*बाल विवाह के कलंक से मुक्ति की ओर बढ़ते कदम*
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आज विश्व बालिका दिवस पर एक अच्छी खबर पढ़ने को मिली। जिसमें बताया गया है कि भारत ने विगत 50 साल के सफर में 50% से अधिक बच्चियों को बाल विवाह के कुचक्र से मुक्ति दिलाने में सफलता प्राप्त की है। इस उपलब्धि पर समाज और सरकार बधाई की समान रूप से हकदार है। बाल विवाह जैसी कुप्रथाओं के चलते आधी आबादी के साथ घोर अन्याय कर रहे थे। शारीरिक और मानसिक रूप से अविकसित अबोध बातिकाएं नरक का जीवन जीने अभिशप्त थी। कन्यादान जैसी मान्यताएं बाल विवाह की इन धारणाओं को धार देती थीं। वयस्क होने से पहले मां बनकर बच्चों के साथ परिवार की परवरिश करनी पड़ती थी।ऊपर से शिक्षा और स्वास्थ्य का अभाव भी झेलना पड़ता था। कुल मिलाकर देश को बड़ी शर्मिंदगी का सामना करना पड़ता था। आज हम गर्व से कह सकते हैं कि समाज सुधार का जो बीड़ा राजा राममोहन राय और ज्योति बा फूले ने उठाया था। उसके परिणाम एक शताब्दी बाद नजर आने लगे हैं। लोग न सिर्फ कानून को जानने लगे हैं बल्कि आखा तीज जैसे त्यौहारों पर सरकार के साथ मिलकर बाल विवाह रोकने निकल पड़ते हैं। इस कलंक से मुक्त बालिकाएं अब उच्च शिक्षा पाकर समाज में बदलाव ला रही हैं। जिस गति से हम इस बुराई को पीछे छोड़ रहे हैं वह दिन दूर नहीं जब हम शिक्षित आबादी के साथ बैठकर मुक्ति महोत्सव मना रहे होंगे। आजादी के अमृत महोत्सव पर इस उपलब्धि पर गर्व किया जा सकता हैं।
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22/01/2025
*जी डी पी में महिलाओं का योगदान*
विश्व आर्थिक मंच की एक रिपोर्ट में कहा गया है कि यदि महिलाओं का स्वास्थ्य ठीक हो तो वे सकल घरेलू उत्पाद में बड़ी भूमिका निभा सकती हैं। भारत जैसे विकासशील देशों के लिए यह स्टडी सटीक बैठती हैं।
जहां महिलाओं को बहुत सारे भेदभाव के बीच अपनी जिंदगी गुजारनी पड़ती है। श्रम प्रदान समाज होने के बाद भी महिलाओं की ताकत को कमतर आंका जाता है। परिवार के लालन पालन में उनकी बहुत बड़ी भूमिका है। परिवार का बहुत बड़ा सहारा होने के बाद भी शिक्षा और चिकित्सा जैसे मुद्दे पर उसके साथ सौतेला व्यवहार किया जाता है।
पढ़ाई की बढ़ती चुनौतियों के बीच जहां लड़के पब्लिक स्कूलों और अच्छी से अच्छी कोचिंग की सुविधा के साथ पढ़ रहे हैं वहीं बच्चियों को सरकारी स्कूलों में भेजा जा रहा है।इन स्कूलों में मिलने वाला मध्यान भोजन इनकी नियति है। इसी तरह पैदा होने से लेकर आखिरी समय तक पुरुषों से कमतर आंकने की आदत खत्म होने का नाम नहीं ले रही है। जन्म के पूर्व माता को पर्याप्त पौष्टिक आहार की कमी, प्रसव के पश्चात अपर्याप्त भोजन, शरीर में खून की कमी जैसी अनेक समस्याएं उनके सामने आती रहती हैं।
भारतीय समाज यदि आधी आबादी को पूरा हक देने लग जाए तो विश्व आर्थिक मंच के शोध से उपजी चिंता का समाधान हो सकता है। मानवता के संपूर्ण विकास में महिलाएं बराबर की हिस्सेदारी निभा सकती है। अभी नारी शक्ति की समाज में आधे अधूरे मन से सहभागिता है।जिस दिन महिला शक्ति कंधे से कंधा मिलाकर काम करने लगेगी, दुनिया बहुत जल्दी मानव विकास के साथ साथ आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक विकास के नए सोपान पाएगा। समानता का व्यवहार सशक्तिकरण के रास्ते खोल देगा। घर,परिवार,समाज ,देश और दुनिया में बदलाव की बयार बह निकलेगी । अपनी एक पहिए की धुरी पर चलने वाला समाज दोनों पहियों से दौड़ने लगेगा।समतावादी समाज में लैंगिक भेदभाव भी जड़ से मिट जाएंगे।
इस तरह के शोध समाज को सोचने मजबूर करते रहेंगे। उम्मीद की जानी चाहिए कि जल्द ही, भारत की पूर्ण आबादी पूरा हक पाकर दुनिया में बड़े परिवर्तन की ध्वजवाहक बनेगी।
- Bhupesh Gupta
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