03/10/2025
चिठ्ठियाँ
रात्रि का अंतिम पहर हो और रोशनी मध्यम हो तब अलभ्य भावों को सफेद पन्ने में उतारने की कलाकारी प्रेम की सबसे ताकतवर बानगी हैं। तुम लिखते हो..असल में तुम जीते हो, अपने प्रेम की प्रत्येक विरह सम्मत अनुभूति को। तुम जताना चाहते हो अपने भावों को, तुम बातें करते हो अपने अन्तर्मन से और तुम मन्दित उत्साह के उस भावावेश से अभिभूत हो, जिसमें योगी खुद को साधना में पाते हैं। ..तो यूँ कह लो कि प्रेम की साधना के क्षणों का मूर्त रूप हैं ये 'चिट्ठियां'।
चिट्ठियां जोड़ती है मनों को और कभी संबल देतीं हैं टूटे हुए हृदयों को। वो चिट्ठियां जो लिखी गयी थी प्रेममय होकर, वो पढ़ी जातीं है रातों के गहन अंधेरों में विरहसिक्त होकर। ..तब जब चिट्ठियां पहुंच नहीं पाती फिर कभी उन पतों पर जिनके लिए उनका अस्तित्व था।
और तब..
..वो चिट्ठियां महज कागज़ के टुकड़े बनकर रह जाती हैं किसी डायरी के बीच दबी हुई। कुछ रह जातीं है अलमारी के सबसे रहस्मयी दराजों के सबसे पिछले कोने में रखी हुई। न जाने कितनी नज़रों से छुपी हुई, न जाने कितनी चांदनी रातों को खुद में लपेटे हुए, कुछ चिट्ठियां अमावस की स्याह रात की तरह खुद में गुम हो जातीं हैं।
ओह! कि ..बरसात की रात सी भीगी-भीगी चिट्ठियां, गर्मी की तल्ख़ धूप-सी सुलगती रहतीं हैं। न ठीक से जलतीं है कभी, न ठीक से कभी बुझती है।
वो चिट्ठियां जो लिखी जाती है पढ़े जाने के लिए..उफ्फ! कि वो बदनसीब चिट्ठियां रखी रह जातीं हैं ताउम्र जिंदगी का ना-मुकम्मल सफ़र जीने के लिए।