04/08/2023
(क़ज़ाए उ़म्री नमाज़ का तरीक़ा)
🌹हज़रत अबू हुरैरा रज़ियल्लाहु तआ़ला अन्हु' ने फ़रमाया कि मैंने रसूलुल्लाह ﷺ से सुना है कि बेशक क़यामत के दिन बन्दे के आ’माल में से पहले उसकी नमाज़ का हिसाब किया जाएगा, पस अगर नमाज़ ठीक निकली तो ना कामियाब और बा मुराद होगा और अगर नमाज़ ख़राब निकली तो मुराद और टोटा उठाने वाला होगा।
📗मरने के बाद क्या होगा' पेज़ नं 210)
✍️जिस ने क़स्दन एक वक़्त की नमाज़ छोड़ी हज़ारों बरस जहन्नम में रहने का मुस्तह़िक़ हुवा, जब तक तौबा न करे और उस की क़ज़ा न कर ले।
📘फ़तावा रज़विय्या' जिल्द-9, सफ़ा 158 ता 159)
✍️र-मज़ानुल मुबारक के आख़िरी जुमुआ़ में बा’ज लोग बा जमाअ़त क़ज़ाए उ़म्री पढ़ते हैं और येह समझते हैं कि उ़म्र भर की क़ज़ाएं इसी एक नमाज़ से अदा हो गई येह बात़िल महज़ है।
📗बहारे शरीअत' जिल्द-1, सफ़ा 708)
✍️बहरहाल! जिस ने कभी नमाज़े ही न पढ़ी हों और अब तौफ़ीक हुई और क़ज़ाए उ़म्री पढ़ना चाहता है वोह जब से बालिग़ हुवा है उस वक़्त से नमाज़ों का हिसाब लगाए और तारीखें बुलूग़ भी नहीं मा’लूम तो एह़तियात़ इसी में है कि हिजरी सन् के हिसाब से औ़रत 9 साल की उ़म्र से और मर्द 12 साल की उ़म्र से नमाज़ों का हिसाब लगाए।
✍️क़ज़ाए उ़म्री में यूं भी कर सकते हैं कि पहले तमाम फ़ज्र की नमाज़े अदा कर लें फिर तमाम ज़ोहर की नमाज़े इसी तरह़ अ़सर, मग़रिब और इ़शा।
क़ज़ा हर रोज़ के बीस रकअ़तें होती हैं।
दो फ़र्ज़ फ़ज्र के, चार ज़ोहर, चार अ़सर, तीन मग़रिब, चार इ़शा के, और तीन वित्र।
✍️निय्यत इस तरह़ कीजिये, म-सलन: सब से पहली फ़ज्र जो मुझ से क़ज़ा हुई उस को अदा करता हूं।
हर नमाज़ में इसी तरह़ निय्यत कीजिये।
जिस पर ब कसरत क़ज़ा नमाज़ें हैं वोह आसानी के लिये अगर यूं भी अदा करे तो जाइज़ है कि हर रुकूअ़ और हर सज्दे में तीन तीन बार “सुब्हाना रब्बियल अज़ीम, सुब्हाना रब्बियल आ’ला” की जगह सिर्फ़ एक बार कहे।
मगर येह हमेशा और हर तरह़ की नमाज़ में याद रखना चाहिये कि जब रुकूअ़ में पूरा पहुंच जाए उस वक़्त सुब्हाना, का “सीन” शुरूअ़ करे और जब अज़ीम का “मीम” ख़त्म कर चुके उस वक़्त रुकूअ़ से सर उठाए, इसी तरह़ सज्दे में भी करे।
एक तख़्फ़ीफ़ (या’नी कमी) तो येह हुई और दूसरी येह कि फ़र्ज़ों की तीसरी और चौथी रकअ़त में अलहम्द शरीफ़ की जगह फ़क़त़ “सुब्हानल्लाहे” तीन बार कह कर रुकूअ़ कर ले।
मगर वित्र की तीनों रक्अ़तों में अल ह़म्द शरीफ़ और सूरत दोनों ज़रूर पढ़ी जाएं।
तीसरी तख़्फ़ीफ़ (या’नी कमी) येह कि क़ा’दए अख़ीरा में तशह्हुद या’नी अत्तह़िय्यात के बाद दोनों दुरूदों और दुआ़ की जगह सिर्फ़ *اَللّٰھُمً صَلّٰ َعلٰی مُحَمّدٍ وٌاٰلِهٖ* कह कर सलाम फेर दे।
चौथी तख़्फ़ीफ़ (या’नी कमी) येह कि वित्र की तीसरी रक्अ़त में दुआ़ए क़ुनूत की जगह “अ़ल्लाहु अक्बर” कह कर फ़क़त़ एक बार या तीन बार *رَبّ اغٌفِرلِیٌ* कहे।
📗मुलख़्ख़स अज़ फ़तावा रज़विय्या' मुख़र्रजा जिल्द-8, सफ़ा 157)
✍️याद रखिये! तख़्फ़ीफ़ (या’नी कमी) के इस तरीके की आ़दत हरगिज़ न बनाइये, मा’मूल की नमाज़ें सुन्नत के मुताबिक़ ही पढ़िये और इन में फ़राइज़ व वाजिबात के साथ साथ सुनन और मुस्तह़ब्बात व आदाब की भी रिआ़यत कीजिये।
✍️फ़तावा शामी में है: क़ज़ा नमाज़ें नवाफ़िल की अदाएगी से बेहतर और अहम है।
मगर सुन्नते मुअक्कदा, नमाज़े चाश्त सलातुत्तस्बीह़ और वोह नमाज़े जिन के बारे में अह़ादीसे मुबा-रका मरवी हैं (या’नी जैसे तह़िय्यतुल मस्जिद, अ़सर से पहले की 4 रकअ़त (सुन्नते ग़ैर मुअक्कदा) और मग़रिब के बाद 6 रक्अ़तें (पढ़ी जाएंगी)।
*📗رَدالمحتار، ج٢، ص٦٤٦)*
✍️याद रहे! क़ज़ा नमाज़ की बिना पर सुन्नते मुअक्कदा छोड़ना जाइज़ नहीं, अलबत्ता सुन्नते ग़ैर मुअक्कदा और ह़दीसों में वारिद शुदा मख़्सूस नवाफ़िल पढ़े तो सवाब का हक़दार है मगर इन्हें न पढ़ने पर कोई गुनाह नहीं, चाहे ज़िम्मे क़ज़ा नमाज़ हो या न हो।
✍️क़ज़ा नमाज़ें छुप कर पढ़िये लोगों पर (या घर वालों बल्कि क़रीबी दोस्त पर भी) इस का इज़्हार न कीजिये (म-सलन येह मत कहा कीजिये कि मेरी आज की फ़ज्र क़ज़ा हो गई या मैं क़ज़ाए उ़म्री पढ़ रहा हूं? वग़ैरा।
कि गुनाह का इज़्हार भी मकरूहे तह़रीमी व गुनाह है।
*📗رَدالمحتار، ج٢، ص٦٥٠)*
👉लिहाज़ा अगर लोगों की मौजू-दगी में वित्र क़ज़ा पढ़ें तो तक्बीरे कुनूत के लिये हाथ न उठाएं।
✍️जिस के ज़िम्मे क़ज़ा नमाज़ें हों उन का जल्द से जल्द पढ़ना वाजिब है मगर बाल बच्चों की परवरिश और अपनी ज़रूरिय्यात की फ़राहमी के सबब ताख़ीर जाइज़ है।
लिहाज़ा कारोबार भी करता रहे और फुरसत का जो वक़्त मिले उस में क़ज़ा पढ़ता रहे यहां तक कि पूरी हो जाएं
*📗رَدالمحتار، ج٢، ص٦٤٦)*
✍️क़ज़ा के लिये कोइ वक़्त मुअ़य्यन नहीं उ़म्र में जब भी पढ़ेगा बरिय्युज़्ज़िम्मा हो जाएगा।
मगर तुलूअ़् व ग़ुरूब और ज़वाल के वक़्त नमाज़ नहीं पढ़ सकता कि इन वक़्तों में नमाज़ जाइज़ नहीं।
📗फ़तावा आ़लमगीरी' जिल्द-1, सफ़ा 52)
📘बहारे शरीअत' जिल्द-1, सफ़ा 702)
📕नमाज़ के अह़काम' पेज़ नं 250 ता 254)
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