31/10/2022
कविता बेचैन आत्मा की उपज है। वह कह देने की ललक है जो देख कर भी अब तक कहा नहीं गया हो। सदियों के नजरिये को एक नए अर्थ में गढ़ने की चाहत व्यक्ति को कवि बनाती है। जिसकी कलम एक विचार, एक सोच, एक विश्वास पर ठहर जाये वो उम्दा कवि नहीं हो सकता।
कवि हृदय का संवेदनशील होना उसकी काव्य विधा को परिपक्व करता है। किसी की भावनाओं को स्वयं में आरोपित करना और फिर उसको शब्द शिल्प के साथ मुखर करना कवि का धर्म माना गया है।
Sonroopa Vishal जी वर्तमान दौर की कलमों में अपना विशेष स्थान रखती हैं। इनकी कविताएं वैचारिकी और लयात्मकता की दोहरी कसौटी पर एकदम खरी उतरती हैं। इनकी लेखनी का फ़लक आधुनिक सामाजिक दर्शन के विस्तार को सहज समेट लेने में सर्वथा सक्षम है तो इनकी प्रस्तुतियाँ भी मिष्ठान से उठती केसर की भीनी सुगंध की तरह मनभावन होती हैं।
जितना इन्हे पढ़ना रुचिकर लगता है उतना ही सम्मोहन इनको सुनने में है। आज सोनरूपा विशाल जी के जन्मदिवस पर तीखर अपने पूरे परिवार की तरफ से उन्हें शुभकामनाएँ देता है। आप उनमें से हैं जिनकी आंखों में तीखर की सफलता के स्वप्न पलते हैं। आप का साथ तीखर के लिए गर्व का विषय है।
बीते दिनों ही लिखा गया उनका प्रण गीत उनके काव्य कौशल एवं अपने परिवार से मिली साहित्य-संस्कार को परिलक्षित करता है।
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मन में दृढ़ विश्वास निर्मित कर सकूँ मैं,
हौसलों से भय पराजित कर सकूँ मैं!
राह में बाधाएँ होंगी जानती हूँ
अनगिनत चिंताएँ होंगी जानती हूँ
फिर भी हर व्यवधान खण्डित कर सकूँ मैं
हौसलों से भय पराजित कर सकूँ मैं!
स्वाभिमानी श्वास तन में अंत तक हो
परहितों का ध्यान मन में अंत तक हो
पुष्प सा ख़ुद को सुगन्धित कर सकूँ मैं
हौसलों से भय पराजित कर सकूँ मैं!
रूढ़ियों के बोझ हमको त्यागना है
मन में उन्नत सोच को अब धारना है
इन इरादों को प्रसारित कर सकूँ मैं
हौसलों से भय पराजित कर सकूँ मैं!
स्वार्थ के उपहार बन कर रह गये जो
तन का बस शृंगार बन कर रह गये जो
ऐसे पुष्पों को विसर्जित कर सकूँ मैं
हौसलों से भय पराजित कर सकूँ मैं!
प्रण है मेरा सूर्य की उपमा बनूँगी
मै निडर होकर सदा आगे बढूँगी
स्वसृजित आयाम अर्जित कर सकूँ मैं
हौसलों से भय पराजित कर सकूँ मैं!