ढांचा देने की कोशिश की गई थी। कई पौराणिक कहानियों को खंगालने के बाद एक कहानी कुरुक्षेत्र की भी मिली जिसका संबंध पशुपतिनाथ से था। पांडवों और कौरवों के मध्य लड़ी गई कुरूक्षेत्र का खूनी महायूद्ध काफी विध्वंसक और प्रबल था । अपने ही सगे संबंधियों, भाइयों की हत्या करने से पांडव बहुत दुखी थे , अपराधबोध और पछतावे की अग्नि में जल रहे थे , गोत्र वध के इस दोष से मुक्ति केवल शिव दे सकते थे और वो निकल पड़ते हैं शिव की तलाश में । शिव ऐसे कृत्य के लिए पांडवों को आसानी से मुक्ति नहीं देना चाहते थे। ऐसे में पांडवों को अपने पास देख वो बैल का रूप धारण कर भागने की कोशिश करते हैं। पर पांडव इस भेद का पता लगा लेते हैं और उस बैल को पकड़ने की कोशिश करते हैं । इस भाग-दौड़ में शिव जमीन में विलुप्त हो जाते हैं , पुनः जब अवतरित हुए तो उनके शरीर के टुकड़े अलग अलग जगह पर बिखर गए । नेपाल के जिस जगह पर मस्तक गिरा था वह पशुपतिनाथ कहलाया ,वैसे ही केदारनाथ में बैल का कूबड़, तुंगनाथ में आगे की दो टांगें, मध्यमहेश्वर में बैल का नाभि , कल्पनाथ में बैल के सींग गिरे थे । ये सारे जगह शिव के महान मंदिरों में से एक है। एक कथा के अनुसार पांडवों को स्वर्गप्रयाण के समय शिव ने भैंसें के रूप में दर्शन दिया , फिर धरती में विलुप्त होने लगे । पूर्ण रूप से विलूप्त होने के पूर्व भीम उसकी पूंछ पकड़ लेते हैं, जहां भीम ने पूंछ पकड़ा था वह स्थान केदारनाथ है , जिस स्थान पर उनका मुख धरती से बाहर आया वह पशुपतिनाथ कहलाया। हम चारों अब मंदिर के पीछे स्थित श्मशान को देखने आ गए , नदी के किनारे स्थित श्मशान भी गजब का खुबसूरत लगा मुझे। बाद में मुझे इस मंदिर से जुड़ी एक और मान्यता की जानकारी मिली मंदिर में दर्शन के लिए जाते समय भक्तों को मंदिर के बाहर विराजित नंदी के दर्शन नहीं करने चाहिए। जो व्यक्ति पहले नंदी के दर्शन करने के बाद शिवलिंग के दर्शन करता है, उसे अगले जन्म में पशु योनि में जन्म मिलता है। अब मुझे थोड़े पता था बाबा , अब आगे आपकी मर्जी।
पशुपतिनाथ महामंदिर के इस प्रांगण में लगभग 492 मंदिर, 15 शिवालय और 12 लिंगीय मंदिर है ।
मंदिर के अंदर सुरक्षाकर्मी इस बात को लेकर मुस्तैद थे की कोई फोन और कैमरे का प्रयोग न करें । थोड़े आगे आने पर ऐसा कोई रोक-टोक नहीं था फिर क्या हमारे समूह के दो माडल, इस यात्रा के दौरान सबसे ज्यादा फोटो लेने वालों में से एक शिव और कविता तुरंत सक्रिय हो गए, हमने पशुपतिनाथ के द्वार के बाहर ग्रूप फोटो लिया तदपश्चात पैदल ,दोपहर के भोजन की तलाश में निकल पड़े। तकरीबन 2 किलोमीटर चलने के पश्चात हम एक होटल पर पहुंचे, तय हुआ की नेपाली थाली भोजन में किया जाए यानि "दाल भात पावर ट्वेंटी फार आवर " सबसे ज्यादा नेपाल में हमने कुछ खाया तो यही था एक वक्त पर मन उब गया क्योंकि हममें से हर कोई सादा भोजन ही लेता था और पहाड़ पर विकल्प हमारे पास कम थे हालांकि उबकर अन्य नेपाली भोजन के तरफ हम बढे थे। थाली आ चुकी थी , मैंने खाना भी शुरू कर दिया, तभी कविता चौंकती है जब उसकी नजर मोबाइल के कवर पर जाता है। उसका रुपे डेबिट कार्ड गायब था । हम सभी अपने आस-पास खोजते हैं, पर कोई फायदा नहीं । कविता भोजन छोड़ निकल जाती है, उसको नहीं पता उसका डेबिट कार्ड कहा खोया होगा , क्योंकि हम घुमावदार रास्तों से होते हुए आऐ थे। मैं आराम से भोजन किया , अक्सर मैं कंफ्लिक्ट में सहज ही रहता हूं और फिर सुनिश्चित करता हूं कि करना क्या है। भोजन उपरांत मैं ठीक उसी रास्ते को पकड़ आगे बढ़ा जहां से होकर हम सभी आए थे। मंदिर जाने वाले रास्ते में स्वतः संवाद प्रस्फुटित हुआ "क्या पशुपतिनाथ, यही होगा ? अभी नेपाल आए ज्यादा समय भी नहीं हुआ, हम में से किसी के बातों का बुरा लगा है क्या? जाने दीजिए प्रभू कार्ड उसका लौटा दीजिए, आगे यात्रा लंबा है । पड़ेशान मत कीजिए "
कुछ देर बाद महामंदिर के पास पहुंच चुका था। चारों तरफ नजर दौड़ाने के बाद , जुते चप्पल जमा करने की जगह कविता दिखाई पड़ी, उदास अपने जुते को पहनते हुए। देखते ही समझ गया कि इसका कार्ड नहीं मिला है। अत्यंत भीड़ और विशाल इस जगह पर छोटा सा कार्ड खोजना और यह भी नहीं पता कि कार्ड कब और कहां गिरा होगा विफल प्रयास था। 'मैं एक बार फिर भीतर जाकर ढूंढता हूं', मैंने कहा । नहीं,मैं अंदर में सब जगह ढूंढ चुकी हूं , वापस चलते हैं । वाक्य जबतक पूरा होता , पीछे के एक शिवलिंग के पास मुझे दूर से ही एक कार्ड दिखा । मैं दौड़ कर गया , कार्ड उठाया और बिना कार्ड को ध्यान से देखें कविता को आवाज दिया "कविता यह तुम्हारा कार्ड" । कविता को विश्वास करने में एक पल लगा , और फिर दूसरे ही पल आंखों में चमक और राहत थी।हमने पशुपतिनाथ को धन्यवाद दिया और वापस होटल की ओर चल पड़े जहां विकास ओझा सर और शिव अब भी थे । हमें चमकता देख वे भी आश्वस्त हुए ,भोजन उपरांत हम पैदल एयरपोर्ट के पास स्थित अपने होटल की दिशा में बढ गए। कमरे में पहुंच हमलोगों ने थकान दूर करने हेतु सोने का निर्णय लिया । शाम में काठमांडू के मार्केट थामेल में ट्रैकिंग हेतु कुछ आवश्यक खरीदारी करनी थी , भारतीय रुपये को नेपाली रूपयों में बदलना था ,पर अभी नींद जरूरी थी।
क्रमशः ..............