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08/10/2022

जयमल मेड़तिया ( राठौड़ )

मेवाड़ के इतिहास में महाराणा सांगा और महाराणा प्रताप के मध्य की अवधि पराक्रम की दृष्टि से कतिपय कमजोर प्रतीत होती है। इसकी भरपाई की जयमल मेड़तिया और फत्ता सिंह सिसोदिया जैसे शूरवीरों ने ...

अक्टूबर 1567, अकबर की सेना ने चितौड़ में डेरा डाल दिया। अकबर आक्रमण करेगा, यह सूचना अकबर के आने से पूर्व ही चितौड़ पहुंच चुकी थी। महाराणा उदयसिंह के पुत्र शक्तिसिंह ने चितौड़ को अवगत करवा दिया था कि अकबर अपने 80,000 सैनिकों के साथ आक्रमण करने वाला है।

महाराणा प्रताप के लाख मना करने के उपरांत भी चितौड़ दुर्ग में यह निश्चित हुआ कि उदयसिंह परिवार सहित गिरवा की पहाड़ियों में चले जाएंगे। महाराणा के प्रस्थान उपरांत चितौड़ दुर्ग का महत्तर दायित्व जयमल मेड़तिया पर था। कुछ समय पहले ही जयमल मेड़ता का राज्य खोकर उदयसिंह की शरण में आ गए थे। वही अब दुर्गरक्षक थे।

अकबर ने युद्ध-नीति बदल दी थी। वह दुर्ग की दीवारें गिरवाने के लिए सुरंग की खुदाई करवा रहा था। आप अकबर की चितौड़-शत्रुता का अनुमान इस बात से लगा सकते हैं कि वह एक कटोरी मिट्टी खोदकर लाने वाले मजदूर को एक स्वर्णमुद्रा दे रहा था। लेकिन उसे यह जानकर आश्चर्य हुआ कि वह जो दीवार रात में गिरवाता, सुबह पुनः बन जाती। आख़िर यह मरम्मत कौन करवा रहा था ? वह महान यौद्धा जयमल मेड़तिया थे।

जब अकबर को यह ज्ञात हुआ कि महाराणा उदयसिंह दुर्ग का भार जयमल पर छोड़कर गिरवा की पहाड़ियों में चले गए हैं तो उसने जयमल को अपनी ओर मिला लेने की युक्ति सोची। अकबर ने अपना दूत भेजा और कहा - यदि वह चितौड़ बादशाह को सौंप दे तो उसे मेड़ता का राज्य मिल जाएगा। लेकिन जयमल ने लिखवा भेजा --

है गढ़ म्हारो म्है धणी,असुर फ़िर किम आण।
कुंच्यां जे चित्रकोट री, दिधी मोहिं दीवाण।।
जयमल लिखे जबाब यूँ सुनिए अकबर शाह।
आण फिरै गढ़ उपरा, पडियो धड़ पातशाह।।

( यह गढ़ मेरा है और मैं इसका स्वामी। कोई असुर इस पर अपना अधिकार कैसे जमा सकता है ? इस चित्रकूट की चाभियाँ मुझे स्वयं दीवान ( मेवाड़ महाराणा ) ने दी हैं। )

पुनः अकबर ने कहा - मैं तुम्हें मेड़ता के साथ साथ नागौर भी देता हूँ। लेकिन जयमल रंचक भर भी डिगे नहीं। उन्होंने टोडरमल से कहा -

भूख न मेटे मेड़तौ, ना मेटे नागौर।
रजवट भूख अनोखड़ी, मर्या मिटे चितौड़।
डेरे टोडर जाय ने, कर लो रण री पाण।
जयमल गढ़ में जीवतो, अकबर फिरे न आण।।

( न मेरी भूख मेड़ता मिटा सकता है और न ही नागौर। यह रजवट की अनोखी भूख है, जो चितौड़ के लिए प्राणोत्सर्ग करने के पश्चात ही मिटेगी। इसलिए टोडर जी आप तो अकबर के डेरे जाकर युद्ध की तैयारी कीजिए कि जयमल अभी दुर्ग में जीवित है। )

एक रात दीवार मरम्मत करवा रहे जयमल के पाँव में अकबर ने अपनी संग्राम बंदूक से गोली मार दी। अब उनकी गति आधी हो गयी। इधर इस घटना के बाद दुर्ग में नैराश्य छा गया। उधर राशन-पानी की भयंकर कमी। दोनों ओर से संकट आ खड़ा हुआ। केवल आठ हजार सैनिकों पर दुर्ग में और उसके आसपास रहने वाले तीस हजार अन्य हिन्दू लोगों की जीवन रक्षा का दायित्व-भार।

अब समय आ गया था कि साका किया जाए। जयमल की बहन अर्थात फत्ता की धर्मपत्नी, फत्ता की माँ सहित सैंकड़ो राजपूत महिलाओं ने अग्नि स्नान किया। अतीव कारुणिक दृश्य रहा होगा जब माँ अपने नौनिहालों को पीठ पर बांध-बांधकर अग्निकुंड में जा बैठी थीं।

धधकती ज्वालाएं देख अकबर ने भगवानदास से कहा - यह सब क्या है, अब आगे क्या होगा ? भगवानदास ने उत्तर दिया - यह जौहर है, कल दुर्ग के कपाट खुलेंगे, कल होगा केसरिया ...

प्रातःकाल राजपूत यौद्धाओं ने गोमुख कुंड स्पर्श किया, माँ भगवती की पूजा-आराधना की, चितौड़ दुर्ग को शीश नवाया और दुर्ग के कपाट खोल दिये ....

आरपार की लड़ाई। देखते ही देखते चितौड़ की माटी रक्तवर्णा हो गई। जयमल एक ओर कोने में निराश खड़े थे। उनका दुःख यह था कि वह क्षत पाँव के साथ युद्ध नहीं लड़ पा रहे थे। तभी जिम्मा सम्भाला कल्ला राठौड़ ने, जो कुटुंब में जयमल के भतीजे थे। कल्ला राठौड़ ने जयमल मेड़तिया को अपने कंधों पर बिठा दिया और रणक्षेत्र में कूद पड़े। शत्रुओं के अगणित शीश उतारने के पश्चात मेड़तिया यौद्धा वीरगति को प्राप्त हुए।

यही युद्ध था, जिसमें अकबर ने 30,000 निर्दोष हिंदुओं का नरसंहार किया था। कोई इतिहासकार इसकी संख्या 50,000 तक बताते हैं।

अकबर यह युद्ध फरवरी 1568 में जीत पाता है। बस इतना पर्याप्त है, यह बताने के लिए कि जयमल मेड़तिया के नेतृत्व, पराक्रम और स्वामीभक्ति का स्तर क्या था !

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