15/05/2026
वैज्ञानिक पद्धति से भेड़ एवं बकरी पालन के माध्यम से उद्यमिता विकास प्रशिक्षण
Swami Keshwanand Rajasthan Agricultural University, Bikaner
15/05/2026
वैज्ञानिक पद्धति से भेड़ एवं बकरी पालन के माध्यम से उद्यमिता विकास प्रशिक्षण
*वैज्ञानिक पद्धति से भेड़ बकरी पालन से उद्यमिता विकास पर प्रशिक्षण*
बीकानेर। स्वामी केशवानंद राजस्थान कृषि विश्वविद्यालय में बुधवार से “वैज्ञानिक भेड़ एवं बकरी पालन के माध्यम से उद्यमिता विकास” विषय पर सात दिवसीय प्रशिक्षण दिया जा रहा है । कॉलेज ऑफ एग्रीकल्चर, बीकानेर के पशुधन उत्पादन एवं प्रबंधन विभाग द्वारा आयोजित किए जा रहे इस सात दिवसीय प्रशिक्षण में राजस्थान सहित 10 राज्यों के 100 प्रगतिशील किसान भाग ले रहे हैं l उद्घाटन समारोह में रजिस्ट्रार डॉ. देवराम सैनी ने भारतीय परिप्रेक्ष्य में किसान, खेती एवं कृषि के महत्व पर प्रकाश डाला। उन्होंने वैज्ञानिक प्रशिक्षण कार्यक्रमों की आवश्यकता पर बल देते हुए वैज्ञानिक विधि के महत्व को भी रेखांकित किया। साथ ही उन्होंने बकरी के दूध की बढ़ती उपयोगिता पर चर्चा करते हुए बताया कि कुछ बीमारियों के दौरान इसकी मांग काफी अधिक रहती है। उन्होंने वैज्ञानिक तरीकों से पशुओं की उत्पादकता बढ़ाने की आवश्यकता पर भी जोर दिया।
डॉ. वीर सिंह ने बकरी के दूध के पोषणात्मक महत्व को रेखांकित किया। डॉ. एच.एल. देशवाल ने पशुधन उत्पादन एवं प्रबंधन विभाग की विभिन्न गतिविधियों की जानकारी दी।
कार्यक्रम के संयोजक व सहायक आचार्य डॉ. शंकर लाल ने बताया कि इस प्रशिक्षण कार्यक्रम राजस्थान सहित 10 राज्यों के कुल 100 किसानों ने भाग ले रहे हैं । पशुधन उत्पादन विभाग प्रभारी डॉ. कुलदिप प्रकाश शिंदे द्वारा धन्यवाद ज्ञापित किया गया।
15/05/2026
13/05/2026
केवीके लूणकरणसर में किसान जागरूकता कार्यक्रम आयोजित
लूणकरणसर। कृषि विज्ञान केन्द्र (केवीके), लूणकरणसर में मंगलवार को किसान जागरूकता कार्यक्रम का आयोजन किया गया। कार्यक्रम में निदेशक विस्तार, डॉ. दीपाली धवन ने कहा कि कृषि विज्ञान केन्द्र किसानों के सर्वांगीण विकास हेतु निरंतर प्रयासरत है। उन्होंने कहा कि आधुनिक कृषि तकनीकों को अपनाकर किसान अपनी आय को दोगुना कर सकते हैं। डॉ. धवन ने केवीके लूणकरणसर के माध्यम से किसानों को प्रदान की जा रही सेवाओं की सराहना की तथा किसानों से आह्वान किया कि वे वैज्ञानिक खेती को अपनाकर क्षेत्र की कृषि को नई दिशा दें। उन्होंने जल संरक्षण, जैविक खेती एवं फसल विविधीकरण पर विशेष बल दिया। कार्यक्रम के दौरान अनुसूचित जाति उप-योजना के अंतर्गत अनुसूचित जाति के किसानों को बैटरी चालित नैपसैक स्प्रेयर का वितरण किया गया। किसानों को यह उपकरण प्रदान किए गए। बैटरी चालित स्प्रेयर से किसानों को कीटनाशक एवं खाद के छिड़काव में अत्यधिक सुविधा होगी तथा श्रम एवं समय दोनों की बचत होगी । डॉ धवन ने बताया कि एससीएसपी परियोजना का उद्देश्य अनुसूचित जाति के किसानों को आधुनिक कृषि उपकरण उपलब्ध कराकर उनकी कृषि उत्पादकता एवं आर्थिक स्थिति में सुधार लाना है। डॉ. आर. के. शिवरान (वरिष्ठ वैज्ञानिक एवं अध्यक्ष) ने कहा कि वर्तमान श में कृषि क्षेत्र में नवीन तकनीकों का उपयोग अत्यंत आवश्यक है। उन्होंने कहा कि मृदा स्वास्थ्य कार्ड के अनुसार उर्वरकों का संतुलित उपयोग करने से न केवल उत्पादन में वृद्धि होती है बल्कि लागत में भी कमी आती है। डॉ. शिवरान ने एकीकृत कीट प्रबंधन एवं जैव उर्वरकों के उपयोग पर जोर देते हुए कहा कि रासायनिक खादों पर निर्भरता कम करके किसान अपनी आय बढ़ा सकते हैं और भूमि की उर्वरा शक्ति को भी दीर्घकाल तक बनाए रख सकते हैं। कार्यक्रम में क्षेत्र के प्रगतिशील किसान पेमाराम, ओंकारराम, बुधराम, रामलाल एवं मुकेश गर्वा एवं कृषि विज्ञान केन्द्र के स्टाफ संजय शर्मा, भवानी शंकर एवं पर्वत सिंह उपस्थित रहे। किसानों ने अपने अनुभव साझा करते हुए बताया कि केवीके द्वारा दी गई वैज्ञानिक सलाह एवं तकनीकी मार्गदर्शन से उनकी फसल उत्पादकता में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है। इन किसानों की सफलता की गाथा अन्य किसानों के लिए प्रेरणास्रोत बनेगी। कार्यक्रम में वैज्ञानिकों ने किसानों को खरीफ फसल प्रबंधन, मृदा स्वास्थ्य, कीट-व्याधि प्रबंधन तथा सरकारी योजनाओं के बारे में विस्तृत जानकारी प्रदान की। बड़ी संख्या में किसानों ने इस कार्यक्रम में भाग लेकर इसे सफल बनाया
*कल से शुरु होगा वैज्ञानिक भेड़ एवं बकरी पालन के माध्यम से उद्यमिता विकास का 7 दिवसीय प्रशिक्षण*
बीकानेर। स्वामी केशवानंद राजस्थान कृषि विश्वविद्यालय में “वैज्ञानिक भेड़ एवं बकरी पालन के माध्यम से उद्यमिता विकास” पर सात दिवसीय प्रशिक्षण कार्यक्रम 13 – 19 मई तक आयोजित होगा। कृषि महाविद्यालय के
पशुधन उत्पादन एवं प्रबंधन विभाग द्वारा आयोजित होने वाले इस प्रशिक्षण कार्यक्रम में राजस्थान के अलावा भी देश के अन्य राज्यों के प्रगतिशील किसान भाग लेकर प्रशिक्षण प्राप्त करेंगे। प्रशिक्षण प्रभारी डॉ. शंकर लाल ने बताया प्रशिक्षण में भाग लेने हेतु विश्विद्यालय द्वारा 1500 रुपए प्रशिक्षण शुल्क रखा गया है । यह प्रशिक्षण प्राप्त करने वाले किसान प्रशिक्षण के बाद राज्य अथवा केंद्र सरकार की विभिन्न योजनाओं का लाभ लेकर भेड़ बकरी पालन से संबंधित अपना उद्यम स्थापित कर सकते हैं । प्रशिक्षण कार्यक्रम में वैज्ञानिक भेड़ एवं बकरी पालन से संबंधित सभी जानकारियों के साथ साथ भेड़ बकरी पालन से संबंधित बैंक ऋण एवं सरकारी योजनाओं से संबंधित संपूर्ण जानकारी दी जाएगी।
12/05/2026
*खुदरा उर्वरक विक्रेताओं ने ली उर्वरक प्रबंधन की वैज्ञानिक जानकारी*
*मृदा स्वास्थ्य संरक्षण व उर्वरक उपयोग संतुलन में उर्वरक विक्रेता अहम कड़ी- डॉ दुबे*
*15 दिवसीय प्रशिक्षण सम्पन्न*
बीकानेर। एसकेआरएयू के कृषि विज्ञान केन्द्र में उर्वरक विक्रेताओं को 15 दिवसीय प्रशिक्षण देकर किसानों तक उर्वरकों के संतुलित पोषण प्रबंधन, मृदा स्वास्थ्य, बीज एवं कीटनाशी प्रबंधन की जानकारी पहुंचाने हेतु विभिन्न तकनीकी पक्षों से रुबरु करवाया गया। सोमवार को संपन्न हुए इस प्रशिक्षण के समापन समारोह में प्रतिभागियों को संबोधित करते हुए कुलगुरु डॉ. राजेन्द्र बाबू दुबे ने कहा कि फसलों में उर्वरकों का संतुलित एवं विवेकपूर्ण उपयोग वर्तमान की आवश्यकता है। उर्वरकों की बढ़ती खपत को देखते हुए किसान वैज्ञानिक आधार पर ही उर्वरकों का उपयोग करें, इसमें उर्वरक विक्रेताओं की महत्वपूर्ण भूमिका है। उन्होंने मृदा के उपजाऊपन को बनाए रखने के लिए जैविक खेती को बढ़ावा देने तथा मृदा स्वास्थ्य संरक्षण पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि किसान मृदा परीक्षण आधारित उर्वरक प्रबंधन अपनाएं तथा भूमि में ऑर्गेनिक कार्बन बढ़ाने के लिए जैविक पदार्थों का अधिक उपयोग करें। विक्रेता अपने यहां आने वाले किसानों को इस दिशा में प्रेरित करें।
प्रसार शिक्षा निदेशक डॉ. दीपाली धवन ने कहा कि प्रशिक्षण कार्यक्रम से कृषि आदान विक्रेताओं एवं किसानों को वैज्ञानिक जानकारी से रुबरु होने का अवसर मिला है ।प्रतिभागी यह तकनीकी जानकारी किसानों तक पहुंचाएं। प्रभारी वैज्ञानिक डॉ. मदन लाल रैगर ने प्रशिक्षण कार्यक्रम की रूपरेखा से अवगत करवाया। उन्होंने बताया कि प्रशिक्षण के दौरान उर्वरक अधिनियम, संतुलित पोषण प्रबंधन, जैविक एवं तरल उर्वरक, मृदा स्वास्थ्य, बीज एवं कीटनाशी प्रबंधन सहित विभिन्न विषयों पर विशेषज्ञ व्याख्यान आयोजित किए गए।
सहायक आचार्य
डॉ. सुशील कुमार ने कार्यक्रम का संचालन किया तथा प्रशिक्षण की गतिविधियों की जानकारी दी। कृषि महाविद्यालय बीकानेर के डॉ. सुशील खरिया ने मृदा स्वास्थ्य एवं उर्वरक प्रबंधन विषय पर तकनीकी जानकारी प्रदान की। प्रतिभागियों को प्रमाण-पत्र वितरित कर आभार व्यक्त किया गया।
12/05/2026
07/05/2026
*पश्चिमी राजस्थान में चारागाह विकास की अपार संभावनाएं, रणनीतिक रूप में मिलकर काम करें स्टेक होल्डर्स*
*चारा उत्पादन व प्रबंधन के लिए विषय विशेषज्ञों ने किया मंथन*
*संयुक्त राष्ट्र महासभा ने आधिकारिक तौर पर 2026 को रेंजलैंड और पशुपालकों का अंतर्राष्ट्रीय वर्ष किया है घोषित*
*केन्द्रीय विधि एवं न्याय मंत्री की प्ररेणा से चर्चा आयोजित*
बीकानेर। पशुधन के लिए पौष्टिक व पर्याप्त मात्रा में चारा उपलब्धता सुनिश्चित करने के लिए पारम्परिक तरीकों के साथ आधुनिक तकनीक का सामंजस्य करते हुए जनभागीदारी बढानी होगी। एसकेआरएयू वीसी सभागार में बुधवार को चारा प्रबंधन पर आयोजित चर्चा में यह विचार सामने आए। केन्द्रीय विधि एवं न्याय मंत्री श्री अर्जुन राम मेघवाल की प्रेरणा से आयोजित की गई इस चर्चा में राजुवास के कुलगुरु डॉ सुमंत व्यास, भारतीय चरागाह एवं चारा अनुसंधान संस्थान (आईजीएफआरआई), झांसी के निदेशक डॉ पंकज कौशल सहित आईसीएआर, काजरी तथा राज्य सरकार के विभिन्न विभागों के प्रतिनिधि शामिल हुए। अनुसंधान निदेशक एसकेआरएयू डॉ एन के शर्मा ने बताया कि संयुक्त राष्ट्र महासभा ने आधिकारिक तौर पर 2026 को रेंजलैंड और पशुपालकों का अंतर्राष्ट्रीय वर्ष घोषित किया है। पश्चिमी राजस्थान में वैस्टलैड की उपलब्धता को देखते हुए केन्द्रीय मंत्री अर्जुन राम मेघवाल ने पश्चिमी राजस्थान में चारागाह विकास व प्रबंधन को नयी दिशा देने हेतु आपसी समन्वय बढ़ाने के लिए आईजीएफआरआई काजरी व स्थानीय एजंसियों को सहयोग के लिए कहा, इसी के तहत यह चर्चा आयोजित की गई।
*तकनीक के साथ किसानों की सहभागिता आवश्यक*
राजु वास के कुलगुरु डॉ सुमंत व्यास ने कहा कि पश्चिमी राजस्थान का किसान आत्महत्या नहीं करता इसका बड़ा कारण यहां के किसानों का पशुपालन से जुड़ा होना है। छोटी होती जोत, घटते चारागाह , औद्योगीकरण जैसी परिस्थितियों के बीच पशुओं के लिए पौष्टिक चारे की उपलब्धता सुनिश्चित करना बड़ी चुनौती है। आईसीएआर के सभी संस्थानों को उन्नत किस्म की घासों के पर्याप्त बीज उपलब्ध करवाते हुए किसानों को चारे की पौष्टिक किस्में उगाने के लिए प्रेरित करना होगा।
डॉ व्यास ने कहा कि वर्षा आधारित ओरण व गोचर चारा उत्पादन का महत्वपूर्ण पारम्परिक तरीका रहा है। वर्तमान ड्रिप इरिगेशन, हाइड्रोपोनिक्स , साइलेज व अन्य तकनीक को किसानों तक पहुंचाने की आवश्यकता है। उन्होंने कहा कि जानवरों की चराई से इकोसिस्टम को संबल मिलता है। चारे की उपलब्धता सुनिश्चित करने के लिए विशेषज्ञों तथा स्टेक होल्डर्स को मिलकर काम करना होगा।।
भारतीय चरागाह एवं चारा अनुसंधान संस्थान (आईजीएफआरआई) के निदेशक डॉ पंकज कौशल ने उन्नत चारे की किस्मों, उगाने के मॉड्यूल तथा आधुनिक मशीनों के संबंध में विस्तृत प्रजेंटेशन दिया। उन्होंने कहा कि पश्चिमी राजस्थान में वैस्टलैड की व्यापक उपलब्धता है। चारा उगाने में इस भूमि का इस्तेमाल किया जाए। चारा नीति बना कर रणनीतिक रूप से कार्य करते हुए किसानों को समुचित प्रशिक्षण दें। देश में चारे की कमी को दूर करने के लिए सभी एजेंसियां अपनी क्षेत्रीय आवश्यकताओं को समझते हुए रोड मैप बनाकर काम करें ।
सीसीएफ बीकानेर हनुमानराम ने कहा कि कृषि व पशुपालन ग्रामीण अर्थव्यवस्था की रीढ़ है। ऐसे में घटते चारागाह चिंता का विषय है। सेवण तथा धामण पश्चिम राजस्थान की पौष्टिक घास हैं। इकोसिस्टम को बनाए रखने में भी इन घासों की महत्वपूर्ण भूमिका है।इन घासों के बीज उत्पादन बढ़ाने तथा संरक्षण के लिए आमजन को साथ लेकर काम किया जाए।
केन्द्रीय उष्ट्र अनुसंधान संस्थान के प्रतिनिधि वैज्ञानिक ने कहा कि खाद्य सुरक्षा के समान ही पशुओं के लिए फीड सिक्योरिटी महत्वपूर्ण है। पशु को हम नहीं बल्कि पशु हमें पाल रहा है, चारे की पौष्टिकता और उपलब्धता सुनिश्चित करने से खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित होने में मदद मिलेगी। अनुसंधान निदेशक डॉ एन के शर्मा ने स्वागत उद्बोधन में चारा उत्पादन, प्रबंधन के आयामों की जानकारी दी।
बैठक में जिला परिषद की मुख्य कार्यकारी अधिकारी शैलेजा पांडे, प्रसार शिक्षा निदेशक एसकेआरएयू डॉ दीपाली धवन, सेंटर फॉर पॉलिसी डिजाइन अत्री के निदेशक डॉ अबि तमीम, राजु वास के प्रसार शिक्षा निदेशक डॉ आरके धुडिया ,कृषि विभाग के जयदीप दोगने ने एनआरसीसी के आर के सावल, एन डी यादव, एफ ई एस से डिंपल, वाइल्डलाइफ कंजर्वेशन ट्रस्ट मुंबई से चेतन मिश्र, शुभम कलवाणी सहित आईसीएआर के विभिन्न संस्थानों, जिला परिषद, वनविभाग, कृषि , जलसंरक्षण व अन्य विभाग के प्रतिनिधियों ने अपने सुझाव रखे।
06/05/2026
*केवीके बीकानेर में उर्वरक विक्रेताओं के लिए 15 दिवसीय प्रशिक्षण कार्यक्रम प्रारम्भ*
*उर्वरक विक्रेताओं को दी जाएऐ आधुनिक कृषि तकनीकों की जानकारी*
बीकानेर, 5 मई। कृषि विज्ञान केंद्र, बीकानेर में उर्वरक विक्रेताओं हेतु 15 दिवसीय प्रशिक्षण कार्यक्रम मंगलवार से प्रारम्भ हुआ। उद्घाटन अवसर पर मुख्य अतिथि के रुप में कुल गुरु डॉ. आर.बी. दुबे ने संतुलित उर्वरक उपयोग की आवश्यकता पर जोर देते हुए कहा कि अंधाधुंध उर्वरक उपयोग से मृदा की उर्वरता पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है। उन्होंने मृदा परीक्षण आधारित उर्वरक उपयोग करने की सलाह दी। डॉ दुबे ने कहा कि उन्नत एवं क्षेत्र विशेष के अनुकूल बीज किस्मों का चयन उत्पादकता व गुणवत्ता में उल्लेखनीय वृद्धि लाने में सक्षम है। अच्छा बीज ही अच्छी फसल की नींव है। प्रसार शिक्षा निदेशक
डॉ. दीपाली धवन ने कृषि विस्तार तंत्र की भूमिका को रेखांकित करते हुए कहा कि उर्वरक विक्रेता किसानों और वैज्ञानिकों के बीच एक महत्वपूर्ण कड़ी के रूप में कार्य करते हैं। उर्वरक विक्रेताओं को वैज्ञानिक जानकारी होने से वे किसानों को सही समय पर , सही सलाह देकर उत्पादन बढ़ाने में योगदान दे सकते हैं। उन्होंने प्रशिक्षण कार्यक्रमों के माध्यम से अपडेट रहने तथा नई तकनीकों को अपनाने पर विशेष बल दिया।
कृषि विज्ञान केंद्र, बीकानेर-I के प्रधान वैज्ञानिक डॉ. मदन लाल रेगर ने कार्यक्रम की रूपरेखा प्रस्तुत की। उन्होंने बताया कि 15 दिवसीय प्रशिक्षण के दौरान प्रतिभागियों को मृदा परीक्षण की विधियाँ, उर्वरकों का संतुलित उपयोग, पोषक तत्व प्रबंधन, उर्वरकों का सुरक्षित भंडारण, गुणवत्ता नियंत्रण, कीट एवं रोग प्रबंधन तथा आधुनिक कृषि तकनीकों की जानकारी दी जाएगी। प्रशिक्षण में प्रायोगिक सत्र भी शामिल किए गए हैं, जिससे प्रतिभागी व्यावहारिक ज्ञान प्राप्त कर सकें। सहायक आचार्य डॉ. सुशील कुमार ने बागवानी फसलों में पोषक तत्व प्रबंधन पर विस्तृत जानकारी दी।
केंद्रीय शुष्क बागवानी संस्थान, बीकानेर के डॉ. एम.के. जाटव ने मृदा स्वास्थ्य प्रबंधन विषय पर जानकारी साझा की तथा सूक्ष्म पोषक तत्वों की कमी के प्रभावों तथा सुधार के उपायों पर चर्चा की।
भारतीय दलहन अनुसंधान संस्थान, बीकानेर के डॉ. बनवारी लाल ने दलहनी फसलों में उर्वरक प्रबंधन एवं जैव उर्वरकों के उपयोग पर प्रकाश डाला।
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