Tantra Sadhna kendra

Tantra Sadhna kendra

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28/08/2025

|| मां कामाख्या देवी कवच ||

महादेव उवाच

शृणुष्व परमं गुहयं महाभयनिवर्तकम्।कामाख्याया: सुरश्रेष्ठ कवचं सर्व मंगलम्।।
यस्य स्मरणमात्रेण योगिनी डाकिनीगणा:।
राक्षस्यो विघ्नकारिण्यो याश्चान्या विघ्नकारिका:।।क्षुत्पिपासा तथा निद्रा तथान्ये ये च विघ्नदा:।दूरादपि पलायन्ते कवचस्य प्रसादत:।।
निर्भयो जायते मत्र्यस्तेजस्वी भैरवोयम:।समासक्तमनाश्चापि जपहोमादिकर्मसु।
भवेच्च मन्त्रतन्त्राणां निर्वघ्नेन सुसिद्घये।।

मां कामाख्या देवी कवच

ओं प्राच्यां रक्षतु मे तारा कामरूपनिवासिनी।आग्नेय्यां षोडशी पातु याम्यां धूमावती स्वयम्।।नैर्ऋत्यां भैरवी पातु वारुण्यां भुवनेश्वरी।
वायव्यां सततं पातु छिन्नमस्ता महेश्वरी।।
कौबेर्यां पातु मे देवी श्रीविद्या बगलामुखी।
ऐशान्यां पातु मे नित्यं महात्रिपुरसुन्दरी।।
ऊध्र्वरक्षतु मे विद्या मातंगी पीठवासिनी।सर्वत: पातु मे नित्यं कामाख्या कलिकास्वयम्।।
ब्रह्मरूपा महाविद्या सर्वविद्यामयी स्वयम्।
शीर्षे रक्षतु मे दुर्गा भालं श्री भवगेहिनी।।
त्रिपुरा भ्रूयुगे पातु शर्वाणी पातु नासिकाम।
चक्षुषी चण्डिका पातु श्रोत्रे नीलसरस्वती।।
मुखं सौम्यमुखी पातु ग्रीवां रक्षतु पार्वती।
जिव्हां रक्षतु मे देवी जिव्हाललनभीषणा।।
वाग्देवी वदनं पातु वक्ष: पातु महेश्वरी।
बाहू महाभुजा पातु कराङ्गुली: सुरेश्वरी।।
पृष्ठत: पातु भीमास्या कट्यां देवी दिगम्बरी।
उदरं पातु मे नित्यं महाविद्या महोदरी।।
उग्रतारा महादेवी जङ्घोरू परिरक्षतु।
गुदं मुष्कं च मेदं च नाभिं च सुरसुंदरी।।
पादाङ्गुली: सदा पातु भवानी त्रिदशेश्वरी।रक्तमासास्थिमज्जादीनपातु देवी शवासना।।
महाभयेषु घोरेषु महाभयनिवारिणी।
पातु देवी महामाया कामाख्यापीठवासिनी।।
भस्माचलगता दिव्यसिंहासनकृताश्रया।
पातु श्री कालिकादेवी सर्वोत्पातेषु सर्वदा।।
रक्षाहीनं तु यत्स्थानं कवचेनापि वर्जितम्।
तत्सर्वं सर्वदा पातु सर्वरक्षण कारिणी।।
इदं तु परमं गुह्यं कवचं मुनिसत्तम।
कामाख्या भयोक्तं ते सर्वरक्षाकरं परम्।।
अनेन कृत्वा रक्षां तु निर्भय: साधको भवेत।
न तं स्पृशेदभयं घोरं मन्त्रसिद्घि विरोधकम्।।
जायते च मन: सिद्घिर्निर्विघ्नेन महामते।
इदं यो धारयेत्कण्ठे बाहौ वा कवचं महत्।।
अव्याहताज्ञ: स भवेत्सर्वविद्याविशारद:।
सर्वत्र लभते सौख्यं मंगलं तु दिनेदिने।।
य: पठेत्प्रयतो भूत्वा कवचं चेदमद्भुतम्।
स देव्या: पदवीं याति सत्यं सत्यं न संशय:।।

17/08/2025

अक्षय धन प्राप्ति मन्त्र
मंत्र:-
“ॐ नमः विष्णु-प्रियायै ॐ नमः कामाक्षायै ह्रीं ह्रीं ह्रीं क्रीं क्रीं क्रीं श्रीं श्रीं श्रीं फट् स्वाहा।” गुरुवार रात्रि से 21 दिन रात्रि पर्यंत अधिक से अधिक संख्या में जाप कीजिये.
माला :- कमलगट्टे की
दीपक :- गाय का घी
आसान :- उनी
भगवती का पंचोपचार पूजन कर प्रार्थना कीजिये एवं सामर्थ अनुसार अधिक से अधिक जाप कीजिये, भगवती अवश्य कृपा करेंगी....
सभी का कल्याण हो
अलख आदेश.....

18/07/2025

सम्मान देने के लिए भी सिर झुकाना पड़ता है और सम्मान लेने के लिए भी सिर झुकाना पड़ता है..अर्थात सर झुकाना
ही संस्कृति है.... अकारण तने रहना दानवता का प्रतीक है.... केवल ये धयान रहे कि हम समय के अनुसार प्रासंगिक बने रहें...

18/07/2025

एक सच्चा साधक कभी भी किसी से भी किसी प्रकार की कोई स्पर्धा प्रतिस्पर्धा में कदापि रुचि नहीं रखता है क्योंकि जो वो है, वो कोई अन्य बन ही नहीं सकता, और जो कोई भी अन्य हैं,वो उन जैसा बनना ही नहीं चाहता... वो तो संपूर्ण अक्षय आनंद में रहता है , न कोई इच्छा न लवलेश.. ना मान की इच्छा ना अपमान का भय ना कुछ पाने की लालसा ना खोने का डर, बस बाहर से देख और समझने का प्रयास करता रहता हैं माया माई के इस खेल को..... माया माई की जय हो

16/07/2025

**ra

15/07/2025

भक्ति योग क्या है :-
भक्ति व योग संस्कृत के शब्द हैं, योग का अर्थ है जुड़ना अथवा मिलन एवं भक्ति का अर्थ है दिव्य प्रेम, ब्रह्म के साथ प्रेम, परम सत्ता से प्रेम....
भक्ति वह नहीं जो हम करते हैं या जो हमारे पास है,अपितु वह है जो हम हैं,एवं इसी की चेतना, इसी का ज्ञान भक्ति योग है केवल परम चेतना का अनुभव उसके अतिरिक्त अन्य कुछ नहीं, मैं सबसे अलग हूँ .. इस बात का विच्छेद, इसको भूल जाना, संसार, जगत द्वारा दी हुई सभी पहचान का विस्मरण, उस परम चेतना, अंतहीन सर्वयापी प्रेम से मिलन, साक्षात्कार, प्रति क्षण अनुभव ही वास्तव में भक्ति योग है।
महामाई को अलख आदेश....

14/05/2024

भगवान शिव का विभिन्न द्रव्यों से स्नान और उनका फल :-

समुद्र-मंथन से उत्पन्न कालकूट विष की ज्वाला से दग्ध संसार की रक्षा के लिए भगवान शिव ने स्वयं ही उस महाविष का हथेली पर रखकर आचमन कर लिया और नीलकण्ठ कहलाए । उस विष की अग्नि को शांत करने के लिए भगवान शिव का शीतल वस्तुओं से अभिषेक किया जाता है।
जैसे–कच्चा दूध, गंगाजल, पंचामृत, गुलाबजल, इक्षु रस (गन्ने का रस), चंदन मिश्रित जल, कुश-पुष्पयुक्त जल, सुवर्ण एवं रत्नयुक्त जल (रत्नोदक), नारियल का जल आदि ।
भोले-भण्डारी भगवान सदाशिव को अभिषेक अत्यन्त प्रिय है; इसीलिए कहा जाता है—अभिषेक प्रिय: शिव:’ । श्रावणमास में तो इसका महत्त्व बहुत ज्यादा है ।
विभिन्न पुराणों में भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए विभिन्न वस्तुओं से उनके स्नान व विभिन्न प्रकार के फूलों से पूजा बताई गयी है ।
वामनपुराण में वर्णित भगवान शिव के विभिन्न स्नान!!!!!!!
वामन पुराण में भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए विविध वस्तुओं से स्नान और विभिन्न पुष्पों से पूजा करने के साथ ही उनके विभिन्न नामों का उच्चारण करने की विधि इस प्रकार बताई गयी है—
▪️गन्ने के रस से स्नान व कमलपुष्पों से पूजन करने पर विरुपाक्ष (त्रिनेत्र) शिव प्रसन्न हों ▪️दूध से स्नान और कनेर के फूलों से पूजा करने पर शिव प्रसन्न हों ।
▪️दधि से स्नान व कनेर के फूलों से पूजा से शर्व प्रसन्न हों ।
▪️घृत से स्नान व तगर के फूलों से पूजा से त्र्यम्बक प्रसन्न हों ।
▪️कुश के जल से स्नान व कस्तूरी से पूजा करने पर महादेव उमापति प्रसन्न हों ।
▪️पंचगव्य से स्नान और कुन्द के फूलों से पूजा करने पर रुद्र प्रसन्न हों ।
▪️गूलर के फल के जल से स्नान व मदार के फूलों से पूजा से नाट्येश्वर शिव प्रसन्न हों ।
▪️सुगन्धित फूलों के जल से स्नान व आम की मंजरियों से पूजा करने पर कालघ्न शिव प्रसन्न हों ।
▪️आंवले के जल से स्नान व मदार के फूलों से पूजा से पूषा के दांत तोड़ने वाले भगनेत्रघ्न शिव प्रसन्न हों ।
▪️बिल्व के जल से स्नान व धतूरे के उजले फूलों से पूजा करने से दक्ष-यज्ञ का विनाश करने वाले शिव प्रसन्न हों ।
▪️जटामासी के जल से स्नान व बिल्वपत्र व फल सहित पूजा से गंगाधर प्रसन्न हों ।
▪️धतूरे के पुष्पों से शंकर की पूजा करने से विरुपाक्ष (त्रिनेत्र) प्रसन्न हों ।

नारद-विष्णु पुराण में वर्णित शिव के विभिन्न स्नान :-
▪️जो मनुष्य कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी और सोमवार के दिन भगवान शंकर को दूध से नहलाता है, वह शिव सायुज्य प्राप्त कर लेता है ।
▪️अष्टमी अथवा सोमवार को जो मनुष्य नारियल के जल से भगवान शिव को स्नान कराता है, वह शिव-सायुज्य प्राप्त करता है ।
▪️शुक्ल पक्ष की चतुर्दशी अथवा अष्टमी को घी और शहद से भगवान शिव को स्नान कराने से मनुष्य उनका सारुप्य प्राप्त कर लेता है ।
▪️तिल के तेल से भगवान शिव को स्नान कराकर मनुष्य सात पीढ़ियों के साथ उनका सारुप्य प्राप्त कर लेता है ।
▪️जो मनुष्य भगवान शिव को ईख के रस के स्नान कराता है, वह सात पीढ़ियों तक शिव लोक में निवास करता है ।
▪️साथ ही आक के फूलों से शिव पूजन करके मनुष्य उनका सालोक्य प्राप्त करता है और गुग्गुल धूप दिखाने से पापों से छूट जाता है ।
▪️भगवान शिव के समक्ष तिल के तेल से दीपदान करने पर मनुष्य की समस्त कामनाओं की पूर्ति होती है । घी के दीपदान करने से मनुष्य पापों से मुक्त होकर गंगास्नान का फल प्राप्त करता है।
भगवान शिव सबके एकमात्र मूल हैं, उनकी पूजा ही सबसे बढ़कर है; क्योंकि मूल के सींचे जाने पर शाखा रूपी समस्त देवता स्वत: तृप्त हो जाते हैं । भगवान शिव के विधिवत् पूजन से जीवन में कभी दु:ख की अनुभूति नहीं होती है ।
अनिष्टकारक दुर्योगों में शिवलिंग के अभिषेक से भगवान आशुतोष की प्रसन्नता प्राप्त हो जाती है, सभी ग्रहजन्य बाधाएं शान्त हो जाती हैं, अपमृत्यु भाग जाती है और सभी प्रकार के सुखभोग प्राप्त हो जाते हैं । शिवलिंग के अर्चन से मनुष्य को भूमि, विद्या, पुत्र, बान्धव, श्रेष्ठता, ज्ञान एवं मुक्ति सब कुछ प्राप्त हो जाता है।
जय श्री महाकाल अलख आदेश..

12/05/2024

भगवान शिव के पार्थिव पूजन की सरल विधि :-
कलियुग में पार्थिव शिवलिंगों की पूजा करोड़ों यज्ञों का फल देने वाली मानी गयी है । भगवान शिव का किसी पवित्र स्थान पर किया गया पार्थिव पूजन भोग और मोक्ष दोनों देने वाला है । पार्थिव पूजन करने का अधिकार स्त्री व सभी जातियों के लोगों को है ।
शिवपुराण के अनुसार पार्थिव पूजन की एक वैदिक रीति है । वेदपाठी ब्राह्मणों को वैदिक रीति से शिवलिंग का पूजन करना चाहिए परन्तु सर्वसाधारण को दूसरी रीति से पूजन करना चाहिए ।

पूजन में ध्यान रखने योग्य बातें:-
▪️पार्थिव पूजन के लिए स्नान आदि से निवृत्त होकर पहले भस्म और रुद्राक्ष की माला धारण कर लेनी चाहिए । यदि भस्म न हो तो शुद्ध मिट्टी का त्रिपुण्ड मस्तक पर लगा लेना चाहिए ।
▪️शिव पूजन सदैव उत्तर की ओर मुख करके ही करना चाहिए
▪️पूजा की सभी सामग्री पास ही रख लें । पूजन के बीच में उठना नहीं चाहिए ।
▪️पार्थिव पूजा के लिए शिवलिंग निर्माण के लिए मिट्टी पवित्र स्थान की होनी चाहिए । शमी या पीपल की जड़ की मिट्टी या विमौट (वल्मीक) अच्छी मानी जाती है या किसी पवित्र जगह से ऊपर के चार अंगुल मिट्टी हटाकर भीतर की मिट्टी लें या पवित्र नदियों के तटों की मिट्टी ले सकते हैं । जहां जो मिट्टी मिल जाये, उसी से शिवलिंग बनायें ।
▪️शिवपूजन में बिल्वपत्र अवश्य होने चाहिए ।
▪️पूजन में जिस सामग्री की कमी हो, उसको मानसिक भावना करके चढ़ा देनी चाहिए या उसके विकल्प के रूप में पुष्प व चावल चढ़ा दें ।

सर्वसाधारण के लिए पार्थिव शिवलिंग के पूजन की विधि:-
शिवपुराण में पार्थिव लिंग की पूजा भगवान शिव के नामों से बतायी गयी है जो सभी कामनाओं को पूरा करती है । इस प्रकार की पार्थिव पूजा भगवान शिव के आठ नामों—हर, महेश्वर, शम्भु, शूलपाणि, पिनाकधृक्, शिव, पशुपति और महादेव—के साथ की जाती है ।
▪️सर्वप्रथम रक्षादीप जला लें । आचमन करके पवित्री धारण करें । (पवित्री न होने पर अंगूठी सीधे हाथ की अनामिका अंगुली में पहन लें ।)
▪️पूजन से पहले हाथ में पुष्प, अक्षत व जल लेकर संकल्प करें–’हे देव ! मैं आपका पार्थिव पूजन करना चाहता हूँ, आपकी कृपा से यह निर्विघ्न पूर्ण हो ।’ संकल्प सकाम या निष्काम दोनों हो सकता है ।
▪️भगवान शिव के प्रथम नाम ‘ॐ हराय नम:’ का उच्चारण करके पार्थिव लिंग बनाने के लिए मिट्टी लें । मिट्टी को छानकर कंकड़ आदि निकाल दें । जल मिलाकर मिट्टी को गूंथ लें
▪️दूसरे नाम ‘ॐ महेश्वराय नम:’ का उच्चारण करके लिंग का निर्माण करें । शिवलिंग तीन प्रकार के कहे गये हैं—जो शिवलिंग चार अंगुल ऊंचा और देखने में सुन्दर हो तथा वेदी से युक्त हो उसे ‘उत्तम’ कहा गया है । उससे आधे शिवलिंग को ‘मध्यम’ और उससे भी आधे को ‘अधम’ माना गया है ।
▪️फिर ‘ॐ शम्भवे नम:’ बोलकर पार्थिव लिंग की प्रतिष्ठा करें—‘हे शिव इह प्रतिष्ठितो भव
▪️षडक्षर-मन्त्र से अंगन्यास और करन्यास करना चाहिए—

करन्यास :-
ॐ अंगुष्ठाभ्यां नम: (दोनों हाथों की तर्जनी अंगुलियों से दोनों अंगुठों का स्पर्श करना चाहिए ।)
ॐ नं तर्जनीभ्यां नम: (दोनों हाथों के अंगूठों से दोनों तर्जनी अंगुलियों का स्पर्श करना चाहिए ।)
ॐ मं मध्यमाभ्यां नम: (दोनों अंगूठों से दोनों मध्यमा अंगुलियों का स्पर्श करना चाहिए ।)
ॐ शिं अनामिकाभ्यां नम: (दोनों अंगूठों से दोनों अनामिका अंगुलियों का स्पर्श करना चाहिए ।)
ॐ वां कनिष्ठिकाभ्यां नम: (दोनों अंगूठों से दोनों कनिष्ठिका अंगुलियों का स्पर्श करना चाहिए ।)
ॐ यं करतलकरपृष्ठाभ्यां नम: (हथेलियों और उनके पृष्ठभागों का परस्पर स्पर्श ।)

अंगन्यास :-
ॐ हृदयाय नम: (दाहिने हाथ की पांचों अंगुलियों से हृदय का स्पर्श करें ।)
ॐ नं शिरसे स्वाहा (दाहिने हाथ से सिर का स्पर्श करें ।)
ॐ मं शिखायै वषट् (दाहिने हाथ से शिखा का स्पर्श करें ।)
ॐ शिं कवचाय हुम् (दाहिने हाथ की अंगुलियों से बांये कन्धे का और बांयें हाथ की अंगुलियों से दाहिने कंधे का स्पर्श करें ।)
ॐ वां नेत्रत्रयाय वौषट् (दाहिने हाथ की अंगुलियों के अग्रभाग से दोनों नेत्रों और ललाट के मध्यभाग का स्पर्श करें ।)
ॐ यं अस्त्राय फट् (इस वाक्य को पढ़कर दाहिने हाथ को सिर के ऊपर से बायीं ओर से पीछे की ओर ले जाकर दाहिने ओर से आगे की ओर ले आएं और तर्जनीव मध्यमा अंगुलियों से बायीं हथेली पर ताली बजायें ।)।
▪️इसके बाद भगवान गणेश और माता पार्वती को नमस्कार करें–
गजाननं भूतगणादिसेवितं कपित्थजम्बूफलचारुभक्षणम् ।
उमासुतं शोकविनाशकारकं नमामि विघ्नेश्वरपादपंकजम् ।।
नमो देव्यै महादेव्यै शिवायै सततं नम: ।
नम: प्रकृत्यै भद्रायै नियता: प्रणता: स्म ताम् ।।
▪️भगवान शिव के पूजन से पहले उनका ध्यान करना चाहिए—
जो कैलास पर्वत पर एक सुन्दर सिंहासन पर विराजमान हैं, जिनके वामभाग में भगवती उमा उनसे सटकर बैठी हुई हैं, सनक-सनन्दन आदि भक्तजन जिनकी पूजा कर रहे हैं तथा जो भक्तों के दु:खरूपी दावानल को नष्ट कर देने वाले शक्तिशाली ईश्वर हैं । उनके चार हाथों में क्रमश: परशु, मृगमुद्रा, वर एवं अभयमुद्रा हैं । वे वस्त्र की जगह व्याघ्रचर्म धारण किये हुए हैं, उनके पांच मुख हैं और प्रत्येक मुखमण्डल में तीन-तीन नेत्र हैं । वे विश्व के आदि हैं और सबका भय हर लेने वाले हैं ।
▪️इसके बाद ‘ॐ शूलपाणये नम:’ कहकर उस पार्थिव लिंग में भगवान शिव का आवाहन करें ।
▪️‘ॐ पिनाकधृषे नम:’ कहकर पाद्य (पैर धुलाने के लिए के लिए शिवलिंग पर जल) छोड़ें । फिर अर्घ्य (हाथ धुलाने के लिए जल) निवेदित करें । (जल में चंदन, अक्षत व पुष्प मिलाकर अर्घ्यजल बनाया जाता है । इसके बाद भगवान शंकर को आचमन के लिए जल चढ़ाएं । तत्पश्चात् शिवजी को शुद्ध जल से स्नान कराएं । दूध, दही, घी, शहद व शर्करा से शिवजी को अलग-अलग स्नान कराएं । फिर शुद्ध जल से स्नान कराकर अंत में पंचामृत से स्नान कराएं । पुन: शुद्ध जल से स्नान कराएं । थोड़े से जल में चंदन मिलाकर गन्धोदक स्नान कराएं । पुन: गंगाजल से स्नान कराकर अंत में शुद्धजल से स्नान कराएं और स्नान के बाद आचमन के लिए जल छोड़ दें ।
▪️शिवलिंग को साफ वस्त्र से पोंछकर वस्त्र चढ़ाकर आचमन कराएं ।
▪️यज्ञोपवीत समर्पित करके आचमन कराएं । शिवलिंग पर उपवस्त्र चढाकर आचमन के लिए जल छोड़ दें ।
▪️‘ॐ शिवाय नम:’ कहकर उनकी चंदन, अक्षत और बिल्वपत्र से पूजा करें । शिवलिंग पर सुगन्धित चंदन से त्रिपुण्ड्र बनाएं, लाल चंदन से त्रिपुण्ड के बीच में बिन्दी लगाएं । भगवान पर अखण्ड चावल व काले तिल आदि चढ़ाएं । अबीर-गुलाल छिड़कें व इत्र का लेपन करें । भगवान शिव को पुष्पमाला, पुष्प, दूर्वा, ‘ऊँ नम: शिवाय’ या ‘राम’ लिखे बिल्वपत्र चढ़ाएं । इसके बाद बेलफल, धतूरा, शमीपत्र, आदि अर्पित करें । शिवजी पर कमल, गुलाब, चम्पा, चमेली, सफेद कनेर, बेला, अपामार्ग, उत्पल आदि पुष्प चढ़ाने चाहिए । भगवान शिव को आभूषण की जगह रुद्राक्षमाला धारण कराएं ।

भगवान शिव को धूप निवेदन करें । फिर घी से बरा हुआ दीपक दिखाएं । इसके बाद भगवान शिव को नैवेद्य में मिष्ठान व ऋतुफल अर्पित करें फिर भगवान को प्रेमपूर्वक आचमन करायें । (कुछ लोग भगवान को भांग का भोग लगाते हैं।) करोद्वर्तन के लिए दोनों हाथों की अनामिका ऊंगलियों में चंदन लेकर अंगूठे की सहायता से शिवलिंग पर छिड़कें । लोंग, इलायची, सुपारी द्वारा निर्मित ताम्बूल भगवान शिव को निवेदित करें । अंत में सामर्थ्यानुसार द्रव्य दक्षिणा समर्पित करें।
▪️आरती करें, मन्त्रपुष्पांजलि अर्पित करें ।
▪️इसके बाद भगवान शिव की अष्टमूर्तियों के नाम का उच्चारण कर आठों दिशाओं में फूल व अक्षत छोड़ें—
१. पूर्व दिशा में ॐ शर्वाय क्षितिमूर्तये नम: ।
२. ईशानकोण में ॐ भवाय जलमर्तये नम: ।
३. उत्तर दिशा में ॐ रुद्राय अग्निमूर्तये नम: ।
४. वायव्यकोण में ॐउग्राय वायुमूर्तये नम: ।
५. पश्चिम दिशा में ॐ भीमाय आकाशमूर्तये नम: ।
६. नैर्ऋत्य कोण में ॐ पशुपतये यजमानमूर्तये नम: ।
७. दक्षिण दिशा में ॐ महादेवाय सोममूर्तये नम: ।
८. अग्नि कोण में ॐ ईशानाय सूर्यमूर्तये नम: ।
▪️इसके बाद कम-से-कम ‘ॐ नम: शिवाय’ मन्त्र की एक माला का जप करें ।
▪️फिर शिव की आधी परिक्रमा करें ।
▪️तत्पश्चात् शिव को साष्टांग प्रणाम करें ।
▪️इसके बाद गाल बजाकर ‘बम बम भोले’ का उच्चारण करें ।
▪️अंजलि में अक्षत और फूल लेकर ‘ॐ पशुपते नम:’ कहकर भगवान शंकर से इस प्रकार प्रार्थना करें—
आवाहन न जानामि न जानामि विसर्जनम् ।
पूजां नैव हि जानामि क्षमस्व परमेश्वर ।।
मन्त्रहीनं क्रियाहीनं भक्तिहीनं सदाशिव ।
यत् पूजितं मया देव परिपूर्णं तदस्तु मे ।।
‘सबको सुख देने वाले कृपानिधान भूतनाथ शिव ! मैंने अनजाने में या जानबूझकर यदि कभी आपका जप या पूजन किया हो तो आपकी कृपा से वह सफल हो जाए । हे गौरीनाथ ! मैं आधुनिक युग का महान पापी हूँ लेकिन आप सदा से ही महान पतितपावन हैं; इस बात को ध्यान में रख कर आप जैसा चाहें, वैसा करें । मैं जैसा हूँ, वैसा ही आपका हूँ, आपके आश्रित हूँ, इसलिए आपसे रक्षा पाने के योग्य हूँ । परमेश्वर ! आप मुझ पर प्रसन्न होइये ।’
इस प्रकार प्रार्थना करके हाथ में लिए हुए अक्षत और पुष्प को पार्थिव लिंग पर अर्पित कर दें ।
▪️अंत में ‘ॐ महादेवाय नम:’ कह कर भगवान शिव का विसर्जन कर दें ।
गच्छ गच्छ सुरश्रेष्ठ ! स्वस्थाने परमेश्वर ।
मम पूजां गृहीत्वेमां पुनरागमनाय च ।।
ॐ विष्णवे नम:, ॐ विष्णवे नम:, ॐ विष्णवे नम:,
ॐसाम्बसदाशिवाय नम:, ॐसाम्बसदाशिवाय नम:, ॐसाम्बसदाशिवाय नम:,
अंत में ‘अनेन पार्थिवलिंगपूजन कर्मणा श्रीयज्ञस्वरूप: शिव: प्रीयताम्, न मम ।’ ऐसा कहकर पृथ्वी पर जल छोड़ दें और अपने मस्तक व हृदय से लगा लें ।

भगवान शिव की पूजा भक्ति भाव से करनी चाहिए, अनावश्यक भ्रम या तर्क से नहीं । क्योंकि भक्ति से ही भगवान मनोवांछित फल देते हैं।
जय श्री महाकाल, अलख आदेश

29/03/2023

🙏🌹 जय श्री महाकाल 🌹🙏
श्री महाकालेश्वर् ज्योतिर्लिंग उज्जैन में मेरे बाबा जी के आज के भस्म आरती शृंगार दर्शन। 29 मार्च 2023 ( बुधवार )

28/03/2023

🙏🌹 जय श्री महाकाल 🌹🙏
श्री महाकालेश्वर् ज्योतिर्लिंग उज्जैन में मेरे बाबा जी के आज के भस्म आरती शृंगार दर्शन। 28 मार्च 2023 ( मंगलवार )

27/03/2023

🙏🌹 जय श्री महाकाल 🌹🙏
श्री महाकालेश्वर् ज्योतिर्लिंग उज्जैन में मेरे बाबा जी के आज के भस्म आरती शृंगार दर्शन। 27 मार्च 2023 ( सोमवार )

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