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बैंकों के निजीकरण के घातक परिणाम
वर्तमान सरकार के नीति आयोग की कुनीति का सालों का परिणाम यह निकला कि संसद बैंकों को बड़े कॉरपोरेट घरानों को बेचने जा रही है। फिलहाल दो बैंकों के नाम चिन्हित किये गए हैं। मगर धोखे में न रहें। ये लोग धीरे धीरे सबकुछ बेचेंगे। वजह साफ है: गरीब किसान और मजदूर इनके चुनाव में चंदा नही देता, जबकि बड़े बड़े कॉरपोरेट घराने इनको चुनाव में बड़ी रकम देते हैं। अडानी महोदय, जिसके प्राइवेट जेट से उड़ उड़ कर चुनावी रैलियाँ की गई थीं, उनका एहसान चुकाया जा रहा है। पिछले एक साल में गौतम अडानी ने अमेजन के मालिक जेफ बेजोस से भी ज्यादा मुनाफा कमाया। क्या ऐसा इसलिए हो रहा है कि अचानक उनकी IQ का स्तर बढ़ गया? बिल्कुल नहीं। ऐसा इसलिए हो रहा है कि दशकों के परिश्रम और निवेश से आम जनता, गरीब किसान और दिहाड़ी के मजदूर के लिए बनाये गए बैंकिंग संस्थानों को सरकार कौड़ियों के भाव अपने प्रायोजकों को बेच रही है और जनता को झूठे वादों से और लच्छेदार भाषणों से बहकाया जा रहा है।
Financial inclusion के लिए किए गए दशकों के सम्मिलित प्रयास के बाद आज गरीब मजदूर को बैंकिंग सुविधाएं मिल पा रही हैं। बैंकों का निजीकरण इन गरीबों को इन सुविधाओं से बंचित कर देगा।
हमारे देश की विविधता अनेक रूपों में परिलक्षित होती है, जिनमें से एक मुख्य बिंदु है आर्थिक असमानता, जो कुछ लोगों के लिये विपन्नता का कारण बन जाती है। 130 करोड़ लोगों का हमारा देश, जिसकी चर्चा हम सुबह शाम नियमित रूप से हर छोटी बड़ी बात में सुनने को आदी हो चुके हैं, केवल अमीरों के देश नही है, केवल कॉरपोरेट घरानों के देश नही है, यहाँ आज भी ऐसे लोग बसते हैं, जिनके पास बच्चों की फीस देने और इलाज करवाने के लिए पैसे नही हैं। अगर आपके दिमाग में भी अमेरिका और यूरोप के मॉडल का नशा चढ़ चुका है, तो जरा ठहरिए। वहाँ के लोगों, उनकी आदतों, उनकी व्यवस्थाओं को समझिए। वहाँ हर बच्चे की शिक्षा, हर व्यक्ति का इलाज सुनिश्चित है। किसी चीज को आधा अधूरा अनुकरण करना अधिक घातक होता है। 130 करोड़ लोगों में आज भी 30 करोड़ लोग भी नही होंगे, जो प्राइवेट बैंकों की सुविधाएं ले पा रहे होंगे। आज भी भारत सरकारी बैंकों पर निर्भर है।
बैंकों या किसी भी अन्य संस्थान को सरकार में बैठे कुछ लोगों और उनके प्रायोजकों के हाथों बिक जाने से पहले आपको समझना होगा कि सरकारी और प्राइवेट संस्थान में फर्क क्या होता है। प्राइवेट संस्थान किसी व्यक्ति का प्राइवेट बिजनेस होता है, जिसका मुख्य उद्देश्य होता है मुनाफा कमाना, जबकि सरकारी संस्थानों का मुख्य लक्षण होता है जनता के प्रति जवाबदेही। इसीलिए जनता बड़े हक से कहती है कि यह हमारी संस्था है, हमारे पैसे से बनी है, आप हमारे लिए काम करते हैं, हमारे नौकर हैं इत्यादि इत्यादि। जो लोग सरकारी संस्थानों पर इतनी प्रबल दावेदारी जमाते हैं, आज उनकी जिम्मेदारी भी बहुत बढ़ चुकी है। अगर बैंक बिक गए, तो कर्मचारियों का क्या होगा, यह बहुत बड़ा मुद्दा नही है। असली मुद्दा यह है कि जो सुविधाएं गरीब जनता भी बड़े हक से, जरूरत के वक्त और निशुल्क मांगती है, वे समाप्त हो जाएंगी। उदाहरण के तौर पर अगर आपके बच्चे का एडमिशन करने से प्राइवेट स्कूल जैसे कि DPS या Bishop माना कर देता है, तो आप उनका कुछ नहीं कर सकते हैं, क्योंकि आपका किसी भी कानून के तहत उनपर कोई हक नही है। मगर सरकारी स्कूल आपके बच्चे के एडमिशन से मना नही कर सकते; ये उनकी जिम्मेदारी है और आपका हक। अब आप कहेंगे कि सरकारी स्कूलों की हालत जर्जर है और उनके पास कोई गुणवत्ता नही है। बात काफी हद तक सही है, मगर इसके कारणों को तलाशिये और उनको दुरुस्त करने का प्रयास कीजिये। आप खुद सोचिए कि आज कितने बच्चे अच्छे प्राइवेट स्कूलों में पढ़ते हैं। बड़े बड़े नौकरशाह से लेकर IAS, PCS और यहाँ तक कि बड़े बड़े वैज्ञानिक और डॉक्टर और वकील किसी न किसी रूप में इन्ही सरकारी प्राइमरी स्कूलों से लेकर सरकारी केंद्रीय विश्वविद्यालय से जुड़े रहे हैं।
और आपको यह किसने कहा दिया कि सरकारी संस्थान काम नही करते? देश की तीनों फौजें सरकारी हैं, जो देश की सुरक्षा बखूबी कर रही हैं।IIT और IIM सरकारी हैं, जो देश के सबसे बड़े इंजीनियर और मैनेजर पैदा कर रही हैं। मगर दुर्भाग्य यह है कि इन संस्थानों से पढ़ लिख लेने के बाद विद्यार्थी प्रोफेशनल जिंदगी में कदम रखते ही अपना पाला बदल लेता है और कॉरपोरेट घरानों के लिए काम करना शुरू कर देता है।
जिस कल्याणकारी राज्य की कल्पना एक प्रजातांत्रिक व्यवस्था में की जाती है, उन मूल्यों को लागू करने का माध्यम होती हैं सरकारी संस्थाएं। जब सरकार ने नोटबन्दी की, जन धन खाते खोले, इन सबका लोड किस प्राइवेट बैंक ने उठाया? है कोई जवाब आपके पास? इलेक्टोरल बांड के रूप में कॉरपोरेट से बड़े बड़े चंदे लेकर जब नेता लोग चुनाव से पहले जनता को लुभाने के लिए आर्थिक घोषणाएं करते हैं तो उनका क्रियान्वयन कौन करता है? सरकारी बैंक या प्राइवेट बैंक? जरा गौर से सोचिएगा। अगर सरकारी बैंकों का NPA बढ़ रहा है, Recovery mechanism में खामियाँ हैं, तो उन्हें क्यों नहीं सुधारा जा सकता है? सबसे बड़े घोटाले करने वालों को देश से बाहर निकाल दिया जाता है। उनकी फाइलें बिल्कुल सही समय Income Tax department में जला दी जाती हैं। यहाँ तक कि Attorney General से कोर्ट में बुलवा दिया जाता है कि जहाज खरीद की फाइलें रक्षा मंत्रालय में गायब हो गईं। आखिर यह सब किसके इशारे पर हो रहा है?
पुरानी स्मृतियों को ताजा करते हुए जरा याद कीजिये आपने अपना पहला खाता किस बैंक में खोला था? सरकारी या प्राइवेट? यह भी याद कीजिये कि आपने पढ़ाई किस स्कूल से शुरू की थी? गांव के सरकारी प्राइमरी स्कूल से या DPS से? हो सकता है कि आज आप जरा ऊपर उठ गए हों और आपको सरकारी बैंकों की बिल्कुल जरूरत न हो। शायद आपके पैसा इतना पैसा हो कि आपके बच्चे अच्छे प्राइवेट स्कूल में पढ़ सकें। मगर आपके पीछे एक बहुत बड़ा हुजूम है, जो आज भी उन जरूरतों के लिए तरस रहा है, जो आपको एक पीढ़ी पहले मिल चुकी हैं। और ऐसे लोगों की संख्या आज भी कुछ अमीरों के हजारों गुना बड़ी है। वे भी इसी भारतीय गणतंत्र के नागरिक हैं, जिन्हें संविधान सारे अधिकार मुहैया कराने का वादा करता है। जिस भारत में आप पैदा हुए और काम कर रहे हैं पहले उस भारत की आत्मा को समझिए। यह भारत उन चंद अमीरों से नही बनता, जो घोटाले करके दूसरे देशों में अय्याशी करने चले जाते हैं। यह भारत बनता है उन कर्मठ लोगों से जो तमाम परेशानियों के बावजूद इस मिट्टी में पैदा होकर इसी मिट्टी में दफन हो जाता है।
सरकार में बैठे कुनीतियों के निर्माताओं से मैं पूछना चाहता हूँ कि अगर आपको अपने प्रायोजकों की इतनी ही चिंता है, तो उनके लिए नई business friendly नीतियां क्यों नही बना देते? जिस क्षेत्र में उन्हें व्यापार करना है, करें, अपना निवेश करें और मुनाफा कमाएं। यह हक किसने दिया आपको कि जनता की सेवा में समर्पित दशकों से स्थापित संस्थानों को बेच दें। अगर आपको नहीं पता कि उन्हें कैसे दुरुस्त किया जाता है कभी उन लोगों के साथ भी एक मीटिंग कर लें, जो ये काम सफलतापूर्वक कर रहे हैं। मगर आपका ध्यान तो कही और है। अपने घोड़ों को बेलगाम छोड़ रखा है, जो जब चाहे जिसे चाहे फंसा सकते हैं। आप तो उन पत्रकारों की नौकरी खा जाते हैं जो बिकाऊ मीडिया के दौर में आपके झूठ की पोल खोलने का साहस करते हैं।
आपने तो आज ऐसा संस्कृतिकरण पैदा कर दिया है कि लोग सवाल सरकार से नहीं बल्कि विपक्ष से पूछने लगे हैं। सवाल पूछने वालों को गद्दार घोषित करने लगे हैं। मीठी मीठी बातों की जगह कड़वी दवाई ने ले ली है। पकौड़े को आप राष्ट्रीय खाद्य बनाने पर आमादा हैं और पकौड़े बेचने के अलावा आपके दिमाग में बेरोजगारी कम करने की और कोई युक्ति ही नही आती। इस नए संस्कृतिकरण को भक्तिकाल का पुनर्जागरण कहना अनुचित नही होगा, क्योंकि इससे ग्रसित लोगों की आधी ऊर्जा बस माला जपने में ही खप जाती है। कोई भी बीमारी हो, कितना भी दर्द हो, किसी चमत्कार के सहारे सब झेल लेते हैं।
विपक्ष से जवाब मांगने वालों से मैं कहना चाहता हूँ कि विपक्ष नकारा ही नही बिल्कुल गायब है। अगर विपक्ष में इतनी ताकत होती, तो वह क्या अपनी चुनी हुई सरकारें कर्नाटक और मध्यप्रदेश में गिरने देता? क्या इस तानाशाही सरकार को रात के बारह बजे जजों के तबादले करने देता? सारे कानून तोड़कर भ्रस्ट और रिटायर होने वाले पुलिस अफसर को किसी राज्य के पुलिस का हेड बनाने देता? सच तो यह है कि वर्तमान सरकार ने लोगों को भोलेपन का ऐसा पाठ पढ़ाया है लोग एक कदम आगे जाकर बिल्कुल नादान बन चुके हैं।
उठिए, जागिये और कमजोर विपक्ष का रोना मत रोइए। किसी देश का सबसे मजबूत और शास्वत विपक्ष होती है जनता। अब आपकी जिम्मेदारी है, क्योंकि जल्दी ही आपकी भी बारी है।
28/08/2017
INDIAN INSTITUTE OF FOREIGN TRADE
Application form for Full Time MBA(IB) 2018-20:
Last date to apply online: Friday, 15th September 2017
Written Examination: Sunday, 3rd December 2017
ADMISSIONS 2018:: MBA(IB) 2018-20 at New Delhi, Kolkata & Kakinada
04/08/2017
XAVIER APTITUDE TEST..........(XAT 2017)
17/08/2016: Application Date Starts (Cost of the Form: INR 1600 ,
INR 300 per XLRI course)
30/11/2016: Last date without late fee (Cost of the Form: INR 1600,
INR 300 per XLRI course)
11/12/2016: Last date with late fee (Cost of the Form: INR 2000, INR
500 per XLRI course)
Welcome | XAT 2017 XAVIER APTITUDE TEST Welcome to XAT 2017 17/08/2016: Application Date Starts (Cost of the Form: INR 1600 , INR 300 per XLRI course) 30/11/2016: Last date without late fee (Cost of the Form: INR 1600, INR 300 per XLRI course) 11/12/2016: Last date with late fee (Cost of the Form: INR 2000, INR 500...
Common Admission Test 2017 (CAT 2017)
CAT Registration Starts 9th 2017 (Wednesday)
CAT Registration Close 20th September 2017 (Wednesday) 5:00 PM
CAT Admit card Release 18th October 2017 (Wednesday)
CAT Exam Date 26th November 2017 (Sunday)
https://iimcat.ac.in/per/g01/pub/756/ASM/WebPortal/1/PDF/CAT_2017_Advertisement.pdf
JoSAA 2017 : Seat vacancy after round 6 seat allotment
http://josaa.nic.in/WebInfoCMS/Handler/FileHandler.ashx?i=File&ii=103&iii=Y
17/07/2017
CAT 2017 will be conducted by IIM Lucknow with TCS as the testing agency. Not many details have been divulged about the CAT exam to be conducted this year. Here's what we know through grapevine about CAT 2017 exam so far:
1. CAT 2017 will follow a similar exam pattern as CAT 2016.
2. The official notification for CAT will tentatively be out on July 30, 2017.
3. The online application window will open on August 7, 2017. Candidates would have almost 45 days' time to register for CAT exam.
4. This year too there will be a sectional time limit and students would not have the liberty to navigate between different sections.
5. No increase in application fee is expected this year which means the application fee will remain Rs. 1700.
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