12/06/2026
VIJAY KUMAR
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12/06/2026
25/05/2026
25 मई: महान नक्सलबाड़ी किसान विद्रोह की 59वीं वर्षगांठ पर क्रांतिकारी सलाम!
*महान नक्सलबाड़ी संघर्ष अमर रहे!
25 मई 1967 को फूट पड़ा ऐतिहासिक नक्सलबाड़ी किसान विद्रोह भारतीय कम्युनिस्ट आंदोलन और वर्ग संघर्षों के इतिहास में एक युगांतरकारी मोड़ था। नक्सलबाड़ी विद्रोह का सबसे बड़ा ऐतिहासिक और राजनीतिक महत्व यह है कि इसने कम्युनिस्ट आंदोलन के भीतर छिपे संशोधनवाद, वर्ग-सहयोग और चुनावी अवसरवाद की कलई को पूरी तरह उतार फेंका। इस जुझारू किसान उभार ने स्थापित कम्युनिस्टों के भीतर एक वैचारिक और क्रांतिकारी पुनरुत्थान की जमीन तैयार की, जिसकी तार्किक परिणति 1969 में भाकपा (माले) के ऐतिहासिक गठन के रूप में हुई।
यह सच है कि बाद के दौर में इस महान आंदोलन को कई संकीर्णतावादी, दुस्साहसवादी और अवसरवादी भटकावों का सामना करना पड़ा, जिसके कारण नक्सलबाड़ी का क्रांतिकारी नारा और इसके उद्देश्य अधूरे रह गए। आज भी कम्युनिस्ट आंदोलन को उन भटकावों से मुक्त होकर सही वर्ग-दिशा में आगे बढ़ने की चुनौती का सामना करना पड़ रहा है।
दमनकारी शासक वर्ग, कॉरपोरेट लुटेरे और उनके राजनीतिक औजार फ़ासीवादी संघ परिवार अपनी पूरी बर्बरता के बावजूद भी भारत के नक्शे से महान नक्सलबाड़ी की विरासत को मिटा नहीं सकते। नक्सलबाड़ी आज भी देश के कोने-कोने में जल-जंगल-जमीन की लूट, कॉरपोरेट-फासीवादी दमन और वर्ग-शोषण के खिलाफ लड़ रहे मेहनतकशों, आदिवासियों, दलितों और उत्पीड़ितों के लिए प्रेरणा का सबसे प्रखर स्रोत है।
आइए, इस ऐतिहासिक अवसर पर नक्सलबाड़ी के अमर शहीदों को अपनी गहरी वैचारिक और क्रांतिकारी श्रद्धांजलि अर्पित करें!
फासीवाद और कॉरपोरेट लूट के खिलाफ जन-प्रतिरोध तेज करो!
नक्सलबाड़ी की क्रांतिकारी विरासत अमर रहे!
इंकलाब जिंदाबाद!
पी जे जेम्स
महासचिव
भाकपा (मा-ले) रेड स्टार
25 मई 2026
ंगल_जमीन
#क्रांतिकारी_सलाम
#इंकलाब_जिंदाबाद
#नक्सलबाड़ी_अमर_रहे
20/05/2026
भारत के 563 जिलों के 51 वर्षों के आंकड़ों पर आधारित अध्ययन में चेतावनी दी गई है कि जलवायु परिवर्तन भारतीय कृषि के लिए गहरा संकट बन चुका है।
तापमान में हर एक डिग्री सेल्सियस वृद्धि से कुल फसल पैदावार औसतन 7.8 से 8 फीसदी घट सकती है, जबकि बारिश में 20 फीसदी कमी आने पर धान की उपज 11.2 फीसदी और बाजरा की 10.6 फीसदी तक गिरने का अनुमान है।
बाजरा और मक्का सबसे अधिक संवेदनशील फसलें हैं, जिनकी पैदावार क्रमशः 19.1 और 16.2 फीसदी तक घट सकती है। कई जिलों में नुकसान 39 फीसदी तक पहुंचने की आशंका है।
शोधकर्ताओं के अनुसार यह झटका केवल एक मौसम तक सीमित नहीं, बल्कि दो से तीन वर्षों तक किसानों की आय, खाद्य सुरक्षा और महंगाई पर गहरा असर डाल सकता है, जिससे वर्षों की तकनीकी प्रगति और उत्पादकता में हुई बढ़ोतरी मिटने का खतरा है।
पूरी रिपोर्ट पढ़ें -
https://hindi.downtoearth.org.in/climate-change/trends-from-563-districts-reveal-the-harsh-reality-rice-yields-could-decline-by-11-and-millet-yields-by-19
20/05/2026
#पूंजीवाद_मिटाओ_पर्यावरण_बचाओ
20/05/2026
Make 13th Party Congress a Success !
Workers and Oppressed Peoples, Unite !
Down with Imperialism !
Wipe out US-Zionist Axis of Evil !
Solidarity with People of Palestine & Iran !
Resist & Defeat RSS Fascism !
Annihilate Inhuman Caste System !
Resist & Defeat Islamophobia!
Strive for Gender Equality !
13वां पार्टी महाधिवेशन सफल करो!
दुनिया के मेहनतकशों और उत्पीड़ित जनता, एक हो!
साम्राज्यवाद का नाश हो!
कुख्यात अमरीकी-जायनवादी धुरी का अंत करो!
फिलिस्तीन और ईरान की जनता के साथ एकजुटता मज़बूत करो!
आरएसएस (RSS) फासीवाद का प्रतिरोध करो और उसे उखाड़ फेंको!
अमानवीय वर्ण-जाति व्यवस्था का समूल नाश करो!
इस्लामोफोबिया (इस्लाम के खिलाफ नफ़रत) का प्रतिरोध करो और उसे परास्त करो!
लैंगिक समानता के लिए संघर्ष तेज करो!
17/05/2026
"भोजशाला-कमाल मौला मस्जिद" विवाद पर अदालती फैसला: बाबरी मस्जिद फैसले की आपराधिक पुनरावृत्ति!
मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय का 15 मई का फैसला, कमाल मौला मस्जिद-भोजशाला परिसर को जबरन सरस्वती मंदिर और संस्कृत शिक्षा केंद्र घोषित करते हुए मुसलमानों को वहाँ से बेदखल कर वैकल्पिक भूमि खोजने का निर्देश देता है। यह फैसला कारपोरेट-फासीवादी सत्ता के घिनौने चरित्र को पूरी तरह बेनकाब करता है। विधानसभा चुनावों के ठीक बाद आया यह अदालती हमला साफ दिखाता है कि फासीवादी “डबल इंजन” सरकार मेहनतकश अवाम और अल्पसंख्यकों पर चौतरफा शिकंजा कसने के लिए न्यायपालिका का इस्तेमाल एक राजनीतिक हथियार के रूप में कर रही है।
यह अदालती फैसला संसद द्वारा पारित 1991 के “पूजा स्थल (विशेष प्रावधान) अधिनियम” का खुला उल्लंघन है, जो ऐतिहासिक धार्मिक विवादों को दोबारा खोलने पर कानूनी रोक लगाता है। शासक वर्ग के इस सांप्रदायिक एजेंडे को अमलीजामा पहनाते हुए, अदालत के फैसले के तुरंत बाद 16 मई को ही भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) ने दमनकारी आदेश जारी कर दिया। इसके तहत हिंदुओं को परिसर में “निर्बाध प्रवेश” सौंप दिया गया है और मुसलमानों द्वारा पीढ़ियों से अदा की जा रही “नमाज” पर पूरी तरह पाबंदी लगा दी गई है।
बाबरी मस्जिद के ही तर्ज पर, धार (मध्य प्रदेश) में कमाल मौला मस्जिद का विवाद 14वीं शताब्दी (लगभग 1310-1320 ई.) का है, जब यह धार सल्तनत के अधीन था। ऐतिहासिक साक्ष्यों के अनुसार, तब से यह स्थल मुसलमानों की इबादत का निरंतर केंद्र और मालवा सल्तनत काल के सूफी संत शेख कमाल मौला की ऐतिहासिक दरगाह रहा है। लेकिन बाबरी मस्जिद की तरह ही, सांप्रदायिक हिंदू वर्चस्ववादी ताकतों ने इसे भोजशाला परिसर और सरस्वती मंदिर बताकर विवाद खड़ा किया। यह विवाद औपनिवेशिक शासकों की 'फूट डालो और राज करो' की नीति की ही एक नतीजा है। वास्तव में “भोजशाला” शब्द का सुनियोजित प्रचार ब्रिटिश काल में 20वीं शताब्दी की शुरुआत में हुआ, जब 1903 में स्थानीय औपनिवेशिक शिक्षा अधिकारी द्वारा फर्श और स्तंभों पर संस्कृत श्लोकों की “खोज” का नाटक रचकर इसे सांप्रदायिक रंग दिया गया।
इस साम्राज्यवादी-सांप्रदायिक साजिश के बावजूद, 1934 में धार रियासत के प्रशासनिक आदेश के तहत मुसलमानों ने भोजशाला परिसर में नियमित रूप से शुक्रवार की नमाज जारी रखी। लेकिन हिंदुत्ववादी फासीवादी दावों को खाद-पानी देते हुए, वाजपेयी के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार के अधीन ASI ने 7 अप्रैल 2003 को एक समझौतापरस्त व्यवस्था थोप दी, जिसके तहत हिंदुओं को मंगलवार और बसंत पंचमी को पूजा की अनुमति दी गई, जबकि मुसलमान शुक्रवार को नमाज अदा करते रहे। अब उच्च न्यायालय ने फासीवादी ताकतों के पक्ष में एकतरफा फैसला सुनाते हुए पूरे ऐतिहासिक स्थल को हिंदुओं को सौंप दिया है और परिसर के “वास्तविक धार्मिक चरित्र” को हिंदू घोषित कर मुस्लिम समुदाय को वहाँ से बेदखल करने की जमीन तैयार कर दी है।
हिंदुत्ववादी ताकतें राज्य सत्ता के इस एकपक्षीय संरक्षण को “ऐतिहासिक और 700 वर्ष के संघर्ष का परिणाम” बताकर जश्न मना रही हैं। यह ठीक 7 नवंबर 2019 के सर्वोच्च न्यायालय के उस फैसले की याद दिलाता है, जिसने तमाम धर्मनिरपेक्ष दावों को दफन करते हुए संपूर्ण विवादित मस्जिद-मंदिर स्थल को राम मंदिर निर्माण के लिए सरकारी ट्रस्ट को सौंप दिया था।
कमाल मौला मस्जिद का मामला बाबरी मस्जिद के ही आपराधिक पैटर्न की सीधी पुनरावृत्ति है। ठीक इसी तरह, दशकों के कानूनी विवाद और सांप्रदायिक ध्रुवीकरण के बाद, फरवरी 1986 में जिला अदालत के जरिए बाबरी मस्जिद के ताले खुलवाए गए थे ताकि हिंदू समूहों को प्रवेश मिल सके। इसके बाद फासीवादी रथ यात्रा और राज्य के परोक्ष समर्थन से 1992 में मस्जिद को बर्बरतापूर्वक ध्वस्त कर दिया गया। अंततः सर्वोच्च न्यायालय ने उस ऐतिहासिक अन्याय पर कानूनी मुहर लगाई, जिसके परिणामस्वरूप कॉरपोरेट-फासीवादी गठजोड़ के नायक प्रधानमंत्री मोदी 2024 में स्वयं मुख्य “यजमान” बनकर उभरे।
कमाल मौला मस्जिद पर यह हमला न तो अलग-थलग है और न ही अंतिम। “इतिहास के भगवाकरण” और फासीवादी एजेंडे के तहत वाराणसी की ज्ञानवापी मस्जिद और मथुरा की शाही मस्जिद जैसी कई अन्य ऐतिहासिक इमारतें पहले से ही इस कॉरपोरेट-फासीवादी ताकतों की कतार में हैं। जब कार्यपालिका, विधायिका और यहाँ तक कि न्यायपालिका सहित राज्य सत्ता की तमाम संस्थाएँ पूरी तरह भगवाकरण का शिकार हो चुकी हैं, तब यह समझना जरूरी है कि अल्पसंख्यकों के धार्मिक अधिकारों पर यह हमला कोई मामूली घटना नहीं है। यह उन्हें उनके राजनीतिक और नागरिक अधिकारों से वंचित कर 'हिंदू राष्ट्र' के दोयम दर्जे के नागरिक बनाने की बहुसंख्यकवादी फासीवादी मुहिम का हिस्सा है।
यह बेहद निर्णायक और संघर्षपूर्ण समय है। देश की तमाम धर्मनिरपेक्ष, जनवादी और साम्राज्यवादी-विरोधी व फासीवाद-विरोधी ताकतों को एकजुट होना होगा। हमें इस घृणित बहुसंख्यकवादी फासीवादी हमले के खिलाफ, जो देश को कारपोरेटपरस्त मनुवादी हिंदू राष्ट्र की ओर धकेल रहा है, सड़कों पर उतरकर निर्णायक और अथक प्रतिरोध संगठित करना होगा।
पी. जे. जेम्स
महासचिव
भाकपा (माले) रेड स्टार
नई दिल्ली
17.05.2026
16/05/2026
जब एक संवैधानिक लोकतंत्र के मुख्य न्यायाधीश बेरोज़गार युवाओं, आरटीआई कार्यकर्ताओं, मीडियाकर्मियों और असहमति व्यक्त करने वालों की तुलना 'कॉकरोच' और 'परजीवी' से करते हैं, तो यह केवल व्यक्तिगत आक्रोश का मामला नहीं रह जाता; यह लोकतंत्र की मूल आत्मा और उसकी बुनियादी संवैधानिक संस्कृति को आहत करने लगता है.
मनोज कुमार झा का पूरा लेख: https://thewirehindi.com/328893/cji-comments-some-unemployed-youth-like-parasites-cockroaches/
16/05/2026
प्रेस विज्ञप्ति
16 मई 2026
धार भोजशाला मामले पर मध्यप्रदेश हाईकोर्ट के पक्षपाती फैसला संविधान सम्मत नहीं: न्यायिक रुख साम्प्रदायिक राजनीति के अनुकूल
भोपाल। मध्यप्रदेश हाईकोर्ट द्वारा धार स्थित भोजशाला–कमाल मौला मस्जिद परिसर को लेकर दिया गया हालिया फैसला न्यायिक निष्पक्षता, संविधान की धर्मनिरपेक्ष भावना और सामाजिक सौहार्द पर गंभीर चोट है। भाकपा (माले) रेड स्टार, मध्यप्रदेश राज्य कमेटी इस निर्णय को केवल एक ऐतिहासिक-पुरातात्विक विवाद तक सीमित नहीं मानती, बल्कि इसे फ़ासीवादी आरएसएस-भाजपा की साम्प्रदायिक-विभाजनकारी राजनीतिक परियोजना के अनुकूल न्यायपालिका के खतरनाक झुकाव के रूप में देखती है। यह फैसला पूरी तरह एकतरफा और लोकतांत्रिक मूल्यों के खिलाफ है। जिस तरह अदालत ने इस साझा विरासत वाले परिसर की पहचान को एकतरफा धार्मिक रंग देने की कोशिश की है, उससे विवाद के शांतिपूर्ण समाधान की संभावनाएं ध्वस्त हुई हैं और अल्पसंख्यक समुदाय के संवैधानिक अधिकारों तथा सुरक्षा-भावना को गहरा धक्का लगा है।
पार्टी यह रेखांकित करना ज़रूरी समझती है कि इस मामले में 'उपासना स्थल (विशेष उपबंध) अधिनियम, 1991' की तकनीकी व्याख्याओं की आड़ ली गई है। इस कानून का मूल उद्देश्य 15 अगस्त 1947 को मौजूद किसी भी धार्मिक स्थल की स्थिति को जस-का-तस बनाए रखना है। हालांकि, संरक्षित स्मारकों पर इस कानून के लागू न होने संबंधी धारा 4(3)(a) का हवाला देकर दक्षिणपंथी ताकतों द्वारा यह तर्क दिया गया कि भोजशाला इस कानून के दायरे से बाहर है। अदालत ने भी इस तकनीकी छूट का सहारा लेकर कानून की मूल धर्मनिरपेक्ष और प्रगतिशील भावना को ही कमज़ोर कर दिया। आलोचना का मूल बिंदु केवल यह नहीं है कि कानून की कोई सीधी तकनीकी अवहेलना हुई या नहीं, बल्कि यह है कि अदालत ने ऐतिहासिक जटिलताओं को दरकिनार कर एक ऐसे राजनीतिक-धार्मिक दावे को न्यायिक वैधता दे दी, जिसका मकसद केवल साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण को बढ़ावा देना है।
हम स्पष्ट रूप से मानते हैं कि इस न्यायिक रुख को आरएसएस-भाजपा की मौजूदा निरंकुश सत्ता और उसकी फासीवादी वैचारिक दिशा से अलग करके नहीं देखा जा सकता। आज जब पूरा मनुवादी फ़ासिस्ट सत्ता-तंत्र इतिहास के विकृतिकरण, साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण और अल्पसंख्यकों के योजनाबद्ध उत्पीड़न में लगा है, तब न्यायपालिका से यह बुनियादी अपेक्षा थी कि वह संवैधानिक संतुलन, बहुसांस्कृतिक इतिहास और धर्मनिरपेक्ष सह-अस्तित्व की रक्षा के लिए ढाल बनेगी। इसके विपरीत, न्यायालय का यह रवैया साम्प्रदायिक ताकतों के मंसूबों को कानूनी आवरण प्रदान करने जैसा प्रतीत होता है।
इसलिए भाकपा (माले) रेड स्टार, मध्यप्रदेश मांग करती है कि -
- इस जनविरोधी और विभाजनकारी फैसले की तुरंत उच्च स्तर पर संवैधानिक समीक्षा की जाए।
- भोजशाला परिसर को साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण और नफ़रत फैलाने का औजार बनाने की फासीवादी कोशिशों पर तत्काल रोक लगे।
- राज्य सरकार अल्पसंख्यक समुदाय के जान-माल, संवैधानिक अधिकारों और सुरक्षा की मुकम्मल गारंटी दे।
- ऐतिहासिक स्थलों पर साम्प्रदायिक दावों के जरिए देश के ताने-बाने को तोड़ने की न्यायिक व राजनीतिक प्रवृत्तियों पर अंकुश लगाया जाए।
- आरएसएस-भाजपा की इस विभाजनकारी राजनीति के खिलाफ सड़कों से लेकर हर मोर्चे पर व्यापक लोकतांत्रिक प्रतिरोध खड़ा किया जाए।
हम देश और प्रदेश की सभी लोकतांत्रिक, धर्मनिरपेक्ष, वामपंथी और प्रगतिशील ताकतों से अपील करते हैं कि वे इस फैसले के खिलाफ मुखर हों और संविधान, समानता व भाईचारे की रक्षा के लिए एकजुट होकर आगे आएं। मध्यप्रदेश की जागरूक जनता साम्प्रदायिक विभाजन और नफ़रत की राजनीति को खारिज करती है; वह न्याय, रोज़गार, शिक्षा और सामाजिक शांति चाहती है। अदालतों और सत्ताधीशों को जन-इच्छा के इस बुनियादी संकल्प का सम्मान करना ही होगा।
भवदीय
विजय कुमार
राज्य सचिव
भाकपा (माले) रेड स्टार, मध्यप्रदेश
दिनांक: 16 मई 2026
मोबाइल नंबर : 9981773205
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