16/09/2024
भक्त और भगवान का संवाद: 17
एक हास्यप्रधान नाटक या दुःखद त्रासदी?
भक्त: "भगवान, इतना दुःख क्यों है इस संसार में? लोग प्यार करते हैं, विवाह करते हैं, बच्चे होते हैं, फिर एक दिन कहते हैं, 'I hate you, तलाक चाहिए!' कुछ लोग धर्म बदलना चाहते हैं, कोई हिन्दू से ईसाई, तो कोई ईसाई से मुसलमान। और जो उनके धर्म से अलग हैं, उन्हें काफ़िर कहकर लड़ाई करते हैं। इस दुनिया में इतना कष्ट क्यों है?"
भगवान: "अरे, यह सब मेरी लीला है, मेरे महासागर में उठती हुई तरंगे हैं। तुम तो बस तरंग हो, लेकिन यदि तुम समुद्र को जान सको, तो समझोगे कि यह एक नाटक है। समुद्र के लिए यह एक हास्यप्रधान नाटक है, लेकिन तुम्हारे लिए यह त्रासदी लगती है।"
भक्त (नाराज़गी से): "यह आपकी लीला है, हमारे लिए तो मृत्यु है!"
भगवान: "और तुम कौन हो? तुम मुझसे भिन्न नहीं हो। अगर तुम स्वयं को एक तरंग समझोगे, तो यह दुःखद है। लेकिन जब तुम जानोगे कि तुम स्वयं महासागर हो, तो यह नाटक आनंदमय हो जाएगा।"
जगत का रहस्य: माया की शक्ति
भगवान ने समझाया: "यह माया की आवरण शक्ति है, जो तुम्हें सच्चाई से अलग करती है। तुम देख नहीं पाते कि तुम शुद्ध चेतना हो, केवल देह-मन नहीं। यह माया ही संसार का कारण है। यह शक्ति तुम्हारे भीतर और बाहर ब्रह्म और जगत के बीच पर्दा डालती है।"
भक्त: "तो यह माया क्या है, भगवान?"
भगवान: "माया की दो शक्तियाँ हैं। पहली है आवरण शक्ति, जो तुम्हें साक्षी और दृश्य के बीच का भेद दिखने नहीं देती। दूसरी है विक्षेप शक्ति, जो ब्रह्म को जगत के रूप में प्रक्षिप्त करती है। यह सब तुम्हारे अज्ञान का परिणाम है। तुम रस्सी को सर्प समझ रहे हो, और उसी भ्रम में जी रहे हो।"
जीव और ब्रह्म का भेद: असली और मिथ्या
भक्त ने फिर पूछा: "तो मैं इस भ्रम से कैसे बाहर निकल सकता हूँ?"
भगवान मुस्कुराए और बोले: "जब तुम समझोगे कि यह जो जगत तुम देख रहे हो, वह असल में ब्रह्म ही है, तब यह भ्रम दूर हो जाएगा। जैसे नाग के मुख में विष है, जो उसे नहीं मारता, उसी प्रकार माया ब्रह्म को नहीं ढकती, पर तुम्हें भ्रमित कर देती है। जब तुम इस आवरण से मुक्त हो जाओगे, तो यह संसार 'आनंद की कुटिया' बन जाएगा।"
मुक्ति का मार्ग: माया से परे साक्षी
भगवान ने आगे कहा: "तुम साक्षी हो, पर मन और शरीर के साथ अपनी पहचान कर बैठे हो। जब यह आवरण हटेगा, तब तुम समझोगे कि तुम 'व्यावहारिक जीव' नहीं, बल्कि शुद्ध साक्षी चेतना हो। यह जाग्रत, स्वप्न और सुषुप्ति की अवस्थाएँ मन की हैं, साक्षी की नहीं।"
भक्त: "तो, भगवान, जब मैं साक्षी बन जाऊँगा, तब मैं संसार से मुक्त हो जाऊँगा?"
भगवान ने गहरी नज़रों से भक्त की ओर देखा और कहा: "हाँ, जब तुम अपने असली स्वरूप को पहचान लोगे, तब यह सारा नाटक समाप्त हो जाएगा। और तब तुम जानोगे कि यह जगत और ब्रह्म अलग नहीं हैं, यह सब एक ही शुद्ध चेतना का खेल है।"
माया का आवरण हटाकर साक्षी चेतना को जानो
भगवान के ये शब्द सुनकर भक्त की आँखें खुल गईं। उसे समझ में आ गया कि यह सारा जगत माया की लीला है, और असल में सब ब्रह्म ही है। जब माया का आवरण हटता है, तब सबकुछ स्पष्ट हो जाता है। तब यह संसार दुख का नहीं, बल्कि आनंद का स्रोत बन जाता है।
भक्त: भगवन, क्या सचमुच में प्रत्येक जीव, चाहे वह कीड़ा ही क्यों न हो, ब्रह्म का ही अंश है?
भगवान: हाँ, बिल्कुल। हर जीवात्मा उसी शुद्ध चेतना से जुड़ा है, जो ब्रह्म है। कीड़े, पशु, पक्षी, सभी उसी चेतना का ही अंश हैं। अंतर केवल इतना है कि उनके भीतर की चेतना सीमित होती है और वे आत्मज्ञान प्राप्त करने में अक्षम होते हैं, लेकिन वह चेतना उनमें भी विद्यमान है।
भक्त: तो क्या हमें कीड़ों और अन्य जीवों को भी सम्मान देना चाहिए, क्योंकि वे भी ब्रह्म के अंश हैं?
भगवान: सही कहा। हर जीव का सम्मान आवश्यक है, क्योंकि सभी में वही शुद्ध चेतना विद्यमान है। अगर तुम इसे समझते हो, तो तुम किसी को छोटा या बड़ा नहीं समझोगे। सब अपने-अपने स्थान पर समान रूप से महत्वपूर्ण हैं।
भक्त: फिर हमें कैसे पता चलेगा कि हम भी उसी ब्रह्म के अंश हैं? यह तो केवल सिद्धांत सा लगता है।
भगवान: यह तुम्हारा भ्रम है कि यह केवल एक सिद्धांत है। वास्तव में, तुम हर समय उस शुद्ध चेतना का ही अनुभव कर रहे हो, लेकिन आवरण शक्ति, माया, इसे तुम्हें अनुभव नहीं करने देती। इसे जानने के लिए तुम्हें अपनी इंद्रियों और मन के पार जाकर आत्मसाक्षात्कार करना होगा।
भक्त: तो इस माया के आवरण को कैसे हटाया जा सकता है?
भगवान: इसके लिए दो मार्ग हैं। एक तो योग मार्ग है, जिसमें ध्यान और समाधि के माध्यम से मन और शरीर की चंचलता को रोककर निर्विकल्प समाधि में पहुंचा जाता है। दूसरा अद्वैत मार्ग है, जिसमें विवेक के प्रयोग द्वारा शरीर और मन से शुद्ध चेतना को पृथक करके देखा जाता है।
भक्त: क्या इसके बाद कुछ और साधना करनी पड़ती है?
भगवान: नहीं, जब तुम विवेक-प्रयोग से यह जान जाते हो कि तुम नित्य-शुद्ध-बुद्ध आत्मा हो, तो फिर कोई साधना शेष नहीं रहती। यह ज्ञान ही तुम्हें माया के प्रभाव से मुक्त कर देता है। गीता के 13वें अध्याय में भी यही बताया गया है कि जब तुम पहले से ही मुक्त आत्मा हो, तो मुक्ति की इच्छा किसके लिए?
भक्त: लेकिन, यह सब कुछ सैद्धांतिक लगता है। इसे हम अनुभव में कैसे ला सकते हैं?
भगवान: यह तभी संभव होगा जब तुम अपने देह-मन के पहचान को छोड़कर शुद्ध चेतना के रूप में अपने वास्तविक स्वरूप को पहचानोगे। ब्रह्म और जगत के बीच जो माया का पर्दा है, वह तब हट जाएगा जब तुम यह अनुभव करोगे कि यह जगत भी उसी ब्रह्म का ही रूप है।
भक्त: फिर यह जगत क्या है? यह ब्रह्म और जगत के बीच का भेद कैसे धुंधला हो जाता है?
भगवान: माया की विक्षेप शक्ति ब्रह्म के ऊपर नाम-रूप का जाल डाल देती है। यह जगत ब्रह्म है, लेकिन माया इसे हमें अलग-अलग नाम-रूपों में दिखाती है। जैसे मिट्टी से बने बर्तन मिट्टी ही होते हैं, लेकिन हमें वे केवल बर्तन के रूप में दिखते हैं, वैसे ही यह सारा जगत भी ब्रह्म है, पर हमें यह नाम-रूपों के रूप में दिखता है।
भक्त: तो क्या यह सारा संसार माया का खेल है?
भगवान: हाँ, यह माया का खेल है, जिसमें हम सभी फंसे हुए हैं। हम जीवात्माएँ भी माया में लीन रहती हैं जब तक हम विवेक द्वारा माया के आवरण को भेद कर ब्रह्म का अनुभव नहीं कर लेते।