10/01/2026
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10/01/2026
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02/01/2026
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छठ पूजा भारतीय संस्कृति का एक अत्यंत प्राचीन और वैज्ञानिक व आध्यात्मिक पर्व है।
इसे सूर्य उपासना और प्रकृति पूजन का पर्व कहा जाता है।
1. धार्मिक एवं ऐतिहासिक महत्व:::::::
छठ पूजा की परंपरा त्रेतायुग से मानी जाती है।
कथा के अनुसार, भगवान श्रीराम जब राज्याभिषेक के बाद अयोध्या लौटे, तब माता सीता ने कार्तिक शुक्ल षष्ठी तिथि को सूर्यदेव की उपासना की और आशीर्वाद मांगा कि उनके कुल में सदैव सुख, स्वास्थ्य और समृद्धि बनी रहे।
इसी से यह पर्व प्रारंभ हुआ।
दूसरा उल्लेख महाभारत काल से भी मिलता है —
कुंती और द्रौपदी ने भी सूर्यदेव की आराधना की थी ताकि संतति और जीवन में संतुलन व शक्ति प्राप्त हो।
2. आध्यात्मिक और सांस्कृतिक दृष्टि से::::::
सूर्य को प्रत्यक्ष देवता कहा गया है — “साक्षात् जगत् का जीवनदाता”।
छठ में मनुष्य स्वयं को सूर्य ऊर्जा और प्रकृति के तत्वों — जल, अग्नि, वायु, आकाश, पृथ्वी के साथ जोड़ता है। सूर्य की ऊर्जा
समस्त सृष्टि के लिये जीवनदायनी होती है ।
उपवास, स्वच्छता, आत्मसंयम और ब्रह्मचर्य — ये चार अनुशासन आत्मशुद्धि के प्रतीक हैं।
अस्ताचल (डूबते सूर्य) और उदयाचल (उगते सूर्य) दोनों को अर्घ्य देना संतुलन और समरसता
का द्योतक है — “जीवन में हर अवस्था में संतुलन रखो”।
3. ज्योतिषीय दृष्टि से विश्लेषण
सूर्य आत्मा, जीवनशक्ति, आरोग्य और नेतृत्व का कारक ग्रह है।
छठ तिथि (षष्ठी) अंक ज्योतिष में संतुलन, स्वास्थ्य और शुद्धता से जुड़ी है (अंक 6 का स्वामी शुक्र भी है)।
छठ पर्व में सूर्य और शुक्र ग्रह के बीच का संतुलन बहुत महत्त्वपूर्ण होता है, क्योंकि दोनों ही ऊर्जा और जीवन के दो छोर हैं —
सूर्य पुरुष ऊर्जा है, शुक्र स्त्री ऊर्जा।
इस दिन इन दोनों ग्रहों की स्थिति शरीर और मन को सामंजस्य में लाती है।
सूर्य अस्त होने और उदय होने के बीच का समय खगोलीय दृष्टि से सौर विकिरण के शुद्धतम क्षण होते हैं, जब जल में सूर्य की किरणें परावर्तित होकर ऊर्जा संतुलन बनाती हैं — यही कारण है कि अर्घ्य जल में दिया जाता है।
जो जातक जन्म कुंडली में सूर्य कमजोर (अस्थम भाव, शत्रु राशि या राहु से ग्रसित) रखते हैं, उनके लिए छठ पूजा, सूर्य अर्घ्य, आदित्य हृदय स्तोत्र पाठ अत्यंत फलदायी होता है।
सूर्यदेव और छठी मैया की आराधना से संतान, स्वास्थ्य और सुख की प्राप्ति होती है ।यह आत्मशुद्धि, संतुलन और प्रकृति के प्रति कृतज्ञता का पर्व है ।
शरद पूर्णिमा हिंदू धर्म का एक अत्यंत पवित्र और विशेष पर्व है। यह दिन आश्विन मास की पूर्णिमा तिथि को आता है , जब वर्ष का सबसे सुंदर और उज्ज्वल चांद आकाश में दिखाई देता है। इसे कोजागरी पूर्णिमा, रास पूर्णिमा, या कौमुदी पूर्णिमा भी कहा जाता है।
यह पर्व आध्यात्मिक, धार्मिक और वैज्ञानिक—तीनों दृष्टियों से महत्वपूर्ण है।
धार्मिक महत्व:
1. श्रीकृष्ण और रासलीला:
कहा जाता है कि इसी रात भगवान श्रीकृष्ण ने ब्रज की गोपियों के साथ दिव्य महान रासलीला रचाई थी। इसलिए इसे रास पूर्णिमा कहा जाता है।
यह प्रेम, भक्ति और आत्मा के परमात्मा से मिलन का प्रतीक है।
2. लक्ष्मी पूजा:
कई स्थानों पर इस दिन मां लक्ष्मी की पूजा की जाती है। मान्यता है कि इस रात मां लक्ष्मी पृथ्वी पर भ्रमण करती हैं और जो व्यक्ति जागरण करके भक्ति भाव से उनकी आराधना करता है, उसके घर में धन-समृद्धि आती है।
इसी कारण इसे कोजागरी पूर्णिमा कहा गया — “को जागर्ति?” अर्थात “कौन जाग रहा है?”
3. अमृत वर्षा:
शास्त्रों में कहा गया है कि इस रात चंद्रमा की किरणों में अमृत तत्व होता है। इसलिए इस रात दूध और चावल की खीर को चांदनी में रखकर सेवन करना चाहिये ।
आध्यात्मिक व स्वास्थ्य दृष्टि से:
चांद की रोशनी में प्राकृतिक सकारात्मक ऊर्जा और शीतलता होती है।
चांदनी में रखी खीर या दूध में चंद्र किरणों का प्रभाव माना जाता है जो शरीर में शांत ऊर्जा, मानसिक संतुलन, और तनाव मुक्ति देता है।
आयुर्वेद के अनुसार, यह दिन पित्त दोष को संतुलित करने के लिए श्रेष्ठ माना गया है।
वैज्ञानिक पहलू::
इस दिन चांद पृथ्वी के सबसे पास होता है, इसलिए उसकी रोशनी में कैल्शियम, फॉस्फोरस जैसी सूक्ष्म ऊर्जा तरंगें पाई जाती हैं जो स्वास्थ्य के लिए लाभकारी मानी जाती है।
श्वेता विजयवर्गीय
अंक ज्योतिषी ,वास्तु सलाहकार
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24/12/2025