21/10/2023
जय माँ भारती
B.G.S.SANSTHAN DANTOUR
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21/10/2023
जय माँ भारती
03/10/2023
BGS स्कूल दंतौर
जय जय राजस्थान
🌷ए. पी जे अब्दुल कलाम
🌱जन्म : 15 अक्टूबर 1931, रामेश्वरम TN
🔆मृत्यु : 27 जुलाई 2015, शिलांग मेघालय
🔅पूरा नाम : अवुल पकिर जैनुलाबदीन अब्दुल कलाम
♨️वह एक भारतीय एयरोस्पेस वैज्ञानिक और राजनीतिज्ञ थे
🛑2002 से 2007 तक भारत के 11वें राष्ट्रपति
🔻राष्ट्रपति चुने जाने से पहले उन्होंने प्रधान मंत्री के मुख्य वैज्ञानिक सलाहकार और डीआरडीओ के सचिव के रूप में भी कार्य किया
🔹भारत रत्न पुरस्कार : 1997
✍🏻"भारत के मिसाइल मैन" के रूप में जाना जाता है
🏆महत्वपूर्ण पुरस्कार
1997: भारत रत्न
1981: पद्म भूषण
1990: पद्म विभूषण
1997: राष्ट्रीय एकता के लिए इंदिरा गांधी पुरस्कार
🥇1998: वीर सावरकर पुरस्कार
2000: शास्त्र रामानुजन पुरस्कार - शनमुघा कला, विज्ञान, प्रौद्योगिकी और अनुसंधान अकादमी, भारत
2013: वॉन ब्रौन पुरस्कार
🔷एपीजे अब्दुल कलाम की पुस्तकें
विंग्स ऑफ फायर: ऑटोबायोग्राफी
भारत 2020
प्रज्वलित मन
लक्ष्य 3 अरब
टर्निंग पॉइंट
आप खिलने के लिए पैदा हुए हैं
मेरी यात्रा
🔹परिवर्तन के लिए घोषणापत्र
एडवांटेज इंडिया
शासन किया
🔸व्हीलर द्वीप का नाम बदलें डॉ. अब्दुल कलाम द्वीप
हमसे जुड़े👉🏻 🌷ए. पी जे अब्दुल कलाम
🌱जन्म : 15 अक्टूबर 1931, रामेश्वरम TN
🔆मृत्यु : 27 जुलाई 2015, शिलांग मेघालय
🔅पूरा नाम : अवुल पकिर जैनुलाबदीन अब्दुल कलाम
♨️वह एक भारतीय एयरोस्पेस वैज्ञानिक और राजनीतिज्ञ थे
🛑2002 से 2007 तक भारत के 11वें राष्ट्रपति
🔻राष्ट्रपति चुने जाने से पहले उन्होंने प्रधान मंत्री के मुख्य वैज्ञानिक सलाहकार और डीआरडीओ के सचिव के रूप में भी कार्य किया
🔹भारत रत्न पुरस्कार : 1997
✍🏻"भारत के मिसाइल मैन" के रूप में जाना जाता है
🏆महत्वपूर्ण पुरस्कार
1997: भारत रत्न
1981: पद्म भूषण
1990: पद्म विभूषण
1997: राष्ट्रीय एकता के लिए इंदिरा गांधी पुरस्कार
🥇1998: वीर सावरकर पुरस्कार
2000: शास्त्र रामानुजन पुरस्कार - शनमुघा कला, विज्ञान, प्रौद्योगिकी और अनुसंधान अकादमी, भारत
2013: वॉन ब्रौन पुरस्कार
🔷एपीजे अब्दुल कलाम की पुस्तकें
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भारत 2020
प्रज्वलित मन
लक्ष्य 3 अरब
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आप खिलने के लिए पैदा हुए हैं
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17/09/2022
Class 12 हिंदी साहित्य अंतरा का प्रथम पाठ
(क) देवसेना का गीत (ख) कार्नेलिया का गीत Summary in Hindi
कवि परिचय : जन्म सन् 1889 ई.। स्थान-काशी। सुँघनी साहू नाम से प्रसिद्ध परिवार में जन्म। 12 वर्ष की अवस्था में माता तथा 15 वर्ष के होने पर पिता का देहावसान। परिवार का दायित्व उठाया, साहित्य सेवा की, क्षय रोग से ग्रस्त होकर सन् 1934 ई. में देहावसान हुआ।
साहित्यिक परिचय – भाव पक्ष-प्रसाद जी जन्मजात प्रतिभाशाली साहित्यकार थे। आप मूलतः कवि थे। आप आधुनिक कविता की छायावादी प्रवृत्ति से सम्बन्धित थे। आपकी रचनाओं में राष्ट्रवाद का स्वर प्रमुख है। आप करुणा, सौन्दर्य और प्रेम के चित्रकार थे। प्रकृति का मनोरम सजीव चित्रण भी आपकी विशेषता है। आपकी रचनाओं में भारतीय संस्कृति की मनोरम तथा गरिमामयी प्रतिष्ठा हुई है। प्रसाद जी मानवतावादी आशा और उत्साह की प्रेरणा देने वाले साहित्यकार हैं।
कला पक्ष – प्रसाद जी की भाषा परिष्कृत साहित्यिक हिन्दी है। वह प्रभावपूर्ण तथा संस्कृतनिष्ठ है। कहीं-कहीं वह क्लिष्ट भी हो गई है। वह ध्वन्यात्मक तथा लाक्षणिक है। उनकी शैली में प्रतीकात्मकता, ध्वन्यात्मकता और चित्रात्मकता है। आप ओज और माधुर्य गुणों के कवि हैं। परंपरागत अलंकारों के साथ ही आपने मानवीकरण, विशेषण-विपर्यय आदि नवीन. अलंकारों का भी प्रयोग किया है। आपने गीतों के अतिरिक्त विविध छन्दों में काव्य-रचना की है।
कृतियों – प्रसाद कवि, नाटककार, उपन्यासकार, कहानीकार तथा निबन्धकार हैं। आपकी प्रसिद्ध रचनाएँ हैं
काव्य-कृतियाँ – आँसू, झरना, लहर तथा कामायनी (महाकाव्य)।
नाट्य-कृतियाँ – अजातशत्रु, चन्द्रगुप्त, स्कंदगुप्त, राजश्री, जनमेजय का नागयज्ञ, विशाख, ध्रुवस्वामिनी।
उपन्यास – कंकाल, तितली, इरावती (अपूर्ण)।
कहानी – संग्रह आँधी, इंद्रजाल, छाया. प्रतिध्वनि, आकाशदीप।
निबन्ध – संग्रहकाव्य और कला तथा अन्य निबन्ध।
सप्रसंग व्याख्याएँ :
देवसेना का गीत
आह! वेदना मिली विदाई !
मैंने भ्रम-वश जीवन संचित,
मधुकरियों की भीख लुटाई।
शब्दार्थ :
भ्रमवश = भ्रम के कारण।
संचित = एकत्रित।
मधुकरियों = भिक्षा।
सन्दर्भ – प्रस्तुत पंक्तियाँ छायावादी कवि जयशंकर प्रसाद के प्रसिद्ध ऐतिहासिक नाटक ‘स्कन्दगुप्त’ से उद्धृत हैं और हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘अन्तरा भाग-2’ में ‘देवसेना का गीत’ शीर्षक से संकलित अंश से ली गई हैं।
प्रसंग – मालव नरेश बन्धुवर्मा की बहिन देवसेना स्कन्दगुप्त से प्रेम करती है। स्कन्दगुप्त मालव के नगरसेठ की पुत्री विजया से प्रेम करता है। जीवन के उत्तरार्द्ध में स्कन्दगुप्त के विवाह प्रस्ताव को वह अस्वीकार कर देती है तथा आजीवन
अविवाहित रहने का व्रत ले लेती है।
व्याख्या – अपने असफल प्रेम की पीड़ा व्यक्त करती हुई देवसेना कहती है कि जीवन के इस संध्याकाल में जब मेरी आशा, आकांक्षाएँ और भावी सुख की कल्पनाएँ समाप्त हो गई हैं, तब मैं वेदना भरे हृदय से इनसे विदाई लेती हूँ। मैंने स्कन्दगुप्त को अपना समझ कर उससे प्रेम किया किन्तु जैसे कोई प्राप्त भिक्षा को लुटा देता है मैंने भी नादानी में भ्रमवश अभिलाषा रूपी भिक्षा को लुटा दिया। आकांक्षा जो मेरे जीवन की संचित पूँजी थी, मैं उसे भी नहीं बचा सकी।
विशेष –
देवसेना की वेदना और निराशा की अभिव्यक्ति हुई है।
तत्सम शब्दावली का प्रयोग हुआ है।
भाषा में प्रसाद गुण है तथा लाक्षणिकता का समावेश है।
वियोग श्रृंगार रस है।
छलछल थे संध्या के श्रमकण,
आँसू-से गिरते थे प्रतिक्षण।
मेरी यात्रा पर लेती थी –
नीरवता अनंत अंगड़ाई
श्रमित स्वप्न की मधमाया में,
गहन-विपिन की तरु-छाया में,
पथिक उनींदी श्रुति में किसने
यह विहाग की तान उठाई।
सन्दर्भ – प्रस्तुत पंक्तियाँ छायावादी कवि जयशंकर प्रसाद के प्रसिद्ध ऐतिहासिक नाटक ‘स्कन्दगुप्त’ से उद्धृत हैं और हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘अन्तरा भाग-2’ में ‘देवसेना का गीत’ शीर्षक से संकलित अंश से ली गई हैं।
प्रसंग – मालव नरेश बन्धुवर्मा की बहिन देवसेना स्कन्दगुप्त से प्रेम करती है। स्कन्दगुप्त मालव के नगरसेठ की पुत्री विजया से प्रेम करता है। जीवन के उत्तरार्द्ध में स्कन्दगुप्त के विवाह प्रस्ताव को वह. अस्वीकार कर देती है तथा आजीवन अविवाहित रहने का व्रत ले लेती है।
व्याख्या – देवसेना निराश है, उसकी आँखों से प्रतिक्षण आँसू गिर रहे हैं। वह कहती है कि ये आँसू पसीने की बूंदों की तरह गिर रहे हैं। मेरे जीवन की इस यात्रा में नीरवता प्रतिक्षण अँगड़ाई ले रही है। देवसेना जीवन भर दुःख के बादलों से घिरी . रही है। स्कन्दगुप्त को पाने की उसकी अभिलाषा पूरी नहीं हुई। सारा जीवन संघर्ष करते हुए बीता, सुख प्राप्त नहीं हुआ।
देवसेना ने जीवनभर संघर्ष किया। स्कन्दगुप्त के प्रेम की सुखद आकांक्षाओं के सपनों को संजोया, किन्तु उसकी आकांक्षाएँ अतृप्त ही रहीं। जिस प्रकार कोई पथिक थक कर किसी वृक्ष की छाया में सुखद स्वप्नों को देखता हुआ विश्राम कर रहा हो और तब उसे कोई विहाग राग सुना दे, तो उसे वह अच्छा नहीं लगता। इसी प्रकार जीवन के उतार पर स्कन्दगुप्त का प्रणय निवेदन उसे विहाग के समान प्रतीत होता है। स्कन्दगुप्त से प्रेम देवसेना के लिए एक सपना ही था। वह सपना टूट . चुका है। अब स्कन्दगुप्त का प्रणय निवेदन उसे अच्छा नहीं लग रहा।
विशेष :
देवसेना की मनोव्यथा का चित्रण है।
भाषा प्रसादगुण तथा लाक्षणिकता से युक्त है।
रस-वियोग श्रृंगार है। स्थायी भाव-रति है।
आँसू-से गिरते’ में उपमा अलंकार ‘लेती थी’ नीरवता अँगड़ाई में’ मानवीकरण तथा ‘श्रमित स्वप्न’ में अनुप्रास अलंकार है।
लगी सतृष्ण दीठ थी सबकी,
रही बचाए फिरती कबकी।
मेरी आशा आह! बावली,
तूने खो दी सकल कमाई।
शब्दार्थ :
सतृष्ण = तृष्णा के साथ।
दीठ = दृष्टि।
सकल = सारी।
सन्दर्भ – प्रस्तुत पंक्तियाँ छायावादी कवि जयशंकर प्रसाद द्वारा रचित ‘स्कन्दगुप्त’ नाटक से उद्धृत तथा ‘अन्तरा भाग-2’ में ‘देवसेना का गीत’ शीर्षक से संकलित अंश से ली गई हैं।
प्रसंग – देवसेना स्कन्दगुप्त से प्रेम करती है किन्तु उसे स्कन्दगुप्त से निराशा ही मिलती है। जीवन के उतार पर स्कन्दगुप्त उससे प्रणय निवेदन करता है जिसे देवसेना अस्वीकार कर देती है। प्रस्तुत गीतांश में प्रसाद जी ने देवसेना के असफल प्रेम से सम्बन्धित मनोभावों का चित्रण किया है।
व्याख्या – देवसेना मानव मनोवृत्ति का वर्णन करते हुए कहती है कि जब मैं यौवन से परिपूर्ण थी तब सबकी तृष्णा . भरी प्यासी दृष्टि मुझ पर पड़ती थी। मैं लोगों की वासना भरी कुदृष्टि से अपने आप को बचाने का प्रयत्न करती थी, लेकिन मैं उसे बचा नहीं सकी। मैं जीवनभर संचित अपनी अभिलाषा रूपी पूँजी की रक्षा नहीं कर सकी और अपनी बावली आशा के कारण उसे, गँवा बैठी। भाव यह है कि देवसेना स्कन्दगुप्त से जीवनभर प्रेम करती रही, किन्तु उसे स्कन्दगुप्त का प्रेम प्राप्त नहीं हुआ।
विशेष :
भाषा में तत्सम शब्दावली का प्रयोग तथा लाक्षणिकता है।
इन पंक्तियों में संगीतात्मकता है।
देवसेना की वेदना का वर्णन है।
देवसेना की आशाओं और कल्पनाओं को बावली बताया गया है।
इस प्रकार यहाँ मानवीकरण की प्रवृत्ति है।
चढ़कर मेरे जीवन-रथ पर
प्रलय चल रहा अपने पथ पर।
मैंने निज दुर्बल पद-बल पर,
उससे हारी-होड़ लगाई।
लौटा लो यह अपनी थाती
मेरी करुणा हा-हा खाती।
विश्व! न सँभलेगी यह मुझसे
इससे मन की लाज गंवाई।
शब्दार्थ :
जीवन-रथ = जीवन रूपी रथ।
प्रलय = विनाश, तूफान।
दुर्बल = कमजोर।
पद-बल = पैरों की ताकत।
थाती = विरासत में प्राप्त सम्पत्ति, उत्तराधिकार।
सन्दर्भ – प्रस्तुत पंक्तियाँ ‘देवसेना का गीत’ शीर्षक कविता से ली गई हैं जो जयशंकर प्रसाद द्वारा रचित नाटक ‘स्कन्दगुप्त’ से उद्धृत हैं। इस गीत को हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘अन्तरा भाग-2’ में संकलित किया गया है।
प्रसंग – देवसेना निराश है। प्रेम के.क्षेत्र में हारी हुई प्रेमिका है। अपनी जीवनभर की पूँजी को गँवाने के पश्चात् वह पश्चात्ताप करती है। अतृप्त प्रेम के कारण उसे अपना जीवन सूना प्रतीत होता है। वह इन्हीं भावों को इस अंश में व्यक्त करती है।
व्याख्या – देवसेना जीवन-पर्यन्त संघर्ष करने के कारण निराश हो गई है। इसलिए वह कहती है कि मेरे जीवन में प्रलय का साम्राज्य हो गया है अर्थात् मेरा जीवन तूफानों से घिरने के कारण हताश हो गया है। मेरे जीवन की सुन्दर आकांक्षाएँ समाप्त हो गई हैं। मैं अपने दुर्बल पैरों पर खड़ी होकर प्रलय (जीवन की झंझा) से व्यर्थ ही होड़ कर रही हूँ क्योंकि उसमें मेरी हार होना ही सुनिश्चित है। अन्त में निराश होकर वह विश्व से कहती है कि इस धरोहर (प्रेम) को लौटा लो। मुझमें इस थाती को संभाल कर रखने की ताकत नहीं है। स्कन्दगुप्त के प्रेम में डूबकर मैंने अपनी लाज भी गँवा दी है। अब मुझसे यह वेदना सहन नहीं होती।
विशेष :
देवसेना की वेदना का मार्मिक वर्णन है।
प्रेमिका के दुर्बल मन का.सजीव वर्णन है।
तत्सम शब्दावली युक्त साहित्यिक, प्रवाहमय और परिष्कृत खड़ी बोली का प्रयोग हुआ है। लाक्षणिक पदावली.का समावेश है।
वयोग श्रृंगार रस है।
‘जीवन-रथ’ में रूपक, “पथ पर’, ‘हारी-होड़’, ‘लौटा लो’ में अनुप्रास अलंकार है। प्रलय का मानवीकरण किया गया है। ‘विश्व! न ……… गवाई’ में विशेषण-विपर्यय अलंकार है।
कालिया का गीत :
अरुण यह मधुमय देश हमारा!
जहाँ पहुँच अनजान क्षितिज को मिलता एक सहारा।
सरस तामरस गर्भ विभा पर-नाच रही तरुशिखा मनोहर।
छिटका जीवन हरियाली पर-मंगल कुंकुम सारा!
लघु सुरधनु से पंख पसारे-शीतल मलय समीर सहारे।
उड़ते खग जिस ओर मुँह किए-समझ नीड़ निज प्यारा।
बरसाती आँखों के बादल-बनते जहाँ भरे करुणा जल।
लहरें टकराती अनंत की-पाकर जहाँ किनारा।
हेम कुंभ ले उषा सवेरे-भरती दुलकाती सुख मेरे।
मदिर ऊंघते रहते जब-जगकर रजनी भर तारा।
शब्दार्थ :
अरुण = प्रातःकालीन लालिमा युक्त।
मधुमय = मधुरता से युक्त, मिठास से भरा हुआ।
क्षितिज = जहाँ धरती और आकाश एक साथ मिलते हुए दिखाई देते हैं।
विभा = कान्ति।
तामरस = कमल।
मंगल = शुभ, कल्याणकारी।
कुंकुम = अबीर।
सुरधनु = इन्द्रधनुष।
नीड़ = घोंसला।
मलय समीर = चन्दन की सुगंध लिए हुए हवा।
हेम कुंभ = स्वर्ण कलश।
मदिर = नशे में, मस्ती में।
रजनी = रात्रि।
सन्दर्भ – प्रस्तुत गीत छायावादी कवि जयशंकर प्रसाद की कालजयी नाट्य-कृति ‘चन्द्रगुप्त’ से लेकर हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘अन्तरा भाग-2’ में संकलित किया गया है।
प्रसंग – ‘चन्द्रगुप्त’ नाटक के दूसरे अंक में ग्रीक सेनापति सेल्यूकस की पुत्री कार्नेलिया सिन्धु नदी के किनारे ग्रीक-शिविर के पास वृक्ष के नीचे बैठकर यह गीत गाती है। इसमें भारतभूमि की महिमा, गौरव और प्राकृतिक सुषमा का मनोहारी चित्रण है। भारत से प्रभावित कार्नेलिया उसे अपना देश मानती है।
व्याख्या – प्रभातकालीन अरुणिमा से युक्त हमारा यह भारत देश मधुरिम और मनोहारी है। सूर्य की सुनहली. किरणों के कारण इसकी प्राकृतिक सुषमा बढ़ जाती है, मधुमय हो जाती है। विश्व के कोने-कोने से ज्ञान-पिपासु यहाँ आकर ज्ञान प्राप्त करते हैं। यह देश जिज्ञासुओं को सहारा देता है। उन्हें यहाँ अवलम्ब का सहज आभास होता है।
कार्नेलिया भारत के प्राकृतिक सौन्दर्य से प्रभावित होकर भावविभोर हो गीत के माध्यम से अपने भावों को व्यक्त करते हुए कहती है कि इस देश में प्रात:कालीन सूर्य वृक्षों की फुनगियों की हरियाली पर अपनी लालिमा बिखेरता है। वृक्षों की शाखाओं से छनकर जब सर्य की किरणें कमलों पर अपनी कान्ति बिखेरती हैं तो ऐसा प्रतीत होता है मानो वे पुष्पों पर नृत्य कर रही हों और जीवन की हरियाली पर मांगलिक कुंकुम बिखर गया हो।
केवल मनुष्य ही नहीं पक्षी भी इस देश से प्रेम करते हैं। इसलिए दूर-दूर के विभिन्न पक्षी अपने इन्द्रधनुषी पंखों को पसार कर सुगंधित वायु के सहारे इस देश की ओर ही आते हैं मानो यह देश ही उनका नीड़ (घोंसला) हो। भाव यह है कि विभिन्न देशों की सभ्यता-संस्कृति, भाषा, वेश-भूषा, आचार-विचार वाले व्यक्ति यहाँ आते हैं और आश्रय पाते हैं।
कार्नेलिया भारत के लोगों की विशेषता बताती हुई गीत के माध्यम से कहती है कि यहाँ के निवासी करुणा और सहानुभूति वाले हैं। वे अपने दुःख से ही दुखी नहीं होते अपितु जीव मात्र के दुःख से उनकी आँखें आर्द्र हो जाती हैं। उनकी आँखों से निकले करुणा के आँसू ही मानो वाष्प (भाप) बनकर बादल बन जाते हैं और फिर बरस जाते हैं। यह वह देश है जहाँ सागर से आने वाली लहरें किनारा पाकर शान्त हो जाती हैं अर्थात् दूर देशों से आने वाले व्याकुल प्राणी यहाँ शान्ति का अनुभव करते हैं। यह देश दुखियों को शान्ति प्रदान करने वाला है।
प्रसाद जी कार्नेलिया के माध्यम से प्रभातकालीन प्राकृतिक सुषमा का वर्णन करते हुए कहते हैं कि यहाँ की प्रात:कालीन प्रकृति अवर्णनीय है। जब रातभर चमकने वाले तारे मस्ती में ऊँघने लगते हैं तब उषा रूपी सुन्दरी अपने सूर्य रूपी सुनहरे घड़े को आकाशरूपी कुँए में डुबोकर जल लाती है और सुख बिखेरती जाती है। भाव यह है कि जब सूर्योदय होता है तो तारे छिपने लगते हैं और चारों ओर सुखद अनुभूति होने लगती है।
विशेष :
भारत की गौरव-गाथा एवं प्राकृतिक सौन्दर्य का वर्णन इस गीत में है।
भारत की संस्कृति की अतिथि-परायणता, करुणा और सहानुभूति आदि विशेषताओं का चित्रण हुआ है।
तत्सम एवं कोमलकान्त पदाक्ली युक्त लाक्षणिक भाषा का प्रयोग हुआ है।
मानवीकरण, रूपक, उपमा, अनुप्रास इत्यादि अलंकारों का प्रयोग हुआ है।
प्रस्तुत गीत छायावादी शैली की मनोहर रचना है।
13/09/2022
हिंदी वर्णमाला