राजनीति शास्त्र और अंतरराष्ट्रीय संबंध

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07/02/2021
06/04/2016

स्वंतत्रता के बाद भारत के विभिन्न राज्यों में 124 बार राष्ट्रपति शासन लग चुका है...
> अभी तक जिन राज्यों में राष्ट्रपति शासन नहीं लगा है वे हैं छत्तीसगढ़ और तेलंगाना.

22/03/2016

=> सामाजिक अन्याय क्या है....

सामाजिक न्याय क्या है, इसकी कोई सुनिर्दिष्ट परिभाषा नहीं है किन्तु देश-विदेश के विभिन्न समाजविज्ञानियों ने इस पर जो रोशनी डाली है, उसके आधार पर यही कहा जा सकता है कि जन्मगत (जाति, नस्ल, रंग, लिंग, धर्म इत्यादि) कारणों से शक्ति के स्रोतों (आर्थिक-राजनीतिक-धार्मिक इत्यादि) से दूर धकेले गए तबकों को उनका प्राप्य दिलाने के लिए किया जाने वाला प्रयास ही सामाजिक न्याय है। अब अगर शक्ति के स्रोतों से समूह विशेष का बहिष्कार सामाजिक अन्याय है, तो यह मानने में कोई दुविधा नहीं होनी चाहिए कि जिस वर्ण-व्यवस्था द्वारा भारत का समाज सदियों से परिचालित होता रहा है, वह व्यवस्था विश्व की सर्वाधिक अन्यायकारी व्यवस्था है। इसी के कारण देश में सामाजिक अन्याय का सबसे शर्मनाक अध्याय रचित हुआ। यह विशुद्ध रूप से शक्ति के स्रोतों के असमान बंटवारे के दूरगामी उद्देश्य से विदेशी मूल के मनीषियों (आर्यों) द्वारा प्रवर्तित रही। इसमें अध्ययन-अध्यापन, पौरोहित्य, राज्य संचालन में मंत्रणा, राज्य संचालन, सैन्य-वृति, व्यवसाय-वाणिज्य इत्यादि के अधिकार सिर्फ द्विज वर्ग के हिस्से में रहे। चूँकि इस व्यवस्था में कर्म-संकरता की निषेधाज्ञा और कर्म-शुद्धता की अनिवार्यता थी, इसलिए सारे पेशे/कर्म, जाति/वर्ण सूत्र से पीढ़ी दर पीढ़ी हस्तांरित होते रहे। इसलिए वर्ण-व्यवस्था ने एक आरक्षण व्यवस्था का रूप ले लिया। इस आरक्षण व्यवस्था में दलित-आदिवासी-पिछड़े और महिलाओं को शक्ति के सभी प्रमुख स्रोतों से पूरी तरह बहिष्कृत कर चिरकाल के लिए अशक्त बना दिया गया। वर्ण-व्यवस्था के अशक्तों में अस्पृश्यों की स्थिति, मार्क्स के सर्वहाराओं से भी बहुत बदतर थी। मार्क्स के सर्वहारा सिर्फ आर्थिक दृष्टि से विपन्न थे पर राजनीतिक, आर्थिक और धार्मिक क्रियाकलापों में उनकी भागीदारी पर कोई प्रतिबन्ध नहीं था। इसके विपरीत, भारत के दलित सर्वहारा थे जिनके लिए आर्थिक, राजनीतिक के साथ ही धार्मिक और शैक्षणिक गतिविधियां भी धर्माधारित विधानों से पूरी तरह निषिद्ध रहीं। यही नहीं, लोग उनकी छाया तक से दूर रहते थे। ऐसी स्थिति दुनिया के किसी भी मानव समुदाय की कभी नहीं रही। यूरोप के कई देशों की सम्मिलित आबादी और संयुक्त राज्य अमेरिका के समपरिमाण संख्यक सम्पूर्ण अधिकारविहीन इन्हीं मानवेतरों की जिंदगी में सुखद बदलाव लाने का असंभव सा संकल्प लिया था।

डॉ. आंबेडकर ने दलितों को सशक्त बनाने के लिए क्या किया? उन्होंने सदियों से शक्ति के सभी स्रोतों से बहिष्कृत किये गए मानवेतरों के लिए संविधान में ‘आरक्षण’के सहारे सरकारी नौकरियों और राजनीति में हिस्सेदारी सुनिश्चित कराई। आंबेडकर-प्रवर्तित आरक्षण और कुछ नहीं, बस जाति, नस्ल, रंग, लिंग, धर्म इत्यादि के कारण शक्ति के स्रोतों से जबरन वंचित किये गए लोगों को कानून के जोर से शक्ति के स्रोतों में उनका प्राप्य दिलाने का अचूक औजार मात्र है। उन्होंने संविधान के अनुच्छेद 15(4), 16(4), 17, 24, 25(2), 29(1), 164(1), 244, 257(1), 320(4), 330, 332, 334, 335, 338, 341, 342, 350, 371(ए)(बी)(सी)(इ)(एफ) के प्रावधानों के जरिये सामाजिक अन्याय के सर्वाधिक शिकार एससी/एसटी को राजनीतिक, आर्थिक, धार्मिक, शैक्षिक व सामाजिक संरक्षण प्रदान कर उनके विकास का मार्ग प्रशस्त करने का अनुकरणीय दृष्टांत कायम किया। यही नहीं, उन्होंने संविधान में अनुच्छेद 340 का जो प्रावधान किया वह परवर्तीकाल में पिछड़ों को भी सामाजिक अन्याय से उबारने में काफी कारगर साबित हुआ। बहरहाल, डॉ.आंबेडकर द्वारा संविधान के जरिये आरक्षण के प्रयोग का परिणाम चमत्कारिक रहा। जिन दलितों के लिए स्कूल की पढ़ाई करने की कल्पना करना दुष्कर था, वे झुण्ड के झुण्ड एमएलए, एमपी, आईएएस, पीसीएस, डाक्टर, इंजीनियर इत्यादि बनकर राष्ट्र की मुख्यधारा से जुडऩे लगे।

आंबेडकरी आरक्षण का प्रयोग अमेरिका, इंग्लैण्ड, आस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड, मलेशिया, आयरलैंड ने अपने-अपने देशों के जन्मजात वंचितों को शक्ति के स्रोतों में उनकी वाजिब हिस्सेदारी देने के लिए किया। ऐसे में आरक्षण के जरिये दुनिया के जन्मजात वंचितों को जिस तरह शक्ति के स्रोतों में वाजिब हिस्सेदारी मिली, उसके आधार पर डॉ.आंबेडकर को सामाजिक न्याय का चैम्पियन कहा जा सकता है।

बहरहाल, संविधान द्वारा सामाजिक अन्याय के शिकार बनाये गए लोगों के हित में तरह-तरह का प्रावधान किये जाने से कुछ लोगों के जीवन में चमत्कारिक बदलाव आया किन्तु शक्ति के स्रोतों से उनका बहिष्कार नाममात्र ही दूर हो पाया। राजनीति में भले ही इनकी कुछ हिस्सेदारी हो किन्तु उद्योग-व्यापार, फिल्म-मीडिया व पौरोहित्य इत्यादि से आज भी लगभग वे पूरी तरह बहिष्कृत हैं। आज भी देश के 8-10 प्रतिशत अल्पजन परम्परागत विशेषाधिकारयुक्त व सुविधासंपन्न वर्ग का, शक्ति के स्रोतों पर 80-85 प्रतिशत कब्ज़ा है। इस कारण आर्थिक और सामाजिक गैर-बराबरी, जो कि मानव जाति की सबसे बड़ी समस्या है, का भीषणतम साम्राज्य भारत में कायम है। इस विषय में हाल ही में क्रेडिट सुइसे नामक एजेंसी ने वैश्विक धन बंटवारे पर जो अपनी छठवीं रिपोर्ट प्रस्तुत की है, वह काबिले गौर है। रिपोर्ट बताती है कि सामाजिक-आर्थिक न्याय के सरकारों के तमाम दावों के बावजूद भारत में आर्थिक गैर-बराबरी तेजी से बढ़ रही है। रिपोर्ट के मुताबिक, 2000-15 के बीच जो कुल राष्ट्रीय धन पैदा हुआ उसका 81 प्रतिशत शीर्ष की दस प्रतिशत आबादी अर्थात विशेषाधिकारयुक्त वर्ग के पास गया। जाहिर है कि शेष 90 प्रतिशत जनता के हिस्से में 19 प्रतिशत धन आया। 19 प्रतिशत धन की मालिक 90 प्रतिशत आबादी में भी नीचे की 50 प्रतिशत आबादी के हिस्से में 4.1 प्रतिशत धन आया है। इस रिपोर्ट पर टिप्पणी करते हुए एक अखबार ने लिखा- ‘गैर-बराबरी अक्सर समाज में उथल-पुथल की वजह बनती है। सरकार और सियासी पार्टियों को इस समस्या को गंभीरता से लेना चाहिए। संसाधनों और धन का न्यायपूर्ण पुनर्वितरण कैसे हो, यह सवाल अब प्राथमिक महत्व का हो गया है।’कहने का आशय यह कि स्वाधीन भारत में आर्थिक, राजनीतिक और सामाजिक न्याय के विविध उपायों के बावजूद सामाजिक अन्याय की धारा आज भी पूर्ववत जारी है। ऐसे में क्या किया जाय कि देश में मुकम्मल रूप से सामाजिक अन्याय का खात्मा और समतामूलक समाज की स्थापना हो?

इसके लिए बेहतर यही होगा कि आर्थिक और सामाजिक गैर-बराबरी को सबसे बड़ी समस्या मानते हुए हम सारा जोर, शक्ति के स्रोतों के पुनर्वितरण पर लगायें। दुनिया के तमाम महामानवों ने इसी को इन्सानियत की सबसे बड़ी समस्या बताया। बाबा साहेब डॉ. आंबेडकर ने भी 25 नवम्बर, 1949 को आर्थिक और सामाजिक विषमता को राष्ट्र की सबसे बड़ी समस्या बताते हुए इसे कम से कम समय में ख़त्म करने का आह्वान किया था। बहरहाल अगर सामाजिक न्याय के लिए आर्थिक और सामाजिक विषमता को सबसे बड़ी समस्या मानते हुए हम आगे की लड़ाई लडऩा चाहते हैं तो सबसे पहले इसकी उत्पत्ति के कारणों को जान लेना परमावश्यक है। बिना इसे जाने हम अंधेरे में हाथ-पैर मारते रहेंगे।

पूरी दुनिया में आर्थिक और सामाजिक विषमता की उत्पत्ति समाज में शक्ति के स्रोतों का विभिन्न सामाजिक समूहों और उनकी महिलाओं के मध्य असमान बंटवारे से होती रही है। थोड़ा और परिष्कृत रूप में कहना हो तो यही कहा जायेगा कि दुनिया के तमाम शासक ही शक्ति के स्रोतों में सामाजिक और लैंगिक विविधता का असमान प्रतिबिम्बन कराकर मानव जाति की सबसे बड़ी समस्या को जन्म देते रहे हैं। ऐसे में, अगर विषमता का कारण यह है और राष्ट्र यदि सामाजिक अन्याय के खात्मे के लिए शक्ति के स्रोतों के पुनर्वितरण का मन बनाता है तो निम्नलिखित क्षेत्रों में सामाजिक और लैंगिक विविधता के प्रतिबिम्बन कराने अर्थात विविधतामय भारत के चार प्रमुख सामाजिक समूहों-सवर्णों, ओबीसी, एससी/एसटी और धार्मिक अल्पसंख्यकों – के स्त्री-पुरुषों के संख्यानुपात में अवसरों के बंटवारे का विचार करे :-

1-सेना व न्यायालयों सहित सरकारी और निजी क्षेत्र की सभी स्तर की, सभी प्रकार की नौकरियों,

2-सरकारी और निजी क्षेत्रों द्वारा दी जानेवाली सभी वस्तुओं की डीलरशिप

3-सरकारी और निजी क्षेत्रों द्वारा की जानेवाली सभी वस्तुओं की खरीददारी

4-सड़क-भवन निर्माण इत्यादि के ठेकों, पार्किंग, परिवहन

5-सरकारी और निजी क्षेत्रों द्वारा चलाये जानेवाले छोटे-बड़े स्कूलों, विश्वविद्यालयों, तकनीकि-व्यावसायिक शिक्षण संस्थाओं के संचालन, प्रवेश व अध्यापन

6-सरकारी और निजी क्षेत्रों द्वारा अपनी नीतियों,उत्पादित वस्तुओं इत्यादि के विज्ञापन के मद में खर्च की जानेवाली धनराशि

7-देश-विदेश की संस्थाओं द्वारा गैर-सरकारी संस्थाओं (एनजीओ)को दी जानेवाली धनराशि

8-प्रिंट व इलेक्ट्रोनिक मीडिया एवं फिल्म-टीवी के सभी प्रभागों

9-रेल-राष्ट्रीय मार्गों की खाली पड़ी भूमि सहित तमाम सरकारी और मठों की खाली पड़ी जमीन व्यावसायिक इस्तेमाल के लिए भूमिहीन अस्पृश्य-आदिवासियों के मध्य वितरित हो

10-ग्राम-पंचायत, शहरी निकाय, संसद-विधानसभा की सीटों; राज्य एवं केन्द्र की कैबिनेट; विभिन्न मंत्रालयों के कार्यालयों; विधान परिषद राज्यसभा; राष्ट्रपति, राज्यपाल एवं प्रधानमंत्री व मुख्यमंत्री के कार्यालयों इत्यादि में सामाजिक और लैंगिक विविधता का प्रतिबिम्बन हो।

10/02/2016

=> पंचायती राज : महत्त्वपूर्ण तथ्य...

1. पंचायती राज का शुभारंभ स्वतंत्र भारत में 2 अक्टूबर, 1959 ई. को भारत के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरु के द्वारा राजस्थान राज्य के नागौर जिले में हुआ।
2. 11 अक्टूबर, 1959 को जवाहर लाल नेहरू ने आंध्र प्रदेश राज्य में पंचायती राज का प्रारंभ किया।
3. 73वाँ संविधान संशोधन पंचायती राज से संबंधित है इसके द्वारा संविधान के भाग-9 अनुच्छेद 243 (क से ण तक) तथा अनुसूची-11 का प्रावधान किया गया है।
4. 73वाँ संविधान संशोधन की मुख्य बातें-
(i). इसके द्वारा पंचायती राज के त्रिस्तरीय ढाँचे का प्रावधान किया गया है। ग्राम स्तर पर ग्राम पंचायत, प्रखंड स्तर पर पंचायत समिति तथा जिला स्तर पर जिला परिषद के गठन की व्यवस्था की गयी है।
(ii). पंचायती राज संस्था के प्रत्येक उत्तर में एक तिहाई स्थानों पर महिलाओं के लिए आरक्षण की व्यवस्था की गयी है।
(iii). इस का कार्यकाल 5 वर्ष निर्धारित किया गया है।
5. 73वें संविधान संशोधन के बाद पंचायती राज अधिनियम का निर्माण करने वाला प्रथम राज्य कर्नाटक है।
6. 74वाँ संविधान संशोधन नगर पालिका से संबंधित है इसके द्वारा संविधान के भाग-9(क), अनुच्छेद-243 (त से य, छ तक) एवं 12वीं अनुसूची का प्रावधान किया गया है।
7. 74वाँ संविधान संशोधन की मुख्य बातें-
(a). नगरपालिकाएँ तिन प्रकार की होगी-
(i). नगर पंचायत-ऐसा ग्रामीण क्षेत्र जो नगर क्षेत्र में परिवर्तित हो रहा हो।
(ii). नगर परिषद्-छोटे नगर क्षेत्र के लिए।
(iii). नगर निगम-बड़े नगर क्षेत्र के लिए।
(b). इन संस्थाओं में महिलाओं के लिए एक तिहाई स्थान आरक्षित है।
(c). अनुसूचित जाति तथा जनजाति के लिए भी आरक्षण की व्यवस्था की गई है।
(d). नगरीय संस्थाओं का कार्यकाल 5 वर्ष का होगा विघटन की स्थिति में छह माह के अंदर चुनाव करना है।
8. 73वाँ संविधान संशोधन अधिनियम 25/04/1993 ई. से और 74वाँ संविधान संशोधन 01/06/1993 ई. से प्रवृत्त हुआ है।
9. नगर निगम की स्थापना सर्वप्रथम मद्रास में 1687 ई. में की गयी थी।

04/02/2016

=> संघ-राज्य संबंध : सुधारों की आवश्यकता...

भारत में संघ को मजबूत करने का एकमात्र उपाय यह है कि वह अपनी शक्तियों में कमी करे और मुख्य बातों की ओर ही ध्यान दे। आर्थिक उदारीकरण के साथ राजनीतिक शक्ति और व्यवस्था का विकेंद्रीकरण आवश्यक हो गया है। भारत संघ को फेडरल संघ का रूप देने के लिए यह जरूरी है कि वह स्वायत्तशासी इकाइयों के रूप में काम करे। इस व्यवस्था में शासन के अनेक स्तर हो सकते हैं-पंचायतों से संसद और संघ सरकार तक। प्रस्तावित शासन-संगठन संकेंद्रित वृत्तों से युक्त होने के कारण गांधीजी के आदर्श के निकट होगा। शक्तियों का वितरण इस तरह होना चाहिए कि हर उच्चतर स्तर की प्रशासनिक इकाई को कम से कम आवश्यक शक्तियां दी जाएं, जो काम तृणमूल धरातल की संस्थाएं कर सकें, वह उनके हाथ में छोड़ देना चाहिए। उच्च स्तर की सरकार को यह शक्ति नहीं होनी चाहिए कि वह निम्न स्तर की विधिवत निर्वाचित सरकार को बर्खास्त कर दे।
यदि हम सचमुच बहुस्तरीय शासन की स्थापना करना चाहते हैं और तृणमूल धरातल पर लोगों को सत्ता सौंपना चाहते हैं तो संविधान के अनुच्छेद 245, 246 तथा अन्य प्रासंगिक अनुच्छेदों तथा 7वीं अनुसूची में संशोधन कर संघ, राज्यों और पंचायतों तथा नगरपालिकाओं की स्थानीय सरकारों के बीच शक्तियों का स्पष्ट वितरण करना होगा। इससे संविधान के बुनियादी ढांचे अथवा संसदीय प्रणाली पर कोई प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ेगा। इसके कारण सुशासन तथा आर्थिक विकास में सहायता ही मिलेगी।
अब समय आ गया है कि संघ-राज्य संबंधों तथा स्थानीय शासन-संस्थाओं की व्यापक समीक्षा की जाए। इस विषय में कोई सर्वतः स्वीकृत प्रतिमान नहीं हो सकता। भारत को स्थायित्व, सुरक्षा और विकास की आवश्यकता है। यह लक्ष्य एकात्मक और फेडरल राज्य-व्यवस्था के बीच समन्वय स्थापित करने से प्राप्त हो सकता है। सबसे ज्यादा जरूरी यह है कि राजनीतिक व्यवस्था में स्थिरता बनी रहे। इसके साथ ही वह लोगों के प्रति उत्तरदायी भी होनी चाहिए। नया फेडरल राज्य स्वायत्तशासी इकाइयों का संयुक्त राज्य बनेगा। ये स्वायत्तशासी इकाइयां संघ की अधीन या सहायक इकाइयां नहीं होंगी। वे विभिन्न धरातलों पर फेडरेशन की भागीदार होंगी। भारत फेडरल संघ होगा जिसमें शासन के अनेक स्तर होंगे। सत्ता की शृंखला पंचायतों से शुरू होकर संसद तक पहुंचेगी।

(i) पृथक राज्यों की राजनीतिक मांगों को जातीय आकांक्षाओं से अलग करके देखना चाहिए। सिद्धांततः सुशासन की दृष्टि से बढ़ती हुई आबादी के कारण छोटे-छोटे राज्य अच्छे हो सकते हैं। संख्या में अधिक राज्य संघ को मजबूती देंगे। कुछ स्थितियों में नए राज्यों का निर्माण करने की अपेक्षा उप राज्य संरचनाओं का गठन किया जा सकता है। संपूर्ण देश को 4-5 जोनों तथा 40-50 छोटे-छोटे राज्यों में बांटना हितकर होगा। ये राज्य यथा-संभव समान आकार के होने चाहिए तथा इन्हें संसद के दोनों सदनों में या कम से कम एक सदन में समान प्रतिनिधित्व प्राप्त होना चाहिए। आशा की जा सकती है कि प्रस्तावित परिवर्तनों से ज्यादा स्थिरता, जवाबदारी, मजबूत संघ, सुशासित, विकसित और तेजी से विकाशील राज्यों का पथ प्रशस्त होगा।

(ii) राज्यपालों की नियुक्ति के मानदंडों में परिवर्तन होने चाहिए। सरकारिया आयोग की सिफारिशों की परीक्षा होनी चाहिए और उन्हें कार्यान्वित किया जाना चाहिए।

(iii) अनुच्छेद 356 से संबंधित समस्याएं अनुच्छेद 256, 257, 355, 356 और 365 के अनुचित क्रियान्वय के कारण पैदा हुई हैं। इन सब अनुच्छेदों को एक साथ पढ़ने की जरूरत है। अनुच्छेद 355 के अधीन संघ सरकार, अनुच्छेद 356 के अधीन राष्ट्रपति शासन लागू किए बिना राज्य के प्रति कुछ दायित्वों का निर्वहन कर सकती है।

(iv) अर्थव्यवस्था के उदारीकरण के कारण केंद्रीय नियंत्रण की आवश्यकता नहीं रहती। आय कर, निगम कर और परोक्ष करों को समवर्ती सूची में स्थानांतरित किया जा सकता है। इससे कर-प्रणाली में सुधार और समन्वय होगा।

(v) संघ-राज्य संबंधों पर समग्र दृष्टि से विचार करने की आवश्यकता है। राजनीतिक सत्ता चार स्तरों पर विभक्त होनी चाहिए। विभिन्न समूहों को शासन में भागीदार बनाने की जरूरत है। इससे संघ मजबूत बनेगा और राष्ट्र में भावनात्मक तथा सांस्कृतिक दृष्टि से निखार आएगा। शक्तियों का वितरण ऐसा होना चाहिए कि शासन के प्रत्येक उच्चतर स्तर को न्यूनतम आवश्यक शक्तियां दी जाएं। उदाहरण के लिए ग्राम पंचायतें या नगरपालिकाएं जैसी तृणमूल संस्थाएं जो काम कर सकें वह काम पूरी तरह उनके ऊपर छोड़ देना चाहिए। उच्चतर स्तर की सरकार को यह अधिकार नहीं होना चाहिए कि वह अपने से नीचे स्तर की विधिवत निर्वाचित सरकार को बर्खास्त कर सकें। कुशल राज्यकर्मचारी लोकतंत्रात्मक विकेंद्रित शासन का स्थान नहीं ले सकते।

(vi) ग्यारहवीं और बारहवीं अनुसूची को आदेशात्मक बना देना चाहिए। इन दोनों अनुसूचियों को मिलाकर एक सामान्य सूची का निर्माण करना चाहिए। संसद सदस्यों तथा विधायकों को जिला विकास प्रक्रिया का भाग नहीं होना चाहिए। विधि और व्यवस्था के कार्य स्थानीय निर्वाचित निकायों को ही सौंपना ठीक होगा। ग्राम सभा और ग्राम पंचायतों की शक्तियों का वर्गीकरण करना आवश्यक होगा। स्थानीय निकायों के लिए स्थानीय कर्मचारी रखे जाने चाहिए।

(vii) संसद सदस्यों की क्षेत्रीय विकास योजना शक्तियों के वितरण के फेडरल सिद्धांत के प्रतिकूल है।

(viii) उत्तर-पूर्वी राज्यों में अवैध देशांतरण को रोकना चाहिए। शासन की स्थानीय परंपरागत संस्थाओं को आधुनिक रूप देने और महिलाओं के साथ न्याय करने की आवश्यकता है। इन परंपरागत संस्थाओं को शासन की संस्थाएं बनाया जा सकता है। राज्य सरकार, स्वायत्तशासी जिला परिषदों और शासन की परंपरागत प्रणाली के अधिकार-क्षेत्र एक-दूसरे से मिलते हैं। इससे अनेक समस्याएं पैदा होती हैं। अधिकार क्षेत्र की इस परस्पर-व्याप्ति को रोकने की आवश्यकता है। प्रत्येक स्तर की अधिकारिता का स्पष्ट रूप से निरूपण करना उचित है। छठीं अनुसूची में संशोधन कर स्वायत्तशासी जिला परिषदों को अधिक स्वायत्तता दी जानी चाहिए। स्वायत्तशासी जिला परिषदों में गैर-कबाइली लोगों की भागीदारी का प्रश्न विचारणीय है। परंपरागत संस्थाओं, स्वायत्तशासी जिला परिषदों तथा अधीन न्यायपालिका के परस्पर-व्याप्त अधिकार-क्षेत्र के कारण न्याय-प्रशासन में दिक्कतें पैदा हो रही है। उन्हें सुलझाने की आवश्यकता है। मानव अधिकारों तथा कबाइली अधिकारों के संघर्ष और संरक्षण विधियों को भी समझने और सुलझाने की जरूरत है।

04/02/2016

=> एपेक : प्रमुख तथ्य.....

‘एशिया-प्रशांत आर्थिक सहयोग’ (Asia-Pacific Economic Co-operation-APEC) संगठन’ प्रशांत महासागरीय परिधि (Pacific Rim) के 21 सदस्य देशों एवं अर्थव्यवस्थाओं में आर्थिक सहयोग एवं मुक्त व्यापार को बढ़ावा देने का एक साझा आर्थिक मंच है। इस आर्थिक संगठन की स्थापना वर्ष 1989 में की गई थी। एपेक की स्थापना का मुख्य उद्देश्य एशिया-प्रशांत क्षेत्र के सदस्य देशों के मध्य व्यापार ढांचे के माध्यम से इस क्षेत्र के लोगों को आर्थिक समृद्धि प्रदान कर क्षेत्र में औद्योगिक एवं विकसित अर्थव्यवस्थाओं के बढ़ते प्रभाव को रोकना था। अपनी स्थापना के समय से ही यह संगठन सदस्य देशों के निवासियों के जीवन एवं शैक्षिक स्तर में सतत आर्थिक वृद्धि के माध्यम से उन्नयन करने हेतु प्रयासरत है। संगठन के साझा उद्देश्यों की प्राप्ति के लिए प्रति वर्ष वार्षिक शिखर बैठक का आयोजन किया जाता है। इस बैठक के माध्यम से सदस्य देशों के नेताओं के मध्य क्षेत्रीय महत्त्व के विविध विषयों पर व्यापक विचार-विमर्श किया जाता है। इसी आशय से एपेक समूह की 27वीं वार्षिक बैठक (शिखर बैठक के दृष्टिकोण से 23वीं) का आयोजन फिलीपींस की राजधानी मनीला में किया गया।
एपेक की प्रथम बैठक नंवबर, 1989 में ऑस्ट्रेलिया की राजधानी कैनबरा में संपन्न हुई। वर्ष 1989 से 1992 तक एपेक राष्ट्रों की केवल प्रतिनिधि स्तर में बैठकें ही संपन्न हुई। वर्ष 1993 से एपेक राष्ट्रों के शासनाध्यक्षों की बैठकें प्रारंभ हुई (‘जिसे शिखर बैठक या इकोनॉमिक लीर्ड्स मीटिंग’ कहा जाता है)।
एपेक की वर्तमान सदस्य संख्या 21 है। जिसमें 12 राष्ट्र (ऑस्ट्रेलिया, ब्रुनेई, कनाडा, इंडोनेशिया, जापान, दक्षिण कोरिया, मलेशिया, न्यूजीलैंड, फिलीपींस, सिंगापुर, थाईलैंड एवं अमेरिका) वर्ष 1989 में ही सदस्य बने जबकि ताइवान, हांगकांग, चीन, मेक्सिको, पापुआ न्यू गिनी, चिली, पेरू, रूस एवं वियतनाम बाद में एपेक के सदस्य बने। एपेक की पिछली बैठक 10-12 नवंबर, 2014 के मध्य चीन की राजधानी बीजिंग में संपन्न हुई थी।
@ एपेक की आगामी बैठक वर्ष 2016 में पेरू में प्रस्तावित है।
@ एपेक राष्ट्रों की कुल जनसंख्या विश्व जनसंख्या की लगभग 40 प्रतिशत है। विश्व के सकल घरेलू उत्पाद में एपेक राष्ट्रों की भागीदारी लगभग 57 प्रतिशत है। एपेक राष्ट्रों की विश्व व्यापार में हिस्सेदारी लगभग 46 प्रतिशत है।
@ एपेक समूह के शासनाध्यक्षों की 27वीं वार्षिक बैठक (23वीं शिखर बैठक) का आयोजन 18-19 नंवबर, 2015 के मध्य फिलीपींस अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन केंद्र, पसाय (Pasay) मनीला में किया गया।
@ एपेक शासनाध्यक्षों के इस सम्मेलन की विषय- वस्तु (Theme) ‘समावेशी अर्थव्यवस्थाओं का निर्माण, बेहतर विश्व का निर्माण’ (Building Inclusive Economics, Building Better World) था।
@ इस विषयवस्तु (Theme) की अवधारणा इस बात पर केंद्रित थी कि एशिया-प्रशांत क्षेत्र में एक समन्वित, संतुलित और समृद्धिशाली समुदाय का निर्माण किया जाए, जिसमें सभी लोग आर्थिक संवृद्धि और प्रौद्योगिकी प्रगति का लाभ उठा सकें।
@ इस एपेक सम्मेलन की अध्यक्षता फिलीपींस के राष्ट्रपति बेनिग्नो एक्विनो III ने किया।
@ शिखर सम्मेलन में शासनाध्यक्षों द्वारा वर्ष 2020 तक एशिया-प्रशांत क्षेत्र में मुक्त एवं खुले व्यापार तथा निवेश के लिए वर्ष 1974 में निर्धारित ‘बोगोर लक्ष्यों’ (Bogor Goals) की शीघ्र प्राप्ति के लिए साझा प्रयास करने पर सहमति प्रदान की गई।
@ बोगोर लक्ष्यों को प्राप्त करने के उद्देश्य से एपेक शासनाध्यक्षों ने ‘एशिया-प्रशांत मुक्त व्यापार क्षेत्र’ (FTAAP : Free Trade Area of the Asia-Pacific) की दिशा में किए जा रहे प्रयासों को और अधिक तीव्र करने पर सहमति व्यक्त किया।
@ सम्मेलन में यह संकल्प किया गया कि भविष्य की संवृद्धि को मजबूत, संतुलित, पोषणीय और समेकित बनाया जाए जो कि नवप्रवर्तन पर आधारित हो तथा प्राकृतिक आपदाओं एवं अन्य खतरों से सुरक्षित हो। यह संवृद्धि लैंगिक समानता पर आधारित हो तथा हम ‘मध्य आय जाल’ (Middle Income Trap) के जोखिमों से सतर्क रहें।
@ सम्मेलन में एपेक, 2010 की संवृद्धि रणनीति (Growth Strategy) का स्वागत किया गया जिसके तहत एपेक क्षेत्र के 300 मिलियन से अधिक लोग गरीबी की स्थिति से बाहर निकल गए, जो कि विकासशील अर्थव्यवस्थाओं के तीव्र आर्थिक संवृद्धि प्राप्त करने के कारण संभव हुआ।
@ इस सम्मेलन में संरचनात्मक सुधार के लिए नए संरचनात्मक सुधार एजेंडे (RAASR-Renewed APEC Agenda for Structural Reform) की घोषणा की गई।
@ इस सम्मेलन में व्यापार (उद्योग) को आसान बनाने (EODB-Ease of Doing Business) पहल का स्वागत किया गया तथा ‘EODB एक्शन प्लान’ को एक नए लक्ष्य के साथ शुरू किया गया जिसके तहत पांच प्राथमिकता प्राप्त क्षेत्रों, जिनमें व्यापार या उद्योग शुरू करना, निर्माण कार्य की अनुमति, सीमा पार व्यापार, ऋण प्राप्त करना और संविदा या करार को बढ़ाना शामिल है, में 10 प्रतिशत की वृद्धि करना।
@ सम्मेलन में पोषणीय विकास के लिए ‘2030 एजेंडा’ लाया गया।
@ यह एजेंडा अगले 15 वर्षों में भूमंडलीय विकास की समेकित एवं महत्त्वाकांक्षी ढांचे के अंतर्गत कार्य करेगा जिसका लक्ष्य गरीबी मिटाना तथा सभी के लिए विस्तृत एवं पोषणीय भविष्य का निर्माण करना है।
@ सम्मेलन में वित्तीय बाजार के जोखिमों को कम करने की बात की गई, जिसके तहत Cebu Action Plan (CAP) का स्वागत किया गया।
@ Cebu Action Plan के अंतर्गत एपेक देशों के वित्त मंत्री एशिया-प्रशांत क्षेत्र में जोखिम रहित वित्तीय बाजार बनाने के लिए बहुवर्षीय रूपरेखा तैयार करते हैं।
@ सम्मेलन में सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्योगों की क्षेत्रीय एवं वैश्विक बाजार में भागीदारी बढ़ाने पर जोर देने की बात की गई।
@ सम्मेलन में एपेक देशों द्वारा पोषणीय और आपदा प्रतिरोधी अर्थव्यवस्थाओं के निर्माण की बात की गई जिसके अंतर्गत ‘आपदा जोखिम कमी’ (DRR-Disaster Risk Deduction) संरचना का विकास करने पर सहमति व्यक्त की गई।
@ सम्मेलन में पर्यावरण सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए हरित ऊर्जा युक्त निम्न कार्बन वाली शहरी विकास की बात की गई।
@ एपेक देशों द्वारा एशिया-प्रशांत नगरीकरण साझेदारी विकसित करने की बात की गई जिसके तहत चीन वर्ष 2016 में एपेक नगरीकरण गोष्ठी की मेजबानी करेगा।
@ एपेक शिखर सम्मेलन में मानव पूंजी को विकसित करने की बात की गई, जिसके तहत मानव पूंजी को सशक्त बनाया जाए जिससे आर्थिक संवृद्धि में मानव पूंजी की भागीदारी बढ़ाई जा सके।
@ सम्मेलन में विस्तृत, संयुक्त, नवप्रवर्तनशील और आपस में जुड़े हुए एशिया-प्रशांत क्षेत्र पर सहमति बनी। जिसके अंतर्गत वर्ष 2015-2025 के लिए एपेक संबंध रूपरेखा तैयार की गई जिसमें भौतिक, संस्थानिक तथा लोगों से लोगों के बीच संबंध बढ़ाने की बात की गई।

04/02/2016

=> विश्व व्यापार संगठन (World Trade Organization-WTO)....

विश्व व्यापार संगठन (World Trade Organization-WTO) एक ऐसा वैश्विक संगठन है जो अंतर्राष्ट्रीय व्यापार के न्यायपूर्ण एवं सहज संचालन हेतु उपयुक्त नीतियों का निर्माण करता है और समय-समय पर उनकी समीक्षा करता है। इसकी स्थापना 1 जनवरी, 1995 को ‘जनरल एग्रीमेंट ऑन टैरिफ एंड ट्रेड’ (General Agreement on Tariffs and Trade-GATT) के स्थान पर ‘माराकश समझौते’ (Marrakech Agreement) के आधार पर की गई थी। इसका मुख्यालय जेनेवा, स्विट्जरलैंड में स्थित है और इसके वर्तमान महानिदेशक ब्राजील के रॉबर्टो अजेवेडो (Roberto Azevedo) हैं।
सदस्य देशों के मध्य द्विपक्षीय एवं बहुपक्षीय अंतर्राष्ट्रीय व्यापार को सरल एवं समतापूर्ण बनाने के उद्देश्य से सामान्यतः प्रत्येक दो वर्षों के अंतराल पर संगठन के मंत्रिस्तरीय सम्मेलन आयोजित किए जाते हैं। इन सम्मेलनों में अंतर्राष्ट्रीय व्यापार से संबंधित समस्त शर्तों, समझौतों एवं विवादों की समीक्षा की जाती है तथा आवश्यकतानुसार नई नीतियों का निर्माण भी किया जाता है। अभी हाल ही में विश्व व्यापार संगठन का 10वां मंत्रिस्तरीय सम्मेलन नैरोबी, केन्या में संपन्न हुआ।

@ 15 से 19 दिसंबर, 2015 के मध्य केन्या की राजधानी नैरोबी में विश्व व्यापार संगठन के 10वें मंत्रिस्तरीय सम्मेलन का आयोजन किया गया।
@ किसी अफ्रीकी देश में पहली बार आयोजित इस सम्मेलन की अध्यक्षता केन्या की विदेश मामले और अंतर्राष्ट्रीय व्यापार मंत्री अमीना मोहम्मद ने की।
@ सम्मेलन के अंत में ‘नैरोबी पैकेज’ के नाम से एक घोषणा-पत्र जारी किया गया जिसमें कृषि पर 6 मंत्रिस्तरीय निर्णय, कपास और अल्पविकसित देशों (LDC) से संबंधित मुद्दे शामिल हैं।
@ सम्मेलन में यह निर्णय लिया गया कि विकसित देशों द्वारा कुछ कृषि उत्पादों को छोड़कर ज्यादातर उत्पादों पर सब्सिडी को तत्काल समाप्त कर दिया जाएगा।
@ विकासशील देशों द्वारा कृषि उत्पादों पर सब्सिडी खत्म करने की समय-सीमा वर्ष 2018 निर्धारित है।
@ विकासशील देशों को निर्यात मूल्य में मार्केटिंग और परिवहन के खर्च को अलग से प्रदर्शित करने की समय-सीमा वर्ष 2023 निर्धारित की गई है।
@ अल्पविकसित एवं गरीब देशों को निर्यात सब्सिडी समाप्त करने हेतु कोई समय-सीमा निर्धारित नहीं है।
@ इस सम्मेलन में विकासशील देशों को खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करने हेतु वर्ष 2013 के बाली मंत्रिस्तरीय सम्मेलन में बनी सहमति को 11वें सम्मेलन (2017 में प्रस्तावित) तक जारी रखने का निर्णय किया गया है।
@ इसके अंतर्गत विकासशील देश खाद्य वस्तुओं को अपने यहां भंडारित करने का कार्यक्रम तब तक चला सकेंगे जब तक विश्व व्यापार संगठन के देश इस मुद्दे के स्थायी समाधान हेतु सहमत न हो जाएं।
@ विकासशील देशों को डंपिंग की समस्या से निपटने हेतु ‘स्पेशल सेफगार्ड मैकेनिज्म’ (SSM) की व्यवस्था इस सम्मेलन में की गई है।
@ इसके अंतर्गत विकासशील देशों द्वारा कुछ समय तक के लिए अतिरिक्त आयात शुल्क अधिरोपित किया जा सकेगा।
@ नैरोबी सम्मेलन में विकसित देशों के बाजार में अल्पविकसित देशों की पहुंच सुनिश्चित करने हेतु शुल्क मुक्त और कोटा मुक्त कपास निर्यात व्यवस्था लागू करने का निर्णय किया गया है।
@ बाली मंत्रिस्तरीय सम्मेलन (2013) में लिए गए निर्णय के अनुसार, अल्पविकसित देशों के लिए ऐसे बहुपक्षीय आसान दिशा-निर्देश तैयार किए जाने थे जिससे ये देश अपने उत्पादित सामान का निर्यात विकसित एवं विकासशील देशों के बाजार में कर सकें।
@ नैरोबी सम्मेलन में इसे व्यावहारिकता प्रदान की गई और ज्यादा विस्तृत निर्देश एवं तौर-तरीके तय किए गए।
@ इसके अंतर्गत यदि किसी उत्पाद का निर्माण ‘मेड इन एलडीसी’ टैग के तहत किया गया है तो उसके निर्माण में 75 प्रतिशत तक कच्चे माल का उपयोग गैर-एलडीसी स्रोतों से किया जा सकता है।
@ नैरोबी सम्मेलन में एलडीसी देशों की सेवाओं और सेवा प्रदाताओं को सेवा क्षेत्र के व्यापार में वरीयता देने का निर्णय किया गया है।
@ इसके अंतर्गत विकसित एवं विकासशील देशों द्वारा एलडीसी देशों की सेवाओं को 31 दिसंबर, 2030 तक विशेष वरीयता प्रदान की जाएगी।
@ इस सम्मेलन में सूचना प्रौद्योगिकी क्षेत्र (आईटी क्षेत्र) से संबंधित 201 उत्पादों पर लगने वाले शुल्क को एक समय-सीमा के भीतर समाप्त करने पर सहमति बनी।
@ आईटी उत्पाद के वैश्विक व्यापार के लगभग 90 प्रतिशत का प्रतिनिधित्व करने वाले 53 देशों ने निर्णय किया है कि वे 1 जुलाई, 2016 तक 65 प्रतिशत शुल्क समाप्त कर देंगे।
@ वर्ष 2019 तक अगले तीन वर्षों में चार चरणों के तहत आईटी उत्पादों पर ये शुल्क पूर्णतया समाप्त हो जाएंगे।
@ इस सम्मेलन में लाइबेरिया और अफगानिस्तान को विश्व व्यापार संगठन के नए सदस्य के रूप में शामिल किया गया है।
@ इन दो देशों के शामिल होने से विश्व व्यापार संगठन की सदस्य संख्या 164 हो गई है।
@ अफगानिस्तान विश्व व्यापार संगठन का 36वां अल्पविकसित सदस्य है।
@ गौरतलब है कि विश्व व्यापार संगठन का 161वां सदस्य सेशेल्स और 162वां सदस्य कजाख्स्तान है।
@ नैरोबी सम्मेलन में दोहा दौर की भविष्य में होने वाली वार्ताओं के संबंध में विकसित एवं विकासशील देशों का दृष्टिकोण परस्पर विरोधी था।
@ नैरोबी घोषणा-पत्र में इस बात पर सहमति बनी कि दोहा दौर में चर्चा हेतु शेष बचे मुद्दों पर वार्ता अवश्य की जाए किंतु विश्व व्यापार से संबंधित अन्य मुद्दों पर वार्ता के नए चक्र को भी जारी रखा जाए।

14/12/2015

>> राज्य पुनर्गठन आयोग और नवीन गठित राज्य ....

भारत सरकार ने भारत की स्वतंत्रता के बाद अंग्रेजी राज के दिनों के 'राज्यों' को भाषा के आधार पर पुनर्गठित करने के लिये राज्य पुनर्गठन आयोग (States Reorganisation Commission) की स्थापना की थी।। न्यायाधीश फजल अली की अध्यक्षता में 22 दिसम्बर, 1953 को पहले राज्य पुनर्गठन आयोग का गठन हुआ। इस आयोग के तीन सदस्य जस्टिस फजल अली, हृदयनाथ कुंजरू और केएम पाणिक्कर थे। इस आयोग द्वारा 30 सितंबर, 1955 को अपनी रिपोर्ट सौपें जाने के बाद ही 1956 में नए राज्यों का निर्माण हुआ और 14 राज्य व 6 केन्द्र शासित राज्य बने।
@ भारत की स्वतंत्रता के बाद से अब तक हुए राज्यों के पुनर्गठन पर एक नजर–--

* आन्ध्र प्रदेश : आन्ध्र प्रदेश राज्य अधिनियम, 1953 द्वारा मद्रास राज्य के कुछ भागों को काटकर बनाया गया।
* गुजरात और महाराष्ट्र : मुंबई (पुनर्गठन) अधिनियम, 1960 के द्वारा मुम्बई राज्य को दो राज्यों महाराष्ट्र और गुजरात में विभाजित कर दो अलग-अलग राज्य बनाये गये।
* केरल : राज्य पुनर्गठन अधिनियम, 1956 द्वारा त्रावणकोर एवं कोचीन क्षेत्रों को मिलाकर बनाया गया।
* कर्नाटक : राज्य पुनर्गठन अधिनियम, 1956 द्वारा मैसूर राज्य गठित। 1973 में इसका नाम बदलकर कर्नाटक कर दिया गया।
* 10वें संविधान संशोधन 1961 के द्वारा दादरा और नागर हवेली संघ राज्य क्षेत्र घोषित।
* 12वें संविधान संशोधन 1962 द्वारा गोवा, दमण और दीव को संघ राज्य क्षेत्र घोषित।
* 14वें संविधान द्वारा पांडिचेरी संघ राज्य क्षेत्र घोषित।
* नगालैंड : नगालैंड राज्य अधिनियम, 1962 द्वारा असम के कुछ क्षेत्र को काटकर बनाया गया।
* हरियाणा : पंजाब (पुनर्गठन) अधिनियम, 1966 द्वारा पंजाब से अलग कर हरियाणा राज्य निर्मित।
* मद्रास राज्य (नाम परिवर्तन) अधिनियम, 1968 द्वारा म्रदास का नाम परिवर्तित होकर तमिलनाडु हो गया।
* हिमाचल प्रदेश : हिमाचल प्रदेश राज्य अधिनियम, 1970 द्वारा केन्द्र शासित प्रदेश हिमाचल को राज्य का दर्जा प्रदान किया गया।
* मेघालय : 23वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1969 द्वारा पहली बार असम के उप-राज्य के रूप में मेघालय का गठन।
> 1971 में उत्तर-पूर्वी क्षेत्र अधिनियम 1971 द्वारा मेघालय को राज्य का दर्जा प्रदान किया गया।
* मणिपुर एवं त्रिपुरा : उत्तर-पूर्वी अधिनियम, 1971 द्वारा दोनों केंद्रशासित प्रदेशों को राज्य का दर्जा प्रदान किया गया
* लक्कादीव, मिनिकोय और अमीनदीवी द्वीपसमूह का नाम 1973 में 'लक्षद्वीप' कर दिया गया।
* सिक्किम : 35वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1974 द्वारा पहले सिक्किम को सहायक राज्य का दर्जा प्रदान किया गया। 36वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1975 द्वारा इसे पूर्ण राज्य का दर्जा प्रदान किया गया।
* मिजोरम : इसे मिजोरम राज्य अधिनियम, 1986 के द्वारा पूर्ण राज्य का दर्जा प्रदान किया गया।
* अरुणाचल प्रदेश : इसे अरुणाचल प्रदेश राज्य अधिनियम, 1986 द्वारा पूर्ण राज्य का दर्जा प्रदान किया गया।
* गोवा : गोवा, मदन और दीव (पुनर्गठन) अधिनियम, 1987 द्वारा गोवा को पूर्ण राज्य का दर्जा प्रदान किया गया जबकि दमन और दीव को केंद्रशासित प्रदेश के रूप में ही रखा गया।
* 69वें संविधान संशोधन 1991 द्वारा दिल्ली राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र घोषित।
* छत्तीसढ़ : इसे मध्य प्रदेश पुनर्गठन अधिनियम 2000 द्वारा मध्य प्रदेश से अलग करके 1 नवंबर, 2000 को नया राज्य बनाया गया।
* उत्तराखंड : उत्तर प्रदेश पुनर्गठन अधिनियम द्वारा उत्तर प्रदेश से अलग करके 9 नवंबर, 2000 को एक अलग राज्य बनाया गया।
* झारखंड : इसे बिहार पुनर्गठन अधिनियम 2000 द्वारा 15 नवंबर, 2000 को बिहार से काट कर अलग राज्य बनाया गया।
* तेलंगाना : आध्रं प्रदेश पुनर्गठन अधिनियम 2014 द्वारा आध्रं प्रदेश से अलग करके 2 जून, 2014 को तेलंगाना राज्य बनाया गया।

13/12/2015

>> Independence of Judiciary...

Lord Acton has been quoted saying ‘Power tends to corrupt and absolute power corrupts absolutely’. This saying finds reflection in all seats of authority, narrowing down on the mammoth task that includes the power to govern a country. Dr. Bhimrao Ramji Ambedkar incorporated the learning from this quote in the Doctrine of Separation of Powers, where the Constitution of India under Article 50 (one of the Directive Principles of State Policy) lays down that the State shall take steps to separate the judiciary from executive in the public services of the state.

Article 50 – Separation of Judiciary from Executive – The State shall take steps to separate the judiciary from the executive in the public services of the State.

Politicians and scholars have been mulling over the exact meaning of this independence for decades, and now, it has been flexibly allowed to encompass the independence of the institution of courts and the independence of the judges to make unbiased, apolitical and uninfluenced decisions.

What follows is a three pronged argument to justify the need for this independence of this justice dispersion institution. Firstly, this independence of judiciary keeps the functioning of the other two organs in check i.e. that of legislature and executive. The judiciary does this by exercising its power to declare any law made or executed by them void to the extent of its unconstitutionality. Secondly, the flexibility they have in interpreting the provisions of the constitution in an equitable manner, irrespective of the pressures the political scene accrues on it; is preserved with their unanswerablility to those wings. Lastly, this independence is irreplaceable because of its main function – dispute resolution, more so in cases of irreconcilability between two or more states, between a state and the centre, between the centre and its people, or between the legislative and executive in respect of any new law or legislation enacted.

The independence of second aspect that with regard to specific independence of judges has been provisionally given in form of selection, retirement age, salary of judges, strict removal process, action against contempt of court and no liability for words expressed in the course of their duty in the courtroom. In recent times, when corruption has reached the lowest niche in political scenario around us, while judiciary hasn’t been left mud-less, the aggrieved find their way and hope, deriving their strength from the justice in courts, delayed as it has been often claimed to be.

The recent NJAC bill tried to bring in partial involvement of the government in the selection process of judges of Supreme Court and High Courts and transfer of judges of High Courts, which up until now has been an absolute function of the internal pool amongst judges themselves. The Supreme Court rejected this infringement on its independence claiming this bill to be unconstitutional. One is left to wonder if this small addition of a government official will have such disastrous consequences in bringing what acclaimed lawyers like Soli Sorabjee and newsletter editors have called a much needed transparency inculcation in the increasing unreliability and mistrust that backdoor and over-stretched court transactions have garnered in the masses.

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