Forget Depresion-Be Positive Every Time

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03/06/2023

कोई एक परीक्षा या कोई एक परिस्थिति आपके जीवन का निर्धारण नही कर सकती, यह मात्र एक पड़ाव था जो पार हो गया है......

03/06/2023

आप स्वयं पर विश्वास रखिये कि आप कर सकते है, क्योंकि आपने आज तक ऐसी बहुत सी उपलब्धि प्राप्त की है जिनकी आपने कल्पना भी न की थी।

01/06/2023

समस्या सभी को आती है, किन्तु जिस भगवान पर हमें विश्वास है उसके सहारे आसानी से उस समस्या से निपटा जा सकता है......

01/06/2023

मनुष्य प्रत्येक परिस्थिति में अपना सर्वोच्च दे सकता है, बशर्ते वह स्वयं पर विश्वास रखे.....

08/02/2017
10/01/2017

हम कितनी तरक्की कर चुके हैं, इस बात का अंदाजा शायद अब हम लगा पायें......

03/01/2017

Hahahahaaaaaaa............

28/12/2016

एक ऐसी पोस्ट, जिसने मुझे हिला दिया ।
मैं निरुत्तर सा हो गया, सोचने को विवश !!!

मन द्रवित हुआ इसलिये शेयर कर रहा हूँ । .......

😑 जिंदगी के सफ़र में चलते चलते हर मुकाम पर यही सवाल परेशान करता रहा....

कुछ रह तो नहीं गया ?..............

😑 3 महीने के बच्चे को दाई के पास रखकर जॉब पर जानेवाली माँ को, दाई ने पूछा... कुछ रह तो नहीं गया ?
पर्स, चाबी सब ले लिया ना ?

अब वो कैसे हाँ कहे ?
पैसे के पीछे भागते भागते... सब कुछ पाने की ख्वाईश में वो जिसके लिये सब कुछ कर रही है ,
*वह ही रह गया है.....*

😑 शादी में दुल्हन को बिदा करते ही शादी का हॉल खाली करते हुए दुल्हन की बुआ ने पूछा..."भैया, कुछ रह तो नहीं गया ना ?
चेक करो ठीक से ।. बाप चेक करने गया तो दुल्हन के रूम में कुछ फूल सूखे पड़े थे।
सब कुछ तो पीछे रह गया...
25 साल जो नाम लेकर जिसको आवाज देता था लाड से...
वो नाम पीछे रह गया और उस नाम के आगे गर्व से जो नाम लगाता था, वो नाम भी पीछे रह गया अब ...

"भैया, देखा ?
कुछ पीछे तो नहीं रह गया ?"
बुआ के इस सवाल पर आँखों में आये आंसू छुपाते बाप जुबाँ से तो नहीं बोला....
पर दिल में एक ही आवाज थी...

*सब कुछ तो यही रह गया...*

😑 बडी तमन्नाओ के साथ बेटे को पढ़ाई के लिए विदेश भेजा था और वह पढ़कर वही सैटल हो गया ,
पौत्र जन्म पर बमुश्किल 3 माह का वीजा मिला था और चलते वक्त बेटे ने प्रश्न किया सब कुछ चैक कर लिया कुछ रह तो नही गया ?
क्या जबाब देते कि
*अब छूटने को बचा ही क्या है ....*

😑 60 वर्ष पूर्ण कर सेवानिवृत्ति की शाम पी ए ने याद दिलाया चेक कर ले सर कुछ रह तो नही गया,
थोडा रूका और सोचा पूरी जिन्दगी तो यही आने- जाने मे बीत गई !
*अब और क्या रह गया होगा ?*

😑 *"कुछ रह तो नहीं गया ?*

" शमशान से लौटते वक्त किसी ने पूछा, नहीं कहते हुए वो आगे बढ़ा...
पर नजर फेर ली,
एक बार पीछे देखने के लिए....पिता की चिता की सुलगती आग देखकर मन भर आया ।
भागते हुए गया , पिता के चेहरे की झलक तलाशने की असफल कोशिश की और वापिस लौट आया ।

दोस्त ने पूछा... कुछ रह गया था क्या?

भरी आँखों से बोला...
*नहीं कुछ भी नहीं रहा अब...*
*और जो कुछ भी रह गया है वह सदा मेरे साथ रहेगा* ।।

😑 एक बार समय निकालकर सोचे , शायद पुराना समय याद आ जाए, आंखें भर आएं और *आज को जी भर जीने का मकसद मिल जाए*।
.......मैं अपने सभी दोस्तों से ये ही बोलना चाहता हूँ.......

*यारों क्या पता कब*
*इस जीवन की शाम हो जाये.......*

इससे पहले ऐसा हो सब को गले लगा लो, दो प्यार भरी बातें कर लो.....

*ताकि कुछ छूट न जाये .....*

🌹😊😊🌹

26/12/2016

बाधायें आती हैं आयें
घिरें प्रलय की घोर घटायें,
पावों के नीचे अंगारे,
सिर पर बरसें यदि ज्वालायें,
निज हाथों में हंसते-हंसते,
आग लगाकर जलना होगा।
कदम मिलाकर चलना होगा।

हास्य-रूदन में, तूफानों में,
अगर असंख्यक बलिदानों में,
उद्यानों में, वीरानों में,
अपमानों में, सम्मानों में,
उन्नत मस्तक, उभरा सीना,
पीड़ाओं में पलना होगा।
कदम मिलाकर चलना होगा।

उजियारे में, अंधकार में,
कल कहार में, बीच धार में,
घोर घृणा में, पूत प्यार में,
क्षणिक जीत में, दीघर हार में,
जीवन के शत-शत आकर्षक,
अरमानों को ढ़लना होगा।
कदम मिलाकर चलना होगा।

सम्मुख फैला अगर ध्येय पथ,
प्रगति चिरंतन कैसा इति अब,
सुस्मित हर्षित कैसा श्रम श्लथ,
असफल, सफल समान मनोरथ,
सब कुछ देकर कुछ न मांगते,
पावस बनकर ढ़लना होगा।
कदम मिलाकर चलना होगा।

कुछ कांटों से सज्जित जीवन,
प्रखर प्यार से वंचित यौवन,
नीरवता से मुखरित मधुबन,
परहित अर्पित अपना तन-मन,
जीवन को शत-शत आहुति में,
जलना होगा, गलना होगा।
कदम मिलाकर चलना होगा।

By: - पं. अटल बिहारी वाजपेयी

06/12/2016

मँज़िले बड़ी ज़िद्दी होती हैं।
हासिल कहाँ नसीब से होती हैं।

मगर वहाँ तूफान भी हार जाते हैं।
जहाँ कश्तियाँ ज़िद पर होती हैँ।

"हमारी अपनी अपनी क्षमता" और "बाजार में उपलब्ध चीजें"

इंसान "अपनी अपनी क्षमता" और "बाजार में उपलब्ध सामान" के हिसाब से अपने माता पिता के लिए, अपने लिए, अपनी पत्नी, अपने बच्चों या अपने रिस्तेदारों, दोस्त यारों के लिए "सबसे सर्वश्रेस्ट चीज" खरीदता हैं, ये इस दुनिया में आये हुए हर इंसान का जन्म से ही स्वभाव होता है.

इसमें "गरीब, अमीर, जात पात" का कोई लेना देना नहीं होता ….

इस दुनिया का हर इंसान जी हाँ हर इंसान "अपनी अपनी क्षमता" और "बाजार में उपलब्ध चीजों" के हिसाब से ही अपने लिए सबसे बढ़िया चीज ही खरीदता या देखता है …...

कुछ उदाहरण देखते हैं ……...
1) क्या हम अपने "बच्चों को पढ़ाने" के लिए "सबसे बढ़िया स्कूल, कोचिंग या शिक्षक" के पास नहीं भेजना चाहते ?
2) क्या हम घर में "खाने" के लिए "सबसे बढ़िया अनाज, सब्जी या फल" नहीं लाते ?
3) क्या हम "बीमार" होने पर "सबसे बढ़िया डॉक्टर" के पास नहीं जाते ?
4) क्या हम "मकान" बनाने के लिए "सबसे बढ़िया कांट्रेक्टर" को नहीं ढूंढ़ते ?
5) क्या हम "नौकरी" के लिए, अपने बच्चों को "सबसे बढ़िया कंपनी" में नहीं भेजना चाहते ?
6) क्या हम अपने बच्चों की “शादी” के लिए “सबसे बढ़िया रिश्ता” नहीं ढूंढते ?
7) क्या हम "आध्यात्मिक ज्ञान" के लिए "सबसे बढ़िया गुरु" नहीं खोजते ?

इसी तरह हर जगह क्या हम "अपनी अपनी क्षमता" और "बाजार में उपलब्ध सामान" के अनुसार "सबसे बढ़िया" लेने की कोशिश नहीं करते ?

जी हाँ बिलकुल करते हैं इसमें कोई शक नहीं क्योँकि ये सब हम "सिर्फ और सिर्फ" "अपने" लिए करते हैं…. इसी तरह
सबसे "बढ़िया" - "अपने लोग"
सबसे "बढ़िया" - "अपना घर"
सबसे "बढ़िया" - "अपनी कॉलोनी"
सबसे "बढ़िया" - "अपना प्रदेश"
और
सबसे "बढ़िया" - "अपना देश"

किसी ने सही कहा है :-

मँज़िले बड़ी ज़िद्दी होती हैं।
हासिल कहाँ नसीब से होती हैं।

मगर वहाँ तूफान भी हार जाते हैं।
जहाँ कश्तियाँ ज़िद पर होती हैँ।

क्योँकि

क्या कभी हमने सुना है कि ... अंधेरों ने उजाला न होने दिया हो .......

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15/08/2016

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