06/09/2024
वर्तमान क्षण में खड़े होकर आप शायद यह कभी न सोचें कि अगले 10 सालों में दुनिया कितनी बदल सकती है! और आज की 70% से 90% नौकरियाँ अगले 10 सालों में पूरी तरह से खत्म हो जाएँगी। हम धीरे-धीरे "चौथी औद्योगिक क्रांति" के दौर में प्रवेश कर रहे हैं।
कुछ सालों पहले की मशहूर कंपनियों को देखिए-
HMT (घड़ी)
BAJAJ (स्कूटर)
DYANORA (TV)
MURPHY (रेडियो)
NOKIA (मोबाइल)
RAJDOOT (बाइक)
AMBASSADOR (कार)
उपरोक्त कंपनियों में से किसी की भी गुणवत्ता खराब नहीं थी। फिर भी ये कंपनियाँ बाहर क्यों हो गईं? क्योंकि वे समय के साथ खुद को बदल नहीं पाईं।
कोडक कंपनी याद है? 1997 में, कोडक के पास लगभग 160,000 कर्मचारी थे। और दुनिया की लगभग 85% फोटोग्राफी कोडक कैमरों से की जाती थी। पिछले कुछ सालों में मोबाइल कैमरों के उदय के साथ, कोडक कैमरा कंपनी मार्केट से बाहर हो गई है। यहाँ तक कि कोडक पूरी तरह से दिवालिया हो गई और उसके सभी कर्मचारियों को नौकरी से निकाल दिया गया।
उसी समय कई और मशहूर कंपनियों ने खुद को समय के साथ अपने आप को अपडेट किया तथा जरूरी बदलाव के साथ वर्तमान में मौजूद हैं ।
UBER सिर्फ़ एक सॉफ्टवेयर का नाम है। नहीं, उनके पास अपनी कोई कार नहीं है। फिर भी आज दुनिया की सबसे बड़ी टैक्सी-फ़ेयर कंपनी UBER है।
Airbnb आज दुनिया की सबसे बड़ी होटल कंपनी है। लेकिन मज़ेदार बात यह है कि दुनिया में उनके पास एक भी होटल नहीं है।
इसी तरह, Paytm, Ola Cab, Oyo rooms आदि जैसी अनगिनत कंपनियों के उदाहरण दिए जा सकते हैं।
आज अमेरिका में नए वकीलों के लिए कोई काम नहीं है, क्योंकि IBM Watson नामक एक कानूनी सॉफ्टवेयर किसी भी नए वकील से कहीं बेहतर वकालत कर सकता है। इस प्रकार अगले 10 सालों में लगभग 90% अमेरिकियों के पास कोई नौकरी नहीं होगी। शेष 10% बच जाएँगे। ये 10% विशेषज्ञ होंगे।
नए डॉक्टर भी काम पर जाने के लिए बैठे हैं। Watson सॉफ्टवेयर कैंसर और दूसरी बीमारियों का पता इंसानों से 4 गुना ज़्यादा सटीकता से लगा सकता है। 2030 तक कंप्यूटर इंटेलिजेंस मानव इंटेलिजेंस से आगे निकल जाएगा।
अगले 20 सालों में आज की 90% कारें सड़कों पर नहीं दिखेंगी। बची हुई कारें या तो बिजली से चलेंगी या हाइब्रिड कारें होंगी। सड़कें धीरे-धीरे खाली हो जाएंगी। गैसोलीन की खपत कम हो जाएगी और तेल उत्पादक अरब देश धीरे-धीरे दिवालिया हो जाएंगे।
अगर आपको कार चाहिए तो आपको उबर जैसे किसी सॉफ्टवेयर से कार मांगनी होगी। और जैसे ही आप कार मांगेंगे, आपके दरवाजे के सामने एक पूरी तरह से ड्राइवरलेस कार आकर खड़ी हो जाएगी। अगर आप एक ही कार में कई लोगों के साथ यात्रा करते हैं, तो प्रति व्यक्ति कार का किराया बाइक से भी कम होगा।
बिना ड्राइवर के गाड़ी चलाने से दुर्घटनाओं की संख्या 99% कम हो जाएगी। और इसीलिए कार बीमा बंद हो जाएगा और कार बीमा कंपनियाँ भी बाहर हो जायेंगी।
पृथ्वी पर ड्राइविंग जैसी चीजें अब नहीं बचेंगी। जब 90% वाहन सड़क से गायब हो जाएँगे, तो ट्रैफ़िक पुलिस और पार्किंग कर्मचारियों की ज़रूरत नहीं होगी।
जरा सोचिए, 10 साल पहले भी गली-मोहल्लों में STD बूथ हुआ करते थे। देश में मोबाइल क्रांति के आने के बाद ये सारे STD बूथ बंद होने को मजबूर हो गए। जो बच गए वो मोबाइल रिचार्ज की दुकानें बन गए। फिर मोबाइल रिचार्ज में ऑनलाइन क्रांति आई। लोग घर बैठे ऑनलाइन ही अपने मोबाइल रिचार्ज करने लगे। फिर इन रिचार्ज की दुकानों को बदलना पड़ा। अब ये सिर्फ मोबाइल फोन खरीदने-बेचने और रिपेयर की दुकानें रह गई हैं। लेकिन ये भी बहुत जल्द बदल जाएगा। Amazon, Flipkart से सीधे मोबाइल फोन की बिक्री बढ़ रही है।
पैसे की परिभाषा भी बदल रही है। कभी कैश हुआ करता था लेकिन आज के दौर में ये "प्लास्टिक मनी" बन गया है। क्रेडिट कार्ड और डेबिट कार्ड का दौर कुछ दिन पहले की बात है। अब वो भी बदल रहा है और मोबाइल वॉलेट का दौर आ रहा है। पेटीएम का बढ़ता बाजार, मोबाइल मनी की एक क्लिक।
जो लोग उम्र के साथ नहीं बदल सकते, उम्र उन्हें धरती से हटा देती है। इसलिए जमाने के साथ बदलते रहें। वक्त के साथ चलते रहें।
अब जरूरी मुद्दे की बात ....
जब इतने बदलावों को वर्तमान पूंजिवादी अपनाकर स्वयं को स्थापित करने में लगे हैं , जिन दकियानूशी सामंतवादी विचारों को त्यागकर एक दौर में समाज लोकतंत्र और प्रगति की बात करते हुए आगे बढ़ रहा था फिर अचानक क्यों प्रतिक्रियाशील होकर प्रगतिपथ को छोड़कर वही जातिवाद, धार्मिक उन्माद, और पुराने जड़वादी सोच को सही बताने पर तुला हुआ है । इसकी पड़ताल जरूरी है । क्यों हमारे चिंतन और सोच में आज भी ग्रह , नक्षत्र, राशिफल के विचार इतने घनीभूत हैं कि समाज में जिन बुराइयों का अंत आसानी से प्रगतिशील विचार व व्यवस्था को अपनाकर मिटाया जा सकता है उन्ही समस्याओं को दूर करने के लिए हम अपने व्यवहार में सामंतवादी बने होने के चलते समाज के भीतर से हटा नहीं पा रहे हैं ।
विज्ञान की तरक्की और तकनीकी ज्ञान कभी भी मानव सभ्यता को नुकशान पहुचाने के लिए इज़ाद नहीं किये गये थे । विज्ञान और तकनीक का उपयोग मानव समाज को सुख - सुविधा प्रदान करने और पूरी दुनिया पर मानव जाति के वैभव को स्थापित करने के लिए होना चाहिए । जो चिंतन मनुष्य को मनुष्य से बेहतर और कमतर बनाता है उस चिंतन को त्याग देना ही श्रेयस्कर है।
जिन तकनीकी उपायों के बदलाव से कारपोरेट मुनाफा लूट रहे हैं और मानव श्रम की जरूरत को खत्म कर अत्यधिक मुनाफा बटोरना चाहते हैं उन बदलावों के चलते मनुष्य को बेरोजगार बनाकर शोषण करने की खुली छूट कतई नहीं मिलनी चाहिए ।
इसके लिए पूंजिवादी संस्कृति को एवं सामंतवादी चिंतन को मन से मिटा देना ही एकमात्र उपाय है ।और ये अपने आप नहीं होगा इसके लिए प्रगतिशील और लोकतांत्रिक व्यवस्था को वास्तविक अमलीजामा पहनाना होगा । केवल दिखावे के लिए लोकतंत्र और प्रगति को महिमामंडित करना और व्यवहार में नारी अस्मिता से खेलना , भाषा - जाति और धार्मिक उन्माद को हवा देना तथा पुरातनपंथी सोच विचार को शिक्षा में लागू करने वाली दोहरी नीतियों से कतई संभव नहीं है ।
11/08/2024
कीनिया का Athelete एबेल मुताई याद है?
वही जो फिनिश लाइन से कुछ ही फीट की दूरी पर था, लेकिन Signage से भ्रमित हो गया और रुक गया, यह सोचकर कि उसने दौड़ पूरी कर ली है।
एक Spanish धावक, इवान फर्नांडीज, उसके ठीक पीछे था और, यह महसूस करते हुए कि क्या हो रहा था, केन्याई पर दौड़ना जारी रखने के लिए चिल्लाना शुरू कर दिया।
मुताई स्पेनिश नहीं जानता था और न ही उसे समझ में आया। यह महसूस करते हुए कि क्या हो रहा था, फर्नांडीज ने मुताई को जीत की ओर धकेल दिया।
एक पत्रकार ने इवान से पूछा, "तुमने ऐसा क्यों किया?" इवान ने जवाब दिया, "मेरा सपना है कि किसी दिन हम एक तरह का सामुदायिक जीवन जी सकें जहाँ हम जीतने के लिए एक-दूसरे को प्रेरित करें और मदद करें।"
पत्रकार ने जोर देकर कहा, "लेकिन आपने केन्याई को क्यों जीतने दिया?"
इवान ने जवाब दिया, "मैंने उसे जीतने नहीं दिया, वही जीतने वाला था। दौड़ उसकी ही थी।"
पत्रकार ने फिर जोर दिया, "लेकिन तुम जीत सकते थे!"
इवान ने उसकी ओर देखा और जवाब दिया, "लेकिन मेरी जीत का क्या महत्व होता ?
उस पदक में क्या सम्मान होता ?
मेरी माँ इस बारे में क्या सोचती ?"
मूल्य Values पीढ़ी दर पीढ़ी हस्तांतरित होते हैं।
हम अपने बच्चों को कौन से मूल्य सिखा रहे हैं?
क्या संस्कार दे रहे हैं?
हमें अपने बच्चों को जीतने के गलत तरीके और साधन नहीं सिखाने चाहिए।
इसके बजाय, हमें मदद करने वाले हाथ की सुंदरता और मानवता को आगे बढ़ाना चाहिए।
क्योंकि ईमानदारी और नैतिकता जीत रही है!"
22/07/2024
🌺मेरे पापा की औकात🌺
(एक मार्मिक कहानी जिसमें वर्तमान सामाजिक परिवेष के कई मनो-व्यवहारिक , सामाजिक , पारिवारिक पहलुओं की स्पष्ट झलक मिलती है । जिसे फेकबुक से ही copy Paste किया है पता नहीं किसने लिखी इसे पहले भी कई लोगों ने बिना नाम के सेयर किया है)
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पाँच दिन की छूट्टियाँ बिता कर जब ससुराल पहुँची तो पति घर के सामने स्वागत में खड़े थे। अंदर प्रवेश किया तो छोटे से गैराज में चमचमाती गाड़ी खड़ी थी स्विफ्ट डिजायर!
मैंने आँखों ही आँखों से पति से प्रश्न किया तो उन्होंने गाड़ी की चाबियाँ थमाकर कहा:-"कल से तुम इस गाड़ी में कॉलेज जाओगी प्रोफेसर साहिबा!"
"ओह माय गॉड!!'' ख़ुशी इतनी थी कि मुँह से और कुछ निकला ही नही। बस जोश और भावावेश में मैंने तहसीलदार साहब को एक जोरदार झप्पी देदी और अमरबेल की तरह उनसे लिपट गई। उनका गिफ्ट देने का तरीका भी अजीब हुआ करता है। सब कुछ चुपचाप और अचानक!! खुद के पास पुरानी इंडिगो है और मेरे लिए और भी महंगी खरीद लाए। 6 साल की शादीशुदा जिंदगी में इस आदमी ने न जाने कितने गिफ्ट दिए। गिनती करती हूँ तो थक जाती हूँ। ईमानदार है रिश्वत नही लेते । मग़र खर्चीले इतने कि उधार के पैसे लाकर गिफ्ट खरीद लाते है।
लम्बी सी झप्पी के बाद मैं अलग हुई तो गाडी का निरक्षण करने लगी। मेरा फसन्दीदा कलर था। बहुत सुंदर थी।
फिर नजर उस जगह गई जहाँ मेरी स्कूटी खड़ी रहती थी।
हठात! वो जगह तो खाली थी।
"स्कूटी कहाँ है?" मैंने चिल्लाकर पूछा।
"बेच दी मैंने, क्या करना अब उस जुगाड़ का? पार्किंग में इतनी जगह भी नही है।"
"मुझ से बिना पूछे बेच दी तुमने??"
"एक स्कूटी ही तो थी; पुरानी सी। गुस्सा क्यूँ होती हो?"
उसने भावहीन स्वर में कहा तो मैं चिल्ला पड़ी:-"स्कूटी नही थी वो। मेरी जिंदगी थी। मेरी धड़कनें बसती थी उसमें। मेरे पापा की इकलौती निशानी थी मेरे पास। मैं तुम्हारे तौफे का सम्मान करती हूँ मगर उस स्कूटी के बिना पे नही। मुझे नही चाहिए तुम्हारी गाड़ी। तुमने मेरी सबसे प्यारी चीज बेच दी। वो भी मुझसे बिना पूछे।'" मैं रो पड़ी।
शौर सुनकर मेरी सास बाहर निकल आई। उसने मेरे सर पर हाथ फेरा तो मेरी रुलाई और फुट पड़ी। "रो मत बेटा, मैंने तो इससे पहले ही कहा था। एक बार बहु से पूछ ले। मग़र बेटा बड़ा हो गया है। तहसीलदार!! माँ की बात कहाँ सुनेगा? मग़र तू रो मत। और तू खड़ा-खड़ा अब क्या देख रहा है वापस ला स्कूटी को।"
तहसीलदार साहब गर्दन झुकाकर आए मेरे पास। रोते हुए नही देखा था मुझे पहले कभी। प्यार जो बेइन्तहा करते हैं। याचना भरे स्वर में बोले:- सॉरी यार! मुझे क्या पता था वो स्कूटी तेरे दिल के इतनी करीब है। मैंने तो कबाड़ी को बेचा है सिर्फ सात हजार में। वो मामूली पैसे भी मेरे किस काम के थे? यूँ ही बेच दिया कि गाड़ी मिलने के बाद उसका क्या करोगी? तुम्हे ख़ुशी देनी चाही थी आँसू नही। अभी जाकर लाता हूँ। "
फिर वो चले गए।
मैं अपने कमरे में आकर बैठ गई। जड़वत सी। पति का भी क्या दोष था। हाँ एक दो बार उन्होंने कहा था कि ऐसे बेच कर नई ले ले। मैंने भी हँस कर कह दिया था कि नही यही ठीक है।
लेकिन अचानक स्कूटी न देखकर मैं बहुत ज्यादा भावुक हो गई थी। होती भी कैसे नही। वो स्कूटी नही "औकात" थी मेरे पापा की।
जब मैं कॉलेज में थी तब मेरे साथ में पढ़ने वाली एक लड़की नई स्कूटी लेकर कॉलेज आई थी। सभी सहेलियाँ उसे बधाई दे रही थी।
तब मैंने उससे पूछ लिया:- कितने की है?
उसने तपाक से जो उत्तर दिया उसने मेरी जान ही निकाल ली थी कितने की भी हो? तेरी और तेरे पापा की औकात से बाहर की है।
अचानक पैरों में जान नही रही थी। सब लड़कियाँ वहाँ से चली गई थी। मगर मैं वही बैठी रह गई। किसी ने मेरे हृदय का दर्द नही देखा था। मुझे कभी यह अहसास ही नही हुआ था कि वे सब मुझे अपने से अलग "गरीब"समझती थी। मगर उस दिन लगा कि मैं उनमे से नही हूँ।
घर आई तब भी अपनी उदासी छूपा नही पाई। माँ से लिपट कर रो पड़ी थी। माँ को बताया तो माँ ने बस इतना ही कहा" छिछोरी लड़कियों पर ज्यादा ध्यान मत दे! पढ़ाई पर ध्यान दे
रात को पापा घर आए तब उनसे भी मैंने पूछ लिया:-"पापा हम गरीब हैं क्या?"
तब पापा ने सर पे हाथ फिराते हुए कहा था"-हम गरीब नही हैं बिटिया, बस जरासा हमारा वक़्त गरीब चल रहा है।
फिर अगले दिन भी मैं कॉलेज नही गई। न जाने क्यों दिल नही था। शाम को पापा जल्दी ही घर आ गए थे। और जो लाए थे वो उतनी बड़ी खुशी थी मेरे लिए कि शब्दों में बयाँ नही कर सकती। एक प्यारी सी स्कूटी। तितली सी। सोन चिड़िया सी। नही, एक सफेद परी सी थी वो। मेरे सपनों की उड़ान। मेरी जान थी वो। सच कहूँ तो उस रात मुझे नींद नही आई थी। मैंने पापा को कितनी बार थैंक्यू बोला याद नही है। स्कूटी कहाँ से आई ? पैसे कहाँ से आए ये भी नही सोच सकी ज्यादा ख़ुशी में। फिर दो दिन मेरा प्रशिक्षण चला। साईकिल चलानी तो आती थी। स्कूटी भी चलानी सीख गई।
पाँच दिन बाद कॉलेज पहुँची। अपने पापा की "औकात" के साथ। एक राजकुमारी की तरह। जैसे अभी स्वर्णजड़ित रथ से उतरी हो। सच पूछो तो मेरी जिंदगी में वो दिन ख़ुशी का सबसे बड़ा दिन था। मेरे पापा मुझे कितना चाहते हैं सबको पता चल गया।
मग़र कुछ दिनों बाद एक सहेली ने बताया कि वो पापा के साईकिल रिक्सा पर बैठी थी। तब मैंने कहा नही यार तुम किसी और के साईकिल रिक्शा पर बैठी हो। मेरे पापा का अपना टेम्पो है।
मग़र अंदर ही अंदर मेरा दिमाग झनझना उठा था। क्या पापा ने मेरी स्कूटी के लिए टेम्पो बेच दिया था। और छः महीने से ऊपर हो गए। मुझे पता भी नही लगने दिया।
शाम को पापा घर आए तो मैंने उन्हें गोर से देखा। आज इतने दिनों बाद फुर्सत से देखा तो जान पाई कि दुबले पतले हो गए है। वरना घ्यान से देखने का वक़्त ही नही मिलता था। रात को आते थे और सुबह अँधेरे ही चले जाते थे। टेम्पो भी दूर किसी दोस्त के घर खड़ा करके आते थे।
कैसे पता चलता बेच दिया है।
मैं दौड़ कर उनसे लिपट गई पापा आपने ऐसा क्यूँ किया?" बस इतना ही मुख से निकला। रोना जो आ गया था।
तू मेरा ग़ुरूर है बिटिया, तेरी आँख में आँसू देखूँ तो मैं कैसा बाप? चिंता ना कर बेचा नही है। गिरवी रखा था। इसी महीने छुड़ा लूँगा।"
"आप दुनिया के बेस्ट पापा हो। बेस्ट से भी बेस्ट।इसे सिद्ध करना जरूरी कहाँ था? मैंने स्कूटी मांगी कब थी?क्यूँ किया आपने ऐसा? छः महीने से पैरों से सवारियां ढोई आपने। ओह पापा आपने कितनी तक़लीफ़ झेली मेरे लिए मैं पागल कुछ समझ ही नही पाई ।" और मैं दहाड़े मार कर रोने लगी। फिर हम सब रोने लगे। मेरे दोनों छोटे भाई। मेरी मम्मी भी।
पता नही कब तक रोते रहे ।
वो स्कूटी नही थी मेरे लिए। मेरे पापा के खून से सींचा हुआ उड़नखटोला था मेरा। और उसे किसी कबाड़ी को बेच दिया। दुःख तो होगा ही।
अचानक मेरी तन्द्रा टूटी। एक जानी-पहचानी सी आवाज कानो में पड़ी। फट-फट-फट,, मेरा उड़नखटोला मेरे पति देव यानी तहसीलदार साहब चलाकर ला रहे थे। और चलाते हुए एकदम बुद्दू लग रहे थे। मगर प्यारे से बुद्दू।
मुझे बेइन्तहा चाहने वाले राजकुमार बुद्दू...।
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30/06/2024
यदि तुम्हारे घर के
एक कमरे में आग लगी हो
तो क्या तुम
दूसरे कमरे में सो सकते हो?
यदि तुम्हारे घर के एक कमरे में
लाशें सड़ रहीं हों
तो क्या तुम
दूसरे कमरे में प्रार्थना कर सकते हो?
यदि हाँ
तो मुझे तुम से
कुछ नहीं कहना है।
देश कागज पर बना
नक्शा नहीं होता
कि एक हिस्से के फट जाने पर
बाकी हिस्से उसी तरह साबुत बने रहें
और नदियां, पर्वत, शहर, गांव
वैसे ही अपनी-अपनी जगह दिखें
अनमने रहें।
यदि तुम यह नहीं मानते
तो मुझे तुम्हारे साथ
नहीं रहना है।
इस दुनिया में आदमी की जान से बड़ा
कुछ भी नहीं है
न ईश्वर
न ज्ञान
न चुनाव
कागज पर लिखी कोई भी इबारत
फाड़ी जा सकती है
और जमीन की सात परतों के भीतर
गाड़ी जा सकती है।
जो विवेक
खड़ा हो लाशों को टेक
वह अंधा है
जो शासन
चल रहा हो बंदूक की नली से
हत्यारों का धंधा है
यदि तुम यह नहीं मानते
तो मुझे
अब एक क्षण भी
तुम्हें नहीं सहना है।
याद रखो
एक बच्चे की हत्या
एक औरत की मौत
एक आदमी का
गोलियों से चिथड़ा तन
किसी शासन का ही नहीं
सम्पूर्ण राष्ट्र का है पतन।
ऐसा खून बहकर
धरती में जज्ब नहीं होता
आकाश में फहराते झंडों को
काला करता है।
जिस धरती पर
फौजी बूटों के निशान हों
और उन पर
लाशें गिर रही हों
वह धरती
यदि तुम्हारे खून में
आग बन कर नहीं दौड़ती
तो समझ लो
तुम बंजर हो गये हो-
तुम्हें यहां सांस लेने तक का नहीं है अधिकार
तुम्हारे लिए नहीं रहा अब यह संसार।
आखिरी बात
बिल्कुल साफ
किसी हत्यारे को
कभी मत करो माफ
चाहे हो वह तुम्हारा यार
धर्म का ठेकेदार,
चाहे लोकतंत्र का
स्वनामधन्य पहरेदार।
कवि - सर्वेस्वर दयाल सक्सेना
25/06/2024
अकेला शिक्षक ही दोषी क्यों ?
10 मिनट लेट हो जाने पर शिक्षकों पर ऊँगली उठाने वाले लोग बताएं कि किस अधिकारी के कार्यालय में जाने पर आपको उसके आने का घंटो इन्तजार नहीं करना पड़ता ?किस कार्यालय में जाने के बाद आपको यह सुनने को नही मिलता कि साहब आज नहीं हैं ? हफ्तों इन्तजार करने के बाद जब साहब के किसी दिन आने की सूचना मिलती है तो आप समय से कार्यालय पहुँच जाते हैं और 12 बजे तक साहब के आने का इंतजार करते हैं, जब साहब गाड़ी से उतरते हैं तो रस्ता छोड़कर झुककर हाथ जोड़कर उनके सम्मान में अपना सम्मान गिरवी रखते हैं।
फिर साहब आसन ग्रहण करते हैं और आप अपनी बारी का इंतजार बारी आने पर हाथ जोड़कर जी हुजूर, जी हुजूर कहते हुए काँपते हाथों से अपनी फरियाद सुनाते हैं कि साहब कुछ दया कर दें। आधी अधूरी फरियाद सुनने के बाद साहब आपको जाने का हुक्म देते हैं और लौटते समय आप हाथ जोड़कर 3 बार झुक झुककर सलामी ठोंकते हैं इस उम्मीद में कि साहब एक बार आपकी सलामी स्वीकार कर लें। लेकिन साहब कोई जवाब नहीं देते और उनका अर्दली आपको धकियाते हुए कहता है कि चलिये अब बाहर निकलिये ।
इतनी दीनता दिखाने के बाद और इतना सम्मान पाने के बाद आप खुशी-खुशी घर जाते हैं कि आज साहब मिल तो गये और उनसे बात हो गयी।
यही लोग स्कूल में आकर शेर बनते हैं और उस मास्टर के सामने अपना पराक्रम दिखाते हैं जो उनके बच्चों का भविष्य संवारने के लिये गेंहू तक पिसवाकर रोटी खिलाता है। हाथ पकड़कर लिखना सिखाता है। डर से आँसु निकलने पर आपके बच्चे को गोदी में बैठाकर आँसु तक पोछता है। गली में जुआ खेलते दिख जाने पर आपके बच्चे को डाँटता भी है और ऐसे शिक्षक पर आपको धौंस जमाते हुए तनिक भी लज्जा नहीं आती।
• आपके बच्चे को डाँट देने पर आप स्कूल में सवाल करने चले आते हैं कि 'मास्टर तुमने मेरे बच्चे को डाँटा क्यों ?' भले ही आप किसी पुलिस वाले से अक्सर बिना वजह डाँट खाते रहते हों। उनसे तो बिन गलती लाठी खाने पर भी आप माफी मांगने लगते हैं किन्तु शिक्षक द्वारा अनुशासन बनाये रखने के लिए दी गयी डॉट पर भी आपको जवाब चाहिए।
आप ये भूल जाते हैं कि जब आप अपने बच्चे का रोना सुनकर उसकी पैरवी करने स्कूल आते हैं तो उसी समय आपके बच्चे के मन से अनुशासन के नियमों का भय निकल जाता है और वह और भी अनुशासनहीन हो जाता है। उसके मन से दंड का भय निकल जाता है और वह और भी उद्दंड हो जाता है। वह ये सोचने लगता है कि गलती करने पर उसके पापा उसका पक्ष लेंगे इसलिए गुरुजी से डरने की जरूरत नहीं। फिर तो वह स्कूल का कोई भी कार्य न करेगा। आप अपने बच्चे की पढ़ाई चाहते हैं या उसकी स्वच्छन्दता ?
कानून का भय यदि समाप्त हो जाय तो हर कोई कानून का उल्लंघन करने लगेगा, ठीक उसी प्रकार यदि अनुशासन का भय यदि खत्म हो जाय तो बच्चा स्वच्छन्द हो जाएगा। विद्यालय की शैक्षिक व्यवस्था खतरे में पड़ जाएगी।" ये हमारा दुर्भाग्य है कि बेसिक में पढ़ने वाले कई बच्चों के माता-पिता अनुशासन के महत्त्व से बिलकुल अनजान हैं और हर दंड को नकारात्मक ही लेते हैं।
जबकि गोस्वामी तुलसीदास ने लिखा है भय बिन होय न प्रीति।' भय बिना अनुशासन भी सम्भव नहीं है और बिन अनुशासन शिक्षक छात्र सम्बन्धों की कल्पना
बेमानी सी होगी।
आप अपने परिवार को ही लीजिये, क्या आप बच्चे की गलती पर उसे दंड नहीं देते ? समझाने का असर एक सीमा तक ही होता है, वो भी हर एक पर असर भी नहीं करता । दंड का आशय सदैव उत्पीड़न नहीं होता, विद्यालय में तो हरगिज नहीं। विद्यालय में दंड का आशय अनुशासन स्थापित करने से होता है। यहाँ दंड का आशय पिटाई से न लगाएँ।
शिक्षक को सदैव खुशी होती है जब उसका कोई शिष्य उससे भी आगे निकलता है और इसी उद्देश्य से वह शिक्षा भी देता है कि उसका प्रत्येक शिष्य सफल हो। इसलिए आप शिक्षक के कार्यों का छिद्रान्वेषण न करें, न ही उस पर शंका।
सोशल मीडिया से साभार कॉपी🙏🙏
31/05/2024
अरमान...
गांव देहात के लोग खासकर मजदूरवर्ग, जब शहरों का रुख करते हैं तो उनके बहुत सारे अरमान होते हैं! कुछ पूरे हो पाते हैं और कुछ अधूरे रह जाते हैं!
अकसर ये देखा जाता है कि एक मजदूर वर्ग 2-4 साल शहर में रह लेने के बाद थोड़ी बहुत गिटिर पिटिर हिंदी या उस शहर की क्षेत्रीय भाषा बोलना सीख ही जाता है!
तीज त्योहार के वक्त जब वही इंसान वापस अपने गांव का रुख करता है और अपनों के बीच पहुंचता है तो लोग उसमें कुछ बदलाव की अपेक्षा करते हैं! ये उनके अपने अरमान हैं!
अब सामने वाले कि मनोदशा को समझिए!
महीनों तक चप्पल घिस कर मजदूरी करने के बाद 40-45 घण्टे तक भारतीय रेलवे के संडास में खड़े खड़े यात्रा की है उसने! घर के पास वाले स्टेशन पर उतरते ही उसने कपड़े बदले हैं और दाढ़ी बनवायी है! ... ताकि गन्दे कपड़े और बेतरतीब दाढ़ी देखकर किसी को ये ना लगे कि वह कितनी मुश्किलों का सामना करते हुए घर तक पहुंचा है!
वह मुस्कुरा कर सभी को प्रणाम करता है और ट्रेन में हुई छुटपुट घटनाओं का जिक्र करता है और अपनी काल्पनिक हीरोगिरी का बखान करते हुए बताता है कि कैसे उसने टिकट कन्फर्म कराया TTE को बेवकूफ बनाकर!!
उसके घरवाले पूरे मनोयोग से उसकी एक एक बात सुनते हैं क्योंकि वह घर का हीरो है!
हक़ीक़त में वह एक मजदूर है! 10×10 की खोली में उसके जैसे 10 और मजदूर रहते हैं! लेकिन जो बातें वह बता रहा होता है उसको सुनकर ऐसा लगता है कि मानों वह किसी 3BHK फ्लैट में रहता हो!
आगे वह बताता है कि 'सेठ' बहुत खयाल रखता है मेरा! एकदम बेटे की तरह रखता है! जब मांगो तब छुट्टी दे देता है! तनखाह तो हर छह महीने में बढ़ाते रहता है! कुल मिलाकर नौकरी 'परमामिंट' है!
जबकि हकीकत इसके ठीक उलट होती है!
ये सारी बातें बाहर ओसारे में हो रही हैं!
पर्दे की ओट से एक नयी नवेली दुल्हन इन सारी बातों को सुन रही है और उसके अपने अरमान कुलांचे मार रहे हैं!
..शहर में मेरे हीरो का एक घर होगा! घर में टीवी होगी! घर में हमदोनो पति पत्नी अपनी दुनिया में रह रहे होंगें! हीरो सुबह 'डिप्टी' पर जाएगा तो मैं उसको नाश्ता बनाकर दूंगी! वापस आने पर चाय नमकीन करेंगे और शाम को कहीं घूमने निकल पड़ेंगे!!
महीने भर की छुट्टी बीतने वाली है और हीरो को वापस शहर जाना है! दुल्हन ने जिद पकड़ ली है कि मुझे भी साथ लेकर चलो शहर!
हीरो समझाता है! लेकिन कोई मानने को तैयार नहीं है क्योंकि उसने शहर के अपने संघर्ष के बारे में किसी को बताया ही नहीं!
थक हार कर वह दुल्हन को साथ लेकर चल देता है!
स्टेशन पर पहुंच कर उसने टिकट लिया! ट्रेन खचाखच भरी हुई है! तिल रखने तक कि जगह नहीं है! लोग धक्के खा रहे हैं!
इसी भीड़ में दुल्हन को महसूस होता है कि इक्का दुक्का हाथ उसके शरीर के नाजुक हिस्सों को छूकर गए हैं!
यहीं पर दुल्हन की अरमानों पर पहला वज्रपात होता है!
घर के ओसारे में कही गयी बातों में और इस हकीकत में जमीन आसमान का अंतर है!
वह कातर नजरों से अपने हीरो को देख रही है जो लोगों के बीच सीधा खड़े होने की जद्दोजहद कर रहा है!
जैसे तैसे वह भीड़ से बाहर आता है और दुल्हन को उसी संडास में धकेल कर पहुंचा देता है जिसमें वह महीने भर पहले बैठकर आया था! वहां पहले से तीन और औरतें खड़ी हैं!
दुल्हन के आधे अरमान यहीं संडास की बदबू के साथ घुलमिल गए!
अरमानों की रही सही कसर शहर पहुँचने के बाद पूरी हो जाती है जब हीरो उसको अपनी 10×10 की खोली के दर्शन कराता है!
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27/04/2024
केन्या के सुप्रसिद्ध धावक अबेल मुताई आलंपिक प्रतियोगिता के अंतिम राउंड मे दौड़ते वक्त अंतिम लाइन से एक मीटर ही दूर थे और उनके सभी प्रतिस्पर्धी पीछे थे। अबेल ने स्वर्ण पदक लगभग जीत ही लिया था, इतने में कुछ गलतफहमी के कारण वे अंतिम रेखा समझकर एक मीटर पहले ही रुक गए। उनके पीछे आने वाले स्पेन के इव्हान फर्नांडिस के ध्यान में आया कि अंतिम रेखा समझ नहीं आने की वजह से वह पहले ही रुक गए। उसने चिल्लाकर अबेल को आगे जाने के लिए कहा लेकिन स्पेनिश नहीं समझने की वजह से वह नहीं हिला। आखिर में इव्हान ने उसे धकेलकर अंतिम रेखा तक पहुंचा दिया। इस कारण अबेल का प्रथम तथा इव्हान का दूसरा स्थान आया।
पत्रकारों ने इव्हान से पूछा "तुमने ऐसा क्यों किया ? मौका मिलने के बावजूद तुमने प्रथम क्रमांक क्यों गंवाया ?"
इव्हान ने कहा "मेरा सपना है कि हम एक दिन ऐसी मानवजाति बनाएंगे जो एक दूसरे को मदद करेगी ना कि उसकी भूल से फायदा उठाएगी। और मैंने प्रथम स्था नहीं गंवाया।
पत्रकार ने फिर कहा "लेकिन तुमने केनियन प्रतिस्पर्धी को धकेलकर आगे लाया।
इसपर इव्हान ने कहा "वह प्रथम था ही। यह प्रतियोगिता उसी की थी।"
पत्रकार ने फिर कहा, "लेकिन तुम स्वर्ण पदक जीत सकते थे।"
इव्हान ने कहा, "उस जीतने का क्या अर्थ होता। मेरे पदक को सम्मान मिलता ? मेरी मां ने मुझे क्या कहा होता ?
संस्कार एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक आगे जाते रहते हैं। मैंने अगली पीढ़ी को क्या दिया होता ? दूसरों की दुर्बलता या अज्ञान का फायदा न उठाते हुए उनको मदद करने की सीख मेरी मां ने मुझे दी है।"
साभार :
15/04/2024
सामान्य हास्य विनोद
एक पति पत्नी में झगड़ा नहीं होता था तो मोहल्ले वालों को बड़ा आश्चर्य होता था , तो एक दिन एक पड़ोसी ने उनके घर जाकर उनसे पूछा कि "मैं देखता हूं कि आप लोगों में बिल्कुल भी झगड़ा नहीं होता है क्या कारण है ?"
पति ने कहा कि "घर में हमने कुछ नियम बना रखे हैं कि घर के सभी छोटे-मोटे फैसले मेरी पत्नी ले लेती हैं और बड़े-बड़े फैसले मैं ले लेता हूं । तो इससे हम लोगों में कोई झगड़े की बात ही नहीं होती ।"
फिर पड़ोसी ने पूछा छोटे फैसले और बड़े फैसले कैसे होते हैं ? थोड़ा बताइए ।
तो बड़े खुश होकर पति ने बताया कि जैसे "घर खरीदना है बेचना है ، बेटा - बेटी की शादी करना है तो कहां करना है ? इस तरह के सारे छोटे फैसले मेरी पत्नी कर लेती हैं "
तो पड़ोसी को फिर से घोर आश्चर्य हुआ तो फिर उसने पूछा अच्छा तो बड़े फैसले कैसे होते हैं ? तब पति ने फिर कहा कि *बड़े फैसले जैसे रूस को यूक्रेन से वापस आना चाहिए कि नहीं? इसराइल को फिलिस्तीन पर हमले रोकना चाहिए कि नहीं? ईरान ने जो अभी इज़्राइल पर हमला किया है वह सही है कि नहीं ? इस तरह के अंतर्राष्ट्रीय लेवल के बड़े फैसले मै ले लेता हूं।
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