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04/08/2023

(क़ज़ाए उ़म्री नमाज़ का तरीक़ा)

🌹हज़रत अबू हुरैरा रज़ियल्लाहु तआ़ला अन्हु' ने फ़रमाया कि मैंने रसूलुल्लाह ﷺ से सुना है कि बेशक क़यामत के दिन बन्दे के आ’माल में से पहले उसकी नमाज़ का हिसाब किया जाएगा, पस अगर नमाज़ ठीक निकली तो ना कामियाब और बा मुराद होगा और अगर नमाज़ ख़राब निकली तो मुराद और टोटा उठाने वाला होगा।
📗मरने के बाद क्या होगा' पेज़ नं 210)

✍️जिस ने क़स्दन एक वक़्त की नमाज़ छोड़ी हज़ारों बरस जहन्नम में रहने का मुस्तह़िक़ हुवा, जब तक तौबा न करे और उस की क़ज़ा न कर ले।
📘फ़तावा रज़विय्या' जिल्द-9, सफ़ा 158 ता 159)

✍️र-मज़ानुल मुबारक के आख़िरी जुमुआ़ में बा’ज लोग बा जमाअ़त क़ज़ाए उ़म्री पढ़ते हैं और येह समझते हैं कि उ़म्र भर की क़ज़ाएं इसी एक नमाज़ से अदा हो गई येह बात़िल महज़ है।
📗बहारे शरीअत' जिल्द-1, सफ़ा 708)

✍️बहरहाल! जिस ने कभी नमाज़े ही न पढ़ी हों और अब तौफ़ीक हुई और क़ज़ाए उ़म्री पढ़ना चाहता है वोह जब से बालिग़ हुवा है उस वक़्त से नमाज़ों का हिसाब लगाए और तारीखें बुलूग़ भी नहीं मा’लूम तो एह़तियात़ इसी में है कि हिजरी सन् के हिसाब से औ़रत 9 साल की उ़म्र से और मर्द 12 साल की उ़म्र से नमाज़ों का हिसाब लगाए।

✍️क़ज़ाए उ़म्री में यूं भी कर सकते हैं कि पहले तमाम फ़ज्र की नमाज़े अदा कर लें फिर तमाम ज़ोहर की नमाज़े इसी तरह़ अ़सर, मग़रिब और इ़शा।
क़ज़ा हर रोज़ के बीस रकअ़तें होती हैं।
दो फ़र्ज़ फ़ज्र के, चार ज़ोहर, चार अ़सर, तीन मग़रिब, चार इ़शा के, और तीन वित्र।

✍️निय्यत इस तरह़ कीजिये, म-सलन: सब से पहली फ़ज्र जो मुझ से क़ज़ा हुई उस को अदा करता हूं।
हर नमाज़ में इसी तरह़ निय्यत कीजिये।

जिस पर ब कसरत क़ज़ा नमाज़ें हैं वोह आसानी के लिये अगर यूं भी अदा करे तो जाइज़ है कि हर रुकूअ़ और हर सज्दे में तीन तीन बार “सुब्हाना रब्बियल अज़ीम, सुब्हाना रब्बियल आ’ला” की जगह सिर्फ़ एक बार कहे।
मगर येह हमेशा और हर तरह़ की नमाज़ में याद रखना चाहिये कि जब रुकूअ़ में पूरा पहुंच जाए उस वक़्त सुब्हाना, का “सीन” शुरूअ़ करे और जब अज़ीम का “मीम” ख़त्म कर चुके उस वक़्त रुकूअ़ से सर उठाए, इसी तरह़ सज्दे में भी करे।
एक तख़्फ़ीफ़ (या’नी कमी) तो येह हुई और दूसरी येह कि फ़र्ज़ों की तीसरी और चौथी रकअ़त में अलहम्द शरीफ़ की जगह फ़क़त़ “सुब्हानल्लाहे” तीन बार कह कर रुकूअ़ कर ले।
मगर वित्र की तीनों रक्अ़तों में अल ह़म्द शरीफ़ और सूरत दोनों ज़रूर पढ़ी जाएं।
तीसरी तख़्फ़ीफ़ (या’नी कमी) येह कि क़ा’दए अख़ीरा में तशह्हुद या’नी अत्तह़िय्यात के बाद दोनों दुरूदों और दुआ़ की जगह सिर्फ़ *اَللّٰھُمً صَلّٰ َعلٰی مُحَمّدٍ وٌاٰلِهٖ* कह कर सलाम फेर दे।
चौथी तख़्फ़ीफ़ (या’नी कमी) येह कि वित्र की तीसरी रक्अ़त में दुआ़ए क़ुनूत की जगह “अ़ल्लाहु अक्बर” कह कर फ़क़त़ एक बार या तीन बार *رَبّ اغٌفِرلِیٌ* कहे।
📗मुलख़्ख़स अज़ फ़तावा रज़विय्या' मुख़र्रजा जिल्द-8, सफ़ा 157)

✍️याद रखिये! तख़्फ़ीफ़ (या’नी कमी) के इस तरीके की आ़दत हरगिज़ न बनाइये, मा’मूल की नमाज़ें सुन्नत के मुताबिक़ ही पढ़िये और इन में फ़राइज़ व वाजिबात के साथ साथ सुनन और मुस्तह़ब्बात व आदाब की भी रिआ़यत कीजिये।

✍️फ़तावा शामी में है: क़ज़ा नमाज़ें नवाफ़िल की अदाएगी से बेहतर और अहम है।
मगर सुन्नते मुअक्कदा, नमाज़े चाश्त सलातुत्तस्बीह़ और वोह नमाज़े जिन के बारे में अह़ादीसे मुबा-रका मरवी हैं (या’नी जैसे तह़िय्यतुल मस्जिद, अ़सर से पहले की 4 रकअ़त (सुन्नते ग़ैर मुअक्कदा) और मग़रिब के बाद 6 रक्अ़तें (पढ़ी जाएंगी)।
*📗رَدالمحتار، ج٢، ص٦٤٦)*

✍️याद रहे! क़ज़ा नमाज़ की बिना पर सुन्नते मुअक्कदा छोड़ना जाइज़ नहीं, अलबत्ता सुन्नते ग़ैर मुअक्कदा और ह़दीसों में वारिद शुदा मख़्सूस नवाफ़िल पढ़े तो सवाब का हक़दार है मगर इन्हें न पढ़ने पर कोई गुनाह नहीं, चाहे ज़िम्मे क़ज़ा नमाज़ हो या न हो।

✍️क़ज़ा नमाज़ें छुप कर पढ़िये लोगों पर (या घर वालों बल्कि क़रीबी दोस्त पर भी) इस का इज़्हार न कीजिये (म-सलन येह मत कहा कीजिये कि मेरी आज की फ़ज्र क़ज़ा हो गई या मैं क़ज़ाए उ़म्री पढ़ रहा हूं? वग़ैरा।
कि गुनाह का इज़्हार भी मकरूहे तह़रीमी व गुनाह है।
*📗رَدالمحتار، ج٢، ص٦٥٠)*

👉लिहाज़ा अगर लोगों की मौजू-दगी में वित्र क़ज़ा पढ़ें तो तक्बीरे कुनूत के लिये हाथ न उठाएं।

✍️जिस के ज़िम्मे क़ज़ा नमाज़ें हों उन का जल्द से जल्द पढ़ना वाजिब है मगर बाल बच्चों की परवरिश और अपनी ज़रूरिय्यात की फ़राहमी के सबब ताख़ीर जाइज़ है।
लिहाज़ा कारोबार भी करता रहे और फुरसत का जो वक़्त मिले उस में क़ज़ा पढ़ता रहे यहां तक कि पूरी हो जाएं
*📗رَدالمحتار، ج٢، ص٦٤٦)*

✍️क़ज़ा के लिये कोइ वक़्त मुअ़य्यन नहीं उ़म्र में जब भी पढ़ेगा बरिय्युज़्ज़िम्मा हो जाएगा।
मगर तुलूअ़् व ग़ुरूब और ज़वाल के वक़्त नमाज़ नहीं पढ़ सकता कि इन वक़्तों में नमाज़ जाइज़ नहीं।
📗फ़तावा आ़लमगीरी' जिल्द-1, सफ़ा 52)
📘बहारे शरीअत' जिल्द-1, सफ़ा 702)
📕नमाज़ के अह़काम' पेज़ नं 250 ता 254)

16/07/2023

_*दाढ़ी ना रखने का नुकसान*_
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_*✒ सरकार आला हज़रत इमाम अहमद रज़ा बरैलवी रदियल्लाहु अन्हू ने दाढ़ी के मसअले में जो आयात व अहादीस और नुसूसे अइम्मा पेश फरमाई उन में से जो वईदें, मज़म्मते और तहदीदें वारिद है उनका खुलासा यह है कि दाढ़ी मुंडाने वाले या कतरनें वालें अल्लाह व रसूलुल्लाह अलैहिस्सलाम के नाफरमान है,शैताने लईन के अहमक है, अल्लाह व उसके रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम उससे बेज़ार है, हुज़ूरे पाक अलैहिस्सलाम को ऐसी सुरत देखने से कराहत आती हैं कि ऐसी सुरत यहुदीयों और हिन्दुओं की सुरत है और नसरानी वज़ा है और फिरंगियों से मुशाबेह हैं, ऐसे लोग रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के गिरोह से नही बल्कि नसारा, यहूदी व मजूस ब हुनूद के गिरोह से है, वाजिबुत्ताज़ीर है शहर बदर करने के क़ाबिल है, फितरत और खल्क़ुल्लाह को बदलने वाले है, जनाने मुखन्नस है, खुदा के अहद शिकन है, ज़लील व ख्वार है, घिनौने क़ाबिले नफरत है, मरदूदुश्शहादह है।*_

_*दाढ़ी मुंडाने वाले या कतरनें वालें पुरे इस्लाम में दाखिल न हुयें, हलाकत में है, मुस्तहिक़े बरबादी है, दीन में बेबहरा, आखिरत में बेनसीब है, अज़ाबे इलाही के मुंतज़िर है, ऐसे लोग अल्लाह तआला के सक़्त दुश्मन मबगूज़ है, सुब्हों-शाम अल्लाह कह्हार के गज़ब में है, क़यामत के दिन उनकी सुरते बिगाडी जायेंगी, ऐसे लोग अल्लाह व उसके रसूल अलैहिस्सलाम के मल्ऊन है, दुनिया व आखिरत में मल्ऊन है, अल्लाह और उसके फरिश्ते व बशर सबकी उन पर लानत है, फरिश्तों ने उनके लानती होने पर आमीन कही, ऐसों पर अल्लाह तबारक व तआला नज़रे रहमत न फरमायेगा, वह बहिश्त में न जायेंगें, अल्लाह तआला उन्हें जहन्नम में डालेगा।*_
_*(वल अयाज़ु बिल्लाही तआला)*_

_*📕 फतावा रज़वीया, जिल्द-09, सफा-136, 137*_

_*अल्लाह पाक मुसलमानों को अपने चेहरों को सुन्नते रसूल (दाढ़ी रखने) से आरास्ता करके इश्क़े रसूल के दावे में खरे उतरने की तौफीक़ अता फरमाये (आमीन)*_
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14/07/2023

तीन औरतें तीन कहानियां एक सबक

शोशल मीडिया पर इंतेहाई खूबसूरत मुसलमान जोडे़ जोकि आपस में मुहब्बत और शराफत की बेहतरीन मिसालें और ऐन कामयाब शादी के उसूलों के मुताबिक़ जिंदगी बसर करने वाले कपल दरहकीकत दोहरे चेहरों के मालिक थे इनकी निजी जिंदगी कैमरे के पीछे इतनी ही भयानक और खोखली थी .. आईए जानते है इनकी जिंदगियों में हमारे लिए क्या सबक मौजूद है ..
सबसे ऊपर की तस्वीर में हिशाम और शमाएला :
हिशाम इस्लामाबाद ( पाक ) से तालुक रखते है इकलौता बेटा और इंतेहाई नफीस नेक और सुलझा इंसान है , वो काफी सालों से बलोगिंग कर रहे थे और फिर उनकी शादी होती है और बीबी शमाएला आती है जो कुछ अरसे के बाद हिशाम के साथ Vlog बनाने में शामिल हो जाती है और यही से मसला शुरु होता है , अल्लाह इनको बेटी अता करता है इसी दौरान शमाएला अपना एक कामयाब चैनल बनाकर ब्यूटी टिप्स देती है और फिर पहले हिजाब उतरता है फिर शौहर हिशाम भी दिल से उतर जाता है और तलाक पर बात खत्म हो जाती है आज हिशाम अपनी बेटी के लिए तडप रहा है जबकि शमाएला ने दूसरी शादी कर ली है

दूसरी तसवीर में हस्सनात और उममे मुहम्मद :
इन दोनों का तालुक बांग्लादेश से था जो कि इंगलैंड में रह रहे थे इनके भी लाखों फॉलोवर थे और बेहतरीन मियां बीबी की मुहब्बत वे शरारतें देखने को मिलती इन की आपस में मिसाली उलफत और हिजाब वे दाढी़ से चेहरे को सजाए हुए थे ये जादू वगेरह से बचने के लिए वीडियो वगेरह बनाया करते थे इसी दौरान इन्होंने रोहिंगया मजलूम मुसलमानो के लिए चंदा मांगा जिस में मुसलमानो ने खूब चंदा दिया और पूरे दो लाख इकठ्ठे हुए ये रोहिंगया मुसलमानो के पास भी गए .. फिर एक दिन दुनिया को पता चलता है कि बा हिजाब नेक लड़की उममे मुहम्मद हकीकत में एक बंगाली फैशन मोडल है और उसका असली नाम रुखसाना है , जबकि हससनात एक मुलहिदाना जहन का मालिक और लडकियों को फंसाकर धोखा देना इसकी फितरत है इसने एक छोटी उम्र की लड़की सिस्टर सारा को भी फंसाया था और जो रकम रोहिंगया मुसलमानो के लिए इकठ्ठी हुई थी उसे भी हडप कर गए थे इसपर इंगलैंड में एंक्वाएरी बैठाई गई मजीद मामलात खराब होने पर हस्सनात ने अपनी बीबी को गाली गलौच देना शुरु हो गया और आखिर में रूखसाना वे हस्सनात दोनो में तलाक हो गया और दो बच्चे रुखसाना के पास चले गए और उनके शोशल मीडिया अकाऊंट डिलीट कर दिए गए..

तीसरी तसवीर में आदम वे नसीम :
इनका तालुक फ्रांस से है शादी हुई दोनों की टिकटोक वीडियोज पर मिलीयन व्यूज है लोग इनकी जोडी को बहुत कद्र ओ मुहब्बत से देखते और दुआएं देते और फिर एक दिन बीबी नसीम ने अपनी शदीद जखम से नीली आंख और कटे बाल दिखाए जो कि शौहर आदम ने तशद्दुद किया था बाद में आदम को गिरफतार कर लिया गया और मुक़दमा चलाया गया ..

कितनी दुख भरी सच्ची कहानियां है जो हमारे लिए सबक है हम बजाहिर चमकतीं चींजे देखकर अफ़सोस और गम में मुबतिला हो जाते सोचते है ऐसी खुशी वाली जिंदगी हमें कयू मयस्सर नहीं और ऐसे ही अहसास कमतरी का शिकार बन जाते है सब्र और शुक्र ए खुदा भूल जाते है जबकि सचचाई में जिस चमक को हम देख रहे होते है वो एक धोखा होता है , हमारे लिए आइडियल हमारे लिए महवर कभी भी ऐसे किरदार नहीं बल्कि नबी पाक सलल. की जिंदगी है , सहाबाओं सालेहीन की जिंदगी होनी चाहिए ...

उर्दू से तर्जुमा
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12/07/2023

जो ये ख्याल करता हो कि अल्लाह अपने नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की मदद न फरमाएगा, दुनिया और आखिरत में, तो उसे चाहिए कि ऊपर को ऐक रस्सी ताने, फिर अपने आपको फांसी देलें, फिर देखें कि उसका ये दावं कुछ ले गया ❓उस बात को जिसकी उसे जलन हो |
(सूरह अल हज्ज आयत 15)

11/07/2023

बेशक क़ुरआन ओ हदीस के बाद किसी की भी बात हर्फे आखिर नहीं है ,, ये उसूल है ,,

मगर आज कल ये जुमला महज़ इमाम अहमद रज़ा अलैहिररहमा की तालीमत से इन्हेंराफ करने वाले या उनके फतावा ए कुफ्र में हीले बहाने तलाशने वालों ने काफी ज़ोर शोर से बोलना शुरू किया हुआ है ,, उनका मक़सद इस जुमले से क़ुरआन ओ हदीस की अज़मत साबित करना नहीं होता , बल्कि उनका मक़सद इस जुमले से इमाम ए अहले सुन्नत के हुससामुल हरमैन पर तनकीद करना होता है , ताकि उनको अहले सुन्नत के उसूल से आज़ादी हासिल हो सके वो खुद को सुन्नी भी कहलाते रहें , और गुस्ताखो से यारियां दोस्तीयान रिश्तेदारियां भी निभा सकें ,, कलमा गो का नाम लेकर 72 फिरको वाली हदीस का इनकार भी कर सकें , हर ऐतिक़ादी बिदअत को हल्का करके मुसलमान अवाम को उस बिदअत का आदि बना सकें , गुड़ गोबर एक करके बातिल आक़ायद ओ नजरियात को हक़ नजरियात में घालमेल करके सबको एक माला में पिरो सकें ,,

मगर हमारे भी चंद सवाल हैँ अगर जवाब मिल सकें तो ,,,

ये उसूल सिर्फ इमाम अहमद रज़ा के फतवो तक ही महदूद क्यूँ और उन्हीं पर आकर ये क्यूँ याद आता है ??
इमाम अहमद बिन हंबल अलैहिररहमा पर क्यूँ याद नहीं आता ?? उनके लिए क्यूँ नहीं कहा जाता की उन्होंने पूरी हुकूमते इस्लामिया खिलाफत ए इस्लामिया से बगावत क्यूँ की ?? क्यूँ उम्मत में फसाद फैलाया ( माज़ अल्लाह )
कलमा गो तो मोतजली भी थे ,,, अहले क़िब्ला भी थे , हाज़ी नमाजी भी थे , बस एक ( क़ुरआन मखलूक है ) का मसला खड़ा किया था उन्होने कौन सी बड़ी बात थी जाने दिया जाता , उम्मत को क्यूँ तोड़ा गया ?? क्यूँ इमाम साहब की बात आज तक हर्फे आखिर मानी जाती रही है ??
अगर इमाम साहब की बात हर्फे आखिर नहीं थी तो कहो की मोतजली भी सही थे ,,, उन पर ज़्यादती की गई , उम्मत को तोड़ने का इलज़ाम इमाम साहब पर भी लगाओ ,,, उस वक़्त भी तो हर जानिब से इस्लाम और मुसलमानो के खिलाफ यलगार थी ,, रोम अपनी साज़िशें कर रहा था ,,,, यहूदी उस वक़्त भी अपनी शरारतों में मग्न थे ,,,, ईसाई अपने जासूस मुसलमानो के दरमियाँ भेज रहे थे ,,,, इस्लाम और मुसलमान अपने दुश्मनों से सुकून में कब रहे हैँ जो आज ये दुहाई दी जाती है कि ये वक़्त अक़ीदे के बाब में इखतेलाफ का नहीं है ??
क्या इमाम साहब के वक़्त ऐसा था कि अक़ीदे के बाब में इखतेलाफ किया जाए ?? जो भी तारीख से आगाही रखते हैँ वो जानते होंगे कि उस वक़्त क्या हालात थे ,, फिर क्यूँ इमाम साहब ने ये क़दम उठाया ??
जिस तरह आज महज़ 100 सालों में ही इमाम अहमद रज़ा के फतवो में तरह तरह के हीले बहाने , ऐतराज़ , झूठ सच बोलकर तावीलें करने का दौर चल पढ़ा है इमाम अहमद बिन हंबल के तक़रीबन 1000 साल बाद उनके फतवे पर ये जसारत किसी ने क्यूँ न कि ?? मोतजलिओ के साथ ये न इंसाफी क्यूँ , वो भी तो अहले क़िब्ला थे ,, उनसे ऐसी कौन सी दुश्मनी है उन्होने ऐसा कौन सा तुम्हारा घर कबजाया हुआ है जो उनके साथ देओबंदी वहाबीओ कि तरह नर्म रवय्या इख़्तियार नहीं करते ?? और ऐसा नहीं है कि आज मोतजली नहीं हैँ , आज भी बहुत तादद में उस ख्याल के लोग हैँ ,,,, और ऐसा ही मामला इमाम मुजद्दिद अलफे सानी रहैमतुल्लाहि तआला अलैह के साथ भी करो ,,, क्या अकबर के दरबारी मौलवी कलमा नहीं पढ़ते थे ?? फिर उनके साथ सौतेला पन क्यूँ ?? और मुजद्दिद साहब का फतवा हर्फे आखिर क्यूँ ??

तारीख से ऐसी ला तादाद मिसाले लाकर पेश कर सकता हूँ , मगर इन मुनाफिको ,,, बदमज़हबो के द, lalo को बुग़ज़ है तो महज़ बरेली वाले से ,,,, इनको क़ोई उम्मत कि खैर खुवाही की फ़िक्र नहीं कोई उम्मत का इत्तेहाद का दर्द नहीं , इनके धोखे में मत आइये ,,, इनके घर चल रहे हैँ सय्यद sraawaa जैसी सुलह कुल्ली खानकाहो से ये इनका दर्द ए उम्मत नहीं बल्कि वहाँ के फेंके हुए टुकड़े हैँ जो इनको बोलने पर मजबूर करते हैँ ,,,, अगर ये पैसा ये सपोर्ट आज बंद हो जाए तो आज ही इनका इत्तेहाद ए उम्मत का दर्द काफूर हो जाएगा ,,,,,

फिलहाल हमारे इन सवालों के जवाब कोई ला दे तो मेहरबानी होगी कि हर्फे आखिर उन हस्तीओं के फतवे हैँ या नहीं , अगर नहीं तो अकबर को भी शामिल ए इस्लाम करो , मोतजलिओ को भी वही इज़्ज़तें दो ,,, इमाम साहब को कटघरे में खड़ा करो
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11/07/2023

*दहरियों के ऐतराज़ के जवाबात*

*आज का दौर साइंस का है बिना दलील के कोई बात कुबूल नहीं कि जा सकती लिहाज़ा ख़ुदा की कोई दलील कहाँ है?*

दीन व मज़हब के मानने वालों के पास तो खुदा को साबित करने की कई अक़्ली दलील मौजूद है। लेकिन मुंकिराने खुदा के पास खुदा को झुठलाने के लिए कोई दलील मौजूद नहीं। आईये वजूद ए खुदावंद करीम के दलाइल में से चंद पर नज़र डालें:-

*अक़्ली दलाईल:-* तमाम अक्लपरस्त और साइंस भी इस बात को कुबूल करते हैं कोई भी पेचीदा साख्त (काम्प्लेक्स स्ट्रक्चर) बिना किसी क्रिएटर के वजूद में नहीं आ सकती। मिसाल के लिए अगर कोई अक्लपरस्त घड़ी को देख कर यूं कहें कि लाखों सालों तक इस घड़ी के पुर्ज़े खुद ब खुद वजूद में आये और फिर आपस मे जुड़ गए और फिर वक़्त भी अपने आप ही बताने लगे, ऐसा कहने वाले को या तो दिमागी मरीज़ कहा जाएगा या बेवकूफ, और किसी सूरत में उसकी ये बात कबूल नहीं कि जाएगी। ज़रा सोचें वक़्त बताने वाली घड़ी का खुद ब खुद बनने को क़ुबूल नहीं किया जा सकता क्योंकि उसमें कई स्ट्रक्चर्स हैं जो एक दूसरे से जुड़े हुवे हैं यानी वो कॉम्प्लेक्स स्ट्रक्चर्स हैं, लेकिन उससे भी ज़्यादा काम्प्लेक्स वक़्त और खला(टाईम और स्पेस) को बिना किसी क्रिएटर खुद ब खुद बन जाने का मान लेना अगर बीमारी नहीं तो बेवकूफी से कम नहीं। यही नही बल्कि काएनात का हर निज़ाम अपने अंदर इतनी ज़्यादा पैचीदगी इख्तियार किये हुवे है, चाहे वो सूरज हो या ज़मीन चाहे सय्यारे हों या पेड़ पौधे चाहे इंसान हों या जानवर हर शै पैचिदा साख्त लिए हुवे हैं जिनका हर निज़ाम खुद में बड़ी ही कंप्लेक्ससिटी इख्तियार किये हुवे हैं, इतनी ज़्यादा पेचीदा निज़ाम के वजूद को बिना किसी क्रिएटर के खुद ब खुद वजूद में आने का तसव्वुर बेवकूफी से ज़्यादा कुछ नहीं।

*साईंस के ज़रिए वजूद ए ख़ुदा:-*
न्यूटन का पहला नियम (law of motion) है कि *कोई भी अश्या अपने ठहरे हुवे मरहले में या एक जैसी रफ्तार में तब तक रहती है जब तक उस पर बाहर से कोई ताकत न लगा दी जाये।* ज़रा इस कायदे पर गौर किया जाए कि अगर कोई शै ठहरे हुवे मरहले में या एक जैसी रफ्तार के मरहले में तब तक रहती है जब तक उस पर बाहर से कोई ताकत असर अंजाम न हो तो ज़रा तसव्वुर करें कि कैसे काएनात बिना किसी ताकत बिना किसी क्रिएटर के वजूद में आई और बिना किसी ताकत के शुरू हुई, चाहे वो सूरज का बढ़ते रहना हो या ज़मीन का हरकत करना, चाहे मौसमों का बदलना हो चाहे हवाओ का कम व ज़्यादा होना ये पूरा निज़ाम चीख चीख कर अपने चालाने वाले और इस काएनात को पैदा करने वाले कि गवाही देता है। ज़रा गौर करो अगर किसी बस को बिना ड्राइवर यूँ ही शुरू कर छोड़ दी जाए तो क्या वो सभी लोगों को सही सलामत उनके घर छोड़ देगी बिना किसी मदद के हरगिज़ नही बल्कि उसे एक ड्राइवर की ज़रूरत होगी जो उसे कंट्रोल करे, काएनात का पूरा निज़ाम भी उसी नियम पर काम कर रहा है और उसके पैदा करने वाला ही उसे चला रहा है।

*खुदा के वजूद की गवाही:-* किसी भी अदालत या मुकदमें में दलील की चंद सूरतें होती है जिसमें सबसे अहम दलील गवाही होती है। अगर खुदा के होने की मौजूदगी के लिए गवाही मौजूद हो तो उसके वजूद का इनकार का कोई बहाना बाकी नहीं रहता। और अल्लाह तआला ने *आखरी नबी सलल्लाहू तआला अलैहि व सल्लम* तक हर उम्मत की तरफ अपने नबियों के ज़रिए खुद की वहदानियत (एक होने की) गवाही दिलाई, और उस गवाही को साबित करने के लिए मोजिज़ात दिखाए। जिसकी गवाही आज तक मौजूद है। अल्लाह तआला ने अपने नबियों को किताबों के ज़रिए कई अहकाम बयान किये जिसमें उस दौर से कहीं आगे का न सिर्फ साइंस मौजूद था बल्कि फिलॉसफी पिछलों की खबरें और आने वाले वक़्तों में होने वाली चीज़ों का भी बयान मौजूद था। बाकी मज़ाहिब ने अपनी किताबों को महफूज़ नहीं कि जबकि *नबी अकरम सलल्लाहु तआला अलैहि व सल्लम को जो किताब अल्लाह तआला ने दी उसके मुहाफ़िज़त की ज़िम्मेदारी भी अल्लाह तआला ने खुद ली जिसका नतीजा ये रहा कि जो किताब हुज़ूर सलल्लाहु तआला अलैहि व सल्लम पर नाज़िल हुई वो आज तक वैसी ही मेहफ़ूज़ जिस तरह वो नाज़िल हुई थी यानी प्रिज़रव है।* सहाबा इकराम की जमाअत की वो फेहरिस्त वैसी ही मेहफ़ूज़ है जिस तरह से उसे बयान किया गया बल्कि क़ुरआन जिस वक़्त नाज़िल हुवा उसे मेहफ़ूज़ रखने के लिए उस दौर से आज तक हर दौर में जिसमे कोई वक़्त ऐसा न गुज़रा है जिसमें कोई हाफ़िज़ *(जिन्होंने पूरा क़ुरआन हिफ़्ज़ कर रखा हो)* मौजूद न हो, अपने से पहले वाले हुफ़्फ़ाज़ से इसे हिफ़्ज़ किया जिन्होंने पूरी तरह से न सिर्फ हिफ़्ज़ कराया बल्कि इसमें किसी तरह की कोई गलती कमी या ज़्यादती न हो इसकी भी हिफाज़त की। ये पूरी चैन हुज़ूर सलल्लाहू तआला अलैहि व सल्लम तक जाकर मिलती है। ये एक ऐसी गवाही है जो 1400 साल से अब तक लगातार जारी है। और खुदा के वजूद की सबसे बड़ी दलील है। अफसोस अदालतों में किसी एक शख्स के खड़े होकर गवाही देने पर बिना उसका केरेक्टर जाने उसकी गवाही को क़ुबूल कर लिया जाता है, वहीं इतनी अज़ीम गवाही जो 1400 साल आज तक जिसकी पूरी चैन मौजूद है उसे क़ुबूल नहीं किया जा रहा? ये तअस्सुब से ज़्यादा और कुछ नहीं।

*तारीखी नविशते (हिस्टोरिकल रिकॉर्ड):-* किसी के होने की गवाही के बाद उसके तारीखी नविशते उसके वजूद की सबसे बड़ी गवाही होती है। मुंकिराने खुदा के पास खुदा के वजूद के इनकार के लिए न तो कोई गवाही मौजूद है न ही कोई तारीखी नविशते। जबकि दीन व मज़हब के मानने वालों के पास न सिर्फ अम्बिया अलैहिमुस्सलाम की गवाही और अल्लाह तआला के भेजी हुई किताबें मौजूद है, बल्कि उन किताबों और उन नबियों के हवारी व सहाबा इकराम के ज़रिए इन गवाहियों को नविशतों की शक्ल में सम्भाला भी गया है। इनमें सबसे ज़्यादा मोतबर तारीखी रिकॉर्ड्स इस्लाम के ही हैं। दुनिया मे किसी भी हिस्ट्री की किताब को आप देखेंगे तो उसमें बताने वाले कि गवाही क़ुबूल करने का कोई कानून मौजूद नहीं है बल्कि सुनी सुनाई बात को भी हिस्ट्री बता कर लोगो को सिखाया जाता है। जबकि इस्लाम मे हिस्ट्री के किसी भी हिस्से को तब तक मान्यता नहीं मिलती जब तक उसे बयान करने वाले का रिकॉर्ड मौजूद न हो। इस्लाम मे हर वो बात जो हुज़ूर अलैहिस्सलाम तक पहुंचती है उसके बताने वालों की हर दौर की गवाही मौजूद है। जिसमे eye witness और फिर उन eye witness से जिसने सुना उनकी गवाही उनसे जिसने सुना उनकी गवाही उनका हुलिया हर बात मेहफ़ूज़ करली गई जो इसे सबसे ज़्यादा मुस्तनद (ओथेन्टिक) बनाती है। और इन रिकॉर्ड में लिखी हर बात खुदा के वजूद की गवाही दे रही है।
हैरत की बात है कि ऐसी तारीखी किताबों को बिना दलील कुबूल कर लिया जाता है जिसके न कोई eye witness हैं न ही किसी तरह की चैन ऑफ नैरेशन फिर भी उसे क़ुबूल किया जाता है वहीं जब बात खुदा के वजूद की आती है तो इतनी ज़्यादा सुबूत होने अक़्ली व नक़्ली दलाइल के बावजूद इसे क़ुबूल नहीं किया जाता। ये करना तअस्सुब और इग्नोरेन से ज़्यादा कुछ नहीं।

यहाँ वजूद ए हक़ बारी तआला के लिए चंद दलीलें अक़्ल, साइंस, गवाही, और तारीखी नविशतों के ज़रिए समझा दी गई। इसके लिए इतने ज़्यादा दलील मौजूद हैं जिन्हें तफसीलि तौर पर बयान कर दर्ज किया जाये तो कई किताबें लिखी जा सकती हैं। अक़्लमंदो के लिए इतनी तहरीर काफी व शाफी है लेकिन इग्नोरेंट और ताअस्सुबी के लिए पूरा नविषता भी कम है। इंशाअल्लाह आगे काम जारी रहेगा।
*(डॉ तारिक़ हुसैन)*

11/07/2023

उलमा-ए किराम फ़रमाते हैं:
जब परीक्षा(Exam) में ज़मीन के ताल्लुक़(Related) सवाल आए तो इस तरह लिखें कि *“विज्ञान(Science) के अनुसार ज़मीन घूमती है”*
ख़ुद ये अक़ीदा न रखें। क्योंकि ये क़ुरआन-ए पाक के ख़िलाफ़ है, मामला कुफ़्र तक जाएगा।



⚠️इसलिए कहा जाता है इस दौर में बग़ैर इल्मे-दीन के स्कूल-कॉलेज बहुत बड़ा फ़ितना है। याद रहे तालीम(Education) ज़रूर हासिल करें, दीन की भी और दुनिया की भी लेकिन पहले दीन के साथ। वरना अक्सर सिर्फ़ दुनियावी पढ़े-लिखे गुमराह होते हैं।

10/07/2023

ऐ आब-ए-रूद-ए-गंगा! वह दिन हैं याद तुझको?
उतरा तेरे किनारे जब कारवाँ हमारा

वो ख़त जिसको पढ़कर मुहम्मद बिन क़ासिम ने 17 साल की उम्र में, हिन्द व सिंध के ज़ालिम हुक्मरानों को रौंद डाला…

यह ख़त अबुल हसन की बेटी नाहिद ने सिंध से एक सफेद रुमाल पर अपने खून से हज्जाज़ बिन यूसुफ के लिए लिखा था, और क़ासिद से कहा था…
“अगर हज्जाज बिन युसुफ़ का खून मुंजमद हो गया हो तो मेरा ये खत पेश कर देना वरना इसकी जरूरत नहीं है।

हज्जाज़ बिन यूसुफ ने खत के चंद सुतूर पढ़कर कंपकपा उठा, और उसकी आंखों के शोले पानी में तब्दील होने लगे, उसने रुमाल मुहम्मद बिन क़ासिम के हाथों में दे दिया, मुहम्मद बिन कासिम ने शुरू से लेकर आखिर तक लिखे अल्फ़ाज़ पढ़ा उसमे लिखा था……

“मुझे यक़ीन है कि वालि-ए-बसरा क़ासिद की ज़बानी मुसलमान बच्चों और औरतों का हाल सुनकर अपनी फ़ौज के गय्यूर सिपाहियों को घोड़ों पर ज़िनें डालने का हुक्म दे चुका होगा, और क़ासिद को मेरा ये खत दिखाने की जरूरत पेश नहीं आएगी, अगर हज्जाज बिन युसुफ़ का खून मुंजमद हो चुका है तो शायद मेरी तहरीर भी बेसूद साबित हो, मैं अबुल हसन की बेटी हूं मैं और मेरा भाई अभी तक दुश्मन के दस्तरस से महफूज़ हैं, लेकिन हमारे साथी एक ऐसे दुश्मन की कैद में है जिसके दिल में रहम के लिए कोई जगह नहीं है।
क़ैदख़ाने की इस तारीक कोठरी का तसउव्वुर कीजिए जिसके अंदर असीरों के कान मुजाहिदीन-ए-इस्लाम के घोड़ों की टापूँ की आवाज़ सुनने के लिए बेकरार हैं। ये एक मोअजज़ा था कि मैं और मेरा भाई दुश्मन के क़ैद से बच गए थे, लेकिन हमारी तलाश जारी है और मुमकिन है, हमें भी किसी तारीक कोठरी में फेंक दिया जाए। मुमकिन है कि इससे पहले मेरा जख्म मुझे मौत की नींद सुला दे और मैं इबरतनाक अंजाम से बच जाऊं, लेकिन मरते वक़्त मुझे इस बात का अफ़सोस होगा कि, वो सबा रफ्तार घोड़े जिनके सवार तुर्किस्तान और अफ्रीका के दरवाज़े खटखटा रहे हैं, अपनी कौम की यतीम और बेबस बच्चों की मदद को ना पहुंच सके, क्या ये मुमकिन है कि वो तलवार जो रोम और ईरान के मफदूर ताजदारों के सिर पर साबक़ा बनकर कुंदी-
सिंध के मग़रूर राजा के सामने कुंद साबित होंगी?
मैं मौत से क़त्तई नहीं डरती लेकिन ऐ हज्जाज़ अगर तुम जिंदा हो तो अपनी अपनी ग़य्यूर क़ौम के यतीमों और बेवाओं की मदद को पहुंचो”

“नाहिद एक ग़य्यूर क़ौम की बेबस बेटी”

इस खत को पढ़ने के बाद 17 साल की उम्र के मुहम्मद बिन कासिम की सिपहसालारी में मुजाहिदीन-ए-इस्लाम ने हिन्द व सिंध को रौंद डाला था, और क़ौम के बच्चों और औरतों के साथ साथ सालों से ज़ालिम हुक्मरानों के हाथों पिसती सिंध व हिन्द की अवाम को निजात दिलाई थी, और राजा दाहिर को दिखा दिया था कि अभी मुजाहिदीन-ए-इस्लाम की तलवारे कुंद नहीं हुई हैं।

(मुहम्मद बिन क़ासिम)
ज़ीशान क़ादरी ✍️

09/07/2023

खलीफा मंसूर जुमे के वक़्त भारी मजमे को मुखातिब कर रहे थे- सारा मजमा खलीफा के ख़ुत्बे पे ध्यान लगाए बैठा था-एक शख़्स खड़ा हुआ और बुलंद आवाज़ में बोला की:
" ऐ खलीफा मंसूर! तुम पहले खुद में सुधार करो फिर दूसरों को नसीहत करो, तुम अपने आमाल देखो पहले, बाद में लोगो को इल्म देना.."
इतना कहकर वो बैठ गया- मजमा खामोश देख रहा था कि:
" ये कौन शख्स है जिसने वक़्त के खलीफा के सामने इस तरह लफ्फाज़ी की.."
बाद नमाज़े जुमा खलीफा मंसूर कुछ कहते उससे पहले उनके सिपाहियों ने उस शख्स को गिरफ्तार करके जेल में डाल दिया-
खलीफा मंसूर ने अपने एक भरोसेमंद आदमी को ये सिखाकर उसके पास भेजा की:
"कैद खाने में उसे खूब छूट, आराम और लज़्ज़तें मयस्सर करने की कोशिश करना, अगर वो आराम और लज़्ज़तों को ठोकर मार दे तो मुझे खबर करना-"
खादिम कैद खाने में गया और उस शख्स से कहा कि:
"तुम वाकई बहुत बहादुर और हक बोलने वाले मालूम पड़ते हो- तुम कैदखाने का खाना खाकर आजिज़ आ चुके होगे इसलिये मैं तुम्हारे लिए कुछ ताज़े और मीठे फल लेकर आया हूँ, इन्हें कबूल कीजिये-"
उस शख्स ने वो खाना कबूल कर लिया और खादिम का शुक्रिया अदा किया-

अगले दिन खादिम फिर कैदखाने हाज़िर हुआ और उसके लिये आरामदायक बिस्तर का इंतेज़ाम करवा दिया, कैदखाने में उम्दा किस्म की चटाई बिछवा दी और तरह तरह के लज़ीज़ खाने उसके लिए लाने लगा.. ये सिलसिला कई दिनों तक चलता रहा- एक दिन खादिम ने उस शख्स से कहा कि:
" मैं चाहता हूँ तुम खलीफा मंसूर का क़ुर्ब हासिल करो, हुकूमत शहर में एक अफसर मुकर्रर करना चाहती है जो लोगो को नेकी की तरफ बुलाए और बुराई से रोके.."
आपका काम ये रहेगा की:
" कोई गैर शरई काम करता पाया गया तो आप उसे शरई अहकाम याद दिलाएंगे.." इस ओहदे पे फाइज़ होने के लिये आप जैसे हक पसन्द इंसान की हाज़त है- मैंने खलीफा मंसूर से बात कर ली है, आप अपना मन्सब संभाल लीजिये.."
उस शख्स की ख़ुशी का कोई ठिकाना नही रहा, बैठे बिठाए इतना बड़ा मन्सब मिल गया था उसे.. लोगो पे रोक टोक करके उन्हें शरीयत सिखाना उसका मनपसन्द काम था- लिहाज़ा वो अपने ओहदे पे फाइज़ हुआ-

बहुत दिन बीत गए वो अपना काम बखूबी निभा रहा था- किसी को भी गलत करते देखता तो वही उसपे तन्क़ीद कर दिया करता था, अल्लाह और उसके रसूल का वास्ता देकर रोक लेने की कोशिश किया करता था- जहन्नम जन्नत के सब्ज बाग़ और दहकती घाटियों का तसव्वुर करवा दिया करता था- बड़ा ही दिलचस्प काम था ये उसके लिए और बहुत आसान भी..
एक दिन खलीफा मंसूर ने उसे अपने दरबार में बुलाया, ये पहला मौका था जब वो खलीफा के सामने पेश हो रहा था- इससे पहले उसने खलीफा को ख़ुत्बे में देखा था जहाँ उसने खलीफा को ही नसीहत दे डाली थी- मुल्तानी मिट्टी से नहा धोकर, महंगा लिबास,जिस्म पे इत्र की खुशबू और कमर पे तलवार लटकाए मगरूराना चाल चलते हुए वो खलीफा के दरबार में हाज़िर हुआ- तेल से चमकते उसके काले घने बाल कंधे को छू रहे थे- आँखों में सुरमा लगा था-गाल टमाटर की तरह सुर्ख हो चुके थे-पेट फूल कर थोड़ा बाहर आ चुका था-
आते ही उसने झुक कर सलाम अर्ज़ की-खलीफा ने उससे पूछा की:
"जुमे के ख़ुत्बे के दरमियान उस तनक़ीद के बारे में अब क्या ख्याल है तुम्हारा???"
उस शख्स ने अर्ज़ किया कि:
"हुज़ूर मैं उस वक़्त गलत था, इस बात का मुझे बाद में अहसास हुआ- आप बहुत रहमदिल और इंसाफपसन्द खलीफा हो, आपसे बेहतर खलीफा इस मुल्क को नही मिल सकता- उस दिन कहे सारे अल्फ़ाज़ मैं वापस लेता हूँ- मुझे माफ़ी दे दीजिए "
खलीफा मंसूर ने ये बात सुनी और उठ खड़े हुए और कहा कि:
" तू उस दिन हक पे था- तूने भरे मजमे में जो कुछ कहा सब ठीक था- मगर तेरी नियत इस्लाह की नही बल्कि तन्क़ीद की थी.. ये बात आज साबित हुई जब तू अपनी ही बात से पलट गया- तेरी जुर्रत सोची समझी थी- तेरी फितरत में लोगो की खामियों को तंज करना था ना की किसी की इस्लाह करना या सीधी राह दिखाना.."
खलीफा मंसूर के हुक्म से उसे सख्त सजा में मुब्तला कर दिया गया -
तमाम ऐसे ख़ुराफ़ाती आपको फेसबुक पर व्हाट्सअप पर नज़र आ जायेंगे- जिनका सुबह शाम सिर्फ तन्क़ीद का काम है -
इस तरह के मुफ्तियों को इमाम मेहँदी का इंतज़ार है लेकिन मैं समझता हूँ इन्हें "खलीफ़ा मंसूर" की जरूरत है, वही इन्हें ठीक कर सकते है!!
Ahle Haq Network

03/10/2022

💞 #खाक_हो_जाएं_अदू_मगर_हम_तो_रज़ा💞

💕 ें_जब_तक_दम_है_ज़िक्र_उनका_सुनाते_जाएंगे💕

1. हर साल जश्ने सऊदिया मनाया जाता है जिसका क़ुरआन व हदीस में कोई सबूत नहीं-
2. हर साल गुस्ले खाना ए काबा होता है जिसका क़ुरआनो हदीस में कोई सबूत नहीं-
3. हर साल गिलाफे काबा तब्दील किया जाता है जिसका क़ुरआनो हदीस में कोई सबूत नहीं-
4. गिलाफे काबा पर आयत लिखी जाती हैं जिसका क़ुरआनो हदीस में कोई सबूत नहीं-
5. मक्का मुकर्रमा मदीना मुनव्वरा में तहज्जुद की अज़ान होती है जिसका सबूत क़ुरआनो हदीस में नहीं-
6. मदारिस में हर साल खत्म बुखारी होता है जिसका क़ुरआनो हदीस से कोई सबूत नहीं-
7. महाफिल सजाई जाती है जल्सा ए आम होता है जिसका क़ुरआनो हदीस में कोई सबूत नहीं-
8. हर साल तब्लीगी इज्तिमा होता है चिल्ले लगाए जाते हैं जिसका क़ुरआनो हदीस में कोई सबूत नहीं-
9. सहाबा ए किराम علیہم الرضوان के विसाल के अय्याम मनाये जाते हैं जिसका क़ुरआनो हदीस से कोई सबूत नहीं-
10. जश्ने देवबंद व अहले हदीस मनाया जाता है जिसका क़ुरआनो हदीस से कोई सबूत नहीं-
11. ज़िक्रे मीलादे मुस्तफा ﷺ‌ मनाने का किसी सहाबी अइम्मा मुहद्दिस व बुज़ुर्गाने दीन ने मना किया हो इसका भी क़ुरआनो हदीस से कोई सबूत नहीं-

लेकिन जैसे ही मीलादुन्नबी ﷺ‌ मनाने की बात आ जाए सारे नाम निहाद मुफ्ती दीन के ठेकेदार खड़े हो जाते हैं और शिर्क बिदअत का राग अलापना शुरू कर देते हैं- जबकि उन्हे खुद शिर्क बिदअत की तारीफ नहीं मालूम-

* े_नबी_पाक_से_यूं_प्यार_करेंगे*
* ाल_में_सरकार_ﷺ‌_का_मीलाद_करेंगे*❣️❣️
* #मरहबा_सद_मरहबा_मीलाद_का_मौसम_आया_है*

मुख्तसर वज़ाहत:
"हर वो नया काम जिसको इबादत समझा जाए हालांकि वो शरीयते मुतह्हरा के उसूलों से टकरा रहा हो या किसी सुन्नत,हदीस के मुखालिफ हो तो वो काम मरदूद (यानी क़ुबूल ना होने वाला) और महज़ बातिल है- अलबत्ता इसमें ये बात याद रखना ज़रूरी है कि जो चीज़ शरीयत के दलाइल से साबित हो या दीने इस्लाम के उसूलों के खिलाफ ना हो तो वो मरदूद नहीं और ना उस हदीस के तहत दाखिल है-"
चुनांचा अल्लामा अब्दुर्रुऊफ मनावीرحمۃ اللہ علیہ (साल वफात:1031ھ) इस हदीसे पाक के तहत फरमाते हैं:
”اما ما عضده عاضد منه بان شهد له من ادلة الشرع او قواعده فليس برد بل مقبول كبناء نحو ربط و مدارس وتصنيف علم وغيرها“
तर्जुमा:
"जो चीज़ दीन के लिए मददगार हो और हो भी किसी दीनी क़ानून व ज़ाब्ते के तहत वो मरदूद नहीं- बल्कि वो मक़बूल है- जैसा कि सरहदों की हिफाज़त के लिए क़िले बनाना- मदारिस क़ायम करना और इल्म की तस्नीफ का काम करना वगैरह वगैरह-"
(فیض القدیر ،ج 6،ص47،تحت الحدیث:8333)

बिदअत की अक़्साम:
बुनियादी तौर पर बिदअत की दो क़िस्में हैं:...
1. * #बिदअते_हस्ना*: ऐसा नया काम जो क़ुरआनो हदीस के मुखालिफ ना हो और मुसलमान उसे अच्छा जानते हों तो वो काम मरदूद और बातिल नहीं होता- मसलन तरावीह की नमाज़ बा जमाअत होना वगैरह वगैरह-
2. * #बिदअते_सय्यह*: दीन में ऐसा नया काम जो क़ुरआनो हदीस से टकराता हो- मज़कूरा बाला हदीसे पाक में उसी की तरफ इशारा है- मसलन उर्दू में खुत्बा देना,या उर्दू में अज़ान देना वगैरह-
जैसा कि बिदअत की तक़सीम करते हुए अल्लामा बदरुद्दीन ऐनीحمۃ اللہ علیہ (साल वफात: 855 ھ) फरमाते हैं:
"ثم البدعۃ علی نوعین: ان کانت مما تندرج تحت مستحسن فی الشرع فھی حسنۃ وان کانت مما تندرج تحت مستقبح فی الشرع فھی مستقبحۃ‘‘
तर्जुमा:
"बिदअत की दो किस्में हैं (1) अगर वो शरीयत में किसी अच्छे काम के तहत हों तो बिदअते हस्ना होगी-
(2) अगर शरीयत में किसी क़बीह अम्र (बुरे काम) के तहत हो तो बिदअते क़बीह यानी सय्यह होगी-"
(عمدۃ القاری،ج 8،ص245، تحت الحدیث:2010)

जबकि अल्लामा इब्ने हजर अस्क़लानी رحمۃ اللہ علیہ
(साल वफात: 852ھ) फरमाते हैं:
”قال الشافعی البدعۃ بدعتان محمودۃ ومذمومۃ فما وافق السنۃ فھو محمودۃ وما خالفھا فھو مذموم“
तर्जुमा:
"इमामे शाफई رحمۃ اللہ علیہ ने इरशाद फ़रमाया : बिदअत दो अक़्साम पर मुश्तमिल है (1) बिदअते महमूदा यानी हस्ना और (2) बिदअते मज़मूमा यानी सय्यह- जो सुन्नत के मुवाफिक़ हो वो बिदअते महमूदा (जिसकी तारीफ हो यानी अच्छी) और जो सुन्नत के खिलाफ हो वो बिदअते मज़मूमा ( जिसकी मज़म्मत की जाए यानी बुरी) है- (فتح الباری،ج14،ص216،تحت الحدیث:7277)

बिदअत की यही दो किस्में रसूले अकरम ﷺ‌ के इस फरमान से भी माखुज़ हैं:
’’مَنْ سَنَّ فِی الْاِسْلَامِ سُنَّۃً حَسَنَۃً فَعُمِلَ بِھَا بَعْدَہٗ کُتِبَ لَہٗ مِثْلُ اَجْرِ مَنْ عَمِلَ بِھَا وَلَایَنْقُصُ مِنْ اُجُوْرِھِمْ شَیْءٌ وَمَنْ سَنَّ فِی الْاِسْلَامِ سُنَّۃً سَیِّئَۃً فَعُمِلَ بِھَا بَعْدَہٗ کُتِبَ عَلَیْہِ مِثْلُ وِزْرِ مَنْ عَمِلَ بِھَا وَلَا یَنْقُصُ مِنْ اَوْزَارِھِمْ شَیْءٌ“
तर्जुमा:
"जिसने इस्लाम में कोई अच्छा काम जारी किया और उसके बाद उस पर अमल किया गया तो उसे उस पर अमल करने वालों की तरह अज्र मिलेगा और अमल करने वालों के अज्रो सवाब में भी कोई कमी नहीं होगी और जिसने इस्लाम में कोई बुरा तरीक़ा निकाला और उसके बाद उस पर अमल किया गया तो उसे उस अमल करने वालों की मानिंद गुनाह मिलेगा और अमल करने वालों के गुनाहों में भी कोई कमी ना की जायगी-"
( مسلم،ص394،حدیث:2351)

बिदअते सय्यह की एक पहचान:
फरमाने मुस्तफा ﷺ‌ :
”مَا ابْتَدَعَ قَوْمٌ بِدْعَۃً فِی دِیْنِھِمْ اِلَّا نَزَعَ اللہُ مِنْ سُنَّتِھِمْ مِثْلَھَا‘‘
तर्जुमा:
"कोई क़ौम किसी बिदअत को ईजाद करे तो अल्लाह पाक उसकी मिस्ल सुन्नत को उठा देता है-"
(مشکوٰۃ المصابیح،ج1،ص56،حدیث:188)
मुहद्दिसे कबीर हज़रत अल्लामा अली क़ारी رحمۃ اللہ علیہ (साल वफात:1014ھ) इस हदीस पाक में मज़कूर लफ्ज़ "बिदअत" की तशरीह में फरमाते हैं:
’’ای سیئۃ مزاحمۃ لسنۃ‘‘
तर्जुमा:
"यानी इससे मुराद बिदअते सय्यह है जो किसी सुन्नत के मुखालिफ हो-"
(مرقاۃ المفاتیح،ج1،ص433،تحت الحدیث:188)
हकीमुल उम्मत मुफ्ती अहमद यार खां नईमी رحمۃ اللہ علیہ हदीसे मुबारका के अल्फाज़ ”لَیسَ مِنہُ“ की शरह में फरमाते हैं : ”لَیسَ مِنہُ “ से मुराद क़ुरआन व हदीस के मुखालिफ यानी जो कोई दीन में ऐसे अमल ईजाद करे जो दीन यानी किताबो सुन्नत के मुखालिफ हों जिससे सुन्नत उठ जाती है वो ईजाद करने वाला भी मरदूद ऐसे अमल भी बातिल- जैसे उर्दू में खुत्बा व नमाज़ पढ़ना फारसी में अज़ान देना वगैरह- “(مراٰۃ المناجیح ،ج1،ص146)

बिदअते हस्ना की चंद मिसालें.....
ऐसा अच्छा काम जो शरीयत से टकराता नहीं है- इसकी बहुत सारी मिसालें हैं जिनमें से पांच ये हैं:

(1) हज़रत अबूबक्र सिद्दीक़ رضی اللّٰہ تعالیٰ عنہ ने क़ुरआन पाक को एक जगह जमा करवाया और उसकी तकमील हज़रत उस्मान ग़नी رضی اللّٰہ تعالیٰ عنہ के ज़माने में हुई-
(2) हज़रत उमर फारूक़ رضی اللّٰہ تعالیٰ عنہ ने तरावीह की जमाअत शुरू करवाई-
(3) हज़रते उस्मान ग़नी رضی اللّٰہ تعالیٰ عنہ के दौर में जुमा की अज़ाने सानी शुरू हुई-
(4) क़ुरआन ए पाक में नुक़्ते और आराब हज्जाज बिन यूसुफ के दौर में लगाए गए-
(5) मस्जिद में इमाम के खड़े होने के लिए मेहराब वलीद मरवानी के दौर में सैय्यदना उमर बिन अब्दुल अज़ीज़ رضی اللّٰہ تعالیٰ عنہ ने ईजाद की थी- इनके अलावा भी बहुत सारे ऐसे काम हैं जो नबी ए पाक ﷺ‌ की ज़ाहिरी हयाते तैय्यबा में या सहाबा ए किराम رضی اللّٰہ تعالیٰ عنہم के दौरे मुबारक में नहीं थे- बाद में ईजाद हुए.. तो ये सारे के सारे काम क्या मरदूद और बातिल हैं? हरगिज़ ऐसा नहीं है-
अल्लाह करीम अक़्ले सलीम अता फरमाए और दीन की सही समझ अता फरमाए..!!
اٰمِیْن بِجَاہِ النَّبِیِّ الْاَمِیْن صلَّی اللہ علیہ واٰلہٖ وسلَّم
صلی اللہ علی حبیبہ محمد نور من نوراللہ وعلی آلہ واہل بیتہ وعترتہ وازواجہ وصحبہ وجدہ وذریتہ و کل امتہ وبارک وسلم کثیراً کثیرا و دائماً ابدا ❤️

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