K.c. Adaniya

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Founder Director of Adaniya Education Group -Asind (Bhilwara)
Educationalist, Motivatior, Author
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Private school में exploitation कभी “काम करो” से शुरू नहीं होता… वह अक्सर “Sir, आप पर भरोसा है” से शुरू होता है।अमित सर ...
22/08/2026

Private school में exploitation कभी “काम करो” से शुरू नहीं होता… वह अक्सर “Sir, आप पर भरोसा है” से शुरू होता है।

अमित सर ने नए school में joining की थी।

करीब 3 साल का teaching experience था।

वह कोई बिल्कुल नया teacher नहीं था, लेकिन इस school से उसे काफी उम्मीदें थीं।

पहले दिन Principal Sir ने बहुत सम्मान से बात की।

“अमित जी, आपकी qualification अच्छी है।”

“आपका experience भी है।”

“हमें ऐसे teachers चाहिए जो सिर्फ नौकरी न करें, school को अपना समझें।”

अमित सर को अच्छा लगा।

उन्हें लगा—

“शायद इस बार मुझे सही जगह मिल गई है।”

फिर management ने salary की बात की।

Salary बहुत ज्यादा नहीं थी।

लेकिन साथ में एक बात कही गई—

“अभी शुरुआत है Sir… आप अच्छा काम कीजिए, आगे growth बहुत है।”

अमित सर ने सोचा—

“Salary थोड़ी कम है, लेकिन अगर environment अच्छा है और future growth है, तो ठीक है।”

यहीं से कहानी शुरू हुई।

पहले हफ्ते सब अच्छा रहा।

Principal Sir कभी-कभी तारीफ करते—

“आपकी class अच्छी चल रही है।”

“Parents आपके teaching से खुश हैं।”

“आप बाकी teachers से अलग हैं।”

अमित सर का confidence बढ़ता गया।

फिर एक दिन छुट्टी के समय Principal Sir ने कहा—

“Sir, एक छोटी-सी request है…”

बस एक extra period लेना था।

अमित सर ने कहा—

“ठीक है Sir।”

अगले हफ्ते फिर—

“Sir, आज एक teacher absent हैं… बस उनकी class भी देख लीजिए।”

अमित सर ने फिर कहा—

“ठीक है Sir।”

फिर annual function की preparation में—

“Sir, आप अच्छे coordinator हैं… थोड़ा संभाल लीजिए।”

अमित सर ने मुस्कुराकर कहा—

“ठीक है।”

उन्हें तब तक कोई problem नहीं लगी।

क्योंकि हर बार काम आदेश की तरह नहीं, भरोसे की तरह आया था।

और यही सबसे खतरनाक हिस्सा था।

क्योंकि exploitation हमेशा शुरुआत में exploitation जैसा दिखाई नहीं देता।

वह अक्सर शुरू होता है—

“Sir, आप पर भरोसा है।”

फिर आता है—

“बस इस बार मदद कर दीजिए।”

फिर—

“आप तो अपने ही आदमी हैं।”

और धीरे-धीरे एक दिन वही काम, जिसे कभी request करके करवाया गया था, आपकी responsibility बन जाता है।

अमित सर को अभी यह समझ नहीं आया था।

उन्हें लग रहा था कि management उन्हें value दे रहा है।

लेकिन कुछ महीनों बाद उन्हें एहसास होने वाला था कि—

जिस “हाँ” को उन्होंने शुरुआत में अपनी अच्छाई समझा था, management उसे उनकी permanent availability समझ चुका था।

और शायद private teaching की सबसे बड़ी गलती यही होती है—

हम शुरुआत में अपनी boundaries खुद तय नहीं करते।

फिर बाद में जब boundaries बनाने की कोशिश करते हैं, तो सामने वाला कहता है—

“लेकिन Sir, पहले तो आप सब कर लेते थे…”

यहीं से असली कहानी शुरू होती है।

अगर आप भी private school में “बस एक बार” से शुरू होकर “ये तो आपकी responsibility है” तक पहुँच चुके हैं, तो अपनी कहानी comments में लिखिए। नाम नहीं—सिर्फ अपना अनुभव।

शायद आपकी कहानी किसी दूसरे teacher को अपनी situation बहुत पहले पहचानने में मदद कर दे।

Private Teacher Diaries — क्योंकि कुछ नौकरियाँ salary से नहीं, उम्मीद से शुरू होती हैं… और कुछ सच्चाइयाँ बहुत देर से समझ आती हैं।

आज मैं खुद एक संस्थान में मुख्य भूमिका में काम कर रहा हूं और इस अनुभव को बखूबी जिया है, किरदार से कब डायरेक्शन में आ गए पता ही नही चला लेकिन पूरा प्रयास रहता है जो बूरे अनुभव मैंने देखें है मेरे स्टाफ को ना मिले

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सभी देशवासियों को स्वतंत्रता दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं
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आखिर Paper-I के 40% की कीमत कब तक चुकाएँगे अभ्यर्थी?तीन दिन पहले स्कूल व्याख्याता हिंदी का परिणाम आया। अनेक अभ्यर्थियों ...
11/08/2026

आखिर Paper-I के 40% की कीमत कब तक चुकाएँगे अभ्यर्थी?

तीन दिन पहले स्कूल व्याख्याता हिंदी का परिणाम आया। अनेक अभ्यर्थियों ने अपने विषय के Paper-II में बहुत अच्छे अंक प्राप्त किए, लेकिन Paper-I में न्यूनतम 40 प्रतिशत अंक नहीं आने के कारण वे कट ऑफ की दौड़ से बाहर हो गए।

जब मैंने इस पीड़ा पर लिखा, तो कुछ लोगों ने कहा—

“गलती विद्यार्थियों की है, विद्यार्थी पढ़ते नहीं हैं।”

आज अंग्रेजी और वाणिज्य के परिणाम आए तो लगभग वही तस्वीर फिर सामने खड़ी थी। विषय बदल गए, विद्यार्थी बदल गए, लेकिन Paper-I के 40 प्रतिशत की दीवार नहीं बदली।

अब सवाल यह है कि क्या हिंदी, अंग्रेजी और वाणिज्य—सभी विषयों के विद्यार्थियों ने ही पढ़ाई नहीं की? अभी अनेक विषयों के परिणाम आना शेष हैं। यदि उनमें भी यही स्थिति सामने आती है, तो क्या हर बार केवल विद्यार्थियों को दोष देकर बात समाप्त कर दी जाएगी?

इस व्यवस्था की सबसे बड़ी पीड़ा केवल अभ्यर्थियों का बाहर होना नहीं है। जब पदों के बराबर भी अभ्यर्थी Paper-I की 40 प्रतिशत अर्हता पार नहीं कर पाते, तो अनेक पद रिक्त रह जाते हैं। एक ओर वर्षों से तैयारी कर रहा योग्य अभ्यर्थी कुछ अंकों के कारण चयन से वंचित रह जाता है, दूसरी ओर विद्यालयों को शिक्षक नहीं मिल पाते। अंततः नुकसान अभ्यर्थी, विद्यालय और विद्यार्थियों—तीनों का होता है।

हम आसान परीक्षा की माँग नहीं कर रहे हैं। Paper-I कठिन और स्तरीय हो, लेकिन आसान, मध्यम और कठिन प्रश्नों का उचित संतुलन भी होना चाहिए। प्रतियोगिता का वास्तविक अर्थ तभी है जब पर्याप्त अभ्यर्थी न्यूनतम अर्हता प्राप्त करें और फिर उनमें से सर्वश्रेष्ठ का चयन मेरिट के आधार पर हो।

यदि Paper-II में शानदार प्रदर्शन करने वाले अभ्यर्थी Paper-I में केवल दो या चार अंक कम रहने के कारण बाहर हो जाएँ और दूसरी ओर पद भी रिक्त रह जाएँ, तो इस व्यवस्था पर विचार करने योग्य है।

एक विषय का परिणाम संयोग हो सकता था, लेकिन हिंदी के बाद अंग्रेजी और वाणिज्य में भी वही स्थिति दिखाई देना गंभीर सवाल खड़ा करता है—

आखिर हर विषय के विद्यार्थी एक साथ पढ़ना कैसे छोड़ सकते हैं? और यदि योग्य अभ्यर्थी उपलब्ध होने के बावजूद पद रिक्त रह रहे हैं, तो इसका उत्तरदायी कौन है?

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