लक्ष्मी नारायण यज्ञ भोपाल गुफा मंदिर भोपाल
आचार्य पाणिग्राही चतुर्वेद संस्कृत वेद पाठशाला भोपाल
वेदमेव सदा पठेत,धर्मों रक्षति रक्षितः,
16/04/2026
मनोकामेश्वर ऋषिकुल वेद विद्यालय
प्रवेश प्रारम्भ
निःशुल्क शिक्षा एवं आवास
विषय
वेद, कर्मकाण्ड, ज्योतिष, व्याकरण
समस्त ब्राह्मण परिवार जो भी अपने पुत्र को गुरुकुल में अध्ययन करवाना चाहते हो, तो सत्र 2026-27 के प्रवेश प्रारम्भ हो चुके है। गुरुकुल में 12 वर्ष की आयु के विद्यार्थियों को प्रवेश मिल जायेगा। प्रवेश के लिए सीमित समय है, तो शीघ्र ही आप संपर्क कर सकते है।
संपर्क सूत्र +91-7974960285
स्थानः कोलार रोड भोपाल
(म.प्र.)
12 मार्च का पूजन संकल्प ✅
ॐ विष्णुर्विष्णुर्विष्णुः।
श्रीमद्भगवतो महापुरुषस्य विष्णोराज्ञया प्रवर्तमानस्य अद्यैतस्य ब्रह्मणोह्नि द्वितीये परार्धे श्रीश्वेतवाराहकल्पे वैवस्वतमन्वन्तरे अष्टाविंशतितमे युगे कलियुगे कलि प्रथमचरणे भूर्लोके भारतवर्षे जम्बूद्विपे भरतखण्डे मध्य प्रदेश - राज्ये अन्तरगते अमुक* -नाम्नि नगरे (ग्रामे वा)
देवब्राह्मणानां सन्निधौ श्रीमन्नृपतिवीरविक्रमादित्यसमयतः 2082(द्विसहस्रशतम् द्वयशीतिः) संख्या-परिमिते प्रवर्त्तमानसंवत्सरे, प्रभवादिषष्ठि-संवत्सराणां मध्ये कालयुक्त नाम संवत्सरे, उत्तरायण अयने, शिशिर-ऋतौ, चैत्र मासे, कृष्ण पक्षे, नवमी तिथौ, गुरुवार वासरे, मूल नक्षत्रे, सिद्धि योगे, तैतिल करणे, धनु राशिस्थिते चन्द्रे, कुंभ राशिस्थिते श्रीसूर्ये, शेषेषु ग्रहेषु यथायथा राशिस्थानस्थितेषु सत्सु, एवं ग्रहगुणविशेषणविशिष्टायां शुभपुण्यतिथौ गोत्रोत्पन्नस्य अमुक* सपरिवारस्य ममात्मनः
अहं अमुक* श्रुति-स्मृति-पुराणोक्त-पुण्य-फलप्राप्त्यर्थं, मम सकुटुम्बस्य सपरिवारस्य क्षेम-स्थैर्य-आयुरारोग्य-ऐश्वर्याभिवृद्ध्यर्थम्, आधिभौतिक-आधिदैविक-आध्यात्मिक-त्रिविधताप-शमनार्थं, धर्मार्थकाममोक्ष-फलप्राप्त्यर्थं, नित्यकल्याणलाभाय, भगवत्प्रीत्यर्थं, अमुक* स्य पूजनं करिष्ये।
29/01/2026
अति महत्वपूर्ण पड़ियेगा जरूर
24/01/2026
🙏🚩🕉️😊☘️ध्यान मंत्र☘️😊🕉️🚩🙏
21/01/2026
🙏☘️हेमाद्रि संकल्प☘️🙏
#हेमाद्रि #हेमाद्रीसंकल्प
20/01/2026
🌼 गुप्त नवरात्रि विशेष 🌼
🌼दस महाविद्या दीक्षा 🌼
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साधनाओं की बात आते ही दस महाविद्या का नाम सबसे ऊपर आता है। प्रत्येक महाविद्या का अपने आप में अलग ही महत्त्व है। लाखों में कोई एक ही ऐसा होता है जिसे सदगुरू से महाविद्या दीक्षा प्राप्त हो पाती है। इस दीक्षा को प्राप्त करने के बाद सिद्धियों के द्वार एक के बाद एक कर साधक के लिए खुलते चले जाते है।
दस महा विद्या:👉 1.काली, 2.तारा, 3.त्रिपुरसुंदरी, 4.भुवनेश्वरी, 5.छिन्नमस्ता, 6.त्रिपुरभैरवी, 7.धूमावती, 8.बगलामुखी, 9.मातंगी और 10.कमला।
महाकाली महाविद्या दीक्षा
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नाम : माता कालिका
शस्त्र : त्रिशूल और तलवार
वार : शुक्रवार
दिन : अमावस्या
ग्रंथ : कालिका पुराण
मंत्र : ॐ ह्रीं श्रीं क्रीं परमेश्वरि कालिके स्वाहा
दुर्गा का एक रूप : माता कालिका 10 महाविद्याओं में से एक
मां काली के 4 रूप हैं:- दक्षिणा काली, शमशान काली, मातृ काली और महाकाली।
राक्षस वध : रक्तबीज।
कालीका के प्रमुख तीन स्थान है
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कोलकाता में कालीघाट पर जो एक शक्तिपीठ भी है। मध्यप्रदेश के उज्जैन में भैरवगढ़ में गढ़कालिका मंदिर इसे भी शक्तिपीठ में शामिल किया गया है और गुजरात में पावागढ़ की पहाड़ी पर स्थित महाकाली का जाग्रत मंदिर चमत्कारिक रूप से मनोकामना पूर्ण करने वाला है।
यह तीव्र प्रतिस्पर्धा का युग है। आप चाहे या न चाहे विघटनकारी तत्व आपके जीवन की शांति, सौहार्द भंग करते ही रहते हैं। एक दृष्ट प्रवृत्ति वाले व्यक्ति की अपेक्षा एक सरल और शांत प्रवृत्ति वाले व्यक्ति के लिए अपमान, तिरस्कार के द्वार खुले ही रहते हैं। आज ऐसा एक भी व्यक्ति नहीं है, जिसका कोई शत्रु न हो … और शत्रु का तात्पर्य मानव जीवन की शत्रुता से ही नहीं, वरन रोग, शोक, व्याधि, पीडा भी मनुष्य के शत्रु ही कहे जाते हैं, जिनसे व्यक्ति हर क्षण त्रस्त रहता है … और उनसे छुटकारा पाने के लिए टोने टोटके आदि के चक्कर में फंसकर अपने समय और धन दोनों का ही व्यय करता है, परन्तु फिर भी शत्रुओं से छुटकारा नहीं मिल पाता।
महाकाली दीक्षा के माध्यम से व्यक्ति शत्रुओं को निस्तेज एवं परास्त करने में सक्षम हो जाता है, चाहे वह शत्रु आभ्यांतरिक हों या बाहरी, इस दीक्षा के द्वारा उन पर विजय प्राप्त कर लेता है, क्योंकि महाकाली ही मात्र वे शक्ति स्वरूपा हैं, जो शत्रुओं का संहार कर अपने भक्तों को रक्षा कवच प्रदान करती हैं। जीवन में शत्रु बाधा एवं कलह से पूर्ण मुक्ति तथा निर्भीक होकर विजय प्राप्त करने के लिए यह दीक्षा अद्वितीय है। देवी काली के दर्शन भी इस दीक्षा के बाद ही सम्भव होते है, गुरु द्वारा यह दीक्षा प्राप्त होने के बाद ही कालिदास में ज्ञान का स्रोत फूटा था, जिससे उन्होंने ‘मेघदूत’ , ‘ऋतुसंहार’ जैसे अतुलनीय काव्यों की रचना की, इस दीक्षा से व्यक्ति की शक्ति भी कई गुना बढ़ जाती है।
काली माता का मंत्र: हकीक की माला से नौ माला 'क्रीं ह्रीं ह्नुं दक्षिणे कालिके स्वाहा:।' मंत्र का जाप कर सकते हैं। जाप के नियम किसी जानकार से पूछें।
तारा दीक्षा
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भगवती तारा के तीन स्वरूप हैं👉 तारा , एकजटा और नील सरस्वती
तारा के सिद्ध साधक के बारे में प्रचिलित है, वह जब प्रातः काल उठाता है, तो उसे सिरहाने नित्य दो तोला स्वर्ण प्राप्त होता है। भगवती तारा नित्य अपने साधक को स्वार्णाभूषणों का उपहार देती हैं। तारा महाविद्या दस महाविद्याओं में एक श्रेष्ठ महाविद्या हैं। तारा दीक्षा को प्राप्त करने के बाद साधक को जहां आकस्मिक धन प्राप्ति के योग बनने लगते हैं, वहीं उसके अन्दर ज्ञान के बीज का भी प्रस्फुटन होने लगता है, जिसके फलस्वरूप उसके सामने भूत भविष्य के अनेकों रहस्य यदा-कदा प्रकट होने लगते हैं। तारा दीक्षा प्राप्त करने के बाद साधक का सिद्धाश्रम प्राप्ति का लक्ष्य भी प्रशस्त होता हैं।
तारा माता का मंत्र👉 नीले कांच की माला से बारह माला प्रतिदिन 'ऊँ ह्रीं स्त्रीं हुम फट' मंत्र का जाप कर सकते हैं। जाप के नियम किसी जानकार से पूछें।
षोडशी त्रिपुर सुन्दरी दीक्षा
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महाविद्या समुदाय में त्रिपुरा नाम की अनेक देवियां हैं, जिनमें त्रिपुरा-भैरवी, त्रिपुरा और त्रिपुर सुंदरी विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं।
त्रिपुर सुन्दरी दीक्षा प्राप्त होने से आद्याशक्ति त्रिपुरा शक्ति शरीर की तीन प्रमुख नाडियां इडा, सुषुम्ना और पिंगला जो मन बुद्धि और चित्त को नियंत्रित करती हैं, वह शक्ति जाग्रत होती है। भू भुवः स्वः यह तीनों इसी महाशक्ति से अद्भुत हुए हैं, इसीसलिए इसे त्रिपुर सुन्दरी कहा जाता है। इस दीक्षा के माध्यम से जीवन में चारों पुरुषार्थों की प्राप्ति तो होती ही है, साथ ही साथ आध्यात्मिक जीवन में भी सम्पूर्णता प्राप्त होती है, कोई भी साधना हो, चाहे अप्सरा साधना हो, देवी साधना हो, शैव साधना हो, वैष्णव साधना हो, यदि उसमें सफलता नहीं मिल रहीं हो, तो उसको पूर्णता के साथ सिद्ध कराने में यह महाविद्या समर्थ है, यदि इस दीक्षा को पहले प्राप्त कर लिया जाए तो साधना में शीघ्र सफलता मिलती है। गृहस्थ सुख, अनुकूल विवाह एवं पौरूष प्राप्ति हेतु इस दीक्षा का विशेष महत्त्व है। मनोवांछित कार्य सिद्धि के लिए भी यह दीक्षा उपयुक्त है। इस दीक्षा से साधक को धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष इन चारों पुरुषार्थों की प्राप्ति होती है।
त्रिपुर सुंदरी माता का मंत्र:👉 रूद्राक्ष माला से दस माला 'ऐ ह्रीं श्रीं त्रिपुर सुंदरीयै नम:' मंत्र का जाप कर सकते हैं। जाप के नियम किसी जानकार से पूछें।
भुवनेश्वरी दीक्षा
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भुवनेश्वरी को आदिशक्ति और मूल प्रकृति भी कहा गया है। भुवनेश्वरी ही शताक्षी और शाकम्भरी नाम से प्रसिद्ध हुई। पुत्र प्राप्ती के लिए लोग इनकी आराधना करते हैं।
भूवन अर्थात इस संसार की स्वामिनी भुवनेश्वरी, जो ‘ह्रीं’ बीज मंत्र धारिणी हैं, वे भुवनेश्वरी ब्रह्मा की भी आधिष्ठात्री देवी हैं। महाविद्याओं में प्रमुख भुवनेश्वरी ज्ञान और शक्ति दोनों की समन्वित देवी मानी जाती हैं। जो भुवनेश्वरी सिद्धि प्राप्त करता है, उस साधक का आज्ञा चक्र जाग्रत होकर ज्ञान-शक्ति, चेतना-शक्ति, स्मरण-शक्ति अत्यन्त विकसित हो जाती है। भुवनेश्वरी को जगतधात्री अर्थात जगत-सुख प्रदान करने वाली देवी कहा गया है। दरिद्रता नाश, कुबेर सिद्धि, रतिप्रीती प्राप्ति के लिए भुवनेश्वरी साधना उत्तम मानी है है। इस महाविद्या की आराधना एवं दीक्षा प्राप्त करने वाले व्यक्ति की वाणी में सरस्वती का वास होता है। इस महाविद्या की दीक्षा प्राप्त कर भुवनेश्वरी साधना संपन्न करने से साधक को चतुर्वर्ग लाभ प्राप्त होता ही है। यह दीक्षा प्राप्त कर यदि भुवनेश्वरी साधना संपन्न करें तो निश्चित ही पूर्ण सिद्धि प्राप्त होती है।
भुवनेश्वरी माता का मंत्र:👉 स्फटिक की माला से ग्यारह माला प्रतिदिन 'ह्रीं भुवनेश्वरीयै ह्नीं नम:' मंत्र का जाप कर सकते हैं। जाप के नियम किसी जानकार से पूछें।
छिन्नमस्ता महाविद्या दीक्षा
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माता का स्वरूप अतयंत गोपनीय है। चतुर्थ संध्याकाल में मां छिन्नमस्ता की उपासना से साधक को सरस्वती की सिद्ध प्राप्त हो जाती है। कृष्ण और रक्त गुणों की देवियां इनकी सहचरी हैं। पलास और बेलपत्रों से छिन्नमस्ता महाविद्या की सिद्धि की जाती है। इससे प्राप्त सिद्धियां मिलने से लेखन बुद्धि ज्ञान बढ़ जाता है। शरीर रोग मुक्त होताते हैं। सभी प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष शत्रु परास्त होते हैं। यदि साधक योग, ध्यान और शास्त्रार्थ में साधक पारंगत होकर विख्यात हो जाता है।
भगवती छिन्नमस्ता के कटे सर को देखकर यद्यपि मन में भय का संचार अवश्य होता है, परन्तु यह अत्यन्त उच्चकोटि की महाविद्या दीक्षा है। यदि शत्रु हावी हो, बने हुए कार्य बिगड़ जाते हों, या किसी प्रकार का आपके ऊपर कोई तंत्र प्रयोग हो, तो यह दीक्षा अत्यन्त प्रभावी है। इस दीक्षा द्वारा कारोबार में सुदृढ़ता प्राप्त होती है, आर्थिक अभाव समाप्त हो जाते हैं, साथ ही व्यक्ति के शरीर का कायाकल्प भी होना प्रारम्भ हो जाता है। इस साधना द्वारा उच्चकोटि की साधनाओं का मार्ग प्रशस्त हो जाता है, तथा उसे मौसम अथवा सर्दी का भी विशेष प्रभाव नहीं पङता है।
छीन्नमस्ता माता का मंत्र👉 रूद्राक्ष माला से दस माला प्रतिदिन 'श्रीं ह्रीं ऎं वज्र वैरोचानियै ह्नीं फट स्वाहा' मंत्र का जाप कर सकते हैं। जाप के नियम किसी जानकार से पूछें।
त्रिपुर भैरवी दीक्षा
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भैरवी के नाना प्रकार के भेद बताए गए हैं जो इस प्रकार हैं त्रिपुरा भैरवी, चैतन्य भैरवी, सिद्ध भैरवी, भुवनेश्वर भैरवी, संपदाप्रद भैरवी, कमलेश्वरी भैरवी, कौलेश्वर भैरवी, कामेश्वरी भैरवी, नित्याभैरवी, रुद्रभैरवी, भद्र भैरवी तथा षटकुटा भैरवी आदि। त्रिपुरा भैरवी ऊर्ध्वान्वय की देवता हैं। यह साधक को युक्ति और मुक्ति दोनों ही प्रदान करती है। इसकी साधना से षोडश कला निपुण सन्तान की प्राप्ति होती है। जल, थल और नभ में उसका वर्चस्व कायम होता है। आजीविका और व्यापार में इतनी वृद्धि होती है कि व्यक्ति संसार भर में धन श्रेष्ठ यानि सर्वाधिक धनी बनकर सुख भोग करता है।
भूत-प्रेत एवं इतर योनियों द्वारा बाधा आने पर जीवन अस्त-व्यस्त हो जाता है। ग्रामीण अंचलों में तथा पिछडे क्षेत्रों के साथ ही सभ्य समाज में भी इस प्रकार के कई हादसे सामने आते है, जब की पूरा का पूरा घर ही इन बाधाओं के कारण बर्बादी के कगार पर आकर खडा हो गया हो। त्रिपुर भैरवी दीक्षा से जहां प्रेत बाधा से मुक्ति प्राप्त होती है, वही शारीरिक दुर्बलता भी समाप्त होती है, व्यक्ति का स्वास्थ्य निखारने लगता है। इस दीक्षा को प्राप्त करने के बाद साधक में आत्म शक्ति त्वरित रूप से जाग्रत होने लगती है, और बड़ी से बड़ी परिस्थियोंतियों में भी साधक आसानी से विजय प्राप्त कर लेता है, असाध्य और दुष्कर से दुष्कर कार्यों को भी पूर्ण कर लेता है। दीक्षा प्राप्त होने पर साधक किसी भी स्थान पर निश्चिंत, निर्भय आ जा सकता है, ये इतर योनियां स्वयं ही ऐसे साधकों से भय रखती है।
त्रिपुर भैरवी का मंत्र👉 मुंगे की माला से पंद्रह माला 'ह्रीं भैरवी क्लौं ह्रीं स्वाहा:' मंत्र का जाप कर सकते हैं। जाप के नियम किसी जानकार से पूछें।
धूमावती दीक्षा
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धूमावती का कोई स्वामी नहीं है। इसलिए यह विधवा माता मानी गई है। इनकी साधना से जीवन में निडरता और निश्चंतता आती है। इनकी साधना या प्रार्थना से आत्मबल का विकास होता है। मां धूमावती महाशक्ति स्वयं नियंत्रिका हैं। ऋग्वेद में रात्रिसूक्त में इन्हें 'सुतरा' कहा गया है। अर्थात ये सुखपूर्वक तारने योग्य हैं। इन्हें अभाव और संकट को दूर करने वाली मां कहा गया है। इस महाविद्या की सिद्धि के लिए तिल मिश्रित घी से होम किया जाता है। धूमावती महाविद्या के लिए यह भी जरूरी है कि व्यक्ति सात्विक और नियम संयम और सत्यनिष्ठा को पालन करने वाला लोभ-लालच से दूर रहें। शराब और मांस को छूए तक नहीं।
धूमावती दीक्षा प्राप्त होने से साधक का शरीर मजबूत व् सुदृढ़ हो जाता है। आए दिन और नित्य प्रति ही यदि कोई रोग लगा रहता हो, या शारीरिक अस्वस्थता निरंतर बनी ही रहती हो, तो वह भी दूर होने लग जाती है। उसकी आखों में प्रबल तेज व्याप्त हो जाता है, जिससे शत्रु अपने आप में ही भयभीत रहते हैं। इस दीक्षा के प्रभाव से यदि कीसी प्रकार की तंत्र बाधा या प्रेत बाधा आदि हो, तो वह भी क्षीण हो जाती है। इस दीक्षा को प्राप्त करने के बाद मन में अदभुद साहस का संचार हो जाता है, और फिर किसी भी स्थिति में व्यक्ति भयभीत नहीं होता है। तंत्र की कई उच्चाटन क्रियाओं का रहस्य इस दीक्षा के बाद ही साधक के समक्ष खुलता है।
धूमावती का मंत्र:👉 मोती की माला से नौ माला 'ऊँ धूं धूं धूमावती देव्यै स्वाहा:' मंत्र का जाप कर सकते हैं। जाप के नियम किसी जानकार से पूछें।
बगलामुखी दीक्षा
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माता बगलामुखी की साधना युद्ध में विजय होने और शत्रुओं के नाश के लिए की जाती है। बगला मुखी के देश में तीन ही स्थान है। कृष्ण और अर्जुन ने महाभातर के युद्ध के पूर्व माता बगलामुखी की पूजा अर्चना की थी। इनकी साधना शत्रु भय से मुक्ति और वाक् सिद्धि के लिए की जाती है।
यह दीक्षा अत्यन्त तेजस्वी, प्रभावकारी है। इस दीक्षा को प्राप्त करने के बाद साधक निडर एवं निर्भीक हो जाता है। प्रबल से प्रबल शत्रु को निस्तेज करने एवं सर्व कष्ट बाधा निवारण के लिए इससे अधिक उपयुक्त कोई दीक्षा नहीं है। इसके प्रभाव से रूका धन पुनः प्राप्त हो जाता है। भगवती वल्गा अपने साधकों को एक सुरक्षा चक्र प्रदान करती हैं, जो साधक को आजीवन हर खतरे से बचाता रहता है।
बगलामुखी का मंत्र:👉 हल्दी या पीले कांच की माला से आठ माला 'ऊँ ह्लीं बगुलामुखी देव्यै ह्नीं ओम नम:' दूसरा मंत्र- 'ह्लीं बगलामुखी सर्व दुष्टानां वाचं मुखं पदं स्तम्भय जिह्वां कीलम बुद्धिं विनाशय ह्लीं ॐ स्वाहा।' मंत्र का जाप कर सकते हैं। जाप के नियम किसी जानकार से पूछें।
मातंगी दीक्षा
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मतंग शिव का नाम है। शिव की यह शक्ति असुरों को मोहित करने वाली और साधकों को अभिष्ट फल देने वाली है। गृहस्थ जीवन को श्रेष्ठ बनाने के लिए लोग इनकी पूजा करते हैं। अक्षय तृतीया अर्थात वैशाख शुक्ल की तृतीया को इनकी जयंती आती है।
यह श्याम वर्ण और चन्द्रमा को मस्तक पर धारण करती हैं। यह पूर्णतया वाग्देवी की ही पूर्ति हैं। चार भुजाएं चार वेद हैं। मां मातंगी वैदिकों की सरस्वती हैं।
पलास और मल्लिका पुष्पों से युक्त बेलपत्रों की पूजा करने से व्यक्ति के अंदर आकर्षण और स्तम्भन शक्ति का विकास होता है। ऐसा व्यक्ति जो मातंगी महाविद्या की सिद्धि प्राप्त करेगा, वह अपने क्रीड़ा कौशल से या कला संगीत से दुनिया को अपने वश में कर लेता है। वशीकरण में भी यह महाविद्या कारगर होती है।
आज के इस मशीनी युग में जीवन यंत्रवत, ठूंठ और नीरस बनकर रह गया है। जीवन में सरसता, आनंद, भोग-विलास, प्रेम, सुयोग्य पति-पत्नी प्राप्ति के लिए मातंगी दीक्षा अत्यन्त उपयुक्त मानी जाती है। इसके अलावा साधक में वाक् सिद्धि के गुण भी जाते हैं। उसमे आशीर्वाद व् श्राप देने की शक्ति आ जाती है। उसकी वाणी में माधुर्य और सम्मोहन व्याप्त हो जाता है और जब वह बोलता है, तो सुनने वाले उसकी बातों से मुग्ध हो जाते है। इससे शारीरिक सौन्दर्य एवं कान्ति में वृद्धि होती है, रूप यौवन में निखार आता है। इस दीक्षा के माध्यम से ह्रदय में जिस आनन्द रस का संचार होता है, उसके फलतः हजार कठिनाई और तनाव रहते हुए भी व्यक्ति प्रसन्न एवं आनन्द से ओत-प्रोत बना रहता है।
मातंगी माता का मंत्र:👉 स्फटिक की माला से बारह माला 'ऊँ ह्रीं ऐ भगवती मतंगेश्वरी श्रीं स्वाहा:' मंत्र का जाप कर सकते हैं। जाप के नियम किसी जानकार से पूछें।
कमला दीक्षा
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दरिद्रता, संकट, गृहकलह और अशांति को दूर करती है कमलारानी। इनकी सेवा और भक्ति से व्यक्ति सुख और समृद्धि पूर्ण रहकर शांतिमय जीवन बिताता है।
श्वेत वर्ण के चार हाथी सूंड में सुवर्ण कलश लेकर सुवर्ण के समान कांति लिए हुए मां को स्नान करा रहे हैं। कमल पर आसीन कमल पुष्प धारण किए हुए मां सुशोभित होती हैं। समृद्धि, धन, नारी, पुत्रादि के लिए इनकी साधना की जाती है।
धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष इन चार प्रकार के पुरुषार्थों को प्राप्त करना ही सांसारिक प्राप्ति का ध्येय होता है और इसमे से भी लोग अर्थ को अत्यधिक महत्त्व प्रदान करते हैं। इसका कारण यह है की भगवती कमला अर्थ की आधिष्ठात्री देवी है। उनकी आकर्षण शक्ति में जो मात्रु शक्ति का गुण विद्यमान है, उस सहज स्वाभाविक प्रेम के पाश से वे अपने पुत्रों को बांध ही लेती हैं। जो भौतिक सुख के इच्छुक होते हैं, उनके लिए कमला सर्वश्रेष्ठ साधना है। यह दीक्षा सर्व शक्ति प्रदायक है, क्योंकि कीर्ति, मति, द्युति, पुष्टि, बल, मेधा, श्रद्धा, आरोग्य, विजय आदि दैवीय शक्तियां कमला महाविद्या के अभिन्न देवियाँ हैं।
कमला माता का मंत्र:👉 कमलगट्टे की माला से रोजाना दस माला 'हसौ: जगत प्रसुत्तयै स्वाहा:।' मंत्र का जाप कर सकते हैं। जाप के नियम किसी जानकार से पूछें।
प्रत्येक महाविद्या दीक्षा अपने आप में ही अद्वितीय है, साधक अपने पूर्व जन्म के संस्कारों से प्रेरित होकर या गुरुदेव से निर्देश प्राप्त कर इनमें से कोई भी दीक्षा प्राप्त कर सकते हैं। प्रत्येक दीक्षा के महत्त्व का एक प्रतिशत भी वर्णन स्थानाभाव के कारण यहां नहीं हुआ है, वस्तुतः मात्र एक महाविद्या साधना सफल हो जाने पर ही साधक के लिए सिद्धियों का मार्ग खुल जाता है, और एक-एक करके सभी साधनों में सफल होता हुआ वह पूर्णता की ओर अग्रसर हो जाता है।
यहां यह बात भी ध्यान देने योग्य है, कि दीक्षा कोई जादू नहीं है, कोई मदारी का खेल नहीं है, कि बटन दबाया और उधर कठपुतली का नाच शुरू हो गया।
दीक्षा तो एक संस्कार है, जिसके माध्यम से कुस्नास्कारों का क्षय होता है, अज्ञान, पाप और दारिद्र्य का नाश होता है, ज्ञान शक्ति व् सिद्धि प्राप्त होती है और मन में उमंग व् प्रसन्नता आ पाती है। दीक्षा के द्वारा साधक की पशुवृत्तियों का शमन होता है … और जब उसके चित्त में शुद्धता आ जाती है, उसके बाद ही इन दीक्षाओं के गुण प्रकट होने लगते हैं और साधक अपने अन्दर सिद्धियों का दर्शन कर आश्चर्य चकित रह जाता है।
जब कोई श्रद्धा भाव से दीक्षा प्राप्त करता है, तो गुरु को भी प्रसनता होती है, कि मैंने बीज को उपजाऊ भूमि में ही रोपा है। वास्तव में ही वे सौभाग्यशाली कहे जाते है, जिन्हें जीवन में योग्य गुरु द्वारा ऐसी दुर्लभ महाविद्या दीक्षाएं प्राप्त होती हैं, ऐसे साधकों से तो देवता भी इर्ष्या करते हैं।
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🔱 दश महाविद्या – मुख्य नाम एवं अन्य नाम
1️⃣ काली
अन्य नाम:
महाकाली
दक्षिणा काली
श्यामाकाली
भद्रकाली
कालरात्रि
कराली
स्वरूप संकेत: काल, संहार, मोक्ष
2️⃣ तारा
अन्य नाम:
नीलसरस्वती
उग्रतारा
एकजटा
महामाया तारा
स्वरूप संकेत: संरक्षण, वाणी, करुणा
3️⃣ त्रिपुरा सुंदरी
अन्य नाम:
श्रीविद्या
षोडशी
ललिता
राजराजेश्वरी
कामेश्वरी
स्वरूप संकेत: सौंदर्य, पूर्णता, ब्रह्मानंद
4️⃣ भुवनेश्वरी
अन्य नाम:
महाभुवनेश्वरी
जगदंबा
आदिशक्ति
विश्वेश्वरी
स्वरूप संकेत: सृष्टि, विस्तार, आकाश तत्व
5️⃣ छिन्नमस्ता
अन्य नाम:
प्रचण्डा
छिन्नमुण्डा
प्रचण्डचण्डिका
स्वरूप संकेत: त्याग, जीवन–मृत्यु चक्र, ऊर्जा
6️⃣ भैरवी
अन्य नाम:
त्रिपुरा भैरवी
महाभैरवी
कालभैरवी
स्वरूप संकेत: तप, अग्नि, शुद्धि
7️⃣ धूमावती
अन्य नाम:
ज्येष्ठा देवी
अलक्ष्मी
दरिद्ररूपिणी
स्वरूप संकेत: वैराग्य, शून्यता, ज्ञान
8️⃣ बगलामुखी
अन्य नाम:
पीतांबरा
स्तम्भिनी देवी
ब्रह्मास्त्र रूपा
स्वरूप संकेत: शत्रु-निग्रह, वाणी-नियंत्रण
9️⃣ मातंगी
अन्य नाम:
राजमातंगी
श्यामला
उच्छिष्ट चाण्डालिनी
स्वरूप संकेत: कला, वाणी, सिद्धि
🔟 कमला
अन्य नाम:
महालक्ष्मी
श्रीदेवी
पद्मा
कमलालयी
स्वरूप संकेत: ऐश्वर्य, लक्ष्मी तत्त्व, सौभाग्य
📜 शास्त्रीय संदर्भ संकेत
तंत्रसार
शक्तिसंगम तंत्र
रुद्रयामल
महाभागवत पुराण
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🔱 १. दश महाविद्या — शुद्ध संस्कृत नाम
1.काली
2.तारा
3.त्रिपुरा सुन्दरी
4.भुवनेश्वरी
5.छिन्नमस्ता
6.भैरवी
7.धूमावती
8.बगलामुखी
9.मातंगी
10.कमला
🔑 २. दश महाविद्या — बीज मंत्र
(साधना में बीज सबसे प्रभावी माने जाते हैं)
महाविद्या बीज मंत्र
काली -क्रीं
तारा. -ह्रीं
त्रिपुरा सुन्दरी- श्रीं
भुवनेश्वरी. -ह्रीं
छिन्नमस्ता -ह्रीं
भैरवी. -ह्रीं
धूमावती. -धूं
बगलामुखी. -ह्लीं
मातंगी. -ऐं
कमला. -श्रीं
⚠️ बीज मंत्र गुरु-मार्ग से जपना श्रेष्ठ माना गया है
🪔 ३. दश महाविद्या —
ध्यान श्लोक (संक्षिप्त रूप)
🔹 काली
श्मशानस्थितां घोरां
मुण्डमालाविभूषिताम्
खड्गं च छिन्नशिरः
धारयन्तीं नमाम्यहम्
🔹 तारा
नीलोत्पलसमप्रख्यां
उग्रतारां करुणामयीम्
वरदाभयदां देवीं
तारां प्रणमाम्यहम्
🔹 त्रिपुरा सुन्दरी
सिन्दूरारुणविग्रहां
त्रिनयनां मणिमण्डिताम्
कामेश्वरीं महादेवीं
ललितां प्रणमाम्यहम्
🔹 भुवनेश्वरी
विश्वव्यापकविग्रहां
महामायां जगन्मयीम्
भुवनेश्वरीं देवीं
प्रणतोऽस्मि सदा शिवाम्
🔹 छिन्नमस्ता
स्वच्छिन्नमस्तकां देवीं
रक्तधाराप्रवाहिनीम्
योगिनीगणसेवितां
छिन्नमस्तां नमाम्यहम्
🔹 भैरवी
ज्वलन्तीं तेजसा देवीं
त्रिशूलडमरुधारिणीम्
भैरवीं सर्वसिद्धिदां
नमामि त्रिपुरां पराम्
🔹 धूमावती
विधवां विरूपां देवीं
काकध्वजसमन्विताम्
धूमावतीं महादेवीं
वन्दे दुःखनिवारिणीम्
🔹 बगलामुखी
पीताम्बरधरां देवीं
पीतपुष्पविभूषिताम्
शत्रुस्तम्भकरीं देवीं
बगलां प्रणमाम्यहम्
🔹 मातंगी
श्यामलां वीणहस्तां
नानालङ्कारभूषिताम्
वाणीविद्याप्रदां देवीं
मातंगी प्रणमाम्यहम्
🔹 कमला
पद्मासने स्थितां देवीं
पद्महस्तां मनोहराम्
ऐश्वर्यसिद्धिदां नित्यं
कमलां प्रणमाम्यहम्
📿 ४. साधना में कौन-सा नाम प्रयोग करें?
✔️ सामान्य भक्ति / जप
👉 मुख्य नाम
जैसे: ॐ नमः शिवाय काली देव्यै नमः
✔️ तांत्रिक साधना
👉 बीज + नाम
जैसे: ॐ क्रीं कालीकायै नमः
✔️ विशेष कार्य (शत्रु, वाणी, धन)
👉 विशिष्ट नाम
शत्रु-निग्रह → पीताम्बरा / स्तम्भिनी
वाणी-सिद्धि → राजमातंगी
ऐश्वर्य → श्री / कमला
मोक्ष → महाकाली / धूमावती
#दसमहाविद्या #जयमातादी #शिवचालीसा #जीवनदर्शन #हनुमानचालीसा #अमृत #आयु #वृंदावन #आयुर्वेद #जीवन
19/01/2026
#दुर्गा #सप्तशती #चण्डी #पाठ
उत्तर चरित्र भाग 3
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सभी आत्मीय बंधुओं को
जय सियाराम जी, सबका कल्याण हो
18/01/2026
कलयुग में सुंदरकांड पढ़ने के 6 चमत्कारिक फायदे
Hanuman ji, Sunderkand, Hanuman Chalisa
❤️❤️❤️
16/01/2026
#पूजन से जुड़ी संपूर्ण जानकारी सुगम यांग विधान
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