ग़ज़ल-गुरु

ग़ज़ल-गुरु

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अपने अंदर के उस्ताद को तलाशिए- 'ग़ज़ल-गुरु'

क्या आप ग़ज़ल से मोहब्बत करते हैं? क्या शेरो शायरी आपके दिल के क़रीब है? क्या आप खुद ग़ज़ल कहते हैं या कहने की कोशिश करते हैं? क्या आप ग़ज़ल कहना सीख रहे हैं? क्या आप औरों को ग़ज़ल कहना सिखा रहे हैं? अगर इनमें से किसी भी प्रश्न का उत्तर हाँ है तो यह पेज आपके लिए है, इसे ज्वाइन करें आपका स्वागत है! �����

15/05/2026

क्या आप भी अपनी ग़ज़ल, कविता, या गीत से ऐसा गाना बनाना चाहते हैं जिसमें आपकी अपनी तस्वीर लगी हो या आपका मनपसंद फ़ोटो कंटेंट और आपका नाम हो? अगर हाँ तो मुझसे संपर्क करें 😁.

@राज़ नवादवी
7879623853
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Photos from ग़ज़ल-गुरु's post 14/11/2025

🌾 बिहार का जनादेश और उभरता नया भारत 🇮🇳✨
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(आने वाले समय में जो भी देश-विरोधी विचारों से खेल रहा है, उसे अपने पाँव ज़मीन पर और पीठ दीवार से सटाकर चलना होगा, वरना…
बुलडोज़र तो है ही! 😄💪🚜)

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आज पूरे दिन बिहार के चुनावी नतीजों पर नज़र बनाए रखते हुए एक बात बिल्कुल स्पष्ट हो गई—बिहार ने वह निर्णय सुना दिया है जो पूरे देश की राजनीतिक दिशा को बदलने की क्षमता रखता है।

बिहार के जनादेश ने प्रधानमंत्री मोदी और उनकी नीतियों का विरोध कर रहे सभी समूहों को एक करारा व निर्णायक उत्तर दिया है। मैंने हमेशा कहा है कि समय बदल चुका है—भारत एक सशक्त, आत्मविश्वासी और उभरती वैश्विक शक्ति के रूप में आगे बढ़ रहा है। ऐसे में राष्ट्र-विरोधी ताक़तों का दर्प दलन होना स्वाभाविक है, चाहे वो राजनीतिक ध्रुवीकरण की आड़ में हों या मज़हबी अतिरेक की छाया में।

🏛️ एनडीए की ऐतिहासिक विजय—नए राजनीतिक युग का उद्घोष
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बिहार में एनडीए की शानदार जीत सिर्फ़ एक चुनावी सफलता नहीं है; यह उस दौर की घोषणा है जिसमें संकीर्ण सोच, तुष्टीकरण की राजनीति और सियासी अड्डेबाज़ी के लिए कोई स्थान नहीं बचेगा।
जो भी भारत की राष्ट्रीय अस्मिता पर चोट पहुँचाएगा, जनता उसके राजनीतिक अस्तित्व को मिटा देगी—यही संदेश है बिहार के मतदाताओं का।

🌟 मोदी युग और भविष्य की दिशा
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मोदी विरोधियों को आज भी यह शुक्र मनाना चाहिए कि केंद्र में इस समय एक संयमित, संतुलित, और “सबका साथ, सबका विकास” की भावना से देश को दिशा देने वाला नेतृत्व मौजूद है।

और आने वाला समय?🤔🤔🤔🤔🤔🤔
देश ने ख़ुद देखा है कि भारत किस दिशा में अग्रसर है। वह दिन दूर नहीं जब मोदी जी के सफल कार्यकाल के बाद केंद्र में योगी आदित्यनाथ जैसा नेतृत्व स्थिर रूप से स्थापित होगा। यदि उनका लंबा कार्यकाल 2050 के आसपास तक विस्तृत हुआ, जो हर दृष्टिकोण से अनुमानित एवं संभावित है,
तो जो भी देश-विरोधी विचारों से खेल रहा है, उसे अपने पाँव ज़मीन पर और पीठ दीवार से सटाकर चलना होगा, वरना…
बुलडोज़र तो है ही! 😄💪🚜

🌼 जागो भारत, जागो!

राष्ट्र का भविष्य हमारे हाथों में है।
राष्ट्र पहले—बाक़ी सब बाद में।

🙏🇮🇳🌹

@राज़ नवादवी / राज़ की रोज़ाबेल

Raz Ki Rosabelle Catherine
एक अंजान शायर
Raz Ki Rosabelle Catherine

30/10/2025
03/08/2025

With Ehsan Azmi – I just got recognised as one of their top fans! 🎉

03/08/2025

With Mohammed Azam – I just got recognised as one of their top fans! 🎉

21/06/2024

#कहानी: 'ग़ज़ल का दारोग़ा'
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#लेखक- एक अंजान शायर

शह्र के अदीबों की दुनिया में अचानक एक नया नाम गूंज उठा – उस्ताद शमसुद्दीन। वे एक अरुज़ी थे, यानी ग़ज़ल के छन्दशास्त्र के ज्ञानी। कहते थे कि उनके पास ग़ज़ल की हर बारीक़ी का गहरा ज्ञान था। उनकी आवाज़ में ऐसा आत्मविश्वास था कि उनके मुंह से निकले हर शब्द को लोग वज़्न देते थे। उनके आने से पहले शहर के शायर बेफ़िक्र होकर अपनी ग़ज़लों का आनंद लिया करते थे, लेकिन उस्ताद शमसुद्दीन के कदम रखते ही माहौल बदल गया।

उस्ताद शमसुद्दीन ने आते ही शायरों के बीच सनसनी फैला दी। उन्होंने नये और पुराने सभी शायरों की ग़ज़लों का बारीक़ी से विश्लेषण करना शुरू कर दिया। उनकी आलोचना इतनी कठोर और तीखी होती थी कि बड़े से बड़े शायर भी उनके सामने कांप उठते थे। उनके अनुयायियों की संख्या दिन-ब-दिन बढ़ती जा रही थी। लोग उनके पांडित्य को मानने लगे थे और उन्हें 'ग़ज़ल का दारोग़ा' की उपाधि से नवाज़ा गया।

उनकी आलोचनाओं का आलम ये था कि कोई भी शायर उनकी नज़रों से बच नहीं पाता था। हर शेर, हर मिसरा उनकी नज़र में होता और वो उसकी कमियों को उजागर कर देते। नए शायर तो छोड़िए, स्थापित शायर भी उनकी आलोचना से घबरा गए थे। कई शायर तो अपनी ग़ज़लें लिखने से पहले उनसे मार्गदर्शन लेना ही उचित समझते थे।

लेकिन हर कहानी में एक मोड़ आता है। एक दिन शह्र के प्रतिष्ठित शायरों ने मिलकर एक सभा आयोजित की। उन्होंने उस्ताद शमसुद्दीन को आमंत्रित किया और कहा, "उस्ताद, आप हमारी ग़ज़लों की बारीक़ी से जांच करते हैं। हम आपके ज्ञान को सलाम करते हैं। लेकिन आज हम चाहते हैं कि आप स्वयं अपनी लिखी हुई एक ग़ज़ल हमें सुनाएं।"

उस्ताद शमसुद्दीन के चेहरे पर हल्की सी परेशानी की लकीरें खिंच गईं। उन्होंने कई बहाने बनाए, लेकिन सभा के शायरों ने ज़िद पकड़ ली। आखिरकार, उस्ताद को मंच पर आना पड़ा। उन्होंने एक ग़ज़ल सुनाने की कोशिश की, लेकिन उनके शब्दों में वह मिठास, वह दर्द और वह रूहानियत नहीं थी जो एक सच्ची ग़ज़ल में होती है। उनके शेरों में वो जज़्बात नहीं थे जो दिल को छू सकें।

श्रोताओं में खुसर-पुसर शुरू हो गई। सभी को समझ में आ गया कि उस्ताद शमसुद्दीन को ग़ज़ल की विधा का गहरा ज्ञान तो है, लेकिन वे स्वयं एक अच्छी ग़ज़ल नहीं कह सकते। वे केवल आलोचक थे, शायर नहीं।

इस खुलासे के बाद उनकी प्रतिष्ठा गिरने लगी। 'ग़ज़ल का दारोग़ा' की पदवी उनसे छिन गई। लोग उन्हें अब पहले की तरह नहीं मानते थे। उनके अनुयायी भी उनसे दूर होने लगे। आख़िरकार, वे अपनी आलोचनाओं के बोझ तले दबकर शह्र छोड़कर चले गए।

उस्ताद शमसुद्दीन चौबे से छब्बे बनने आए थे, लेकिन दुबे बनकर ही लौटे। उन्होंने साबित कर दिया कि केवल ज्ञान होना ही पर्याप्त नहीं होता, बल्कि उसे सही रूप में प्रस्तुत करने की कला भी आनी चाहिए।

@राज़ नवादवी

#राज़_नवादवी #आहंग_ए_तसव्वुर ंजान_शायर ुरु_प्रोग्राम #विचारों_की_रिइंजीनियरिंग #लेखक_कवि_और_शायर_की_असली_पहचान #एकला_चलो_रे ्रेट_मिर्ज़ा_ग़ालिब #साहित्य_में_सामंतवाद ीखने_सिखाने_में_बाबागिरी
#छोटी_मछली_को_बड़ी_मछली_निगल_जाती_है

20/06/2024

💞

#दोस्तो, इस बार ग़ज़ल नहीं, #मेरी_कविता. ❤🐱😽

प्रस्तुत है आज से 31 वर्ष पूर्व डेल्ही स्कूल ऑफ़ सोशल वर्क हॉस्टल, दिल्ली विश्वविद्यालय में लिखी मेरी यह कविता, जो मैंने अपने प्रेम के टूट जाने पर लिखी थी. 😸😸💞 मैंने कभी सोचा नहीं था कि एक दिन मैं ख़ुद ही इसे एक गाने के रूप में प्रस्तुत करूँगा. उम्मीद है आपको मेरी प्रस्तुति पसंद आएगी.
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- Thursday, 20/06/2024, Bhopal, MP, India
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#गाने के बोल
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"मैं मानता हूँ
तुम्हारी उपेक्षा का प्रहार सह न सका
और गिर गया निराशा की कठोर धरा पे
अपनी व्यथा का भार लिए!"

listen with the earphones on, else on a Music System to enjoy most 💞

Raz Nawadwi-MGIGL-GGP Production
#शब्द- एक अपरिचित कवि
#आवाज़- हरिजीत सिंह
#संगीत निर्देशन- राज़ नवादवी
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#लिरिक्स 👇
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#राज़ नवादवी: एक अपरिचित कवि की कृतियाँ- १८
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(आज से तीस वर्ष पूर्व डेल्ही स्कूल ऑफ़ सोशल वर्क कॉलेज में लिखी गई लिखी ये मेरी कविता आज भी कितनी समीचीन है 😁)
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अपनी हताशा से फिर इक बार उठूँगा....
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मैं मानता हूँ
तुम्हारी उपेक्षा का प्रहार सह न सका
और गिर गया निराशा की कठोर धरा पे
अपनी व्यथा का भार लिए!
मैं मानता हूँ
मेरी पीड़ाका अतिस्राव
अभी और भी दुखायेगा मुझे
जब तुमसे बह कर आने वाली हवा
स्मृतियों का एक पूरा संसार
छोड जाएगी पीछे!
मैं मानता हूँ
अभी और भी जलेंगे
मेरी निद्राविहीन ऑखों में उलझनों के दिये!
जीवन की निरन्तरता में व्यतिक्रम
और भी होगा मगर
मैं अपनी हताशा से फिर इक बार उठूँगा
पहले की तरह स्वस्थ सबल होकर
और सोचूँगा
क्या मिला तुम्हारी प्रवंचना के अवसाद में बह कर ???

©राज़ नवादवी
डेल्ही स्कूल ऑफ़ सोशल वर्क हॉस्टल
दिल्ली विश्वविद्यालय,
नयी दिल्ली, १९९३

#राज़_नवादवी©
(एक अपरिचित कवि)
🆁🅰🆉 🅽🅰🆆🅰🅳🆆🅸

(ایک اپرچت کوی)

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