SHRI VIDYA

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25/07/2023

सावन राधा कृष्ण भजन
शुभ दिन आन लगे सावन के
झूला झूलत नन्द किशोर

1 कहाँ से आई राधिका रानी कहाँ से नन्द किशोर
बरसाने से आई राधा रानी, गोकुल नन्द किशोर

2 कौना झूले कौन झूलावे कौना खींचे डोर
राधा झूले श्याम झूलावे ललिता खींचे डोर
3 उमड़ घूमड़ घन गर्जन लागे पवन चले पुरजोर
राग मल्हार गाय रही गोपी, होके भाव विभोर
4 वृन्दावन की कुंज गलिन मे धूम मची चहु ओर
छुपा लइ राधा ने बंसरी, तो ढूंढ़त है जुगल किशोर

29/11/2021

क्रोधभट्टारक ‘दुर्वासा ’

सबसे पहले दुर्वासा का नाम उल्लेखनीय है । तान्त्रिक साहित्य में ‘क्रोध भट्टारक ’ नाम से इनका परिचय मिलता हैं । प्रसिद्धि के अनुसार इन्होंने श्रीकृष्ण को ६४ अद्वैतागमों को पढाया था । यह भी किंवदन्ती है कि कलियुग में दुर्वासा द्वारा ही आगम प्रकाश में लाय गये । नेपाल दरबार के ग्रन्थागार में सुरक्षित महिम्नः स्तोत्र की एक पोथी में इनके सम्बन्ध में लिखा है - ‘सर्वासामुपनिषदां दुर्वासा जयति देशिकाः प्रथमः ’ । जयद्रथयामल नामक आगम है अनुसार भी तन्त्र के प्रवर्तक ऋषियों में दुर्वासा का नाम ब्रह्मयामलानुसारी सभी तन्त्रों के भीतर दुर्वासा -मत प्रथम है । यह बात दरबार ग्रन्थागार में उपलब्ध पिंगलागम में पिंगला -मत के प्रसंग में उल्लिखित है । अर्धचन्द्रकला विद्याओं के भीतर भी दुर्वासा का मत उल्लेखनीय है । चन्द्रकला (श्री ) विद्याएँ कौल तथा सोम (कापालिक ) मतों की संमिश्रम हैं । प्राचीन काल में इन विद्याओं में चारों वर्णो का अधिकार था , किन्तु विशेष यह था त्रैवार्णिक लो दक्षिण -मार्ग से अनुष्ठान करते थे और अन्य लोग वाम -मार्ग से ।

दुर्वासा श्रीमाता के उपासक थे । श्रीमाता के द्वादशविध उपासकों में उनका भी एक नाम है । सुनने में आता है उनकी उपास्य षडक्षरी विद्या थी । किसी -किसी के मत में ये त्रयोदशाक्षरी विद्या के उपासक थे । सौन्दर्य -लहरी की टीका में कैवल्याश्रम ने इस विद्या का कादि मत के अनुसार उद्धार भी किया है । इतने बाद भी दुर्वासा का सम्प्रदाय इस समय लुप्तप्राय ही है ।

निम्नलिखित ग्रन्थों में दुर्वासा की चर्चा है ---

१ . त्रिपुर -सुन्दरी (देवी ) - महिम्नःस्तोत्र -टीका में नित्यानन्द नाथ ने कहा है -

सकलागमाचार्यचक्रवती साक्षात् ‍ शिव एव अनसूयागर्भसस्भूतः क्रोधभट्टारका -ख्यो दुर्वासा महामुनिः ।

२ . ललितास्तव -रत्न ।

३ . परशिव -महिम्नः स्तोत्र अथवा परशम्भु -स्तुति।

इस प्रकार दुर्वासा श्रीविद्या तथा परमशिव के उपासक थे । कालीसुधानिधि ग्रन्थ से यह पता चलता है कि ये काली के भी उपासक थे ।

07/11/2020

देवता बनकर ही देवता की पुजा करने का आदेश है शास्त्र मे, श्री विद्या पुजन मे सबसे पहले भुत शुध्धि का विधान है,जिसमे प्रानायाम द्वारा ह्रदय मे स्थित पाप पुरुस का दहन कर शरिर का उतपादन कर सन्सकार ,प्राण प्रतिश्टा , मात्रका आदि न्यासो मन्त्रमय शरिर बनाया जाता है, जिसमे देव भाव को जगह दी जाति है, या देवभाव का जागरन किया जाता है, इस प्रकार स्वस्थ मन ,साफ वस्त्र , सुगन्धित वस्तुओ से पुजा की जाति है ,
मन की यहि स्थिथि आगे चलके समाधि मे पहुचाति है, या सहायक होति है,

27/10/2020

विभिन्न ‘तन्त्र’-प्रणेताओं के विचार-द्वारा ‘तन्त्रों’ को तीन भागों में विभक्त कर सकते हैं-
१॰ श्री सदा-शिवोक्त तन्त्र, २॰ पार्वती-कथित तन्त्र, ३॰ ऋषिगण-प्रणीत तन्त्र ग्रन्थ। ये १॰ आगम , २॰ निगम, और ३॰ आर्ष तन्त्र कहलाते हैं।
यह एक स्वतन्त्र शास्त्र है, जो पूजा और आचार-पद्धति का परिचय देते हुए इच्छित तत्त्वों को अपने अधीन बनाने का मार्ग दिखलाता है। इस प्रकार यह साधना-शास्त्र है। इसमें साधना के अनेक प्रकार दिखलाए गए हैं, जिनमें देवताओं के स्वरुप, गुण, कर्म आदि के चिन्तन की प्रक्रिया बतलाते हुए ‘पटल, कवच, सहस्त्रनाम तथा स्तोत्र’- इन पाँच अंगों वाली पूजा का विधान किया गया है। इन अंगों का विस्तार से परिचय इस प्रकार हैः-
(क) पटल – इसमें मुख्य रुप से जिस देवता का पटल होता है, उसका महत्त्व, इच्छित कार्य की शीघ्र सिद्धि के लिए जप, होम का सूचन तथा उसमें उपयोगी सामग्री आदि का निर्देशन होता है। साथ ही यदि मन्त्र शापित है, तो उसका शापोद्धार भी दिखलाया जाता है।
(ख) पद्धति – इसमें साधना के लिए शास्त्रीय विधि का क्रमशः निर्देश होता है, जिसमें प्रातः स्नान से लेकर पूजा और जप समाप्ति तक के मन्त्र तथा उनके विनियोग आदि का सांगोपांग वर्णन होता है। इस प्रकार नित्य पूजा और नैमित्तिक पूजा दोनों प्रकारों का प्रयोग-विधान तथा काम्य-प्रयोगों का संक्षिप्त सूचन इसमें सरलता से प्राप्त हो जाता है।
(ग) कचव – प्रत्येक देवता की उपासना में उनके नामों के द्वारा उनका अपने शरीर में निवास तथा रक्षा की प्रार्थना करते गुए जो न्यास किए जाते हैं, वे ही कचव रुप में वर्णित होते हैं। जब ये ‘कचव’ न्यास और पाठ द्वारा सिद्ध हो जाते हैं, तो साधक किसी भी रोगी पर इनके द्वारा झाड़ने-फूंकने की क्रिया करता है और उससे रोग शांत हो जाते हैं। कवच का पाठ जप के पश्चात् होता है। भूर्जपत्र पर कवच का लेखन, पानी का अभिमन्त्रण, तिलकधारण, वलय, ताबीज तथा अन्य धारण-वस्तुओं को अभिमन्त्रित करने का कार्य भी इन्हीं से होता है।
(घ) सहस्त्रनाम – उपास्य देव के हजार नामों का संकलन इस स्तोत्र में रहता है। ये सहस्त्रनाम ही विविध प्रकार की पूजाओं में स्वतन्त्र पाठ के रुप में तथा हवन-कर्म में प्रयुक्त होते है। ये नाम देवताओं के अति रहस्यपूर्ण गुण-कर्मों का आख्यान करने वाले, मन्त्रमय तथा सिद्ध-मंत्ररुप होते हैं। इनका स्वतन्त्र अनुष्ठान भी होता है।
(ङ) स्तोत्र – आराध्य देव की स्तुति का संग्रह ही स्तोत्र कहलाता है। प्रधान रुप से स्तोत्रों में गुण-गान एवँ प्रार्थनाएँ रहती है; किन्तु कुछ सिद्ध स्तोत्रों में मन्त्र-प्रयोग, स्वर्ण आदि बनाने की विधि, यन्त्र बनाने का विधान, औषधि-प्रयोग आदि भी गुप्त संकेतों द्वारा बताए जाते हैं। तत्त्व, पञ्जर, उपनिषद् आदि भी इसी के भेद-प्रभेद हैं। इनकी संख्या असंख्य है।
इन पाँच अंगों से पूर्ण शास्त्र ‘तन्त्र शास्त्र’ कहलाता है।

09/09/2020

तन्त्र शास्त्र क्या है ?
तन्त्र-शास्त्रों के लक्षणों के विषय में ऋषियों ने शास्त्रों में जो वर्णन किया है, उसके अनुसार निम्न विषयों का जिस शास्त्र में वर्णन किया गया हो, उसको ‘तन्त्र-शास्त्र’ कहते हैं।
१॰ सृष्टि-प्रकरण, २॰ प्रलय-प्रकरण, ३॰ तन्त्र-निर्णय, ४॰ दैवी सृष्टि का विस्तार, ५॰ तीर्थ-वर्णन, ६॰ ब्रह्मचर्यादि आश्रम-धर्म, ७॰ ब्राह्मणादि-वर्ण-धर्म, ८॰ जीव-सृष्टि का विस्तार, ९॰ यन्त्र-निर्णय, १०॰ देवताओं की उत्पत्ति, ११॰ औषधि-कल्प, १२॰ ग्रह-नक्षत्रादि-संस्थान, १३॰ पुराणाख्यान-कथन, १४॰ कोष-कथन, १५॰ व्रत-वर्णन, १६॰ शौचा-शौच-निर्णय, १७॰ नरक-वर्णन, १८॰ आकाशादि पञ्च-तत्त्वों के अधिकार के अनुसार पञ्च-सगुणोपासना, १९॰ स्थूल ध्यान आदि भेद से चार प्रकार का ब्रह्म का ध्यान, २०॰ धारणा, मन्त्र-योग, हठ-योग, लय-योग, राज-योग, परमात्मा-परमेश्वर की सब प्रकार की उपासना-विधि, २१॰ सप्त-दर्शन-शास्त्रों की सात ज्ञान-भूमियों का रहस्य, २२॰ अध्यात्म आदि तीन प्रकार के भावों का लक्ष्य, २३॰ तन्त्र और पुराणों की विविध भाषा का रहस्य, २४॰ वेद के षङंग, २५॰ चारों उप-वेद, प्रेत-तत्त्व २६॰ रसायन-शास्त्र, रसायन सिद्धि, २७॰ जप-सिद्धि, २८॰ श्रेष्ठ-तप-सिद्धि, २९॰ दैवी जगत्-सम्बन्धीय रहस्य, ३०॰ सकल-देव-पूजित शक्ति का वर्णन, ३१॰ षट्-चक्र-कथन, ३२॰ स्त्री-पुरुष-लक्षण वर्णन, ३३ राज-धर्म, दान-धर्म, युग धर्म, ३४॰ व्वहार-रीति, ३५॰ आत्मा-अनात्मा का निर्णय इत्यादि।
विभिन्न ‘तन्त्र’-प्रणेताओं के विचार-द्वारा ‘तन्त्रों’ को तीन भागों में विभक्त कर सकते हैं-
१॰ श्री सदा-शिवोक्त तन्त्र, २॰ पार्वती-कथित तन्त्र, ३॰ ऋषिगण-प्रणीत तन्त्र ग्रन्थ। ये १॰ आगम , २॰ निगम, और ३॰ आर्ष तन्त्र कहलाते हैं।
यह एक स्वतन्त्र शास्त्र है, जो पूजा और आचार-पद्धति का परिचय देते हुए इच्छित तत्त्वों को अपने अधीन बनाने का मार्ग दिखलाता है। इस प्रकार यह साधना-शास्त्र है। इसमें साधना के अनेक प्रकार दिखलाए गए हैं, जिनमें देवताओं के स्वरुप, गुण, कर्म आदि के चिन्तन की प्रक्रिया बतलाते हुए ‘पटल, कवच, सहस्त्रनाम तथा स्तोत्र’- इन पाँच अंगों वाली पूजा का विधान किया गया है। इन अंगों का विस्तार से परिचय इस प्रकार हैः-
(क) पटल – इसमें मुख्य रुप से जिस देवता का पटल होता है, उसका महत्त्व, इच्छित कार्य की शीघ्र सिद्धि के लिए जप, होम का सूचन तथा उसमें उपयोगी सामग्री आदि का निर्देशन होता है। साथ ही यदि मन्त्र शापित है, तो उसका शापोद्धार भी दिखलाया जाता है।
(ख) पद्धति – इसमें साधना के लिए शास्त्रीय विधि का क्रमशः निर्देश होता है, जिसमें प्रातः स्नान से लेकर पूजा और जप समाप्ति तक के मन्त्र तथा उनके विनियोग आदि का सांगोपांग वर्णन होता है। इस प्रकार नित्य पूजा और नैमित्तिक पूजा दोनों प्रकारों का प्रयोग-विधान तथा काम्य-प्रयोगों का संक्षिप्त सूचन इसमें सरलता से प्राप्त हो जाता है।
(ग) कचव – प्रत्येक देवता की उपासना में उनके नामों के द्वारा उनका अपने शरीर में निवास तथा रक्षा की प्रार्थना करते गुए जो न्यास किए जाते हैं, वे ही कचव रुप में वर्णित होते हैं। जब ये ‘कचव’ न्यास और पाठ द्वारा सिद्ध हो जाते हैं, तो साधक किसी भी रोगी पर इनके द्वारा झाड़ने-फूंकने की क्रिया करता है और उससे रोग शांत हो जाते हैं। कवच का पाठ जप के पश्चात् होता है। भूर्जपत्र पर कवच का लेखन, पानी का अभिमन्त्रण, तिलकधारण, वलय, ताबीज तथा अन्य धारण-वस्तुओं को अभिमन्त्रित करने का कार्य भी इन्हीं से होता है।
(घ) सहस्त्रनाम – उपास्य देव के हजार नामों का संकलन इस स्तोत्र में रहता है। ये सहस्त्रनाम ही विविध प्रकार की पूजाओं में स्वतन्त्र पाठ के रुप में तथा हवन-कर्म में प्रयुक्त होते है। ये नाम देवताओं के अति रहस्यपूर्ण गुण-कर्मों का आख्यान करने वाले, मन्त्रमय तथा सिद्ध-मंत्ररुप होते हैं। इनका स्वतन्त्र अनुष्ठान भी होता है।
(ङ) स्तोत्र – आराध्य देव की स्तुति का संग्रह ही स्तोत्र कहलाता है। प्रधान रुप से स्तोत्रों में गुण-गान एवँ प्रार्थनाएँ रहती है; किन्तु कुछ सिद्ध स्तोत्रों में मन्त्र-प्रयोग, स्वर्ण आदि बनाने की विधि, यन्त्र बनाने का विधान, औषधि-प्रयोग आदि भी गुप्त संकेतों द्वारा बताए जाते हैं। तत्त्व, पञ्जर, उपनिषद् आदि भी इसी के भेद-प्रभेद हैं। इनकी संख्या असंख्य है।
इन पाँच अंगों से पूर्ण शास्त्र ‘तन्त्र शास्त्र’ कहलाता है।

01/09/2020

कुंडलिनी जागरण के प्रारंभिक अनुभव : जब कुंडलिनी जाग्रत होने लगती है तो व्यक्ति को देवी-देवताओं के दर्शन होने लगती हैं। ॐ या हूं हूं की गर्जना सुनाई देने लगती है। आंखों के सामने पहले काला, फिर पील और बाद में नीला रंग दिखाई देना लगता है।

उसे अपना शरीर हवा के गुब्बारे की तरह हल्का लगने लगता है। वह गेंद की तरह एक ही स्थान पर अप-डाउन होने लगता है। उसके गर्दन का भाग ऊंचा उठने लगता है। उसे सिर में चोटी रखने के स्थान पर अर्थात सहस्रार चक्र पर चींटियां चलने जैसा अनुभव होता है और ऐसा लगता है कि मानो कुछ है जो ऊपर जाने की कोशिश कर रहा है। रीढ़ में कंपन होने लगता है। इस तरह के प्रारंभिक अनुभव होते हैं।

24/07/2020

♦️कालसर्प की शांति कराने के बाद भी योग्य परिणाम देखने को नही मिलरहे।
♦️कुंडली मे राहु केतु ग्रहण योग बना रहे है ।
♦️स्वप्न में सर्प ज्यादा दिखाई देते है।
♦️घर मे सर्प निकलते रहते है।मन में सदा सर्प भय बना रहता हो।जो घर नागों का अड्डा बन गया हो,जिस घर मे नागों के वजह से दारुण स्थिति बन गयी हो।
♦️सर्प दंश से किसी की मृत्यु हुई हो,अथवा दंस के बाद ब्यक्ति बच गया हो पर भयभीत रहता हो।
♦️कुंडली मे किसी भी प्रकार की सर्प बाधा अथवा राहुकेतु युति हो तो।
♦️यदि आप किसी विषाक्त रोग से लंबे समय से ग्रस्त है तो
दूसरे झंझटो में पड़े बिना नागपंचमी को करे यह कभी न फेल होनेवाला अभिष्ट उपाय।।
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♦️किसी योग्य वैदिक ब्राह्मण द्वारा नागपंचमी को आप के कुंडली मे स्थित राहु केतू युति के निराकरण के साथ साथ उपरोक्त सभी समस्याओं से मुक्ति के लिए भगवती मनसा देवी का स्थापन पूजन शिव और 12 नागों के साथ षोडशोपचार विधि से कराए।
🔸उसके बाद काले तिल और कामलकाकडी(कमलगट्टे) से इस मंत्र से 1008 आहुति दे।
्रीं_श्रीं_क्लीं_ऐं_मनसादेव्यै_स्वाहा।।
फिर ग्रहादि होम निपटाए,
फिर गुग्गल से 108 आहुति अघोर मंत्र की
(अघोरेभ्योऽथ घोरेभ्यो घोरघोरतरेभ्यः सर्वेभ्यः
सर्वशर्वेभ्यो नमस्तेऽस्तु रुद्ररूपेभ्यः।।) दे !
🔸नाग मनसा देवी और दिक्पालों को खीर की बलि प्रदान करे।भगवती मनसा देवी को खीर का ही नैवेद्य अर्पण करें।
♦️यज्ञ विधि पूरी होने के बाद इन नामस्त्रोत्र से 108 बार बिल्व पत्र भगवती मनसा देवी को अर्पित करे।
🔸जरत्कारु र्जगदगौरी मनसा सिध्द योगिनी।
वैष्णवी नाग भगिनी शैवी नागेश्वरी तथा।।
जरत्कारु प्रिया आस्तिकमाता विष हरेती च।
महाज्ञानयुता चैव सा देवी विश्वपूजिता।।🐍
🔸आरती इत्यादि क्रम निपटा के ब्राह्मण को योग्य दक्षिणा,वस्त्र,और अन्न दान दे।
फिर उन 12 नागों में से -:
☘️☘️☘️☘️☘️☘️☘️
🔸5नाग महादेव के लिंग पे ,
🔸2नाग पार्वती के पास,
🔸2नाग गणेश के पास,
🔸1नाग बहते जल में प्रवाहित कर दे।
🔸2नाग/नागिन किसी नदी,तालाब किनारे के झाड़ी में रख दे जाते समय किसी से कुछ बोले न लौटते समय पीछे मुड़ के देखे।
घर आने के बाद वस्त्र सहित स्नान करे उस वस्त्र को बदल कर उसे बिना धोए बिना निचोड़े सूखने के लिए डाल दे अगले दिन उस वस्त्र को कुछ पैसों के साथ किसी भिखारी को दान कर दे।
घर के मंदिर में दिया जलाए और अपने इष्ट देव /या कुल देव से वंश वृद्धि,धन,और आरोग्यता की प्रार्थना करे।
🔸वैसे तो सदभाग्यहीन मानवो का स्वभाव है कि उसके पास कितना भी धन हो अथवा वह कितना भी दुखी हो फिर भी वह उस धन को जल्दी से धर्म मे नही खर्च नही करना चाहता।
परन्तु यदि वास्तव में संबंधित परेशान ब्यक्ति यदि सामर्थ्यवान न हो। जिसकी स्थिति सही न हो, वह एक तांबे का नाग ले के उसका अभिषेक दूध+कालेतिल+अष्टगंध को मिश्रित कर इस मंत्र के 1008 पाठ से करे।
्रीं_श्रीं_क्लीं_ऐं_मनसादेव्यै_स्वाहा।।
फिर उस नाग को अपने और अपने परिवार के सदस्यों के माथे से 7 बार उतार के किसी नदी,तालाब किनारे के झाड़ी में रख दे जाते समय किसी से कुछ बोले न लौटते समय पीछे मुड़ के देखे न घर आने के बाद वस्त्र सहित स्नान करे उस वस्त्र को बदल कर उसे बिना धोए बिना निचोड़े सूखने के लिए डाल दे अगले दिन उस वस्त्र को कुछ पैसों के साथ किसी भिखारी को दान कर दे।
यह उपाय करने के 3 महीनों के अंदर ही आप को उपाय का असर दिखने लगेगा।
#विषेश👇🏼👇🏼
🔸लोककल्याण के निमित्त यह गूढ़ और गुप्त उपाय प्रस्तुत किया हु।जो कर, करवा सके वह करवा लें।फायदा अवश्य होगा यदि उपाय के प्रति दृढ़ विश्वास अथवा श्रद्धा होतो बाकी
ारथ_है_जग_माहीं।
#करमहीन_नर_पावत_नाहीं।।
🔸किसी भी समस्या समाधान के लिए आप पेज पे दिए दूरभाष अंकों पे संपर्क स्थापित कर सकते है ध्यान रहे सारी सेवाएं सशुल्क है।
🙇 #जयश्रीसीताराम🙇

02/06/2020

मन्त्रार्थ ग्यान के बिना मन्त्र जप करने वाला उस गधे के समान हो जाता है जिसके ऊपर चन्दन लादा गया हो ।लेकिन वो चन्दन की महिमा तो नही बस चन्दन का बोझ ढोता है ।

27/04/2020

जय माँई ! जय स्वामीजी महाराज !
प्रिय मित्रों,भक्तों व स्नेहीजनों
इन दिनों फेसबुक पर यह चर्चा है की भगवती पीताम्बरा (बगलामुखी) जयंती कब मनाई जायें।
कोई कहता है 'चतुर्थी' तो कोई कहता है 'अष्टमी' को। लेकिन कोई भी शास्त्रोक्त प्रमाणों द्वारा सिद्ध नहीं कर पाया और जिसने भी प्रमाण प्रस्तुत किये तो उनके ठीक विपरीत अपनी हठधर्मिता का परिचय देते हुए 'अष्टमी' को ही जयंती घोषित कर दी जबकि उन्होंने स्वयं 'चतुर्दशी' प्रमाणों में दी हैं।
आइये "श्री श्रीस्वामीजी महाराज (पीताम्बरा पीठ दतिया) ने 'स्वतन्त्र तन्त्र ' के अनुसार अपना कथन इस प्रकार व्यक्त किया---
।। श्रीबगला महाविद्या।।
।। श्री श्रीस्वामीजी महाराज।।
।।पोस्ट संख्या-02।।
स्वतन्त्र तन्त्र में कहा गया है---
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अथ वक्ष्यामि देवेशि बगलाोत्पत्तिकारणम्।
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अथार्त श्री शंकरजी पार्वती से कहते हैं कि हे देवि ! श्रीबगला विद्या के आविर्भाव (उत्पत्ति) को कहता हूँ।
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पुरा कृतयुगे देवि वातक्षोभ उपस्थिते।।
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कृतयुग में सारे जगत् का नाश करने वाला वातक्षोभ(तूफान) उपस्थित हुआ।।
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चराचर विनाशाय विष्णुश्चिन्तापरायणा।
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उसे देखकर जगत् की रक्षा में नियुक्त भगवान विष्णु चिन्तापरायण हुए।
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तपस्यया च सन्तुष्टा महात्रिपुरसुन्दरी।।2।।
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हरिद्राख्यं सरो द्रष्ट्वाजलक्रीडा परायणा।
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महापीतह्रदस्यान्ते सौराष्ट्रे बगलाम्बिका।। 3।।
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उन्होंने सौराष्ट्र ( वर्तमान गुजरात का एक भाग ) देश में हरिद्रा सरोवर के समीप तपस्या कर श्रीत्रिपुरासुन्दरी भगवती को प्रसन्न किया।
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श्रीविद्या सम्भवं तेजो विजृम्भति इतस्ततः।
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श्रीविद्या महात्रिपुरसुन्दरी ने ही बगला रूप में प्रकट होकर समस्त तूफान को निवृत किया। त्रैलोक्य स्तम्भिनी ब्रह्मास्त्र महाविद्या श्रीविद्या एवं वैष्णव तेज से युक्त हुई।
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'चतुर्दशी' भौमयुता मकारेण समन्विता।।4।।
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कुलॠक्ष समायुक्ता वीररात्रिः प्रकीर्तिता।
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मंगलवार युक्त 'चतुर्दशी',मकार, कुल नक्षत्रों से युक्त वीररात्रि कही जाती है।
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तस्यामेवार्ध रात्रौ तु पीत ह्रद निवासिनी।। 5।।
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इसी की अर्धरात्रि (आधीरात, यानि 12 बजे) में श्रीपीताम्बरा बगलामुखी का अविर्भाव हुआ था।
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अब उक्त प्रमाणों से विद्वद्जन स्वयं निर्णय करे कि "भगवती पीताम्बरा बगलामुखी" जयंती कब है। हमें आशा है कि विद्वद्जन इस विषय पर शोध करेंगे। हम तो प्रयासरत है ही।
पीताम्बरा निलय
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क्रमशः................
कृपया comments में अपने विचार जरूर प्रकट करें।
जय माँई
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17/03/2020

कामकला काली के ११ उपासक

इन्द्र
वरुण
कुबेर
ब्रह्मा
महाकाल
बाण
रावण
यम
चन्द्र
विष्णु
महर्षिगण.

25/10/2019

श्रीविद्या - परिचय
एक बार पराम्बा पार्वती ने भगवान शिव से कहा कि आपके द्वारा प्रकाशित तंत्रशास्त्र की साधना से मनुष्य समस्त आधि-व्याधि, शोक-संताप, दीनता-हीनता से मुक्त हो जायेगा। किंतु सांसारिक सुख, ऐश्वर्य, उन्नति, समृद्धि के साथ जीवन-मरण के चक्र से मुक्ति कैसे प्राप्त हो इसका कोई उपाय बताईये।

भगवती पार्वती के अनुरोध पर कल्याणकारी शिव ने श्रीविद्या साधना प्रणाली को प्रकट किया। श्रीविद्या साधना भारतवर्ष की परम रहस्यमयी सर्वोत्कृष्ट साधना प्रणाली मानी जाती है। ज्ञान, भक्ति, योग, कर्म आदि समस्त साधना प्रणालियों का समुच्चय (सम्मिलित रूप) ही श्रीविद्या-साधना है।

श्रीविद्या साधना की प्रमाणिकता एवं प्राचीनता

जिस प्रकार अपौरूषेय वेदों की प्रमाणिकता है उसी प्रकार शिव प्रोक्त होने से आगमशास्त्र (तंत्र) की भी प्रमाणिकता है। सूत्ररूप (सूक्ष्म रूप) में वेदों में, एवं विशद्रूप से तंत्र-शास्त्रों में श्रीविद्या साधना का विवेचन है।

शास्त्रों में श्रीविद्या के बारह उपासक बताये गये है- मनु, चन्द्र, कुबेर, लोपामुद्रा, मन्मथ, अगस्त्य अग्नि, सूर्य, इन्द्र, स्कन्द, शिव और दुर्वासा ये श्रीविद्या के द्वादश उपासक है।

श्रीविद्या के उपासक आचार्यो में दत्तात्रय, परशुराम, ऋषि अगस्त, दुर्वासा, आचार्य गौडपाद, आदिशंकराचार्य, पुण्यानंद नाथ, अमृतानन्द नाथ, भास्कराय, उमानन्द नाथ प्रमुख है।

इस प्रकार श्रीविद्या का अनुष्ठान चार भगवत् अवतारों दत्तात्रय, श्री परशुराम, भगवान ह्यग्रीव और आद्यशंकराचार्य ने किया है। श्रीविद्या साक्षात् ब्रह्मविद्या है।

श्रीविद्या साधना

समस्त ब्रह्मांड प्रकारान्तर से शक्ति का ही रूपान्तरण है। सारे जीव-निर्जीव, दृश्य-अदृश्य, चल-अचल पदार्थो और उनके समस्त क्रिया कलापों के मूल में शक्ति ही है। शक्ति ही उत्पत्ति, संचालन और संहार का मूलाधार है।

जन्म से लेकर मरण तक सभी छोटे-बड़े कार्यो के मूल में शक्ति ही होती है। शक्ति की आवश्यक मात्रा और उचित उपयोग ही मानव जीवन में सफलता का निर्धारण करती है, इसलिए शक्ति का अर्जन और उसकी वृद्धि ही मानव की मूल कामना होती है। धन, सम्पत्ति, समृद्धि, राजसत्ता, बुद्धि बल, शारीरिक बल, अच्छा स्वास्थ्य, बौद्धिक क्षमता, नैतृत्व क्षमता आदि ये सब शक्ति के ही विभिन्न रूप है। इन में असन्तुलन होने पर अथवा किसी एक की अतिशय वृद्धि मनुष्य के विनाश का कारण बनती है। सर्वाधिक महत्वपूर्ण तथ्य है कि शक्ति की प्राप्ति पूर्णता का प्रतीक नहीं है, वरन् शक्ति का सन्तुलित मात्रा में होना ही पूर्णता है। शक्ति का सन्तुलन विकास का मार्ग प्रशस्त करता है। वहीं इसका असंतुलन विनाश का कारण बनता है। समस्त प्रकृति पूर्णता और सन्तुलन के सिद्धांत पर कार्य करती है।

मनुष्य के पास प्रचुर मात्र में केवल धन ही हो तो वह धीरे-धीरे विकारों का शिकार होकर वह ऐसे कार्यों में लग जायेगा जो उसके विनाश का कारण बनेगें। इसी प्रकार यदि मनुष्य के पास केवल ज्ञान हो तो वह केवल चिन्तन और विचारों में उलझकर योजनाएं बनाता रहेगा। साधनों के अभाव में योजनाओं का क्रियान्वयन नहीं हो पायेगा। यदि मनुष्य में असिमित शक्ति हो तो वह अपराधी या राक्षसी प्रवृत्ति का हो जायेगा। इसका परिणाम विनाश ही है।

जीवन के विकास और उसे सुन्दर बनाने के लिये धन-ज्ञान और शक्ति के बीच संतुलन आवश्यक है। श्रीविद्या-साधना वही कार्य करती है, श्रीविद्या-साधना मनुष्य को तीनों शक्तियों की संतुलित मात्रा प्रदान करती है और उसके लोक परलोक दोनों सुधारती है।

जब मनुष्य में शक्ति संतुलन होता है तो उसके विचार पूर्णतः पॉजिटिव (सकारात्मक, धनात्मक) होते है। जिससे प्रेरित कर्म शुभ होते है और शुभ कर्म ही मानव के लोक-लोकान्तरों को निर्धारित करते है तथा मनुष्य सारे भौतिक सुखों को भोगता हुआ मोक्ष प्राप्त करता है।

श्रीविद्या-साधना ही एक मात्र ऐसी साधना है जो मनुष्य के जीवन में संतुलन स्थापित करती है। अन्य सारी साधनाएं असंतुलित या एक तरफा शक्ति प्रदान करती है। इसलिए कई तरह की साधनाओं को करने के बाद भी हमें साधकों में न्यूनता (कमी) के दर्शन होते है। वे कई तरह के अभावों और संघर्ष में दुःखी जीवन जीते हुए दिखाई देते है और इसके परिणाम स्वरूप जन सामान्य के मन में साधनाओं के प्रति अविश्वास और भय का जन्म होता है और वह साधनाओं से दूर भागता है। भय और अविश्वास के अतिरिक्त योग्य गुरू का अभाव, विभिन्न यम-नियम-संयम, साधना की सिद्धि में लगने वाला लम्बा समय और कठिन परिश्रम भी जन सामान्य को साधना क्षेत्र से दूर करता है। किंतु श्रीविद्या-साधना की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि वह अत्यंत सरल, सहज और शीघ्र फलदायी है। सामान्य जन अपने जीवन में बिना भारी फेरबदल के सामान्य जीवन जीते हुवे भी सुगमता पूर्वक साधना कर लाभान्वित हो सकते है। परम पूज्य गुरूदेव डॉ. सर्वेश्वर शर्मा ने चमत्कारी शीघ्र फलदायी श्रीविद्या-साधना को जनसामान्य तक पहुचाने के लिए विशेष शोध किये और कई निष्णात विद्ववानों, साधकों और सन्यासियों से वर्षो तक विचार-विमर्श और गहन अध्ययन चिंतन के बाद यह विधि खोज निकाली जो जनसामान्य को सामान्य जीवन जीते हुए अल्प प्रयास से ही जीवन में सकारात्मक परिवर्तन कर सफलता और समृद्धि प्रदान करती है। गुरूदेव प्रणीत श्रीविद्या-साधना जीवन के प्रत्येक क्षे़त्र नौकरी, व्यवसाय, आर्थिक उन्नति, सामाजिक उन्नति, पारिवारिक शांति, दाम्पत्य सुख, कोर्ट कचहरी, संतान-सुख, ग्रह-नक्षत्रदोष शांति में साधक को पूर्ण सफलता प्रदान करती है। यह साधना व्यक्ति के सर्वांगिण विकास में सहायक है। कलियुग में श्रीविद्या की साधना ही भौतिक, आर्थिक समृद्धि और मोक्ष प्राप्ति का साधन है।

श्रीविद्या-साधना के सिद्धांत

संतुलन का सिद्धांत- शक्ति के सभी रूपों में धन-समृद्धि, सत्ता, बुद्धि, शक्ति, सफलता के क्षेत्र में।
संपूर्णता का सिद्धांत- धर्म-अर्थ-काम-मोक्ष की प्राप्ति।
सुलभता का सिद्धांत- मिलने में आसान।
सरलता का सिद्धांत- करने में आसान।
निर्मलता का सिद्धांत- बिना किसी दुष्परिणाम के साधना।
निरंतरता का सिद्धांत- सदा, शाश्वत लाभ और उन्नति।
सार्वजनिकता का सिद्धांत - हर किसी के लिए सर्वश्रेष्ठ साधना ।
देवताओं और ऋषियों द्वारा उपासित श्रीविद्या-साधना वर्तमान समय की आवश्यकता है। यह परमकल्याणकारी उपासना करना मानव के लिए अत्यंत सौभाग्य की बात है। आज के युग में बढ़ती प्रतिस्पर्धा, अशांति, सामाजिक असंतुलन और मानसिक तनाव ने व्यक्ति की प्रतिभा और क्षमताओं को कुण्ठित कर दिया है। क्या आपने कभी सोचा है कि हजारों प्रयत्नों के बाद भी आप वहां तक क्यों नहीं पहुच पाये जहां होना आपकी चाहत रही है ? आप के लिए अब कुछ भी असंभव नहीं है, चाहें वह सुख-समृद्धि हो, सफलता, शांति ऐश्वर्य या मुक्ति (मोक्ष) हो। ऐसा नहीं कि साधक के जीवन में विपरीत परिस्थितियां नहीं आती है। विपरीत परिस्थितियां तो प्रकृति का महत्वपूर्ण अंग है। संसार में प्रकाश है तो अंधकार भी है। सुख-दुःख, सही-गलत, शुभ-अशुभ, निगेटिव-पॉजिटिव, प्लस-मायनस आदि। प्रकाश का महत्व तभी समझ में आता है जब अंधकार हो। सुख का अहसास तभी होता हैं जब दुःख का अहसास भी हो चुका हो। श्रीविद्या-साधक के जीवन में भी सुख-दुःख का चक्र तो चलता है, लेकिन अंतर यह है कि श्रीविद्या-साधक की आत्मा व मस्तिष्क इतने शक्तिशाली हो जाते है कि वह ऐसे कर्म ही नहीं करता कि उसे दुःख उठाना पड़े किंतु फिर भी यदि पूर्व जन्म के संस्कारों, कर्मो के कारण जीवन में दुःख संघर्ष है तो वह उन सभी विपरीत परिस्थितियों से आसानी से मुक्त हो जाता है। वह अपने दुःखों को नष्ट करने में स्वंय सक्षम होता है।

06/10/2019

चरणस्वामी: वेदांत के इतिहास में एक प्रसिद्ध आचार्य हुए हैं। तंत्र में इन्होंने 'श्रीविद्यार्थदीपिका' की रचना की है। 'श्रीविद्यारत्न-सूत्र-दीपिका' नामक इनका ग्रंथ मद्रास लाइब्रेरी में उपलब्ध है। इनका 'प्रपंच-सार-संग्रह' भी अति प्रसिद्ध ग्रंथ है।
सरस्वती तीर्थ: परमहंस परिब्राजकाचार्य वेदांतिक थे। यह संन्यासी थे। इन्होंने भी 'प्रपंचसार' की विशिष्ट टीका की रचना की।
राधव भट्ट: 'शादातिलक' की 'पदार्थ आदर्श' नाम्नी टीका बनाकर प्रसिद्ध हुए थे। इस टीका का रचनाकाल सं॰ 1550 है। यह ग्रंथ प्रकाशित है। राधव ने 'कालीतत्व' नाम से एक और ग्रंथ लिखा था, परंतु उसका अभी प्रकाशन नहीं हुआ।

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