IBC
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22/07/2021
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Bada Business Pvt. Ltd. Opened its yet another Office at Surat- Gujarat.
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20/07/2021
Trophy 🏆 of success
Trophy 🏆 of bada test
Golden moment for team odisha...
17/07/2021
Conscious Capitalism | Business Summit at IIM | Ajay Piramal | Radhanath Swami | Dr Vivek Bindra Dr. Vivek Bindra is the Founder CEO Of Bada Business Pvt. Ltd., One Of The Most Progressive Ed-Tech platforms in South East Asia.He is the Only Business Ment...
12/07/2021
6th Guinness World Record for India during Lockdown!!!
Dr. Vivek Bindra (Founder & CEO - BadaBusiness.com) has made India proud yet again by registering for his exclusive webinar on Leadership Program. Business Yoga from Bhagvad Gita - Do watch the recording on YouTube - https://youtu.be/we7AOqWJXcQ>
09/07/2021
वृन्दावन - मेरी आध्यात्मिक ऊर्जा का स्त्रोत है
बताइये आपको एनर्जी कहाँ से मिलती है?
09/07/2021
21 Strategies to Think Big & Innovative | India Economic Conclave | Dr Vivek Bindra Dr. Vivek Bindra is an International Motivational Speaker, Leadership Consultant & Business Coach. He has been awarded Honorary Ph.D. Degree, Doctor of Phil...
06/07/2021
पिछले 32 सालों से बिना वेतन ट्रैफिक संभाल रहे हैं 75 वर्षीय गंगाराम, बेटे की मौत ने बदल दी पूरी जिंदगी, आज अपने कार्यों के जरिए पेश कर रहे हैं नई मिसाल
आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में हर कोई आगे बढ़ने की होड़ में लगा हुआ है। शहरों में आए दिन सड़क हादसे होते रहते हैं जिसमें कितने ही मासूमों की जान चली जाती है. कई लोग अपनों के खोने का गम भूलाकर फिर इसी भागदौड़ का हिस्सा बन जाते हैं लेकिन कुछ ऐसे भी लोग हैं जो ना केवल इन हादसों से जीवन का सबक सिखते हैं बल्कि अपना संपूर्ण जीवन लोगों की रक्षा करने में समर्पित कर देते हैं। इस बात का प्रत्यक्ष उदाहरण हैं साहिबाबाद के रहने वाले 75 वर्षीय गंगाराम। जिन्होंने एक सड़क हादसे में अपने बेटे को खो दिया था। जिसके बाद उन्होंने लोगों को सड़क हादसे से बचाने का प्रण ले लिया और आज वो पिछले 32 सालों से बिना किसी वेतन, बिना किसी स्वार्थ के ट्रेफिक पुलिस की भूमिका निभा रहे हैं। वो सड़को पर होने वाले हादसे के प्रति लोगों को जागरूक कर रहे हैं ताकि उनके बेटे की तरह किसी और की जान ना जाए। गंगाराम के लिए अपने बेटे को खोने के बाद समाज सेवा करने का निर्णय लेना, और 32 सालों से बिना वेतन के काम करना आसान नहीं था। आइए जानते हैं उनके जीवन का प्रेरणादायी सफर।
32 वर्षों से बिना वेतन के कर रहे हैं ट्रेफिक पुलिस की नौकरी
दिल्ली के सीलमपुर चौक पर दुबले-पतले से हाथों में डंडा लिए 75 वर्षीय गंगाराम आपको ट्रेफिक संभालते हुए दिख जाएंगे। धूप, गर्मी, बरसात यहां तक की कोरोना के समय में भी वो अपने कर्तव्य से पीछे नहीं हटे। गंगाराम पिछले 32 सालों से बिना किसी वेतन के ट्रैफिक कंट्रोल के तौर पर सेवा कर रहे हैं। साहिबाबाद के एकता विहार में रहने वाले गंगाराम के एक इशारे भर से ट्रैफिक थमता और चलता है। यहां से गुजरने वाले ज्यादातर वाहन चालक गंगाराम को अच्छी तरह जानते हैं। उम्र के इस पड़ाव पर भी उनका जुनून देखते ही बनता है। दरअसल इसी चौक पर एक हादसे ने युवा बेटे को बुजुर्ग गंगाराम से छीन लिया था। अब वे कोशिश करते हैं कि यहां किसी और का बेटा हादसे का शिकार न हो। वे सुबह से रात तक यहां ट्रैफिक नियंत्रित करते हैं। ट्रैफिक पुलिस के अधिकारी भी उनका हौसला देखकर जवानों को नसीहत लेने के लिए कहते हैं, हर कोई उनके कार्य को देख नतमस्तक हो जाता है।
बेटे के साथ हुए हादसे से बदल गई पूरी जिंदगी
गंगाराम की कुछ वर्ष पहले बी-ब्लॉक सीलमपुर में टीवी रिपेयरिंग की दुकान थी। अक्सर पुलिसकर्मी उनकी दुकान पर वायरलेस सेट आदि ठीक कराने आ जाते थे। उनका बेटा मुकेश भी उनके साथ ही काम करता था। ट्रैफिक पुलिस के जवानों से अच्छे संबंधों से उत्साहित होकर उन्होंने 32 साल पहले ट्रैफिक वार्डन के लिए अपना फार्म भर दिया था, उनका आईकार्ड भी बन गया था। जिसके बाद वो सुबह और शाम बिना वेतन ट्रैफिक कंट्रोल करने का काम करते थे। करीब आठ साल पहले उनके बेटे मुकेश को सीलमपुर चौक पर एक ट्रक ने टक्कर मार दी थी। वह बुरी तरह घायल हो गया था। उसकी रीढ़ की हड्डी टूट गई थी। उन्होंने अपने बेटे को लेकर छह माह इधर-उधर चक्कर लगाए, लेकिन उसके बावजूद उसकी मौत हो गई। इकलौते बेटे के सदमे में गंगाराम की पत्नी ममता देवी भी गुजर गईं। गंगाराम ने बहू रमा देवी की एक निजी अस्पताल में नौकरी लगवाई। लेकिन गंगाराम अपने बेटे को खोने का दुःख भूले नहीं थे।
इसलिए समाज सुधार करने की ठानी
बेटे की मौत के बाद गंगाराम टूट गए थे। लेकिन उनके हौसले कम नहीं हुए थे। उन्होंने अपने बेटे को सड़क हादसे में खोने के बाद यह प्रण लिया कि वो अब किसी और के साथ यह हादसा नहीं होने देंगे। जिसके बाद वो फुलटाईम बिना वेतन ट्रेफिक पुलिस के रूप में सेवा देने लगे। वो सुबह आठ से रात साढ़े आठ बजे तक सीलमपुर चौक पर मुफ्त में सेवा देते है। वो ट्रेफिक को कंट्रोल करने का कार्य करते हैं। यही नहीं उन्होंने कई जत्न करके अपनी दोनों पोतियों का भी विवाह करवाया। इतना कुछ होने के बाद भी गंगाराम आज भी मजबूत जज्बे के साथ अपने काम पर पूरी निष्ठा से कार्य करते हैं।
कोरोना में भी बिना वेतन गंगाराम संभाल रहे यातायात
यही नहीं कोरोना महामारी के समय जब हर कोई अपनी और अपने अपनों की सुरक्षा के लिए घर में बंद था। उस समय में भी गंगाराम पूरी चुस्ती और फुर्ती से सेवा कर रहे थे। कोरोना महामारी भी उनके नेक इरादों को रोक नहीं सकी। 75 वर्षीय गंगाराम अपने इरादों पर अडिग हैं। जबकि सरकार ने बुजुर्गों को तो विशेषकर घर के अंदर रहने की हिदायत दी है बावजूद इसके गंगाराम यह काम कर रहे हैं। यह सब उनके समर्पण और सेवाभाव को दिखाता है।
दिल्ली सरकार ने भी गंगाराम को किया सम्मानित
75 वर्षीय गंगाराम जी के हौसले और त्याग को देखकर दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने एक कार्यक्रम में उन्हें पगड़ी पहनाकर सम्मानित किया था। इसके अलावा 15 अगस्त और 26 जनवरी को गंगाराम को बुलाकर सम्मान दिया जाता है। गंगाराम को आज कई सम्मान से सम्मानित किया जा चुका हैं। लेकिन गंगाराम के हौसले और उनके जज़्बे के आगे आज हर सम्मान कम है। आज भी गंगाराम भरी आंखों से कहते हैं कि सड़क से गुजरने वाले हर बाइक सवार में मुझे अपने बेटे का अक्स दिखाई देता है। किसी और का बेटा हादसे का शिकार न हो, इसलिए मैं पूरी जिम्मेदारी के साथ इस चौराहे पर मुस्तैद रहता हूं।
एक हादसे में अपने बेटे को खोने वाले गंगाराम आज सही मायने में लाखों लोगों के लिए प्रेरणास्त्रोत है। उनका संपूर्ण जीवन सभी को प्रेरित करने वाला है। आज समाज को गंगाराम जैसे लोगों की सख्त जरूरत है। Bada Business गंगाराम जी के हौसले और उनकी सेवाभाव की तहे दिल से सराहना करता है। यदि आप Bada Business के बारे में अधिक जानकारी चाहते हैं तो call- 8249669088
06/07/2021
Dr. Mahesh Gupta, Chairman of Kent RO Systems Ltd. is Bada Business Pvt. Ltd. esteemed Professor. His business lectures and teachings have helped lakhs of Indian MSMEs to a greater extent.
We thank You Dr. Mahesh Gupta for your high-valued association with Bada Business Family.
30/06/2021
Setting goals is the first step in turning the invisible into the visible.
Here are the top 3 strategies to improve your sales
27/06/2021
80 की उम्र में 18 का जज्बा रखने वाली वाली मार्शल आर्ट गुरु मीनाक्षी गुरुक्कल की फुर्ती देख आप हो जाएंगे हैरान, इनकी हिम्मत को देख सरकार ने पद्मश्री सम्मान से किया सम्मानित
दुनिया में अपनी पहचान बनाने की कोई उम्र नहीं होती। इंसान की उम्र भी कुछ करने के जुनून को के बीच में बाधा नहीं बनती। इस बात की प्रत्यक्ष उदाहरण है 80 साल की केरल की रहने वाली मीनाक्षी गुरुक्कल जिन्हें लोग प्यार से मीनाक्षी अम्मा (Meenakshi Amma) कहते हैं। वो दिलेरी की जीती जागती मिसाल हैं। मीनाक्षी अम्मा (Meenakshi Amma) मार्शल आर्ट कलारीपयट्ट (Kalaripayattu) की एक्सपर्ट हैं और इस उम्र में भी इसका नियमित अभ्यास करती हैं। उम्र के इस पड़ाव में भी उनका जोश देखते ही बनता हैं। वो 80 साल की उम्र में भी पूरे जोश से तलवारबाजी करती हैं। कलारीपयट्ट तलवारबाजी और लाठियों से खेला जाने वाला केरल का एक प्राचीन मार्शल आर्ट हैं। मीनाक्षी ने इस आर्ट को आज भी जीवंत रखा हुआ है। उनके इस कार्य के लिए भारत सरकार ने उन्हें देश के सर्वोच्च सम्मान में से एक पद्मश्री सम्मान से नवाज़ा है। लेकिन मीनाक्षी अम्मा के लिए केरल के एक छोटे से गांव से निकलकर पद्मश्री सम्मान पाने तक का सफर तय करना इतना आसान नहीं था। आइए जानते हैं उनके जीवन का प्रेरणादायी सफर।
अपनी कला से युवाओं के भी छक्के छुड़ा देती हैं
मीनाक्षी अम्मा (Meenakshi Amma) मार्शल आर्ट कलारीपयट्ट (Kalaripayattu) में इतनी पारंगत हैं कि इस विधा के युवाओं के भी छक्के बड़ी आसानी से छुड़ा देती हैं। मीनाक्षी अम्मा कलारीपयट्ट का प्रशिक्षण भी देती हैं इसलिए उन्हें गुरुक्कल यानि गुरु का दर्जा भी दिया गया है। वह पिछले कई वर्षों से लड़कियों को आत्मरक्षा के लिए प्रशिक्षित कर रही हैं। उन्होंने इसे ही अपने जीवन का उद्देश्य बना लिया हैं। वो लड़कियों के साथ लड़को को भी मार्शल आर्ट की ट्रेनिंग देती हैं। उनकी चुस्ती और स्फुर्ति को देख हर कोई हैरान रह जाता है।
7 साल की उम्र में ही शुरू कर दिया था प्रशिक्षण लेना
केरल की रहने वाली मीनाक्षी अम्मा (Meenakshi Amma) जब सात साल थी। तभी से उन्होंने इस कला का प्रशिक्षण लेना शुरू कर दिया था। आमतौर पर लड़कियां किशोरावस्था की उम्र में प्रवेश करते ही इस मार्शल आर्ट का अभ्यास छोड़ देती हैं, लेकिन उन्होंने अपने पिता की प्रेरणा से इस विधा का अभ्यास करना जारी रखा। मीनाक्षी इससे ताउम्र जुड़ी रहना चाहती हैं।
1949 से ही दे रही हैं निःशुल्क प्रशिक्षण
आज के समय में जब कला को सिखाने के लिए मोटी फीस वसूलना आम हो गया है, ऐसे समय में भी मीनाक्षी अम्मा (Meenakshi Amma) संगम में कलारीपयट्ट सिखाने के लिए कोई फीस नहीं लेती हैं। मीनाक्षी अम्मा ने 1949 में शुरू हुई इस परंपरा को आज भी जारी रखा हुआ है। कलारीपयट्ट ताइची और कुंगफू जैसे अन्य मार्शल आर्ट्स से अलग हैं इसमें आप लड़ने के साथ ही खुद को बचाने और इसमें चोटिल होने पर अपना इलाज करना भी सीखते हैं।
हजारों लोगों को कर चुकी हैं प्रशिक्षित
मीनाक्षी गुरुक्कल (Meenakshi Amma) अब तक हजारों लड़के-लड़कियों को मार्शल आर्ट सिखा चुकी हैं। वे कहती हैं कि ‘जब मैं सात साल की थी तब मेरे पिता मुझे केलारी सिखाने ले गए थे। तब उनका बहुत विरोध हुआ था। आज परिस्थितियां ऐसी हो गई हैं कि लड़कियों का अकेले बाहर निकलना मुश्किल हो गया है। ऐसे में हर लड़की को आत्मरक्षा का प्रशिक्षण लेना ही चाहिए। इससे वे मजबूत बनती हैं और उनमें आत्मविश्वास भी आता है। मैंने अपनी बेटी और बहू को भी मार्शल आर्ट सिखाया है।’
सोशल मीडिया के वायरल वीडियो से मिली पहचान
मीनाक्षी गुरुक्कल (Meenakshi Amma) के इस हुनर को उस वक्त नई और खास पहचान मिली, जब उनका एक वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हुआ था। इस वीडियो में मीनाक्षी अम्मा कलारीपयट्ट में अपने से करीब आधी उम्र के एक पुरुष पर भारी पड़ती नजर आ रही थीं। मीनाक्षी अम्मा अपने इस हुनर को लड़कियों की सुरक्षा के लिए वरदान मानती हैं।
वे कहती हैं कि - 'आज जब लड़कियों के देर रात घर से बाहर निकलने को सुरक्षित नहीं समझा जाता और इस पर सौ सवाल खड़े किए जाते हैं, कलारीपयट्ट ने उनमें इतना आत्मविश्वास पैदा कर दिया है कि उन्हें देर रात भी घर से बाहर निकलने में किसी प्रकार की झिझक या डर महसूस नहीं होती।'
पद्मश्री सम्मान से हुईं सम्मानित
अपने मार्शल आर्ट के हुनर से हर किसी को अपना फैन बनाने वाली मीनाक्षी गुरुक्कल (Meenakshi Amma) के कार्यों को देखते हुए भारत सरकार ने उन्हें देश के सर्वोच्च सम्मान में से एक पद्मश्री सम्मान से सम्मानित किया है। पद्मश्री मिलने मार्शल आर्ट गुरु मीनाक्षी अम्मा कहती हैं कि, "मैं यह नहीं कह सकती कि पद्म पुरस्कार जीतना मेरा सपना पूरे होने जैसा है, क्योंकि कभी भी मेरे दिल या दिमाग में ऐसा कोई पुरस्कार जीतने का कोई ख्याल नहीं आया। वह इसका श्रेय अपने दिवंगत पति राघवन गुरुक्कल को देती हैं, जो उन्हें कलारीपयट्ट सिखाने वाले उनके गुरु भी थे।"
मीनाक्षी अम्मा ने एक ऐसी कला से अपनी पहचान बनाई है, जो अधिक लोकप्रिय नहीं है। सात साल की उम्र से इस कला का प्रशिक्षण हासिल करने वाली मीनाक्षी अम्मा आज लाखों लोगों के लिए प्रेरणास्त्रोत (Inspiration) है। मीनाक्षी गुरुक्कल ने अपनी मेहनत और लगन के दम पर अपनी सफलता की कहानी (Success Story) लिखी हैं। Bada Business मीनाक्षी गुरुक्कल उर्फ मीनाक्षी अम्मा के कार्यों और उनकी दिल्लेरी की तहे दिल से सराहना करता है।
26/06/2021
“मैं कभी हारता नहीं,
या तो जीतता हूं,
या तो सीखता हूं”
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