06/08/2021
जब ये ग्यारह लड़कियां हॉकी की स्टिक लिए मैदान में उतर रही थी तो मैं खेल के पहले मिनट से प्रार्थना में था। सिर्फ़ इसलिए नहीं कि भारतवासी होने के कारण अपने देश की टीम को जीतते हुए देखना चाहता हूँ, बल्कि इसलिए कि एक भारतीय होने के नाते अच्छी तरह से जानता हूँ कि गांव,शहर या छोटे कस्बे की इन लड़कियों के लिए बेलन की जगह हॉकी पकड़ना कितना मुश्किल रहा होगा। भारत की लड़कियां खेल में अपने प्रतिद्वंद्वी से सबसे आखिरी में लड़ती है, उसके पहले लड़ाइयों का एक लंबा सिलसिला चलता है जो परिवार से शुरू होकर मोहल्ला, स्कूल, समाज(रिश्ते नातेदार) तक फैलता जाता है और क्रमिक रूप से अधिक तीव्र होते जाता है। छोटे छोटे निक्कर पहन के लड़कों के सामने खेलेगी? अरे अच्छे घर की लड़कियां थोड़ी ऐसे छोटे ड्रेस पहन कर मैदान में खेला कूदा करती है। चलो खिलाड़ी बन भी गयी तो शादी कौन करेगा इससे? खेल कर क्या करेगी ? खेल से घर चलता है क्या बहन जी? समझाओ अपनी लड़की को।
तमाम सामाजिक वर्जनाओं को भेदते हुए ये लड़कियां ओलिम्पिक के सेमीफाइनल तक आ पहुँची। ये साहसी नहीं दुस्साहसी है, ये कोई सामान्य लड़कियां नहीं हो सकती। प्रार्थना में होने की वजह यही थी कि मैं जानता था कि ये सिर्फ़ 11 लड़कियां नहीं है, ये ख़्वाब है भारत के उन तमाम लड़कियों का जिन्हें रोटियां बेलने से ज्यादा अच्छा लगता है खेलना। जो बेलन की जगह बैडमिंटन, हॉकी, बल्ला, या ग्लव्स पहनना चाहती है उन तमाम लड़कियों का ख्वाब हक़ीक़त बन,हौसला बन मैदान में उतरी है।
आज ये हार जरूर गयी मगर आप सोच नहीं सकते कि कितनी उम्मीदों को जीत गयी, जगा गयी, कितने बंद पंछियों की आज़ादी का पिंजरा इन्होंने खोल दिया है..
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