22/08/2025
**वालिदैन की दुआ का करिश्मा**
अल्लाह तआला ने एक बार हज़रत सुलेमान (अलैहिस्सलाम) की तरफ़ वह़ी भेजी कि समुद्र के किनारे जाकर मेरी क़ुदरत का नज़ारा देखो।
हज़रत सुलेमान (अलैहिस्सलाम) अपने साथियों के साथ वहाँ पहुँचे, मगर उन्हें कुछ दिखाई न दिया। आपने एक जिन्न को हुक्म दिया कि समुद्र में गोता लगाकर अंदर की खबर लाओ। वह गोता लगाकर लौटा और कहा कि मैं नीचे तक नहीं पहुँच सका और मुझे कुछ नज़र नहीं आया।
फिर आपने एक और ताक़तवर जिन्न को भेजा, मगर वह भी नाकाम वापस आया। तब आपने अपने वज़ीर आसिफ बिन बरख़िया को हुक्म दिया। उन्होंने थोड़ी देर में समुद्र की तह से काफ़ूर (सफ़ेद पत्थर) का एक सुंदर गुंबद निकालकर हज़रत सुलेमान (अलैहिस्सलाम) के सामने पेश किया। उसमें चार दरवाज़े थे – मोती, याक़ूत, हीरा और ज़ुमर्रुद के। चारों दरवाज़े खुले होने के बावजूद उसमें ज़रा भी पानी अंदर नहीं गया था।
अंदर एक ख़ूबसूरत नौजवान साफ़ कपड़े पहने नमाज़ में मशगूल था। हज़रत सुलेमान (अलैहिस्सलाम) ने उससे सलाम करके पूछा:
**"तुम यहाँ कैसे पहुँचे?"**
उसने जवाब दिया:
"ऐ अल्लाह के नबी! मेरे माँ-बाप बूढ़े और कमज़ोर थे, मेरी माँ अंधी थीं। मैंने सत्तर साल उनकी सेवा की। जब माँ का अन्त समय आया तो उन्होंने दुआ की:
‘ऐ परवरदिगार! मेरे बेटे को अपनी इबादत में लंबी उम्र अता फ़रमा।’
और जब बाप का वक़्त आया तो उन्होंने दुआ की:
‘ऐ ख़ुदा! मेरे बेटे को ऐसी जगह इबादत में लगा दे जहाँ शैतान की दख़ल न हो।’
माता-पिता की मौत के बाद जब मैं इस समुंदर के किनारे आया तो यह गुंबद मिला। मैं इसमें दाख़िल हुआ, तभी एक फ़रिश्ता आया और इसे समुद्र की तह में उतार दिया।”
हज़रत सुलेमान (अलैहिस्सलाम) ने पूछा:
**"तुम किस ज़माने से यहाँ हो?"**
नौजवान ने कहा: “हज़रत इब्राहीम (अलैहिस्सलाम) के दौर से।”
यानी उसे दो हज़ार साल हो गए थे, लेकिन वह अब तक जवान था और उसके बाल तक सफ़ेद नहीं हुए थे।
आपने पूछा:
**"तुम खाते क्या हो?"**
नौजवान ने कहा: “एक हरा परिंदा रोज़ाना अपनी चोंच में एक पीले रंग की चीज़ लाता है। मैं उसे खा लेता हूँ, और उसमें दुनिया की सारी नेमतों का स्वाद होता है। उससे मेरी भूख-प्यास मिट जाती है और नींद, थकान, गर्मी-सर्दी कुछ भी महसूस नहीं होता।”
हज़रत सुलेमान (अलैहिस्सलाम) ने कहा:
**"क्या तुम हमारे साथ रहना चाहते हो, या अपनी जगह वापस जाना चाहते हो?"**
नौजवान ने जवाब दिया: “मुझे मेरी जगह पहुँचा दीजिए।”
तब हज़रत आसिफ बिन बरख़िया ने फिर से उस गुंबद को समुद्र की तह में पहुँचा दिया।
इसके बाद हज़रत सुलेमान (अलैहिस्सलाम) ने लोगों से कहा:
**“अल्लाह तुम पर रहम करे! देखो, वालिदैन की दुआ कितनी मुक़बूल होती है। इसलिए कभी भी उनकी नाफ़रमानी मत करना।”**
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✨ **सबक़:** माँ-बाप की खिदमत और उनकी दुआ इंसान को ऐसी बरकत और मक़ाम अता कर सकती है, जो किसी और चीज़ से हासिल नहीं हो सकती।